पेड़ की हत्या (कहानी) (Murder of a Tree)

यह कहानी ‘अशोक’ के एक पेड़ की कहानी है। अशोक के पेड़ को सकारात्मक उर्जा का प्रतीक माना गया है। ‘अशोक’ का अर्थ है, जहाँ ‘शोक’ (दुःख) नहीं हो। घर के पास अशोक का पेड़ होने से सुख, शांति और समृधि बनी रहती है। अशोक का पेड़ घर के पास लगाने से परिवार की महिलाओं की शारीरिक व मानसिक उर्जा में वृद्धि होती है। अशोक के पेड़ के नीचे बैठकर पढ़ने से यादाश्त बढ़ता है। अशोक के पेड़ का वैज्ञानिक नाम पॉलिएल्थिया (polyalthia, longifolia) है। अशोक का फूल भी बड़ा ही सुन्दर और सुगन्धित होता है। इसे ‘मधुपुष्प’ भी कहा जाता है।

‘जीत’ नाम के एक बच्चे ने बड़े ही प्यार से अपने घर के सामने अशोक का एक पेड़ लगाया था। वह बच्चा (जीत) हमेशा इसकी देखभाल करता था। उसके मन में यह डर लगा रहता था कि कहीं कोई उसे नुकसान न पहुंचाए। इस कारण हमेशा वह उसकी सुरक्षा का ध्यान रखता था। यह अशोक का पेड़ बहुत लोगों के बीच में अकेला था। रिहाइसी क्षेत्र में कई घरों के बीच, सड़क के किनारे, घर के आगे और घर तथा बैठक वाले मकान के बीच में होने के कारण इसका महत्व और भी अधिक बढ़ गया था। पेड़ की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए जीत ने उसके चारो तरफ ईंट की जालीदार दीवार खड़ा कर दिया और हमेशा उसमें पानी तथा कीटनाशक डालते रहता था।

एक दिन अशोक के पेड़ ने जीत से कहा मैं यहाँ अकेला हूँ। तुम मेरे पास एक और पेड़ लगा दो बहुत अच्छा रहेगा। हम दोनों आपस में अपनी-अपनी बातें किया करेंगे। मैं अकेला हूँ इसलिए मुझे अच्छा नहीं लगता है। जीत ने कहा कि बड़ी मुश्किल से मैं तुम्हें यहाँ पर रख पाया हूँ, अब एक और लाऊंगा तो तुम्हें भी लोग उखाड़ कर फेंक देंगे। तुम अकेले नहीं हो, मैं तुम्हारे साथ हूँ, और तुम्हारा दोस्त भी हूँ। पेड़ ने कहा! हाँ ये तो है। घर में इतने सारे लोग हैं  लेकिन कोई भी मेरे पास नहीं आता है, सिर्फ तुम ही मेरे पास आते हो, मुझे प्यार करते हो, पानी पिलाते हो, खाना खिलाते हो, मेरी सेवा करते हो, मुझे बहुत अच्छा लगता है। अन्य लोग जब भी मेरे पास आते हैं तब कोई मेरे पत्ते तोड़ देता है, तो कोई अकारण धक्का मार कर के चला जाता है। तब मुझे बहुत बुरा लगता है। तुम उन लोगों को भी कहो और सिखाओ कि वे सब भी तुम्हारे जैसे ही मुझसे बातें करें, मुझे भी बहुत अच्छा लगेगा। आखिर वे सब भी तो तुम्हारे जैसे ही मनुष्य हैं। जीत ने कहा! मैं बहुत खुश हूँ कि अभी वे लोग तुम्हारे पास नहीं आते हैं। अभी तुम छोटे हो, वे सब तुम्हें परेशान करेंगे। जीत ने कहा, तुम्हें पता नहीं है दोस्त! देखना जब तुम बड़े हो जाओगे तो सब तुम्हारे पास ही आकर बैठेंगे। सभी मनुष्य एक जैसे नहीं होते हैं। मैं तुमसे बहुत प्यार करता हूँ। यह कहकर जीत ने पेड़ से कहा मैं चाहता हूँ कि तुम जल्दी बड़ा हो जाओ। इसीलिए मैं तुम्हारी देख-भाल करता रहता हूँ। पेड़ ने कहा! तुम बहुत अच्छे हो, तुम जब बड़े हो जाओगे तो तुम्हें भी कोई तंग नहीं करेगा, सभी तुमसे प्यार ही करेंगे।

समय बीतता जा रहा था। धीरे-धीरे पेड़ बड़ा होने लगा और उसका दोस्त भी। अब पेड़ पहले से बहुत खुश रहने लगा था। अब उसके पास ईंट की दीवार की जरुरत नहीं थी। वहाँ सबकुछ साफ करके कुर्सियाँ लगा दी गई थी। अब लोग उसकी छाया में बैठने के लिये आते रहते थे। लोग वहाँ बैठकर अपनी-अपनी बातें किया करते थे। अशोक का पेड़ सब की बातों को ध्यान से सुनता था। पेड़ को खुश देखकर उसका दोस्त जीत भी खुश रहता था।

एक दिन अशोक के पेड़ ने जीत से कहा आजकल तुम कम दिखाई देते हो, बहुत व्यस्त हो क्या? जीत ने कहा हाँ दोस्त अब मैं महाविद्याल में पढता हूँ, जो हमारे घर से बहुत दूर है। रोज-रोज आना-जाना सम्भव नहीं है। इसलिए अब सिर्फ सप्ताह में एक ही दिन आ सकता हूँ। तुम्हें कोई तकलीफ तो नहीं होता? पेड़ ने कहा नहीं, अब घर के सभी लोग मेरे पास आकर बैठते हैं। खूब बातें करते हैं। कभी घर की कभी राजनीति की तो कभी रिश्तेदारों की। उन सबकी बातें सुनकर मुझे बहुत अच्छा लगता है लेकिन कभी-कभी दुःख भी होता है। जीत ने पेड़ से पूछा क्यों दुःख क्यों होता है? पेड़ ने कहा यहाँ बैठकर वे लोग कभी-कभी अपनों की शिकायत भी करते हैं। एक दुसरे से जलते हैं, दुसरे की बुराई करते हैं और पीठ पीछे दुसरे की चुंगली भी  करते हैं। ये सब देख सुन कर मैं बहुत दुखी हो जाता हूँ, हाँ लेकिन जब बच्चे मेरे पास आते हैं तब बहुत अच्छा लगता है। वे सब अच्छी-अच्छी बातें करते हैं। खेलते-कूदते हैं और मुझे पकड़ कर बोलते हैं कि तुम बहुत अच्छे हो ‘अशोक’। तब मैं भी उन्हें बोलता हूँ कि तुम सब भी बहुत अच्छे और दिल के सच्चे हो। जीत पेड़ को खुश देखकर बहुत खुश रहता था और अक्सर अशोक के पेड़ से बातें करता था कि अब तो तुम खुश हो न? तुम्हारी डालियाँ बड़ी-बड़ी हो गई हैं। तुम्हारे हरे-हरे लम्बे घने पत्तियों और फूलों को देखकर मेरा मन झूमने लगता है। अब जब भी मैं तुम्हारे पास आता हूँ, तुम्हें देखता हूँ तो मुझे बहुत अच्छा लगता है। मन करता है कि यहीं बैठकर तुमसे हमेशा बातें करता रहूँ। तुम मेरे मन की बातों को समझते भी हो और कभी किसी की शिकायत भी नहीं करते हो, तुम सचमुच मेरे सबसे अच्छे दोस्त हो। पेड़ भी जीत की बातों को सुनकर बोला, हाँ मेरे दोस्त! अब मुझे भी यहाँ अच्छा लगता है। खासकर गर्मी की भरी दुपहरी में, तपते सूरज से लोगों को जब बेचैनी होने लगती है तब मेरे पास आकर बैठते हैं और एक बार ये जरुर कहते हैं कि बहुत गरमी है। कहीं भी राहत नहीं है, लेकिन इस अशोक के पेड़ के नीचे बहुत सुकून मिलता है। तब मेरा मन गदगद हो जाता है। एक दिन जीत ने अशोक के पेड़ से कहा! पता है दोस्त! तुम मेरे घर की पहचान हो गए हो। पेड़ ने कहा वह कैसे? जीत बोला एक बार एक व्यक्ति हमारे घर का पता पूछ रहा था, तभी दूसरा व्यक्ति बोला कि आप सीधे चले जाइए उनके घर के सामने एक बड़ा अशोक का पेड़ है। मुझे यह सुनकर बहुत खुशी हुई। यह सुनकर अशोक का पेड़ भी खुश हो गया। इसप्रकार दोनों दोस्त बहुत देर तक आपस में बातें करते रहते थे।

एक दिन अशोक के पेड़ ने अपने दोस्त जीत से कहा अब तो तुम बड़े हो गए हो तुम्हारी नौकरी लग जाएगी। तुम मुझे छोड़कर दूर चले जाओगे। जीत ने कहा हाँ दोस्त, मुझे जाना तो पड़ेगा ही आज नहीं तो कल क्योंकि मेरे ऊपर बहुत सारी जिम्मेदारियाँ है। पेड़ ने कुछ सोंच कर बोला, हाँ! सही कह रहे हो दोस्त लेकिन मुझे तुम्हारी बहुत याद आएगी। अपने दिल की बातें किससे करूँगा? जीत ने कहा तुम चिंता मत करना। अपना ध्यान रखना। मैं पत्र के द्वारा, माँ से हमेशा तुम्हारी समाचार लेता रहूँगा। (उनदिनों मोबाईल नहीं था) पेड़ ने कहा? दोस्त माँ को बोल देना कि वो हमारी भी देख भाल करती रहेगी। जीत ने कहा? हाँ ठीक है! यह कहकर जीत मुस्कुराने लगा और पेड़ को जोर से पकड़कर प्यार किया।

आज जीत को अपनी नौकरी के लिए घर से निकलना था। उसकी नौकरी भारतीय सेना में हो गई थी। जीत घर के सभी लोगों से विदा लेकर अपने दोस्त के पास आकर बोला मैं जा रहा हूँ, तुम अपना ध्यान रखना। पेड़ ने कहा, दोस्त! मैं जा रहा हूँ नहीं कहते, बोलो मैं आ रहा हूँ। जीत ने कहा, अच्छी बात है, मैं आ रहा हूँ। पेड़ ने कहा, भगवान तुम्हारी रक्षा करें। तभी माँ जीत को बोली तुम उस बेजान पेड़ से क्या बातें करते रहते हो। जीत बोला माँ यह बेजान नहीं है, यह मेरा दोस्त है। हम दोनों अपनी दिल की बातें कहते और सुनते हैं। जीत की बातें सुनकर घर के सभी लोग हँसने लगे। यह बोलकर जीत घर से निकल गया।

दिन, महीने और साल गुजरने लगे। अशोक का पेड़ अब बहुत बड़ा हो गया था। वह बदलने वाले हर मौसम का सामना करते हुए अटल था। अब आने-जाने वाले सभी मुसाफ़िर, पेड़ के पास बैठकर आराम किया करते थे, खुश होते और बोलते, अगर यह पेड़ नहीं होता तो हमारी धुप में हालत खराब हो जाती। बहुत सारी छोटी-छोटी चिड़िया (गौरईया) दिनभर उस पेड़ पर चहचहाते रहती थी। जानवर भी वहाँ बैठ कर आराम किया करते थे। इस तरह अशोक का यह पेड़ सभी को सुख और आराम देने लगा था।

एक दिन बाहर से कुछ लोग आये थे। वे लोग उसी अशोक के पेड़ के पास खड़े होकर बातें कर रहे थे। सब कुछ अच्छा है, लड़का अच्छी नौकरी भी कर रहा है। बात पक्की हो जाएगी तो ठीक रहेगा। पेड़ को समझते देर नहीं लगी कि ये सब मेरे दोस्त की शादी के लिए आये हैं। पेड़ खुश होने लगा। शाम के समय घर के लोग और बाहर से जो लोग आये थे वे मिलकर बातें करने लगे। इस पेड़ ने घर के अनेक बच्चों की शादियाँ देखी थी लेकिन इस बार उसके दोस्त की शादी थी इसलिए पेड़ भी बहुत खुश था। सुबह-सुबह पेड़ मन में सोच रहा था कि अब मेरा दोस्त आयेगा और हमलोग बहुत सारी बातें करेंगे। उसी दिन डाकिया आया, मुझे लग रहा था कि जरुर दोस्त का पत्र आया होगा। पेड़ खुश होकर डाकिया से पूछा, भैया! मेरे दोस्त का पत्र है क्या? अरे! ओह! वो मेरी बात थोड़े सुनेगा! मैं भी—? तब डाकिया ने माँ को बुलाया और जीत का पत्र माँ को दे दिया। माँ पत्र लेकर बहुत खुश हो रही थी। माँ बोली जीत कल आने वाला है। दुसरे दिन दोस्त के इंतजार में पेड़ बहुत खुश था। उसी समय गांव का एक आदमी आया और पेड़ के नीचे खड़ा होकर बोला आज तो यह अशोक का पेड़ भी बहुत हरा दिख रहा है, क्या बात है? लगता है इसमें लोग पानी-वानी डाले हैं। माँ बोली, पानी तो हमेशा कोई न कोई डालता ही रहता है, लेकिन आज खास बात यह है कि इसका दोस्त आ रहा है। इसलिए यह खुश होकर हरा दिखाई दे रहा है। उस व्यक्ति ने बोला हाँ चाची सुना हूँ कि आपका बेटा ‘जीत’ की शादी हो रही है। तभी पेड़ बोला- सच सुना है! आपने। अगले दिन ‘जीत’ घर आ गया। जीत को देखकर सभी खुश हो रहे थे। जीत अपनी माँ को प्रणाम करके पेड़ के पास गया और बोला दोस्त! मैं आ गया हूँ। पेंड़ बोला- तुम कैसे हो दोस्त? जीत ने कहा मैं अच्छा हूँ, तुम कैसे हो दोस्त? पेड़ ने कहा, मैं भी ठीक हूँ, अभी तक हमने इस घर के अनेक लोगों की शादियाँ देखी है। आज हमारे दोस्त की शादी है इसलिए मुझे बहुत खुशी हो रही है। जीत बोला लेकिन दोस्त मुझे अभी शादी नहीं करना था। पेड़ ने पूछा कितने दिन की छुट्टी आये हो? जीत ने कहा दस दिन की। तो क्या शादी करके तुरंत चले जाओगे? जीत बोला हाँ।

जीत की शादी बहुत ही हर्षोल्लास के साथ हो गई। शादी के चौथे दिन ही जीत को अपनी नौकरी पर जाना था। वह जाने की तैयारी करने लगा। आज चौथा दिन था। जीत जाते समय अपने दोस्त से मिलने गया और बोला दोस्त आज मैं जा रहा हूँ। पेड़ ने कहा, बोलो आ रहा हूँ, अरे दोस्त हाँ! हाँ! गलती हो गई, क्षमा करना, आ रहा हूँ। जाने का मन तो नहीं कर रहा है लेकिन छुट्टी नहीं है। जीत ने पेड़ से कहा- तुम अपना ध्यान रखना। पेड़ ने भी कहा- तुम भी अपना ध्यान रखना और पत्र लिखते रहना। इस तरह कई वर्षो तक सब कुछ अच्छा चलता रहा। जीत जब भी छुट्टी आता था तब दिनभर अपने दोस्त के पास ही बैठे रहता था। जीत को वहाँ बैठे देखकर गांव के और भी लोग आ जाते थे। असल में अब वह पेड़ बहुत बड़ा और छायादार हो गया था। हमेशा वहाँ भीड़ लगी रहती थी। कभी-कभी तो कुछ लोग वहीं तख्त के उपर नींद से सो भी जाते थे।

अब हमेशा पेड़ के पास भीड़ लगी रहती थी। यह सब देख कर घर के कुछ लोग चिढ़ने लगे थे। एक दिन अचानक किसी कारण वश दो परिवारों के बीच में झगड़ा होने लगा। झगड़े में बात चल रही थी कि पेड़ से पत्ते गिरते रहते है लेकिन कोई भी साफ नहीं करता है। दुसरे ने कहा- लोग दिनभर यहीं भीड़ लगाये रहते हैं, तो कैसे सफाई किया जाए। यही बात इतनी आगे बढ़ गई कि चरन सिंह पेड़ को काटने के लिए उतारू होने लगे। जो पेड़ इतने सारे लोगों को सुख देता था अब उसका अपना जीवन ही संकट में पड़ गया था। उसके गुण ही अब उसके संकट का कारण बन गया था। अब अशोक का पेड़ बड़ा और उसका तना भी मोटा हो गया था। जिसे देखकर किसी व्यवसायी ने उसके लिए 5,000 रुपये की बोली भी लगाई थी। चरन सिंह की नजरें अब उस 5,000 रुपये पर टीकी हुई थी। किसी न किसी बहाने अब वो पेड़ को काटने के पीछे पड़े हुए थे। जीत के सामने तो वह पेड़, एक अरमान और खुशी की निशानी थी, उसके सामने कोई उस पेड़ को क्षति नहीं पहुँचा सकता था लेकिन उसकी नौकरी भारतीय सेना में थी। वह हमेशा घर पर रह नहीं सकता था। इसलिए अपने भरोसे मंद लोगों से आग्रह करता था कि जब मेरी छुट्टियाँ समाप्त हो जायेंगी और मैं अपने डियूटी पर चला जाऊँगा तो आप लोग ध्यान देना कि चरन सिंह इस पेड़ को काट न दें। एक दो वर्ष इसीतरह चलता रहा लेकिन एक दिन ऐसा भी आया जब जीत अपनी अगली छुट्टियों में घर आया तो दरवाजे के सामने कोई पेड़ नहीं था। चारों तरफ उदासी फैली हुई थी। घर सुना-सुना सा लग रहा था। सामने कटे हुए पेड़ की सुखी तना वाली लकड़ी पड़ी हुई थी। ऐसा लग रहा था कि वो सुखी लकड़ियाँ चीख-चीख कर कह रही थीं कि देखो जीत चरन ने मेरी ‘हत्या’ कर दी। मुझे ‘काट’ दिया अब मैं कभी भी बातें नहीं कर पाउँगा। कुछ दिनों में मेरी इस बची हुई लकड़ियों को भी वो जला देगा और हमेशा-हमेशा के लिए मेरा अस्तित्व मिट जायेगा।

जीत उसदिन रातभर सो नहीं सका। उसे ऐसा लग रहा था जैसे बार-बार अशोक का पेड़ सामने आकर कह रहा हो जीत किसी ने मेरी रक्षा नही की, सब अपनी खुले आँखों से मुझे कटते हुए देख रहे थे। मैं दर्द से चिल्ला और कराह रहा था, लेकिन सब लोग शांत खड़े थे। उस समय सिर्फ मुझे तुम्हारी याद आ रही थी। आज मेरा दोस्त होता तो मेरी रक्षा जरुर करता।    मुझे इस तरह से मरते हुए नहीं देखता। मेरा अस्तित्व हमेशा-हमेशा के लिए समाप्त हो गया।

ये सिर्फ एक पेड़ की हत्या नहीं थी एक अरमान की हत्या थी, एक भरोसे की हत्या थी, अपने कहे जाने वाले उस रिश्ते की हत्या थी जो एक हरे भरे पेड़ को टुकड़े-टुकड़े करके उसका अंत कर दिया। अब कभी जीत जब वापस गाँव आता है तो उस पेड़ की यादें मन को उदास कर देती हैं। हर बार उस जगह को देखने पर यही लगता है कि पेड़ सामने खड़ा होकर बोल रहा हो, जीत! चरन ने मेरी हत्या कर दी, मुझे काट दिया, अब मैं कभी भी बातें नहीं कर पाउँगा, मेरा अस्तित्व हमेशा हमेशा के लिए मिट गया। जीत अब बहुत उदास रहता है। धीरे धीरे अब छुट्टियाँ भी कम ही आता है। अशोक का वह पेड़ उसके लिए सिर्फ एक पेड़ नहीं था। उसकी खुशियों का एक संसार उस पेड़ में छुपा हुआ था। थोड़ी देर के लिए ऑक्सीजन देने वाले डॉक्टर को हम पैसे देकर भगवान मान लेते हैं जबकि जीवन भर मुफ्त में ऑक्सीजन देने वाले पेड़ का हम कद्र ही नहीं करते हैं, उसे हम अपने सुख के लिए नष्ट कर देते हैं। जीवन का एक सत्य और भी है, जिस दिन हम मरेंगे उस दिन भी एक पेड़ साथ लेकर जायेंगे, तो क्यों न हम प्रकृति का कर्ज चुका कर मरें अथार्त जीते जी ही क्यों न हम कुछ पेड़ लगा दें।

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