घाघ और भड्डरी (कहानी) GHAGH AUR BHADDARI (Story)

घाघ और भड्डरी दोनों एक ही व्यक्ति थे या दो। इस विषय पर लोगों में मतभेद है। अनुमान यही लगाया जाता है कि ये दोनों नाम एक ही व्यक्ति के हैं। कहावतों में बहुत जगह ऐसा भी है- ‘कहै घाघ सुनु भड्डरी’ या ‘कहै घाघ सुनु घाघिनी’ आदि। कहीं-कहीं घाघिनी, घाघ की पत्नी को कहा गया है। देवनारायण द्विवेदी जी ने घाघ के विषय में लिखा है कि- घाघ और भड्डरी में दैवी प्रतिभा थी। इसका अर्थ तो यह हुआ कि घाघ और भड्डरी दोनों दो व्यक्ति थे। ये दोनों पति-पत्नि भी हो सकते हैं। उनकी सभी कहावतें प्रायः सत्य होती थी। गाँव और देहातों में तो उनकी कहावतें प्रत्येक स्त्री-पुरुष और किसानों को कंठस्थ थी। मुझे भी याद है कि जब हम सब गाँव में रहते थे। उस समय हमने कई बार धान की रोपनी, खेत में पटवन या अन्य खेती के मौके पर उनकी कहावतों को सुना करते थे।

भड्डरी के जन्म के संबंध में भी किंवदन्ती है। कहा जाता है कि इनकी माता अहिरिन और पिता बहुत बड़े ब्राह्मण ज्योतिषी थे। ज्योतिषी जी को एक बहुत उत्तम मुहूर्त दिखाई दिया। उस मुहुर्त में अगर कोई स्त्री गर्भ धारण करेगी तो उसके गर्भ से उत्पन्न होने वाला बालक त्रिकाल दर्शी विद्वान होगा। ज्योतिषी जी उस सुयोग्य का लाभ उठाने के लिए वहाँ से चल पड़े। उनकी पत्नी उन दिनों उनके साथ नहीं रहती थी। इसलिए वे अपने घर पहुँचना चाहते थे। गाँव दूर था और समय कम। अभी वे रास्ते में ही थे कि वह मुहूर्त आ गया। उन्होंने देखा कि अब तो वे अपनी पत्नी के पास पहुँच नहीं सकते हैं, इसलिए वे बहुत ही चिंतित होने लगे। इतने में उन्हें एक स्त्री दिखाई पड़ी। ज्योतिषी जी ने उस स्त्री को अपने मन की बातें बताई। उनकी बातों से प्रभावित होकर वह स्त्री ज्योतिषी जी के बच्चे की माँ बनने के लिए राजी हो गई। उसने ज्योतिषी जी के सम्पर्क से गर्भ धारण किया। समय आने पर उसके गर्भ से एक बालक पैदा हुआ। उसने बालक का नाम भड्डरी रखा। भड्डरी की माँ एक राजा के रनिवास में काम करती थी। धीरे-धीरे भड्डरी बड़ा होने लगा। अब वह चार-पाँच वर्ष का हो गया था। उसी समय रानी के गर्भ से भी एक बालक पैदा हुआ। यह खबर सुनकर राजा बहुत खुश थे। बड़े-बड़े विद्वान ज्योतिषियों को बुलाकर बालक के ग्रहों का फल पूछा गया। ज्योतिषियों ने नवजात शिशु के ग्रहों की गणना करके बताया कि यह बालक बड़ा ही दुराचारी होगा। इसके कारण इसके माता-पिता पर भारी विपत्ति आएगी। यह बालक जीवित रहने योग्य नहीं है। बहुत सोचने-विचारने के बाद यह फैसला लिया गया कि इस बालक को बाहर फेंकवा दिया जाए। कुछ देर में यह अपने-आप ही मर जाएगा। राजा की आज्ञा पाकर उसके कर्मचारियों ने उस बालक को बाहर जंगल में फेंकवा दिया। सब सोचे कि कुछ ही देर बाद वह स्वयं मर जायेगा।

इधर सूतिका गृह की सफाई होने लगी। एक दाई ने देखा कि सूतिका-गृह के दीवार पर कुछ लिखा हुआ है। उसने, उसे पढ़ा। उस दीवार पर लिखा था कि यह बालक बड़ा भाग्यशाली होगा। संसार का कोई भी आदमी इस बालक का बाल बांका नहीं कर सकता है। धीरे-धीरे यह बात राजा तक पहुंच गई। राजा ने भी सूतिका-गृह में जाकर दीवार पर लिखी हुई उन पंक्तियों को पढ़ा। राजा के आश्चर्य की सीमा नहीं रही। काफी खोज करने पर पता चला कि यह पंक्तियाँ भड्डरी की लिखी हुई हैं। भड्डरी को बुलवाकर यह पूछा गया। भड्डरी ने स्वीकार करते हुए कहा कि हाँ! यह पंक्तियाँ मैंने ही लिखी है। राजा ने पूछा कि तुमने झूठी बात क्यों लिखा है? उस बालक की तो इहलीला समाप्त हो गई होगी। भड्डरी ने बड़े ही गर्व के साथ कहा, ऐसा होना असंभव है। उस बालक को मारने वाला संसार में कोई पैदा ही नहीं हुआ है। राजा ने कहा कि यदि वह मर गया होगा तो? तुझे क्या दंड दिया जाएगा। भड्डरी ने कहा कि यदि वह बालक मर गया होगा तो मैं कठोर से कठोर दंड सहने के लिए तैयार हूँ। राजा ने उस बालक को देखने के लिए अपने आदमी भेजे। राजा के कर्मचारियों ने वहाँ जाकर देखा कि उस बालक के पास एक बिकराल नाग कुंडली मार कर बैठा है। नाग के कंठ में मधुमखियों का छत्ता है जिसमे से एक-एक बूंद शहद बालक के मुख में टपक रहा था। बालक प्रसन्न होकर खेल रहा था। नाग के फन की छाया से बालक को धुप भी नहीं लग रहा था। जब यह खबर राजा को मिली तब वह सुनकर हक्के-बक्के हो गए और दरबारियों को लेकर स्वयं उस स्थान पर गए। राजा ने उस नाग से प्रार्थना किया। राजा के प्रार्थना करते ही नाग अंतर्ध्यान हो गया। तब बालक को लेकर राजा अपने महल में आ गए। उस बालक का ठीक तरह से पालन-पोषण होने लगा।

उस दिन से भड्डरी का राज्य में सम्मान बहुत बढ़ गया। राजा ने उस ज्योतिष को बुलाया जिसने उनके पुत्र की जन्म-कुण्डली देखकर अशुभ की भविष्यवाणी की थी। राजा ने उस ज्योतिष को प्राणदंड की आज्ञा दिया। परन्तु भड्डरी ने राजा को रोक कर कहा, महाराज इसमें ज्योतिषी का कोई अपराध नहीं है। ज्योतिष को बालक के जन्म का जो समय बतलाया गया था वह समय ही गलत था। इस प्रकार भड्डरी ने ज्योतिषी को भी मृत्यु दण्ड से बचा दिया।

कुछ दिनों के बाद भड्डरी के पिता वहाँ आये और भड्डरी को माँ से अपना पुत्र माँगा। माता ने अपने पुत्र भड्डरी को, उसके पिता को देने से अस्वीकार कर दिया। इससे नाराज होकर पिता जबरदस्ती भड्डरी को उसकी माँ से छिन कर, वहाँ से जाने लगे। रास्ते में एक किसान अपने खेत में धान छीट रहा था। धान छीटते समय कुछ धान के बीज दूसरे किसान के खेत में पड़ रहे थे। इसे देखकर भड्डरी ने उस किसान से पूछा कि जो धान का बीज दूसरे के खेत में गिर रहा है वह जब उगकर तैयार होगा तो उन्हें तुम काटोगे या खेतवाला? किसान ने कहा, जिसके खेत में बीज उगेगा वही उन्हें काटेगा। यह बात सुनते ही बालक भड्डरी अपने पिता के कंधे से कूद कर नीचे उतर गया और बोला कि बीज डालने वाले का फसल पर कोई अधिकार नहीं होता है। फसल पर अधिकार सिर्फ खेत वाले का होता है। अब बताइए मुझ पर आपका अधिकार है या कि मेरी माँ का? यह कहकर भड्डरी भाग कर अपनी माता के पास चले गये। भड्डरी की बात को सुनकर उनके पिता चुप-चाप अपने घर चले गए।

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