कैकेयी के पुत्र प्रेम

रामायण सनातन धर्म का प्रमुख ग्रन्थ है। इसे पौराणिक, ऐतिहासिक, धार्मिक और दार्शनिक ग्रन्थ मना जाता है। रामायण की एक बड़ी घटना भगवान श्री राम का वन जाना था। राजा दशरथ से विवाह के पहले रानी कैकेयी महर्षि दुर्वासा की सेवा किया करती थी। कैकेयी की सेवा से प्रसन्न होकर महर्षि दुर्वासा ने उनका एक हाथ वज्र का बना दिया और आशीर्वाद दिया कि भविष्य में भगवान तुम्हारी गोद में खेलेंगे। कुछ समय के पश्चात कैकेयी का विवाह अयोध्या के राजा दशरथ के साथ हो गया। रानी कैकेयी दशरथ जी को सबसे प्रिय थी। सुन्दर होने के साथ-साथ कैकेयी युद्ध कौशल में भी निपुण थी। कैकेयी हमेशा राजा दशरथ को युद्ध में सहयोग देने के लिए तत्पर रहती थी। जब देवासुर संग्राम आरम्भ हुआ तब देवराज इंद्र ने राजा दशरथ को सहायता के लिए बुलाया। राजा दशरथ के साथ रानी कैकेयी भी महाराज की रक्षा करने के लिए उनका सारथी बनकर उनके साथ गई। उस युद्ध में राजा दशरथ के रथ का धुरा टूट गया। कैकेयी ने रथ के धुरे में अपना हाथ डालकर रथ को टूटने से बचा लिया था। उन्होंने अपने युद्ध कौशल से राजा दशरथ के प्राणों की रक्षा की थी। उस समय कैकेयी से प्रभावित होकर दशरथ जी ने उनसे दो मनचाहा वरदान मांगने को कहा था। रानी के पास उस समय मांगने के लिए कुछ भी नहीं था। अतः कैकेयी ने राजा से कहा, भविष्य में जब कभी आवश्यकता होगी तब वह उनसे कोई दो वर मांग लेगी।

भगवान श्रीराम को वन भेजने का दोषी मानकर माता कैकेयी को त्रेतायुग से ही हम सब भला बुरा कहकर उन्हें संबोधित करते आ रहे हैं। यहाँ तक कि ‘व्यासपीठ’ पर बैठकर कथा वाचक भी माता कैकेयी को दोषी ठहराने से नहीं चूकते हैं। कैकेयी वास्तव में एक अत्यंत सुलझी हुई और व्यवहार कुशल रानी थी। इस संसार में किसी भी संतान को कोई अधिकार नहीं है कि वह अपने माता-पिता को दोषी माने। जब भगवान राम अपनी माता कैकेयी को दोषी नहीं माने और उनहोंने माता कैकेयी को दोष मुक्त कर दिया तो दूसरे को कुछ बोलने का कोई प्रश्न ही नहीं उठता है। राम को प्यार करने वाली कैकेयी माता जैसी कोई दूसरी माता नहीं थी। संत कहते हैं कि एक दिन राम खेलते-खेलते पीछे से आकर माता कैकेयी की आँख बंद करके बोले, माँ! माँ! बोलो कौन है? माता कैकेयी ऐसा सोच भी नहीं सकती थी कि मेरा राम ऐसा करेगा। माता ने कहा, मुझे पता है, तुम लक्षमण हो। राम बोले, नहीं माँ, मैं तो राम हूँ। राम बोले, माँ आज तू मुझसे हार गई। मैं जीत गया। कैकेयी राम को गोद में बैठाकर बोली, आज मेरा राम जीत गया और मैं हार गई। मुझे बहुत खुशी हो रही है कि आज मेरे राम ने अपनी माँ को हरा दिया। माँ कैकेयी बहुत खुश होकर बोली, बताओ राम तुम्हें क्या चाहिए? आज तुम जो माँगोगे मैं तुम्हें वही दूँगी। राम बोले, सच माँ! मैं जो मागूँगा, वह तुम दोगी न? हाँ राम! आज तुम मेरा प्राण भी मगोंगे तो मैं तुम्हें प्राण भी दे दूँगी। राम बोले, माँ! मुझे जो चाहिए उसे संसार में आपको छोड़कर और कोई नहीं दे सकता है। कैकेयी माता ने कहा, बोलो राम! बोलो! तुम्हें क्या चाहिए। राम बोले, माँ जब पिताजी मेरे लिए राजसत्ता की बात करेंगे तब आप उस समय मेरे लिए वनवास मांग लेना। माँ बोली, क्यों? राम बोले, माँ आपका राम जिस काम के लिए धरती पर आया है। यदि वह वन नहीं जाएगा तो आपके राम का काम पूरा नहीं होगा। कैकेयी माँ राम की यह बात सुनकर सहम गई और बोली, “तुम्हे पता है राम! मेरे यह वर मांगने से और तुम्हारे वन जाने से मेरे मांग का सिंदूर मिट जाएगा। मेरा बेटा भरत मुझे माँ कहना छोड़ देगा। दुनिया वाले मुझे क्या-क्या कहेंगे ये तुम जानते हो?” फिर कुछ सोचकर कैकेयी बोली, कोई बात नहीं राम! यदि इस कैकेयी के समाप्त होने से मेरे पुत्र राम का काम बन जाएगा तो तुम्हारे लिए मैं एक जन्म नहीं हजार जन्म लेने के लिए तैयार हूँ। यह वर मैं अवश्य मागूंगी।

ऐसा कौन कर सकता है? जो अपने सुहाग को मिटा कर अपने बेटा भरत को त्याग कर और दुनिया क्या कहेगा? इन सब की चिंता को छोड़कर माता कैकेयी ने पुत्र राम को ऊँचा उठाया। राम तो राम थे। किन्तु ‘पुरुषोत्तम राम’ तो माता कैकेयी ने बनाया। अपने पुत्र के लिए प्रिय-से-प्रिय वस्तु का त्याग माता ही कर सकती है, कोई और नहीं। कैकेयी को अपने राम पर भरोसा था लेकिन पिता दशरथ को नहीं। इसलिए उन्होंने पुत्र मोह में अपने प्राण त्याग दिए और कैकेयी हर युग में बदनाम हुई। रानी कैकेयी यथार्थ जानती थी। जो नारी युद्ध भूमि में अपने पति के प्राण को बचाने के लिए अपना हाथ रथ के धुरी में लगा सकती है। वह नारी कठोर और अभागन कैसे हो सकती है। जो रानी युद्ध कला में दक्ष थी भला वह राजनैतिक परिस्थितियों में अनजान कैसे हो सकती है? कैकेयी चाहती थी कि मेरे राम का यश चौदहों भुवनों में होवे। यह यश बिना तप किए और रावण वध के बिना संभव नहीं था।

कैकेयी जानती थी कि अयोध्या के राजा राम, यदि बन जायेंगे तो रावन का वध नहीं हो  सकेगा। इसके लिए राम का वन जाना आवश्यक था। कैकेयी चाहती थी कि राम केवल अयोध्या के ही सम्राट बनकर न रह जाए बल्कि वे विश्व के समस्त प्राणियों के हृदय के सम्राट बने। इसलिए राम का वन जाना जरुरी था। रावण ने सभी ऋषि-मुनियों को पीड़ित कर रखा था। रामायण के बहुत सारे भक्त इसे कैकेयी की दूर दृष्टि कहते हैं। कैकेयी को इस बात के लिए कई संत सराहना भी करते हैं कि उन्होंने अपने आपको कलंकित करके राम को वनवासी बनाया। यदि राम वन नहीं जाते तो राम के यशस्वी आचरण के चरण अयोध्या से रामेश्वरम तक कैसे पहुँचते? वनवासियों को आर्य संस्कृति की सुधा कौन पिलाता? अत्याचारी रावण के अन्याय को कौन मिटाता?

कैकेयी ने राम को चौदह वर्ष के लिए वन भेजकर राम को राम से ‘पुरुषोतम राम’ बना दिया। जिस माता ने राम को पुरुषोतम राम बनाया, भला वह माँ अभागिन कैसे हो सकती है?  धन्य है माता कैकेयी और उनका समर्पण।

2 thoughts on “कैकेयी के पुत्र प्रेम”

  1. राम बोले, माँ जब पिताजी मेरे लिए राजसत्ता की बात करेंगे तब आप उस समय मेरे लिए वनवास मांग लेना। माँ बोली, क्यों? राम बोले, माँ आपका राम जिस काम के लिए धरती पर आया है। यदि वह वन नहीं जाएगा तो आपके राम का काम पूरा नहीं होगा। 
    सच है माँ कैकई नही होती तो आज राम शायद भगवान राम नही होते मगर ये ऊपर वर्णित उद्धरण किस रामायण में है।

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