बात बहुत पुरानी और सत्य है। हमारे नानी के यहाँ की एक पड़ोसी की कहानी है। वैसे तो नानी के यहाँ सभी बुजुर्ग औरतें मर्द नाना-नानी और सभी नौजवान लड़का-लड़की मामा-मौसी कहलाते हैं। हमारे नानी के पड़ोसी रामशरण सिंह और उनकी पत्नी कौशल्या बहुत ही अच्छे और संस्कारी थे। उनके पाँच बच्चे थे। तीन बेटियाँ और दो बेटे। सभी बच्चों का शादी-ब्याह हो गया था। बेटियाँ अपने-अपने ससुराल में रहती थी। दोनों बेटा सरकारी नौकरी करते थे। बड़ी बहु मीरा के चार बच्चे और छोटी बहु रीमा के दो बच्चे थे। मीरा बहुत ही सुघड़ और काम-काज करने में तेज थी। मीरा काम से नहीं डरती थी, उलटे काम ही मीरा से डरता था। गाँव के लोग अपनी बहुओं को मीरा का उदाहरण दिया करते थे। चार बच्चों की माँ बनने के बाद भी उसकी सुन्दरता में कोई कमी नहीं आई थी। जबकि सुबह से लेकर शाम तक ‘कोल्हू की बैल’ की तरह वह काम करते रहती थी। बात उस समय की है, जब पीसिया-कुटिया भी घर में ही करना होता था। इतना सब करने के बाद भी कोई उसे प्यार के दो शब्द नहीं बोलता था। उसकी सास कौशल्या के नजर में तो वह नहीं थकने वाली आज के समय की लोहे की मशीन यानी ‘रोबोट’ थी। दूसरी बहू रीमा गाँव के एक विधालय में शिक्षिका थी। वह सुबह दस बजे जाती और शाम चार बजे विद्यालय से लौटती थी। उसे घर के काम-काज से कोई मतलब नहीं था। उसके दो बच्चे थे। उसके बच्चों की देख-रेख भी बड़ी बहू ही करती थी। ससुर रामशरण सिंह बहुत नेक स्वभाव के व्यक्ति थे। वे हमेशा अपनी बड़ी बहू की तारीफ करते थकते नहीं थे। कभी-कभी वे बहू के छोटे-मोटे कामों में कुछ-कुछ मदद करने की कोशिश भी करते थे, किन्तु मीरा उन्हें काम नहीं करने देती थी। वे बजुर्ग थे, इसलिए उनके काम करने से मीरा को शर्मिंदगी महसूस होता था। सास कौशल्या शरीर से हृष्ट-पुष्ट तो थी, किन्तु पहले की सास आज की सास जैसी नहीं थी। वे तो बहु के आते ही घर का काम-धाम छोड़-छाड़ कर बैठ जाती थी। उपर से सब काम होने के बाद रात में सास का पैर भी दबाना आवश्यक होता था। छोटी बहु को सास से कोई मतलब नहीं था। वह तो बस सास से हमेशा दूर रहने की कोशिश में रहती थी। सास कही कोई काम करने को न कह दे। जब भी सास छोटी बहु को कुछ काम करने को कहती, वह कोई न कोई बहाना मारकर इधर-उधर चली जाती थी। इस बात से सास हमेशा उससे चिढ़ती थी। लेकिन छोटी बहु को कोई फर्क नहीं पड़ता था। कुछ दिन बाद छोटा बेटा किसी पूजा के छुट्टी में घर आया। माँ छोटी बहु का शिकायत अपने बेटे से करते हुए बोली, तुम्हारी पत्नी थोड़ा भी घर के काम-काज पर ध्यान नहीं देती है। छोटा बेटा माँ की बात सुनकर भी कुछ नहीं कहा। क्योंकि उसकी बीबी कमासूत जो थी। कुछ दिन बाद उसकी छुट्टी ख़त्म हो गई और वह वापस अपने काम पर लौट गया।
बेटा के जाने के कुछ दिन बाद ही छोटी बहु रीमा का तबियत खराब रहने लगा था। पति के जाने के दो दिन बाद रीमा विद्यालय नहीं गई। रीमा ने मीरा से कहा, दीदी आज मैं विद्यालय नहीं जाऊँगी। मीरा पूछी, क्यों? क्या हुआ? तुम्हारी तबियत तो ठिक है न? उसने कहा, हाँ तबियत ठिक है, लेकिन थोड़ी कमजोरी और चक्कर जैसा महसूस हो रहा है। मीरा मन ही मन समझ रही थी कि उसकी तबियत क्यों ख़राब है? देवर छुट्टी आया हुआ था, हो न हो रीमा फिर पेट से है। बात सही थी। वह तीसरी बार गर्भवती हो गई थी। अब तो उसके और भी नखरे शुरू हो गए। बड़ी बहु को हैरान परेशान देखकर सास छोटी बहु से बोली तुम बड़ी की भी थोडा बहुत मदद कर दिया करो, हमेशा वो काम में ही लगी रहती है। उसे सुबह से लेकर शाम तक आराम नहीं मिलता है। कहीं बीमार पड़ गई तो सबके नखरे ख़त्म हो जायेंगे। एक दिन छोटी बहु और सास में कुछ कहा सुनी होने लगी तभी छोटी बहु ने सास को कुछ कहा गुस्से में आकर सास ने उसे कहा हे भगवान्! इसे ऐसा बच्चा देना की हमेशा उसी में लगी रहे। मीरा अपनी सास की मुँह से यह शाप सुनकर बहुत दु:खी हुई। उसने सास से कहा, माँ जी आपको इस तरह की बात नहीं कहना चाहिए था। उसे पता था कि बड़ों का शाप कभी-कभी सत्य भी हो जाता है।
बड़ी बहु भी अपने सास से बोली माँ जी आपको इस तरह से रीमा को नहीं बोलना चाहिए था। सास बड़ी बहु से बोली, तुम दिन भर बैल की तरह काम करती रहती हो। रीमा छुट्टी के दिन भी तुम्हारा मदद नहीं करती है। उपर से दो-चार बातें तुम्हें ही सूना कर चल देती है। यह सब देखकर मुझे दुःख होता है। तुम्हें भी तो आराम मिलना चाहिए। कुछ दिन बाद रीमा को सुंदर सी बेटी पैदा हुई। उसके मन में जिस बात डर था। वह अब निकल चूका था। धीरे-धीरे सब कुछ ठीक चल रहा था। रीमा की बेटी धीरे-धीरे बड़ी हो रही थी। उस बच्ची की प्रतिक्रिया अन्य बच्चों से थोड़ी अलग थी। यह देखकर रीमा चिंतित थी। लेकिन वह परिवार में किसी को नहीं बता रही थी। एक दिन वह अपनी बेटी को लेकर डॉक्टर के पास गई। डॉक्टर बच्चे का चेकअप करने के बाद कहा, किसी बात की चिंता न करे हो सकता है कि कुछ दिन बाद प्रतिक्रिया देने लगे। आप इस बच्चे को अधिक से अधिक समय दे और इसके हर क्रिया-कलाप पर ध्यान दें। लेकिन रीमा के पास समय कहाँ था। वो तो सबेरे स्कूल जाती और शाम को घर आती थी। उसका एक बड़ा भाई मोहन और बड़ी बहन कविता थी। वे दोनों भाई-बहन अपनी छोटी बहन सविता की देख रेख किया करते थे। धीरे-धीरे समय बीतता गया सविता न तो बोल पाती थी और ना ही खड़ा हो पाती थी। सिर्फ वह दी, दी, दी, ही बोलती थी और कुछ भी नहीं बोल पाती थी। समय बीतता जा रहा था। सविता अब बड़ी हो गई थी। उसे ‘रजोधर्म’ भी होने लगा था। जैसे-जैसे सविता बड़ी हो रही थी वैसे-वैसे घर के लोगों का चिंता भी बढ़ता जा रहा था। अब कविता की शादी की बात चलने लगी थी। कविता बहुत ही सुंदर थी। सविता कविता से भी अधिक सुंदर थी। कविता के कई रिश्ते आए। लेकिन शादी ठीक नहीं हो पा रहा था। इसका कारण था उसकी छोटी बहन सविता। क्योंकि उसकी माँ ने लड़के वाले से शर्त रखा था कि जो मेरी छोटी बेटी से शादी करेगा उसीसे मैं बड़ी बेटी की शादी करूंगी। उनके पास पैसा बहुत था। वे लोग पैसे से लड़के वालों को खरीदना चाहते थे लेकिन सभी लोग बिकाऊं नहीं होते हैं।
एक दिन की बात है। रीमा बहुत दुखी और चिढ़ी हुई थी। रीमा अपने इस जिंदगी से उब चुकी थी और परेशान भी। सास को बार-बार कहती थी इन्हीं के शाप से मेरी यह दुर्दशा हो रही है। इन्होंने मुझे शाप नहीं दिया होता तो मेरी बच्ची की ऐसी हालत नहीं होती। इन्हीं का शाप लगा है। एक दिन की बात है रीमा अपनी सास के पास गई। बीना कुछ बोले वह चुपचाप सास के पास खड़ी होकर रो रही थी। सास बोली, क्या बात है? तुम इस तरह क्यों रो रही हो? रीमा अपनी सास का पैर पकड़ कर रोते हुए बोली! माँ जी अब आप अपनी शाप से हमें मुक्त कीजिए। मैं अपने जीवन से तंग आ चुकी हूँ। रीमा अपनी सास से माफ़ी मांगते हुए बोली, माँ मुझे माफ़ कर दीजिए और हमारी बच्ची को अपनी शाप से मुक्त कीजिए। उसकी सास तो सब देख ही रही थी। उसे भी अपने उपर ग्लानि हो रही थी। रीमा से उसकी सास बोली। अच्छा, तुम जाओ सब ठीक हो जाएगा। बड़े बुजुर्ग अक्सर कहते हैं कि 24 घंटे में एक बार देवी सरस्वती हर व्यक्ति की जुबान पर जरुर आकर बैठती हैं। उस समय की बोली हुई बात सच होती है। वाणी में कटुता नहीं होनी चाहिए क्योंकि खुद के साथ दूसरों का भी नुक्सान हो सकता है। कबीर दास ने ठीक कहा है-
“ऐसी वाणी बोलिए मन का आपा खोये।
औरन को शीतल करै, आपहुं शीतल होय॥”