वर्ण की परिभाषा:
कामताप्रसाद गुरु के शब्दों में- “वर्ण उस मूल ध्वनि को कहते हैं, जिसके खण्ड नहीं किए जा सकते हैं।”
(क, अ, ट इसे खण्ड नहीं किया जा सकता है)
आचार्य किशोरीदास वाजपेयी के अनुसार- “वर्ण वह छोटी से छोटी ध्वनि है जो कान का विषय है और जिसके टुकड़े नहीं किए जा सकते हैं।”
परिभाषा- “ध्वनि का लिखित रूप वर्ण कहलाता है। भाषा की सबसे छोटी इकाई ध्वनि है किन्तु रचना के स्तर पर भाषा की सबसे छोटी इकाई वर्ण है।”
ध्वनि, वर्ण और अक्षर में अंतर-
ध्वनि – उच्चरित मौखिक रूप ध्वनि है।
ध्वनि – मुख से निकली हुई हवा का वह स्फोट (उच्चारण) जिसका खण्ड नहीं किया जा सके वह ध्वनि है।
जैसे- क, च, त, प आदि
वर्ण – ध्वनि का लिखित रूप ‘वर्ण’ कहलाता है।
अक्षर – वह ध्वनि या ध्वनि समूह है, जिसका उच्चारण श्वास के एक झटके में हो जाता है।
वर्णमाला की परिभाषा- “निश्चित क्रम में व्यवस्थित, लिखित, संपूर्ण ध्वनि – चिह्नों का समूह वर्णमाला कहलाता है।”
हिन्दी वर्णमाला: मानक हिन्दी में निम्नलिखित 52 वर्ण हैं।
अ आ इ ई उ ऊ ऋ ए ऐ ओ औ = 11 स्वर हैं।
अं (अनुस्वार) अ: (विसर्ग) अं अ: अयोगवाह – 02
क ख ग घ ङ
च छ ज झ ञ
त ठ ड ढ ण
त थ द ध न
प फ ब भ म – क से म 25 स्पर्श व्यंजन
य र ल व – 04 अंतःस्थ व्यंजन
श ष स ह – 04 ऊष्ण व्यंजन
क्ष त्र ज्ञ श्र – 04 संयुक्त व्यंजन
ड ढ़ – 02 उत्क्षिप्त व्यंजन
स्वर की परिभाषा- वे ध्वनियाँ जिनका उच्चारण करते समय हवा बिना किसी बाधा के मुख से बाहर निकल जाती है अथार्त मुखांग स्पर्श नहीं करते हैं। जो स्वतंत्र रूप से उच्चरित होते हैं, उन्हें स्वर कहते हैं। (मुखांग = मुख + अंग = तालु, दंत, जिह्वा, कंठ, ओष्ठ, मूर्धा)
हिन्दी में स्वरों की संख्या- अ आ इ ई उ उ ऋ ए ऐ ओ औ = 11 स्वर है।
हिन्दी में शुद्ध स्वरों की संख्या- अ आ इ ई उ उ ए ऐ ओ औ = 10 स्वर है।
वर्तमान में ‘ऋ’ का उच्चारण र + इ = ‘रि’ करने लगे हैं। अतः यह हिन्दी में शुद्ध स्वर नहीं रह गया है। अतः हिन्दी में शुद्ध स्वरों की संख्या 10 है।
स्वरों का वर्गीकरण-
1. उत्पत्ति के आधार पर स्वरों के दो भेद होते हैं
(क) मूल स्वर
(ख) संधि स्वर
संधि स्वर के दो प्रकार हैं– 1.मूल स्वर और 2. संधि स्वर
1.मूल स्वर- वे स्वर जिनकी उत्पत्ति किसी अन्य स्वर के योग से नहीं हुई है। इनकी संख्या- अ, इ, उ, ऋ – 04 हैं।
2. संधि स्वर- वे स्वर जिनकी उत्पत्ति मूल स्वरों के मेल से हुई है। इनकी संख्या- आ, ई, ऊ, ए, ऐ, ओ, औ – 07 हैं।
संधि स्वर के दो भेद हैं- 1. दीर्घ स्वर और 2. संयुक्त स्वर
1.दीर्घ स्वर- वे स्वर जो दो मूल स्वरों के योग से बनते हैं
अ + अ = आ
इ + इ = ई
उ + उ = ऊ
2. संयुक्त स्वर- वे स्वर जो दो भिन्न स्वरों के योग से बनते हैं, उन्हें संयुक्त स्वर कहते हैं।
अ + ई = ए
अ + ए = ऐ
अ + उ = ओ
अ + ओ = औ
संयुक्त स्वर के दो भेद हैं –
(क) गुण स्वर- ए, ओ
(ख) वृद्धि स्वर- ओ, औ
2. जाति के आधार पर स्वरों का वर्गीकरण:
जाति के आधार पर स्वरों को दो भागों में बाँटा जा सकता है-
- सवर्ण या सजातीय स्वर और 2. असवर्ण या विजातीय स्वर
सवर्ण या सजातीय स्वर- वे स्वर जो एक समान उच्चारण स्थान से उच्चरित होते हैं।
अ, आ – कंठ्य
इ, ई – तालव्य
उ, ऊ – ओष्ठ्य
असवर्ण या विजातीय स्वर – वे स्वर जो अलग-अलग उच्चारण स्थानों से उच्चारित होते हैं।
अ, इ – कंठ और तालव्य
उ, इ – ओष्ठ्य और तालव्य
3. जिह्वा के आधार पर स्वरों का वर्गीकरण
जिह्वा के आधार पर स्वरों का वर्गीकरण तीन प्रकार से किया जा सकता हैं- 1. अग्र स्वर 2. मध्य स्वर और 3. पश्च स्वर
अग्र स्वर- जिनके उच्चारण में जिह्वा का अग्र भाग प्रयुक्त होता है। उसे अग्र स्वर कहते हैं इ, ई, ए, ऐ 04 हैं।
(‘ऋ’ भी अग्र स्वर है, लेकिन गिनती में नहीं आएगा)
मध्य स्वर- जिनके उच्चारण में जिह्वा का मध्य भाग प्रयुक्त होता है। उसे मध्य स्वर कहते हैं- अ 01 है।
पश्च स्वर- जिनके उच्चारण में जिह्वा का अंतिम भाग प्रयुक्त होता है। उसे पश्च स्वर कहते हैं- आ, उ, ऊ, ओ, औ 05 हैं।
(अंग्रेजी से आगत ‘ऑ’ भी पश्च स्वर है, लेकिन इसे हिन्दी में स्थान नहीं दिया गया है)
4. ओष्ठाकृति या मुखाकृति के आधार पर स्वरों का वर्गीकरण:
ओष्ठाकृति या मुखाकृति के आधार पर स्वरों दो भागों में वर्गीकरण कर सकते हैं-
(क) वर्तुल / गोलाकार / वृत्ताकार या वृत्तामुखी स्वर:
वे स्वर जिनका उच्चारण करते समय ओष्ठ गोल हो जाते हैं अथार्त वृत जैसी आकृति ग्रहण कर लेते है। उन्हें वर्तुल / गोलाकार / वृत्ताकार या वृत्तामुखी स्वर कहते हैं।
ये निम्न हैं- उ, ऊ, ओ, औ – 04 हैं।
(ख) अवृताकार / अवृत्तमुखी या प्रसृत स्वर:
वे स्वर जिनका उच्चारण करते समय ओष्ठ गोल नहीं होते, अपितु फैले जाते हैं। उन्हें अवृताकार / आवृत्तमुखी या प्रसृत स्वर कहते हैं।
ये निम्न है- अ, आ, इ, ई, ए, ऐ – 06 हैं।
(ऋ अर्द्ध वृताकार स्वर है)
नोट: उपर्युक्त स्वरों के वर्गीकरण को डॉ भोलानाथ तिवारी. किशोरीदास वाजपेयी और कामता प्रदास गुरु ने किया है। ये तीनों ऋ को शुद्ध स्वर नहीं मानते है। इसलिए उन्होंने ऋ को शामिल नहीं किया है।
5. उच्चारण स्थान के आधार पर स्वरों का वर्गीकरण:
उच्चारण स्थान के आधार पर स्वरों के छह भेद हैं-
कंठ्य स्वर – अ, आ
तालव्य स्वर – इ, ई
मूर्धन्य स्वर – ऋ
ओष्ठ्य स्वर – उ, ऊ
कंठ्य-तालव्य – ए, ऐ
कंठोष्ठ्य – ओ, औ
6. मुख के खुलने के आधार पर स्वरों का वर्गीकरण:
मुख के खुलने के आधार पर स्वरों को 4 भागों में वर्गीकरण किया जा सकता हैं-
(क) संवृत स्वर- वे स्वर जिनके उच्चारण में मुख न के बराबर खुलता है, अथार्त लगभग बंद रहता है। इ, ई, उ, ऊ
(ख) विवृत स्वर- वे स्वर जिनके उच्चारण में मुख पूरा खुल जाता है, उसे विवृत स्वर कहते है। ‘आ’
(ग) अर्द्ध संवृत स्वर- वे स्वर जिनके उच्चारण में मुख आधे से कम खुलता है। उसे अर्द्ध संवृत स्वर कहते हैं। ए, ओ, ऋ
(घ) अर्द्ध विवृत स्वर- वे स्वर जिनके उच्चारण में मुख आधे से अधिक या ज्यादा खुलता है। उस अर्द्ध विवृत स्वर कहते है। अ, ऐ, औ ऑ
7. उच्चारण में लगने वाले समय / मात्रा / कालमान के आधार पर स्वरों का वर्गीकरण:
उच्चारण में लगने वाले समय / मात्रा / कालमान के आधार पर स्वरों का वर्गीकरण दो प्रकार से किया जा सकता है।
- ह्रस्व, लघु या एकमात्रिक स्वर – जिनके उच्चारण में अल्प या एक मात्रा का समय लगता है उसे ह्रस्व, लघु या एकमात्रिक स्वर कहते है। ये निम्न है- अ, इ, उ, ऋ
(ख) दीर्घ या गुरु स्वर – जिनके उच्चारण में ह्रस्व स्वर की तुलना दुगुना या दो मात्राओं का समय लगता है। उसे दीर्घ या गुरु स्वर कहते है। ये निम्न है- आ ई उ ऊ ए, ऐ, ओ, औ
8. मांस पेशियों के दृढ़ता के आधार पर स्वरों का वर्गीकरण:
कामता प्रसाद गुरु के अनुसार- मांस पेशियों के दृढ़ता के आधार पर स्वरों का वर्गीकरण तीन प्रकार से किया जा सकता है।
(क) शिथिल स्वर- अ, इ, उ
(ख) दृढ़ स्वर- ई, ऊ
(ग) मध्य स्वर– ए
9. उच्चारण स्थान के आधार पर स्वरों का वर्गीकरण:
उच्चारण स्थान के आधार पर स्वरों का वर्गीकरण दो प्रकार से किया जा सकता है।
(क) अनुनासिक / सानुनासिक – जिनके उच्चारण में ध्वनि मुख के साथ नासिका से भी निकले उसे अनुनासिक स्वर कहते है। अ, आ, ईं
(ख) निरनुनासिक / अनुनासिक – जिनके उच्चारण में ध्वनि केवल मुख से निकले उसे निरनुनासिक / अनुनासिक स्वर कहते है। अ, आ, इ, ऊ
स्वरों के विषय में विशेष तथ्य:
- स्वरों का उच्चारण करते समय स्वर यंत्रियों में कंपन, नाद, गूंज, घोष या झंकार होती है। अतः सभी स्वर घोष / सघोष होते है।
- स्वरों के उच्चारण में श्वास की मात्रा कम लगती है। अतः सभी स्वर अल्प प्राण हैं।
- ‘ऋ’ का प्रयोग केवल तत्सम शब्दों में होते है। अतः ‘ऋ’ को तत्सम स्वर कहते है।
- ‘अ’ एक मात्र ऐसा स्वर है, जिसकी कोई स्वर नहीं मानी जाती है। स्वर 11 और स्वत की मात्राएँ 10 हैं।
व्यंजन- वे ध्वनियाँ जिनका उच्चारण करते समय मुख से बाहर निकलने वाली मुखांगों को बाधा का सामना करना पड़ता है अथार्त मुखांग परस्पर स्पर्श करते हैं, उसे व्यंजन कहते हैं।
मुखांग- कंठ, तालु, मूर्धा, दंत, ओष्ठ और बीच में ‘जिह्वा’ है। व्यंजन स्वरों की सहायता से उच्चरित होते हैं। अथार्त बिना स्वरों के इन व्यंजनों का उच्चारण संभव नहीं है।
हिंदी में व्यंजनों की संख्या निम्नलिखित 33 हैं-
क ख ग घ ङ
च छ ज झ ञ
ट ठ ड ढ ण
त थ द ध न
प फ ब भ म
य र ल व श ष स ह (33)
क्ष त्र ज्ञ श्र (संयुक्त व्यंजन 04) है।
स्पर्श/ वर्गीय व्यंजन – क से म = 25
अंतःस्थ व्यंजन = य, र, ल, व = 04
ऊष्ण व्यंजन = श, ष, स, ह = 04
केंद्रीय हिंदी निदेशालय के अनुसार व्यंजनों की संख्या 35 है। (33 + ड़, ढ़ = 35 हैं।)
व्यंजनों का वर्गीकरण:
1. उच्चारण स्थान के आधार पर व्यंजनों का वर्गीकरण:
कंठ्य व्यंजन – क, ख, ग, घ, ङ, ह
तालव्य व्यंजन – च, छ, ज, झ, ञ, य, श
मूर्धन्य व्यंजन – ट, ठ, ड, ढ, ण, र, ष
दंत्य व्यंजन – त, थ, द, ध, न, ल, स
ओष्ठ व्यंजन – प, फ, ब, भ, म
नासिक्य व्यंजन – ङ्, ञ्, ण्, न्, म्,
(ये सभी द्वीय स्थानीय व्यंजन है।)
जय हिंद