हे! पुरुष (कविता)

हमारे समाज में ज्यादातर कवि, लेखक और गीतकारों ने सिर्फ नारियों के ही गुणों का बखान अपने कविताओं, गीतों और कहानियों में किया है, जबकि पुरुष के बिना समाज की परिकल्पना ही नहीं की जा सकती है। पुरुष के बिना घर परिवार सुना-सुना रहता है। पुरुष घर, परिवार और समाज के शान और सरताज होते हैं। तुलसीदास जी ने रामचरितमानस में लिखा है-

जीव बिन देह नदी बिन वारि वैसे ही नाथ पुरुष बिन नारी ।।

अथार्त- जैसे बिना जीव के देह, बिना जल की नदी की शोभा नहीं होती है वैसे ही बिना पुरुष के नारि की शोभा नहीं होती है। शास्त्रों में सूर्य को ‘पिता’ और ‘पृथ्वी’ को माता कहा गया है। सूर्य की अनुपस्थिति में धरती पर जीव की परिकल्पना नहीं हो सकती है। सृष्टि में जितना महत्व सूर्य का है उतना ही महत्व धरती का भी है। शायद इसीलिए प्रकृति ने संसार की सबसे बहुमूल्य और अनमोल वस्तुएँ पुरुषों को ही दिया है। प्रकृति ने स्वयं ही अपनी बहुमूल्य चीजों से पुरुषों का श्रृंगार किया है। इसलिए उन्हें बनावटी श्रृंगार की जरुरत नहीं पड़ती है। पुरुष उन्हीं रत्नों को पाकर धन्य और गौर्वान्वित हुए है।

पुरुष से ही घर सुहावन लागे बरना लागे सुनसान,

तुम बिन नहीं कोई पहचान, तुम से बढ़ती घर की शान।

तुम से बढ़ता मान हमारा, तुम से बढ़ता शान हमारा,   

तुम से जुडा श्रृंगार हमारा, तुम से ही जुड़ा संसार हमारा।

तुम से बना परिवार हमारा, तुम से ही बना घर-बार हमारा।

सजाया, सवारा नहीं तुम्हें कवियों और लेखकों ने

प्रकृति ने तुम्हें अपने हाथों से है सवांरा

दिया प्रकृति ने तुम्हें अनमोल रतन

जिसे पाकर तुम हुए धन्य ।

परुष को ही हीरा कहते है, चमक से जिसके हो दूर अँधेरा।

दिया ‘कस्तूरी’ प्रकृति ने मृग को, मधुवन में सुगन्ध बिखेरा।

दिया मणि नाग को जिसकी चमक सब सह नहीं पाते।

सुन्दर पंख दिया मोर को, जिसे देख सब खुश हो जाते

दांत दिया हाथी को, जिसको पाकर सब इतराते

पुरुष रक्षा करते परिवार की, सभी परेशानियाँ स्वयं उठाते।

जीवन पर्यन्त परिश्रम करके, परिवार का दायित्व निभाते।

चट्टान बन कर खड़े रहते हैं, असल में पुरुष वही कहलाते।

1 thought on “हे! पुरुष (कविता)”

Leave a reply to Ravindra Kumar Karnani Cancel reply

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.