‘हिन्दी’ का जख्म’ (कविता)

मैं ‘हिन्द’ की ‘हिन्दी रानी’

अपनों से ही जख्मी हूँ ।

मैं क्या कहूँ ऐ हिन्द वासियों

समझो मेरी जख्मों को

मैं हिन्दी हूँ

अपनों से ही जख्मी हूँ ।

भूल गए मुझे अपने लोग

अंग्रेजी को ही समझते अपनी शान ।

मुझसे होकर दूर अंग्रेजी की बढ़ाते हैं मान

वाह रे कुदरत! तेरी कैसी मेहरबानी

रानी बनी नौकरानी और नौकरानी बन गई रानी

यही है मेरी दर्द भरी कहानी

मैं हिन्दी हूँ

अपनों से ही जख्मी हूँ ।

अंग्रेजों ने मुझे अंग्रेजीयत से दबा दिया

ऐ मेरे हिन्द वासियों, मैं ही हूँ तेरी पहचान।

मुझे भूल गए मेरे अपने लोग

समझो मेरी दर्द, मत भूलो अपनी पहचान

मुझको सम्मान्नित करने में ही है तेरी अपनी शान ।

मैं हिन्दी हूँ

अपनों से ही जख्मी हूँ ।

मैं हिन्द देश की रानी, अपनों से ही अपमानित

अंग्रेजों के दिए दर्द को किया बर्दाश्त

अंग्रेजीयत वाले हिन्द वासियों

तेरे दिए दर्द से कराह रही हूँ

मेरे जख्मों को तू पहचान ।

मैं हिन्दी हूँ

अपनों से ही जख्मी हूँ ।

‘सोना’ ने ‘लोहे’ से पूछा होती है मेरी भी पीटाई

लेकिन मैं नहीं चिल्लाता

पर तुम जब पीटते हो तो

तू क्यों इतना शोर मचाता

लोहे ने कहा देख भाई ‘सोना’! तू है सोना

पीटता है तुझे लोहा

चुप करने के सिवा, तू कर भी क्या सकता है

मैं हूँ लोहा और मुझे पीटता है लोहा

अपनों से अपनी पीटाई का दर्द

‘तू’ क्या जाने?

मैं अपनों के दिए दर्द से कराह रही हूँ

मेरे जख्मों को तू पहचान ।

मैं हिन्दी हूँ

अपनों से ही जख्मी हूँ ।

मैं तुझे करूं अगाह, मत भूलो अपनी पहचान

भारत माता की एकता की जान

अपनी राष्ट्र भाषा को पहचान

मुझको सम्मान्नित करने में ही है

तेरी अपनी शान

मेरे दर्द को तू पहचान

मैं हिन्दी हूँ

अपनों से ही जख्मी हूँ ।

1 thought on “‘हिन्दी’ का जख्म’ (कविता)”

  1. काश समझ वो जाए कभी
    माता हमारी एक ओर यहां
    कहते मातृभाषा उसको
    हिंदी हैं वो यहां।।
    है लालिमा मुख पर उनके
    स्वर अद्भुत उनके यहां
    व्यंजन प्रकार बहुत उनके
    हिंदी उनको कहे यहां।।

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