‘श्रम का महत्व’ लिंकन (लघु कथा)

अब्राहम लिंकन अमेरिका के सोलहवें और अश्वेत राष्ट्रपति थे। जब वे अमेरिका के राष्ट्रपति बने थे, उस समय उनके पिता मोची का काम करते थे। सीनेट सभा में कुछ घमंडी और अहंकारी व्यक्ति इस बात से बहुत दुखी और नाराज थे कि एक मोची का बेटा राष्ट्रपति कैसे बन गया? पहला दिन सीनेट में जैसे ही वे अपना उद्घाटन भाषण देने के लिए तैयार हुए वैसे ही उस सभा में एक व्यक्ति (सीनेटर) खड़ा हो गया। उस व्यक्ति ने लिंकन से कहा, “श्रीमान लिंकन, आपको यह नहीं भूलना चाहिए कि आपके पिता मेरे परिवार के लिए जूता बनाते थे।” उस व्यक्ति की बात सुनकर सीनेट में एकत्रित हुए सभी लोग हंसने लगे। उस सीनेटर ने सोचा कि, वह लिंकन को नीचा साबित कर दिया। लेकिन “होनहार विरवान के होत चिकने पात” अथार्त जो पौधा भविष्य में बड़ा वृक्ष बनने वाला होता है, उस पौधे के पत्तों में बचपन से ही कुछ-न-कुछ चिकनाई अवश्य होती है।” उन्होंने तुरंत सीनेटर के बातों का जबाब देते हुए कहा, मुझे मालुम है कि मेरे पिता जूता बनाते थे। उनके द्वारा बनाए जूतों में उनकी आत्मा बसती थी। अपने काम के प्रति समर्पित होने के कारण उनके द्वरा बनाए गए जूतों में कभी किसी ने कोई शिकायत नहीं किया। उनका पुत्र होने के नाते मैं भी जूते बना लेता हूँ। यदि आपको कोई शिकायत है, तो मैं उनके बनाए जूतों का मरम्मत कर देता हूँ। मुझे अपने पिता और उनके काम पर गर्व है। लिंकन के द्वरा दिया गया इस तर्कवादी भाषण से सीनेट में सन्नाटा छा गया। इस भाषण को अमेरिका के सीनेट के इतिहास में सबसे उच्चतम और महत्वपूर्ण भाषण माना गया। उसी समय से “श्रम का महत्व” का सिद्धांत प्रचलित हुआ।

अब्राहम लिंकन का जन्म केंटुकी (अमेरिका) में हुआ था। उनके पिता थॉमस एक बहुत ही अच्छे और सम्मानित इंसान थे। अब्राहम की एक बहन और एक छोटा भाई था। नौ वर्ष की छोटी उम्र में ही उनकी माता की मृत्यु हो गई थी। बाद में उनके पिता ने दूसरी शादी कर ली। लिंकन की सौतेली माँ ने सगी माँ से भी अधिक स्नेह दिया और लिंकन को प्रोत्साहित किया।

अब्राहम लिंकन का व्यक्तित्व मानव के लिए प्रेरणादायक था। वे मानवता से प्रेम रखते थे। शत्रु और मित्रता की संकीर्ण भावना से वे कोसों दूर थे। इससे संबंधित एक रोचक प्रसंग है। गृहयुद्ध के समय एक दिन वे शाम में अपने सैनिकों से मिलने गए। वहाँ पर उन्होंने सभी का हाल चाल पूछा और काफी समय तक सैनिकों के साथ बिताया। उन्होंने घायल सैनिकों से बातचीत कर उनके उत्साह को बढ़ाया। जब वे शिविर से बाहर आये तब अपने साथ के लोगों से कुछ बातचीत करने के बाद वे शत्रु सेना के शिविर में चले गए। वहाँ के सभी सैनिक और ऑफिसर अब्राहम लिंकन को देखकर हैरान हो गए। वे सभी सैनिक और ऑफिसर अब्राहम लिंकन के प्रति आत्मीय श्रद्धा से भर गए। लिंकन ने उन सभी सैनिकों का अभिवादन किया। लिंकन जब अपनी गाडी में बैठने लगे तभी वहाँ खड़ी एक वृद्ध ने कहा “ लिंकन तुम तो अपने शत्रुओं से भी बड़े प्रेम से मिलते हो, जबकि तुममे तो उन्हें समाप्त कर देने की भावना होनी चाहिए।” तब अब्राहम लिंकन ने मुस्कुराकर जबाब दिया, ‘यह कार्य मैं उन्हें अपना मित्र बनाकर भी कर सकता हूँ।’ लिंकन के इस प्रेरक प्रसंग से पता चलता है कि, ‘मित्रता से बड़ी से बड़ी शत्रुता को अंत किया जा सकता है।’ वे अपने शत्रुओं के प्रति भी उदारवादी रवैया रखते थे। कई बार हारने के बावजूद मंजिल तक कैसे पहुँचा जाता है? ये सब हमें अब्राहम लिंकन के जीवन से सीखना चाहिए।    

ना मैं गिरा ना मेरी उम्मीदों की मीनार गिरी, यह सच है की मुझे गिराने वाले बार-बार गिरे।

हमारे प्रधान मंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी को भी सबसे पहले कॉग्रेस के मणिशंकर अय्यर ने चाय वाला कहकर संबोधित किया था। जिसे मोदी जी ने कॉग्रेस का आशीर्वाद समझ लिया। और कॉग्रेस के आशीर्वाद से मोदी जी भारत के दूसरी बार प्रधान मंत्री बने। काम कोई भी बुरा नहीं होता है। काम तो काम होता है। काम की कोई जाति नहीं होती है।काम कोई भी हो सच्चाई, ईमानदारी और लगन से करना चाहिए।

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