जेल डायरी (तिहाड़ से काबुल कंधार तक) लेखक – शेर सिंह राणा

पुस्तक समीक्षा

जेल डायरी (तिहाड़ से काबुल कंधार तक)
लेखक – शेर सिंह राणा
प्रकाशक-   हार्पर कॉलिस
पृष्ठ- ‌  ‌308  मूल्य 199

शेर सिंह राणा रुड़की के राजपूत जमींदार परिवार में जन्मा, बड़े प्यार से लालन-पालन और बहुत ही अच्छे स्कूल में प्राथमिक शिक्षा के बाद देहरादून के एक कॉलेज से उच्च शिक्षा प्राप्त किया। बचपन से लेकर जवानी के दिनों तक दुःख कभी देखा नहीं। विद्यालय के हेड बॉय होने के नाते सब का प्यार और सम्मान ही मिला। घर से लेकर स्कूल तक पारिवारिक संस्कार और आदर्श की शिक्षा ने सैद्धान्तिक जीवन जीने को प्रेरित किया जिसके कारण सबको मदद करना और हमेशा जरुरत मंदों की सहायता करना ही सिखा था। कुछ न कुछ देने की ही नीयत रही, लेना तो कभी जाना ही नहीं लेकिन सिद्धान्तों पर जीने वालों का जीवन व्यवहारिक संसार को समझने में हमेशा चूक जाती है। बिना किसी कारण के समाज के बिगड़े लोगों से टकराव हो जाती है, जिसके कारण गोलियों का शिकार होना पड़ता है। मौत को नजदीक से देखने के बाद भी जज्बात मजबूत होता गया और एक दिन ऐसा भी हुआ कि डाकू फूलन देवी की हत्या का श्रेय अपने उपर ले लेता है। हलांकि अपनी जेल डायरी में शेर सिंह राणा ने ये बात लिखी है कि उस हत्या के आरोप में जेल गया जो उसने किया ही नहीं था। अब प्रश्न यह उठता है कि हत्या जैसे संगीन जुर्म को भावनाओं में आकर अपने ऊपर लेना कहाँ तक उचित था? फूलन देवी के ऊपर जुर्म हुआ था, इससे इनकार नहीं किया जा सकता है, लेकिन हाथ में हथियार आने के बाद उसने कितने निरपराध लोगों की हत्यायें की, कितने लूट और नरसंहार किये। इसके बाद भी उसका सांसद बनकर सत्ता की कुर्सी पर सम्मान के साथ विराजित होना भारतीय राजनीति और जातिगत सामाजिक स्थितियों का दर्पण है। जिस देश में बिना आचरण प्रमाण पत्र के कोई आदमी पुलिस या सेना का सिपाही नहीं बन सकता है। उसी देश में सभी जुर्मों का एक नामजद दोषी राजनीति की सीढ़ियों से चढ़ कर सत्ता के उच्च शिखर तक पहुंच सकता है। यह एक बहुत बड़ी विडम्बना है, जो इस किताब के माध्यम से फूलन देवी के रूप में दीखता है।

अपने लिए तो हर मानव जीता है लेकिन दूसरों के खातिर जीना भी जिंदगी है। शेर सिंह ने बचपन से ही वीर राजपूत राजाओं और वीरों की कहानियाँ अपनी माँ से सुनी थी। जिसका उनपर प्रभाव पड़ा। वे अपने जीवन में भी कुछ ऐसा करना चाहते थे जससे कि उनका नाम हो। स्कूल के समय से ही वे हमेशा हर चीज में आगे रहते थे। एक बार बन्नी नाम के एक लड़का ने शेर सिंह के दोस्त को धक्का दे दिया। बन्नी को ऐसा करते हुए सभी बच्चे देख रहे थे लेकिन शेर सिंह से यह नहीं देखा गया। उसने अपने दोस्त को बचाने के लिए बन्नी को अडंगी लगा कर पटक दिया। बन्नी ने बड़ी मैडम के पास कमप्लेन कर दिया। मैडम ने शेर सिंह की शिकायत डायरी में नोट कर दिया कि अपने पापा को लेकर आना। घर जाकर पापा को उसने डायरी दिखाया और स्कूल की सारी घटनाएँ बता दी तो पापा बोले कि- “बिना वजह के किसी से भी नहीं लड़ना लेकिन अगर कोई लड़ाई करे तो मार के आना मार खाकर मत आना”। वैसे शेर सिंह अपने बचपन के दिनों से ही कई शरारतें करते आ रहे थे इसके बावजूद भी माँ-बाप उनपर शक्ति से पेश नहीं आते थे जिसके कारण शेर सिंह की हिम्मत बढ़ती जा रहा थी। स्कूली जीवन में जब तक वे बच्चे थे तबतक तो पढने-लिखने और खेल-कूद में अच्छे थे। एकबार तो उन्हें आठ इनाम भी मिले थे। इसके बावजूद भी वे जो गलतियाँ करते थे वे तारीफ के काविल तो विल्कुल नहीं थे। जो माँ-बाप बचपन में बच्चों को नहीं सिखाते वे बड़ा होने के बाद सिखा लेंगे यह तो सम्भव ही नहीं है।

एक सिक्के के दो पहलू की तरह शेर सिंह राणा का जीवन है। जहां एक पक्ष में साहस, हिम्मत और वीरता को देखकर सारे देश को गर्व है वही दूसरा पक्ष को देखकर दुःख और गुस्सा भी। शेर सिंह राणा के बारे में एक बात तो है कि वह सच में शकुंतला पुत्र भरत के जैसा ही साहसी औएबहादुर है। ऐसा बहादुर जो शेर की गुफा में घूसकर शेर के दाँत तोड़ने की क्षमता रखता है।

आगे की डायरी बहुत ही साहसिक सफ़र और नेक नियति से किया गया कार्य दिखलाती है। 70 सालों की आजादी के बावजूद भी सरकार, भारत के अंतिम राजपूत सम्राट पृथ्वी राज चौहान की अस्थियों को सम्मान नहीं दिला सकी। जो समाज या देश फूलन देवी पर हुए अत्याचार की आड़ में, उसके द्वारा किए गये नरसंहार को भूल कर सांसद बना कर लोकसभा में सम्मान दिला सकती है। वह भारत के शूरवीर सम्राट, जो अपने दुश्मन को बार-बार पराजित करने के बाद भी अपनी हिन्दू उदारवादी, दयालु और मानवतावादी प्रकृति के कारण पराजित को बार-बार छोड़ देते थे। उसे अपने ही लोगों के धोखे से पराजित होना पड़ा और कई बार की हार के बाद मिली एक विजय के बाद हिन्दू उदारवादी भारतीय राजा का जो अपमान हुआ वो जीवन के अंतिम समय से लेकर अभी तक चलती रही लेकिन हमारी सरकार ने कुछ नहीं किया।

भारत के महान राजा पृथ्वी राज चौहान और मोहम्मद शहाबुद्दीन गौरी के मध्य हुये तराईन के युद्ध (सन् 1191 और 1192 ई०) को हम सभी ने पढ़ा है। कई युद्ध में हारने के बाद गौरी ने अंतिम युद्ध में कुटिल नीति से युद्ध जीता और पृथ्वी राज चौहान को बंदी बना कर अपने देश गजनी ले गया। कवि चंदबरदाई पृथ्वी राज चौहान के परम मित्र थे। चंदबरदाई अपने  मित्र पृथ्वी राज चौहान से मिलने गजनी पहुँच गये थे और उन्हें भी बंदी बना लिया गया था। गौरी उन दोनों को अनेक अमानवीय यातनाएँ देता रहा, यहाँ तक कि उसने पृथ्वी राज चौहान की दोनों आँखे फोड़ दिया था। पृथ्वी राज चौहान की एक विशेषता थी कि वे ‘शब्दभेदी’ बाण चलाते थे। इसी विशेषता के चलते एक ‘पद्य’ के माध्यम से चंदबराई ने पृथ्वी राज चौहान को गौरी की स्थिति बता दी

चार बांस चौबीस गज, अंगुल अष्ट प्रमाण
ता उपर सुल्तान है, मत चूको चौहान।।

चंदबराई के इस संकेत से पृथ्वी राज चौहान ने शब्द भेदी बाण से गौरी को खत्म कर दिया। दोनों मित्रों ने वहीं पर अपनी जीवन लीला भी समाप्त कर ली। गजनी में इन‌की समाधी है। गजनी में पृथ्वी राज चौहान‌ की समाधी को अपमानित किया जाता है। बस यही बात शेर सिंह राणा के मन में थी कि इस समाधी को भारत लाना है और इस व्यक्ति ने इस महान कार्य के लिए अपनी जान जोखिम में डाल दिया। यह आत्मकथा तिहाड़ से ही आरम्भ होती है। तिहाड़ से होते हुए बांग्लादेश और वहाँ से काबुल, कांधार तक घूमती है। “जेल डायरी राणा के अपने शब्दों में कही गयी उनकी अपनी कहानी है। इसकी शुरुआत तिहाड़ में फ़रारी के दिन से होती है और फिर राणा के बचपन से होती हुई उनके जीवन की बेहद दिलचस्प और रोमांचक दास्तान बयान करती है।“ (डायरी के अंतिम पृष्ठ से उद्धृत)

इस आत्मकथात्मक डायरी को पढना रोचक है। कुछ दृश्य तो ऐसे हैं जहाँ साँस तक अटक जाती है। पल पल रोमांच से भरे खतरनाक सफर का जो इस रचना में वर्णन है वह पठनीय है। सिर्फ पठनीय ही नहीं नमन करने योग्य भी है। एक व्यक्ति अफगानिस्तान और वह भी तालिबानी आतंकवादियों के क्षेत्र में जाकर ऐसा कार्य करता है जिससे उसकी जान तक जा

सकती थी। “तालिबनियों के गढ़ में अपने देश के प्रिय पूर्वज सम्राट पृथ्वीराज चौहान की समाधि को वापस अफ़ग़ानिस्तान से भारत लाने के लिए जा रहा हूँ और आप जानते हैं कि मैं वहाँ से ज़िन्दा वापस आऊँगा इसकी कोई गारण्टी नहीं है।“ क्या उसके कार्य को लोग समझ पायेंगे …. इसीलिए शेर सिंह राणा ने सबूत के तौर पर विडियो रिकार्डिंग भी की। अगले दिन मैंने और शाहीन भाई ने ढाका की एक दुकान से ही सोनी का हैण्डीकैम, विडियो कैमरा ख़रीदा, जिसकी ज़रूरत अफ़ग़ानिस्तान में मुझे समाधि को खोदते समय उसकी रिकॉर्डिग के लिए चाहिये थी, क्योंकि मैं जानता था कि हमारे देश में ज़्यादा जनसंख्या ऐसी है जो ख़ुद तो देश और समाज के लिए कुछ कर नहीं सकते लेकिन दूसरों के द्वारा किए गये देश भक्ति के कार्यों में कमियाँ ज़रूर निकाल देते हैं। अगर मैं समाधि खोदते समय वहाँ की रिकार्डिग कैमरे से न करूँ तो कोई भी यक़ीन नहीं करता कि मैं अफ़ग़ानिस्तान गया और वहाँ से समाधि लाया।

शेरसिंह का अफगानिस्तान में पृथ्वी राज चौहान की समाधि ढूंढना भी कोई सरल काम न था। वे निरंतर एक जगह से दूसरी जगह भटकते रहे। स्वयं को एक मुस्लिम व्यक्ति के रूप में पेश करते रहे। बहुत सी जगह लोगों को उन पर जासूस का शक भी होता रहा और कई जगह जान जोखिम में भी डाल दी लेकिन बहादुर आदमी हर जगह, हर मुसीबत से टक्कर लेकर सुरक्षित निकला। “लेकिन आप देयक गाँव में नहीं जा सकते हैं, क्योंकि वह तालिबानियों का गाँव है और जिस जगह पर यह गाँव है वो पूरा इलाक़ा तालिबानियों का गढ़ है”। लेकिन बहादुर आदमी वहाँ भी जा घुसा। इस डायरी का यहाँ से जो अत्यंत रोचक और रोंगटे खड़े करने वाला सफर आरम्भ होता है वह शेरसिंह के कद को और भी बड़ा कर देता है। एक जगह तो तालिबानी आतंकवादी शेरसिंह राणा को घेर लेते हैं और नमाज सुनाने को बोलते हैं ताकी तय कर सके कि यह व्यक्ति मुस्लिम है। मैं जब यह अध्याय पढ़ रहा था तो मेरा सांस रुकने के स्तर पर था। जहाँ तय था कि एक छोटी सी चूक जान ले सकती है। इस रचना में इस यात्रा वृतांत के अलावा भी छोटी-छोटी और बहुत सी रोचक बाते हैं जो पठनीय है।

शेर सिंह राणा ने यह सब क्यों किया? यह प्रश्न सभी पाठकों के मन में उठता है इसका उत्तर शेर सिंह राणा ने स्वयं दिया है। वे सिर्फ भारतीय सम्राट पृथ्वी राज चौहान की अस्थियाँ ही लाते हैं। अन्य किसी भी समाधि/मजार को क्षतिग्रस्त नहीं करते, उनका एक साथी ऐसी कोशिश करता है तो वे उसे मना कर देते हैं। “हमारा मक़सद सिर्फ अपने भारतीय पूर्वज की क़ब्र को खोद कर वहाँ से उनकी अस्थियाँ निकालना है। मैंने कहा कि वैसे भी किसी मरे हुए की क़ब्र को तोड़ कर उसका अपमान करना हमारी भारतीय सभ्यता नहीं है”।

‌‌‌शेरसिंह राणा ने अपने नाम को सार्थक किया। यह सब उसके अच्छे संस्कारों का परिणाम है। शेरसिंह ने हमेशा अपने नाम के अनुसार जीवन जिया है क्योंकि वह बहादुर है। “बहादुर आदमी की बस यही पहचान है कि वह अपने सामने किसी पर ज़ुल्म नहीं होने देता और जब आपने मेरा नाम ही शेर सिंह रखा है तो मुझे तो बहादुरी दिखानी ही पड़ेगी, वरना सब लोग मेरा मज़ाक उड़ायेंगे”। शेरसिंह ने ऐसी बहादुरी दिखाई कि देश दंग रह गया।

शेर सिंह राणा ने बहुत ही कठिन परिस्थितियों से गुजरकर सम्राट पृथ्वी राज चौहान की अस्थियाँ लाने का काम किया। तिहाड़ जेल से लेकर बांग्लादेश, दुबई, काबुल और कांधार तक अनेक असामाजिक और गैर कानूनी सुविधाओं के उपलब्ध ऑफर को अस्वीकार करके जो ईमानदारी वसूल और सिद्धान्तों को स्थापित किया है, वह अपने आप में एक मिशाल है। मेरा सभी से निवेदन है कि इस पुस्तक को एक बार अवश्य पढ़े और खुद निर्णय लें कि शेर सिंह राणा को क्या सजा मिलनी चाहिए और क्यों? बरना अदालत में 60 वर्ष पुरानी फाइलें भी अभी तक सड़ रही हैं और फैसला मुजरिमों के मृत्यु के बाद भी आती है।

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