उस दिन के बाद बचनसिंह लगभग रोज़ ही आने-जाने लगा। जगपती उसके साथ इधर-उधर घूमता भी रहता। बचनसिंह के साथ वह जब तक रहता, अजीब-सी घुटन उसके दिल को बाँध लेती, और तभी जीवन की तमाम विषमताएँ भी उसकी निगाहों के सामने उभरने लगतीं, आख़िर वह स्वयं एक आदमी है, बेकार…यह माना कि उसके सामने पेट पालने की कोई इतनी विकराल समस्या नहीं, वह भूखों नहीं मर रहा है, जाड़े में काँप नहीं रहा है, पर उसके दो हाथ-पैर हैं, शरीर का पिंजरा है, जो कुछ माँगता है, कुछ! और वह सोचता, यह कुछ क्या है? सुख? शायद हाँ, शायद नहीं। वह तो दुःख में भी जी सकने का आदी है, अभावों में जीवित रह सकने वाला आश्चर्यजनक कीड़ा है। तो फिर वासना? शायद हाँ, शायद नहीं। चंदा का शरीर लेकर उसने उस क्षणिकता को भी देखा है। तो फिर धन…शायद हाँ, शायद नहीं। उसने धन के लिए अपने को खपाया है।
पर वह भी तो उस अदृश्य प्यास को बुझा नहीं पाया। तो फिर?…तो फिर क्या?…वह कुछ क्या है, जो उसकी आत्मा में नासूर-सा रिसता रहता है, अपना उपचार माँगता है? शायद काम! हाँ, यही, बिल्कुल यही, जो उसके जीवन की घड़ियों को निपट सूना न छोड़े, जिसमें वह अपनी शक्ति लगा सके, अपना मन डुबो सके, अपने को सार्थक अनुभव कर सके, चाहे उसमें सुख हो या दुःख, अरक्षा हो या सुरक्षा, शोषण हो या पोषण…उसे सिर्फ़ काम चाहिए! करने के लिए कुछ चाहिए। यही तो उसकी प्रकृत आवश्यकता है, पहली और आख़िरी माँग है, क्योंकि वह उस घर में नहीं पैदा हुआ, जहाँ सिर्फ़ ज़बान हिलाकर शासन करने वाले होते हैं। वह उस घर में भी नहीं पैदा हुआ, जहाँ सिर्फ़ माँगकर जीने वाले होते हैं। वह उस घर का है, जो सिर्फ़ काम करना जानता है, काम ही जिसकी आस है। सिर्फ़ वह काम चाहता है, काम।
और एक दिन उसकी काम-धाम की समस्या भी हल हो गई। तालाब वाले ऊँचे मैदान के दक्षिण ओर जगपती की लकड़ी की टाल खुल गई। बोर्ड तक टंग गया। टाल की ज़मीन पर लक्ष्मी-पूजन भी हो गया और हवन भी हुआ। लकड़ी की कोई कमी नहीं थी। गाँव से आने वाली गाड़ियों को, इस कारोबार में पैरे हुए आदमियों की मदद से मोल-तोल करवा के वहाँ गिरवा दिया गया। गाँठें एक ओर रखी गईं, चैलों का चट्टा क़रीने से लग गया और गुद्दे चीरने के लिए डाल दिए गए। दो-तीन गाड़ियों का सौदा करके टाल चालू कर दी गई। भविष्य में स्वयं पेड़ ख़रीदकर कटाने का तय किया गया। बड़ी-बड़ी स्कीमें बनीं कि किस तरह जलाने की लकड़ी से बढ़ाते-बढ़ाते एक दिन इमारती लकड़ी की कोठी बनेगी। चीरने की नई मशीन लगेगी। कारोबार बढ़ जाने पर बचनसिंह भी नौकरी छोड़कर उसी में लग जाएगा, और उसने महसूस किया कि वह काम में लग गया है, अब चौबीसों घंटे उसके सामने काम है। उसके समय का उपयोग है। दिन-भर में वह एक घंटे के लिए किसी का मित्र हो सकता है, कुछ देर के लिए वह पति हो सकता है, पर बाक़ी समय? दिन और रात के बाक़ी घंटे, उन घंटों के अभाव को सिर्फ़ उसका अपना काम ही भर सकता है। और अब वह कामदार था।
वह कामदार तो था, लेकिन जब टाल की उस ऊँची ज़मीन पर पड़े छप्पर के नीचे तख़्त पर वह गल्ला रखकर बैठता, सामने लगे लकड़ियों के ढेर, कटे हुए पेड़ के तने, जड़ों को लुढ़का हुआ देखता, तो एक निरीहता बरबस उसके दिल को बाँधने लगती। उसे लगता, एक व्यर्थ पिशाच का शरीर टुकड़े-टुकड़े करके उसके सामने डाल दिया गया है। फिर इन पर कुल्हाड़ी चलेगी और इनके रेशे-रेशे अलग हो जाएँगे और तब इनकी ठठरियों को सुखाकर किसी पैसेवाले के हाथ तक पर तौलकर बेच दिया जाएगा। और तब उसकी निगाहें सामने खड़े ताड़ पर अटक जातीं, जिसके बड़े-बड़े पत्तों पर सुर्ख़ गर्दनवाले गिद्ध पर फड़फड़ाकर देर तक ख़ामोश बैठे रहते। ताड़ का काला गड़रेदार तना और उसके सामने ठहरी हुई वायु में निस्सहाय काँपती, भारहीन नीम की पत्तियाँ चकराती झड़ती रहतीं धूल-भरी धरती पर लकड़ी की गाड़ियों के पहियों की पड़ी हुई लीक धुँधली-सी चमक उठती और बग़लवाले मूँगफल्ली के पेंच की एकरस खरखराती आवाज़ कानों में भरने लगती। बग़लवाली कच्ची पगडंडी से कोई गुज़रकर, टीले के ढलान से तालाब की निचाई में उतर जाता, जिसके गंदले पानी में कूड़ा तैरता रहता और सूअर कीचड़ में मुँह डालकर उस कूड़े को रौंदते रहते। दुपहर सिमटती और शाम की धुँध छाने लगती, तो वह लालटेन जलाकर छप्पर के खंभे की कील में टाँग देता और उसके थोड़ी ही देर बाद अस्पताल वाली सड़क से बचनसिंह एक काले धब्बे की तरह आता दिखाई पड़ता। गहरे पड़ते अँधेरे में उसका आकार धीरे-धीरे बढ़ता जाता और जगपती के सामने जब वह आकर खड़ा होता, तो वह उसे बहुत विशाल-सा लगने लगता, जिसके सामने उसे अपना अस्तित्व डूबता महसूस होता।
एक-आध बिक्री की बातें होतीं और तब दोनों घर की ओर चल देते। घर पहुँचकर बचनसिंह कुछ देर ज़रूर रुकता, बैठता, इधर-उधर की बातें करता। कभी मौक़ा पड़ जाता, तो जगपती और बचनसिंह की थाली भी साथ लग जाती। चंदा सामने बैठकर दोनों को खिलाती।
बचनसिंह बोलता जाता, “क्या तरकारी बनी है। मसाला ऐसा पड़ा है कि उसकी भी बहार है और तरकारी का स्वाद भी न मरा। होटलों में या तो मसाला ही मसाला रहेगा या सिर्फ़ तरकारी ही तरकारी। वाह! वाह! क्या बात है अंदाज़ की”
और चंदा बीच-बीच में टोककर बोलती जाती, “इन्हें तो जब तक दाल में प्याज़ का भुना घी न मिले, तब तक पेट ही नहीं भरता।”
या-“सिरका अगर इन्हें मिल जाए, तो समझो, सब कुछ मिल गया। पहले मुझे सिरका न जाने कैसा लगता था, पर अब ऐसा ज़बान पर चढ़ा है कि” या- “इन्हें काग़ज़-सी पतली रोटी पसंद ही नहीं आती। अब मुझसे कोई पतली रोटी बनाने को कहे, तो बनती ही नहीं, आदत पड़ गई है, और फिर मन ही नहीं करता…”
पर चंदा की आँखें बचनसिंह की थाली पर ही जमीं रहतीं। रोटी निबटी, तो रोटी परोस दी, दाल ख़त्म नहीं हुई, तो भी एक चमचा और परोस दी। और जगपती सिर झुकाए खाता रहता। सिर्फ़ एक गिलास पानी माँगता और चंदा चौंककर पानी देने से पहले कहती, “अरे तुमने तो कुछ लिया भी नहीं!” कहते-कहते वह पानी दे देती और तब उसके दिल पर गहरी-सी चोट लगती, न जाने क्यों वह ख़ामोशी की चोट उसे बड़ी पीड़ा दे जाती…पर वह अपने को समझा लेती, कोई मेहमान तो नहीं हैं…माँग सकते थे। भूख नहीं होगी।
जगपती खाना खाकर टाल पर लेटने चला जाता, क्योंकि अभी तक कोई चौकीदार नहीं मिला था। छप्पर के नीचे तख़्त पर जब वह लेटता, तो अनायास ही उसका दिल भर-भर आता। पता नहीं कौन-कौन-से दर्द एक-दूसरे से मिलकर तरह-तरह की टीस, चटखन और ऐंठन पैदा करने लगते। कोई एक रग दुखती तो वह सहलाता भी, जब सभी नसें चटखती हों तो कहाँ-कहाँ राहत का अकेला हाथ सहलाए!
लेटे-लेटे उसकी निगाह ताड़ के उस ओर बनी पुख़्ता क़ब्र पर जम जाती, जिसके सिराहने कंटीला बबूल का एकाकी पेड़ सुन्न-सा खड़ा रहता। जिस क़ब्र पर एक पर्दानशीन औरत बड़े लिहाज़ से आकर सवेरे-सवेरे बेला और चमेली के फूल चढ़ा जाती…घूम-घूमकर उसके फेरे लेती और माथा टेककर कुछ क़दम उदास-उदास-सी चलकर
एकदम तेज़ी से मुड़कर बिसातियों के मुहल्ले में खो जाती। शाम होते फिर आती। एक दीया बारती और अगर की बत्तियाँ जलाती। फिर मुड़ते हुए ओढ़नी का पल्ला कंधों पर डालती, तो दीए की लौ काँपती, कभी काँपकर बुझ जाती, पर उसके क़दम बढ़ चुके होते, पहले धीमे, थके, उदास-से और फिर तेज़ सधे सामान्य-से। और वह फिर उसी मुहल्ले में खो जाती और तब रात की तनहाइयों में…बबूल के काँटों के बीच, उस साँय-साँय करते ऊँचे-नीचे मैदान में जैसे उस क़ब्र से कोई रूह निकलकर निपट अकेली भटकती रहती।
तभी ताड़ पर बैठे सुर्ख़ गर्दनवाले गिद्ध मनहूस-सी आवाज़ में किलबिला उठते और ताड़ के पत्ते भयानकता से खड़बड़ा उठते। जगपती का बदन काँप जाता और वह भटकती रूह ज़िंदा रह सकने के लिए जैसे क़ब्र की ईंटों में, बबूल के साया-तले दुबक जाती। जगपती अपनी टाँगों को पेट से भींचकर, कंबल से मुँह छुपा औंधा लेट जाता।
तड़के ही ठेके पर लगे लकड़हारे लकड़ी चीरने आ जाते। तब जगपती कंबल लपेट, घर की ओर चला जाता
“राजा रोज़ सबेरे टहलने जाते थे,” माँ सुनाया करती थीं, “एक दिन जैसे ही महल के बाहर निकलकर आए कि सड़क पर झाड़ू लगाने वाली मेहतरानी उन्हें देखते ही अपना झाडूपंजा पटककर माथा पीटने लगी और कहने लगी, “हाय राम! आज राजा निरबंसिया का मुँह देखा है, न जाने रोटी भी नसीब होगी कि नहीं…न जाने कौन-सी बिपत टूट पड़े!” राजा को इतना दुःख हुआ कि उल्टे पैरों महल को लौट गए। मंत्री को हुक्म दिया कि उस मेहतरानी का घर नाज़ से भर दें। और सब राजसी वस्त्र उतार, राजा उसी क्षण जंगल की ओर चले गए। उसी रात रानी को सपना हुआ कि कल की रात तेरी मनोकामना पूरी होने वाली है। रानी बहुत पछता रही थी। पर फ़ौरन ही रानी राजा को खोजती-खोजती उस सराय में पहुँच गई, जहाँ वह टिके हुए थे। रानी भेस बदलकर सेवा करने वाली भटियारिन बनकर राजा के पास रात में पहुँची। रातभर उनके साथ रही और सुबह राजा के जगने से पहले सराय छोड़ महल में लौट गई। राजा सुबह उठकर दूसरे देश की ओर चले गए। दो ही दिनों में राजा के निकल जाने की ख़बर राज-भर में फैल गई, राजा निकल गए, चारों तरफ़ यही ख़बर थी।”
और उस दिन टोले-मुहल्ले के हर आँगन में बरसात के मेह की तरह यह ख़बर बरसकर फैल गई कि चंदा के बाल-बच्चा होने वाला है।
नुक्कड़ पर जमुना सुनार की कोठरी में फिंकती सुरही रुक गई। मुंशीजी ने अपना मीज़ान लगाना छोड़ विस्फारित नेत्रों से ताककर ख़बर सुनी। बंसी किरानेवाले ने कुएँ में से आधी गईं रस्सी खींच, डोल मन पर पटककर सुना। सुदर्शन दर्जी ने मशीन के पहिए को हथेली से रगड़कर रोककर सुना। और हंसराज पंजाबी ने अपनी नील-लगी मलगुजी क़मीज़ की आस्तीनें चढ़ाते हुए सुना। और जगपती की बेवा चाची ने औरतों के जमघट में बड़े विश्वास, पर भेद-भरे स्वर में सुनाया- “आज छः साल हो गए शादी को न बाल, न बच्चा, न जाने किसका पाप है उसके पेट में।…और किसका होगा सिवा उस मुसटंडे कंपोटर के! न जाने कहाँ से कुलच्छनी इस मुहल्ले में आ गई!…इस गली की तो पुश्तों से ऐसी मरजाद रही है कि ग़ैर, मरद औरत की परछाईं तब नहीं देख पाए। यहाँ के मरद तो बस अपने घर की औरतों को जानते हैं, उन्हें तो पड़ोसी के घर की ज़नानियों की गिनती तक नहीं मालूम।” यह कहते-कहते उनका चेहरा तमतमा आया और सब औरतें देवलोक की देवियाँ की तरह गंभीर बनीं, अपनी पवित्रता की महानता के बोझ से दबी धीरे-धीरे खिसक गईं।
सुबह यह ख़बर फैलने से पहले जगपती टाल पर चला गया था। पर सुनी उसने भी आज ही थी। दिन-भर वह तख़्त पर कोने की ओर मुँह किए पड़ा रहा। न ठेके की लकड़ियाँ चिरवाईं, न बिक्री की ओर ध्यान दिया, न दुपहर का खाना खाने ही घर गया। जब रात अच्छी तरह फैल गई, वह हिंसक पशु की भाँति उठा। उसने अपनी अँगुलियाँ चटकाईं, मुठ्ठी बाँधकर बाँह का ज़ोर देखा, तो नसें तनीं और बाह में कठोर कंपन-सा हुआ। उसने तीन-चार पूरी साँसें खींचीं और मज़बूत क़दमों से घर की ओर चल पड़ा। मैदान ख़त्म हुआ, कंकड़ की सड़क आई…सड़क ख़त्म हुई, गली आई। पर गली के अँधेरे में घुसते वह सहम गया, जैसे किसी ने अदृश्य हाथों से उसे पकड़कर सारा रक्त निचोड़ लिया, उसकी फटी हुई शक्ति की नस पर हिम-शीतल होंठ रखकर सारा रस चूस लिया। और गली के अँधेरे की हिकारत-भरी कालिख और भी भारी हो गई, जिसमें घुसने से उसकी साँस रुक जाएगी, घुट जाएगी।
वह पीछे मुड़ा, पर रुक गया। फिर कुछ संयत होकर वह चोरों की तरह निःशब्द क़दमों से किसी तरह घर की भीतरी देहरी तक पहुँच गया।
दाईं ओर की रसोईवाली दहलीज़ में कुप्पी टिमटिमा रही थीं और चंदा अस्त-व्यस्त-सी दीवार से सिर टेके शायद आसमान निहारते-निहारते सो गई थी। कुप्पी का प्रकाश उसके आधे चेहरे को उजागर किए था और आधा चेहरा गहन कालिमा में डूबा अदृश्य था।
वह ख़ामोशी से खड़ा ताकता रहा। चंदा के चेहरे पर नारीत्व की प्रौढ़ता आज उसे दिखाई दी। चेहरे की सारी कमनीयता न जाने कहाँ खो गई थी, उसका अछूतापन न जाने कहाँ लुप्त हो गया था। फूला-फूला मुख। जैसे टहनी से तोड़े फूल को पानी में डालकर ताज़ा किया गया हो, जिसकी पंखुरियों में टूटन की सुरमई रेखाएँ पड़ गई हों, पर भीगने से भारीपन आ गया हो।
उसके खुले पैर पर उसकी निगाह पड़ी, तो सूजा-सा लगा। एड़ियाँ भरी, सूजी-सी और नाख़ूनों के पास अजब-सा सूखापन। जगपती का दिल एक बार मसोस उठा। उसने चाहा कि बढ़कर उसे उठा ले। अपने हाथों से उसका पूरा शरीर छू-छूकर सारा कलुष पोंछ दे, उसे अपनी साँसों की अग्नि में तपाकर एक बार फिर पवित्र कर ले, और उसकी आँखों की गहराई में झाँककर कहे-देवलोक से किस शापवश निर्वासित हो तुम इधर आ गईं, चंदा? यह शाप तो अमिट था।
तभी चंदा ने हड़बड़ाकर आँखें खोलीं। जगपती को सामने देख उसे लगा कि वह एकदम नंगी हो गई हो। अतिशय लज्जित हो उसने अपने पैर समेट लिए। घुटनों से धोती नीचे सरकाई और बहुत संयत-सी उठकर रसोई के अँधेरे में खो गई। जगपती एकदम हताश हो, वहीं कमरे की देहरी पर चौखट से सिर टिका बैठ गया। नज़र कमरे में गई तो लगा कि पराए स्वर यहाँ गूँज रहे हैं, जिनमें चंदा का भी एक है। एक तरफ़ घर के हर कोने से, अँधेरा सैलाब की तरह बढ़ता आ रहा था…एक अजीब निस्तब्धता…असमंजस! गति, पर पथभ्रष्ट! शक्लें, पर आकारहीन।
“खाना खा लेते,” चंदा का स्वर कानों में पड़ा। वह अनजाने ऐसे उठ बैठा, जैसे तैयार बैठा हो। उसकी बात की आज तक उसने अवज्ञा न की थी। खाने तो बैठ गया, पर कौर नीचे नहीं सरक रहा था। तभी चंदा ने बड़े सधे शब्दों में कहा, “कल मैं गाँव जाना चाहती हूँ।”
जैसे वह इस सूचना से परिचित था, बोला, “अच्छा।”
चंदा फिर बोली, “मैंने बहुत पहले घर चिठ्ठी डाल दी थी, भैया कल लेने आ रहे हैं।”
“तो ठीक है।” जगपती वैसे ही डूबा-डूबा बोला।
चंदा का बाँध टूट गया और वह वहीं घुटनों में मुँह दबाकर कातर-सी फफक-फफककर रो पड़ी। न उठ सकी, न हिल सकी।
जगपती क्षण-भर को विचलित हुआ, पर जैसे जम जाने के लिए। उसके होंठ फड़के और क्रोध के ज्वालामुखी को जबरन दबाते हुए भी वह फूट पड़ा, “यह सब मुझे क्या दिखा रही है? बेशर्म! बेग़ैरत!…उस वक़्त नहीं सोचा था, जब…जब…मेरी लाश तले…”
“तब…तब की बात झूठ है।”, सिसकियों के बीच चंदा का स्वर फूटा, “लेकिन जब तुमने मुझे बेच दिया…”
एक भरपूर हाथ चंदा की कनपटी पर आग सुलगाता पड़ा। और जगपती अपनी हथेली दूसरी से दबाता, खाना छोड़कर कोठरी में घुस गया और रात-भर कुंडी चढ़ाए उसी कालिख में घुटता रहा।
दूसरे दिन चंदा घर छोड़कर अपने गाँव चली गई।
जगपती पूरा दिन और रात टाल पर ही काट देता, उसी बीराने में, तालाब के बग़ल, क़ब्र, बबूल और ताड़ के पड़ोस में। पर मन मुर्दा हो गया था। ज़बरदस्ती वह अपने को वहीं रोके रहता।…उसका दिल होता, कहीं निकल जाए। पर ऐसी कमज़ोरी उसके तन और मन को खोखला कर गई थी कि चाहने पर भी वह जा न पाता। हिकारत-भरी नज़रें सहता, पर वहीं पड़ा रहता। काफ़ी दिनों बाद जब नहीं रह गया, तो एक दिन जगपती घर पर ताला लगा, नज़दीक के गाँव में लकड़ी कटाने चला गया। उसे लग रहा था कि अब वह पंगु हो गया है, बिलकुल लँगड़ा, एक रेंगता कीड़ा, जिसके न आँख है, न कान, न मन, न इच्छा।
वह उस बाग़ में पहुँच गया, जहाँ ख़रीदे पेड़ कटने थे। दो आरेवालों ने पतले पेड़ के तने पर आरा रखा और कर्र-कर्र का अबाध शोर शुरू हो गया। दूसरे पेड़ पर बन्ने और शकूरे की कुल्हाड़ी बज उठी। और गाँव से दूर उस बाग़ में एक लयपूर्ण शोर शुरू हो गया। जड़ पर कुल्हाड़ी पड़ती तो पूरा पेड़ थर्रा जाता।
क़रीब के खेत की मेढ पर बैठे जगपती का शरीर भी जैसे काँप-काँप उठता। चंदा ने कहा था, “लेकिन जब तुमने मुझे बेच दिया…” क्या वह ठीक कहती थी! क्या बचनसिंह ने टाल के लिए जो रुपए दिए थे, उसका ब्याज़ इधर चुकता हुआ? क्या सिर्फ़ वही रुपए आग बन गए, जिसकी आँच में उसकी सहनशीलता, विश्वास और आदर्श मोम-से पिघल गए?
“शकूरे!” बाग़ से लगे दड़े पर से किसी ने आवाज़ लगाई। शकूरे ने कुल्हाड़ी रोककर वहीं से हाँक लगाई, “कोने के खेत से लीक बनी है, ज़रा मेड़ मारकर नंघा ला गाड़ी।”
जगपती का ध्यान भंग हुआ। उसने मुड़कर दड़े पर आँखें गड़ाईं। दो भैंसा गाड़ियाँ लकड़ी भरने के लिए आ पहुँची थीं। शकूरे ने जगपती के पास आकर कहा, “एक गाड़ी का भुर्त तो हो गया, बल्कि डेढ़ का…अब इस पतरिया पेड़ को न छाँट दें?”
जगपती ने उस पेड़ की ओर देखा, जिसे काटने के लिए शकूरे ने इशारा किया था। पेड़ की शाख़ हरी पत्तियों से भरी थी। वह बोला, “अरे, यह तो हरा है अभी इसे छोड़ दो।”
“हरा होने से क्या, उखट तो गया है। न फूल का, न फल का। अब कौन इसमें फल-फूल आएँगे, चार दिन में पत्ती झुरा जाएँगी।” शकूरे ने पेड़ की ओर देखते हुए उस्तादी अंदाज़ से कहा।
“जैसा ठीक समझो तुम,” जगपती ने कहा, और उठकर मेड़-मेड़ पक्के कुएँ पर पानी पीने चला गया।
दुपहर ढलते गाड़ियाँ भरकर तैयार हुईं और शहर की ओर रवाना हो गईं। जगपती को उनके साथ आना पड़ा। गाड़ियाँ लकड़ी से लदीं शहर की ओर चली जा रही थीं और जगपती गर्दन झुकाए कच्ची सड़क की धूल में डूबा, भारी क़दमों से धीरे-धीरे उन्हीं की बजती घंटियों के साथ निर्जीव-सा बढ़ता जा रहा था…
“कई बरस बाद राजा परदेस से बहुत-सा धन कमाकर गाड़ी में लादकर अपने देश की ओर लौटे,” माँ सुनाया करती थीं, “राजा की गाड़ी का पहिया महल से कुछ दूर पतेल की झाड़ी में उलझ गया। हर तरह कोशिश की, पर पहिया न निकला। तब एक पंडित ने बताया कि सकट के दिन का जनमा बालक अगर अपने घर की सुपारी लाकर इसमें छुआ दे, तो पहिया निकल जाएगा। वहीं दो बालक खेल रहे थे। उन्होंने यह सुना तो कूदकर पहुँचे और कहने लगे कि हमारी पैदाइश सकट की है, पर सुपारी तब लाएँगे, जब तुम आधा धन देने का वादा करो। राजा ने बात मान ली। बालक दौड़े-दौड़े घर गए। सुपारी लाकर छुआ दी, फिर घर का रास्ता बताते आगे-आगे चले। आख़िर गाड़ी महल के सामने उन्होंने रोक ली।
“राजा को बड़ा अचरज हुआ कि हमारे ही महल में ये बालक कहाँ से आ गए? भीतर पहुँचे, तो रानी ख़ुशी से बेहाल हो गई।
“पर राजा ने पहले उन बालकों के बारे में पूछा, तो रानी ने कहा कि ये दोनों बालक उन्हीं के राजकुमार हैं। राजा को विश्वास नहीं हुआ। रानी बहुत दुखी हुई।”
गाड़ियाँ जब टाल पर आकर लगीं और जगपती तख़्त पर हाथ-पैर ढीले करके बैठ गया, तो पगडंडी से गुज़रते मुंशीजी ने उसके पास आकर बताया, “अभी उस दिन वसूली में तुम्हारी ससुराल के नज़दीक एक गाँव में जाना हुआ, तो पता लगा कि पंद्रह-बीस दिन हुए, चंदा के लड़का हुआ है।” और फिर जैसे मुहल्ले में सुनी-सुनाई बातों पर पर्दा डालते हुए बोले, “भगवान के राज में देर है, अँधेर नहीं, जगपती भैया!”
जगपती ने सुना तो पहले उसने गहरी नज़रों से मुंशीजी को ताका, पर वह उनके तीर का निशाना ठीक-ठीक नहीं खोज पाया। पर सब-कुछ सहन करते हुए बोला, “देर और अँधेर दोनों हैं!”
“अँधेर तो सरासर है…तिरिया चरित्तर है सब! बड़े-बड़े हार गए…” कहते-कहते मुंशीजी रुक गए, पर कुछ इस तरह, जैसे कोई बड़ी भेद-भरी बात है, जिसे उनकी गोल होती हुई आँखें समझा देंगी।
जगपती मुंशीजी की तरफ़ ताकता रह गया। मिनट-भर मनहूस-सा मौन छाया रहा, उसे तोड़ते हुए मुंशीजी बड़ी दर्द-भरी आवाज़ में बोले, “सुन तो लिया होगा, तुमने?”
“क्या?” कहने को जगपती कह गया, पर उसे लगा कि अभी मुंशीजी उस गाँव में फैली बातों को ही बड़ी बेदर्दी से कह डालेंगे, उसने नाहक़ पूछा।
तभी मुंशीजी ने उसकी नाक के पास मुँह ले जाते हुए कहा, “चंदा दूसरे के घर बैठ रही है…कोई मदसूदन है वहीं का। पर बच्चा दीवार बन गया है, चाहते तो वो यही हैं कि मर जाए, तो रास्ता खुले, पर रामजी की मरजी…सुना है, बच्चा रहते भी वह चंदा को बैठाने को तैयार है।”
जगपती की साँस गले में अटककर रह गई। बस, आँखें मुंशीजी के चेहरे पर पथराई-सी जड़ी थीं।
मुंशीजी बोले, “अदालत से बच्चा तुम्हें मिल सकता है।…अब काहे का शरम-लिहाज!”
“अपना कहकर किस मुँह से माँगूँ, बाबा? हर तरफ़ तो कर्ज से दबा हूँ, तन से, मन से, पैसे से, इज़्ज़त से, किसके बल पर दुनिया संजोने की कोशिश करूँ?” कहते-कहते वह अपने में खो गया।
मुंशीजी वहीं बैठ गए। जब रात झुक आई तो जगपती के साथ ही मुंशीजी भी उठे। उसके कंधे पर हाथ रखे वे उसे गली तक लाए। अपनी कोठरी आने पर पीठ सहलाकर उन्होंने उसे छोड़ दिया। वह गर्दन झुकाए गली के अँधेरे में उन्हीं ख़यालों में डूबा ऐसे चलता चला आया, जैसे कुछ हुआ ही न हो। पर कुछ ऐसा बोझ था, जो न सोचने देता था और न समझने। जब चाची की बैठक के पास से गुज़रने लगा, तो सहसा उसके कानों में भनक पड़ी—“आ गए सत्यानासी! कुलबोरन!”
उसने ज़रा नज़र उठाकर देखा, तो गली की चाची-भौजाइयाँ बैठक में जमा थीं और चंदा की चर्चा छिड़ी थी। पर वह चुपचाप निकल गया।
इतने दिनों बाद ताला खोला और बरोठे के अँधेरे में कुछ सूझ न पड़ा, तो एकाएक वह रात उसकी आँखों के सामने घूम गई, जब वह अस्पताल से चंदा के साथ लौटा था। बेवा चाची का वह ज़हरबुझा तीर, ‘राजा निरबंसिया अस्पताल से लौट आए।’ और आज सत्यानासी! कुलबोरन! और स्वयं उसका वह वाक्य, जो चंदा को छेद गया था, ‘तुम्हारे कभी कुछ न होगा…!’ और उस रात की शिशु चंदा!
चंदा का लड़का हुआ है।…वह कुछ और जनती, आदमी का बच्चा न जनती! …वह और कुछ भी जनती, कंकड़-पत्थर! वह नारी न बनती, बच्ची ही बनी रहती, उस रात की शिशु चंदा। पर चंदा यह सब क्या करने जा रही है? उसके जीते-जी वह दूसरे के घर बैठने जा रही है? कितने बड़े पाप में धकेल दिया चंदा को…पर उसे भी तो कुछ सोचना चाहिए! आख़िर क्या? पर मेरे जीते-जी तो यह सब अच्छा नहीं। वह इतनी घृणा बर्दाश्त करके भी जीने को तैयार है! या मुझे जलाने को? वह मुझे नीच समझती है, कायर…नहीं तो एक बार ख़बर तो लेती। बच्चा हुआ, तो पता लगता। पर नहीं, वह उसका कौन है? कोई भी नहीं! औलाद ही तो वह स्नेह की धुरी है, जो आदमी-औरत के पहियों को साधकर तन के दलदल से पार ले जाती है…नहीं तो हर औरत वेश्या है और हर आदमी वासना का कीड़ा। तो क्या चंदा औरत नहीं रही? वह ज़रूर औरत थी, पर स्वयं मैंने उसे नरक में डाल दिया। वह बच्चा मेरा कोई नहीं, पर चंदा तो मेरी है। एक बार उसे ले आता फिर यहाँ…रात के मोहक अँधेरे में उसके फूल-से अधरों को देखता…निर्द्वंद्व सोई पलकों को निहारता…साँसों की दूध-सी अछूती महक को समेट लेता…
आज का अँधेरा! घर में तेल भी नहीं जो दीया जला ले। और फिर किसके लिए कौन जलाए? चंदा के लिए…पर उसे तो बेच दिया था। सिवा चंदा के कौन-सी सम्पत्ति उसके पास थी, जिसके आधार पर कोई क़र्ज़ देता? क़र्ज़ न मिलता तो यह सब कैसे चलता? काम…पेड़ कहाँ से कटते? और तब शकूरे के वे शब्द उसके कानों में गूँज गए, ‘हरा होने से क्या, उखट तो गया है…’ वह स्वयं भी तो एक उखटा हुआ पेड़ है, न फल का, न फूल का, सब व्यर्थ ही तो है। जो कुछ सोचा, उस पर कभी विश्वास न कर पाया। चंदा को चाहता रहा, पर उसके दिल में चाहत न जगा पाया। उसे कहीं से एक पैसा माँगने पर डाँटता रहा, पर ख़ुद लेता रहा और आज…वह दूसरे के घर बैठ रही है…उसे छोड़कर…वह अकेला है…हर तरफ़ बोझ है, जिसमें उसकी नस-नस कुचली जा रही हैं, रग-रग फट गई है।…और वह किसी तरह टटोल-टटोलकर भीतर घर में पहुँचा…
“रानी अपने कुल-देवता के मंदिर में पहुँचीं,” माँ सुनाया करती थीं, “अपने सतीत्व को सिद्ध करने के लिए उन्होंने घोर तपस्या की। राजा देखते रहे! कुल-देवता प्रसन्न हुए और उन्होंने अपनी दैवी शक्ति से दोनों बालकों को तत्काल जन्मे शिशुओं में बदल दिया। रानी की छातियों में दूध भर आया और उनमें से धार फूट पड़ी, जो शिशुओं के मुँह में गिरने लगी। राजा को रानी के सतीत्व का सबूत मिल गया। उन्होंने रानी के चरण पकड़ लिए और कहा कि तुम देवी हो! ये मेरे पुत्र हैं! और उस दिन से राजा ने फिर से राज-काज संभाल लिया।”
पर उसी रात जगपती अपना सारा कारोबार त्याग, अफ़ीम और तेल पीकर मर गया क्योंकि चंदा के पास कोई दैवी शक्ति नहीं थी और जगपती राजा नहीं, बचनसिंह कंपाउंडर का क़र्ज़दार था।…
“राजा ने दो बातें कीं,” माँ सुनाती थीं, “एक तो रानी के नाम से उन्होंने बहुत बड़ा मंदिर बनवाया और दूसरे, राज के नए सिक्कों पर बड़े राजकुमार का नाम खुदवाकर चालू किया, जिससे राज-भर में अपने उत्तराधिकारी की ख़बर हो जाए…”
जगपती ने मरते वक़्त दो परचे छोड़े, एक चंदा के नाम, दूसरा क़ानून के नाम।
चंदा को उसने लिखा था—“चंदा, मेरी अंतिम चाह यही है कि तुम बच्चे को लेकर चली आना…अभी एक-दो दिन मेरी लाश की दुर्गति होगी, तब तक तुम आ सकोगी। चंदा आदमी को पाप नहीं, पश्चाताप मारता है, मैं बहुत पहले मर चुका था। बच्चे को लेकर ज़रूर चली आना।”
क़ानून को उसने लिखा था—“किसी ने मुझे मारा नहीं है, किसी आदमी ने नहीं। मैं जानता हूँ कि मेरे ज़हर की पहचान करने के लिए मेरा सीना चीरा जाएगा। उसमें ज़हर है। मैंने अफ़ीम नहीं, रुपए खाए हैं। उन रुपयों में क़र्ज़ का ज़हर था, उसी ने मुझे मारा है। मेरी लाश तब तक न जलाई जाए, जब तक चंदा बच्चे को लेकर न आ जाए। आग बच्चे से दिलवाई जाए। बस।”
माँ जब कहानी समाप्त करती थीं, तो आसपास बैठे बच्चे फूल चढ़ाते थे। मेरी कहानी भी ख़त्म हो गई, पर…
जय हिंद