सुंदर विचार

भवभूति (संस्कृत-रचनाकार)

भवभूति संस्कृत के महान कवि एवं सर्वश्रेष्ठ नाटककार थे। उन्होंने अपने नाटकों में संस्कृत और प्राकृत दोनों भाषाओँ का प्रयोग किया है। राजशेखर ने इन्हें वाल्मिकी का अवतार कहा है।    समय- 650 ई. से 750 के बीच माना जाता है। (7वीं शताब्दी का उतरार्द्ध)  जन्म स्थान- दक्षिणी भारत का पदमपुर नगर मूलनाम- श्रीकंठ/भट्ट श्रीकंठ… Continue reading भवभूति (संस्कृत-रचनाकार)

महाकवि भास (संस्कृत-महाकवि)

महाकवि भास संस्कृत साहित्य के सुप्रसिद्ध नाटककार थे। संस्कृत नाटककारों में महाकवि भास का नाम सम्मान का विषय रहा है। भास के जीवनकाल के विषय में अधिक जानकारी प्राप्त नहीं है। महाकवि कालिदास जी को गुप्तकालीन कहा जाता है। कालिदास ने अपने नाटक में पहले के लोकप्रिय नाटककारों का चर्चा करते हुए सबसे पहले महाकवि… Continue reading महाकवि भास (संस्कृत-महाकवि)

समय समाज और साहित्य

समय ना ठहरा है कभी, बदली कभी न चाल। जिसके जैसे कर्म हैं, उसका  वैसा  हाल  ।।       समय 'लेटिन' भाषा का शब्द है। समयका निर्माण सृष्टि के निर्माण के साथ हुआ होगा। समय पिछले युगों में था, इस युग में है और आनेवाले युग में भी रहेगा। जब तक सृष्टि रहेगा समय भी साथ… Continue reading समय समाज और साहित्य

डॉ. अहिल्या मिश्र : मेरी पहली भेंट

साहित्य समाज का दर्पण है और साहित्यकार मानव-समाज का दर्पण। साहित्यकार के अंतस में युग चेतना होती है। यही युग चेतना साहित्य सृजन करने का आधार बनती है। श्रेष्ठ साहित्य भावनात्मक स्तर पर व्यक्ति और समाज को संस्कारित करता है और उसे युग चेतना से साक्षात्कार करवाता है। साहित्यकार जिस समाज में रहता है, उस… Continue reading डॉ. अहिल्या मिश्र : मेरी पहली भेंट

भक्ति आंदोलन और रैदास

"भक्ति द्रविड़ उपजी लाए रामानंद प्रकट किया कबीर ने सप्तद्वीप नव खंड।।"1       भक्ति आन्दोलन का उदय मध्यकालीन इतिहास की एक प्रमुख घटना है। इसका उदय अकस्मात् नहीं हुआ है बल्कि पहले से ही इसकी निर्माण की प्रक्रिया शुरू हो चुकी थी, युगीन परिस्थितियों ने इसे गति प्रदान किया। भक्ति भावना का उद्भव सबसे पहले… Continue reading भक्ति आंदोलन और रैदास

संदर्भ ग्रंथ सूचि

शोध कार्य में ग्रंथ सूचि का महत्व निर्विवाद है। इसे संदर्भ ग्रंथ सूचि भी कहा जाताहै। ग्रंथ सूचि से तात्पर्य अंग्रेजी के शब्द 'बिब्लियोग्राफी' से बना है, जो बहुत ही व्यापक है। इसकी किसी एक निश्चित परिभाषा के संबंध में विद्वानों में मतभेद है। साहित्य एवं भाषा संबंधी शोध तथ्यों पर आधारित होता है। तथ्यों… Continue reading संदर्भ ग्रंथ सूचि

आत्मकथा

परिभाषा- 'आत्मकथा' किसी व्यक्ति की स्वलिखित जीवन की गाथा है। जब कोई रचनाकार अपनी स्वयं की कथा अपनी शैली में लिखता है, तो उसे 'आत्मकथा' कहते है। इसमें लेखक स्वयं की कथा को बड़ी आत्मीयता के साथ पाठक के सामने प्रस्तुत करता है। लेखक अपने जीवन की विभिन्न परिस्थितियों, पारिवारिक घटनाओं, आर्थिक तथा राजनीतिक पृष्ठभूमि… Continue reading आत्मकथा

रिपोर्ताज

'रिपोर्ताज' गद्य-लेखन की एक विधा है। हिंदी में रिपोर्ताज को 'सूचनिका' और 'रूपनिका' भी कहा जाता है। परन्तु इसका प्रचलित शब्द 'रिपोर्ताज' है। रिपोर्ताज 'फ़्रांसिसी' भाषा का शब्द है। फ़्रांस में यह शब्द अंग्रेजी के 'रिपोर्ट' शब्द के आधार पर द्वितीय विश्व युद्ध के समय बनाया गया। रिपोर्ताज की परिभाषाएँ: हिंदी साहित्य कोश के अनुसार-… Continue reading रिपोर्ताज

हालावादी काव्य

छायावाद के समानांतर चलने वाली काव्याधाराएँ हैं- 1. व्यक्ति चेतना प्रधान काव्यधारा/ हालावाद 2. राष्ट्रीय सांस्कृतिक काव्यधारा 3. समष्टि प्रधान/सामाजिक काव्यधारा हालावाद काव्यधारा- (1933-1936 ई.)       परिभाषा- छायावाद के समानांतर जिन कवियों ने निजी अनिभूति के आधार पर प्रेम, मस्ती एवं अहं से संबंधित काव्य लिखा उनके द्वारा रचित काव्य व्यक्ति चेतना प्रधान या हालावाद… Continue reading हालावादी काव्य

अष्टछाप

अष्टछाप की स्थापना- विं सं 1622 (1565 ई.) में हुआ था।    'अष्टछाप' महाप्रभु श्री वाल्भाचार्य एवं उनके पुत्र विट्ठलनाथ जी के द्वारा स्थापित 8 भक्तिकालीन कवियों का एक समूह था, जिन्होंने अपनी विभिन्न पद एवं कीर्तनों के माध्यम से भगवान् श्रीकृष्ण की विभिन्न लीलाओं का गुणगान किया और वे अष्टछाप कहलायें।   'कृष्णभक्ति शाखा'… Continue reading अष्टछाप