छपरा (सारण), बिहार (पौराणिक तीर्थस्थल)

सारण भारत के बिहार प्रान्त में स्थित एक प्रमंडल एवं जिला है। यहाँ का प्रशासनिक मुख्यालय छपरा में है। सारण जिला तीन ओर से गंगा, गंडक एवं घाघरा नदियों से घिरा हुआ त्रिकोणीय भू-क्षेत्र है। सम्पूर्ण जिला समतल एवं उपजाऊ प्रदेश है। कहते हैं कि प्राचीन समय में यहाँ वनों का भरमार था। इन वनों में हिरन (सारंग) अधिक रहा करते थे। इस कारण से इसे ‘सारंग अरण्य’ भी कहा जाता था। जो कालक्रम के अनुसार बदलकर सारण हो गया। ब्रिटिश विद्वान कनिंघम के अनुसार- मौर्य सम्राट अशोक के समय में यहाँ लगाए गए धम्म स्तंभों को ‘शरण’ कहा जाता था जिसे बाद में सारण कहलाने के कारण इसका नाम भी सारण पड़ गया। सारण का मुख्यालय छपरा है जो काफी प्रसिद्ध है इसलिए इस जिले को छपरा भी कहा जाने लगा। यहाँ के कुछ मशहूर स्थान जो देवस्थान और मंदिरों के लिए जाने जाते हैं। जैसे-    

  1. गौतम स्थान 2. शिल्हौरी 3. गढ़देवी 4. अम्बिका भवानी 5. हरिहर नाथ बाबा मंदिर 6. चिरान या चिरांद।

1. गौतम स्थान– रिविल गंज, छपरा (सारण), बिहार, गौतम ऋषि के स्थान के कारण ही जाना जाता है। यह सरयु नदी के उतरी किनारे पर स्थित है। यह वही स्थान है जहाँ अहिल्या माता का उद्धार हुआ था। माना जाता है कि गौतम ऋषि की पत्नि अहिल्या सतयुग में ऋषि श्राप के कारण पत्थर बन गई थी। गौतम ऋषि का पुत्र बड़ा होकर अपनी माता के विषय में जानना चाहा तो गौतम ऋषि ने श्राप बस पत्थर में परिवर्तित अहिल्या के विषय में अपने पुत्र को बताया था। ऋषि पुत्र ने पिता से प्रश्न किया कि मेरी माता का उद्धार कब और कैसे होगा? तब गौतम ऋषि ने अपने पुत्र को बताया कि त्रेता युग में राम का अवतार होगा और उनकी चरण स्पर्स के बाद तुम्हारी माता पुनः मनुष्य रूप में वापस आ जायेंगी। छोटा बालक पिता से पूछा कि त्रेता युग कब आएगा। इस पर गौतम ऋषि ने अपने पुत्र को बताया कि सतयुग के बाद पहले द्वापर युग आएगा और उसके बाद त्रेता युग आएगा। तब बालक ने पिता से पूछा कि इतने दिनों तक मेरी माता क्या ऐसे ही पत्थर बन कर रहेंगी? क्या त्रेता युग द्वापर युग से पहले नहीं आ सकता है? इसपर गौतम ऋषि ने पुत्र को बताया कि सृष्टि की रचना ब्रह्मा जी करते हैं और इस विषय में अधिक जानकारी वही दे सकते हैं। मान्यता है कि ऋषि पुत्र ने ब्रह्मा जी की घोर तपस्या किया और उनसे वरदान माँगा कि त्रेता युग द्वापर से पहले आये नहीं तो मुझे अपनी माता के दर्शन के लिए तीन युगों तक प्रतीक्षा करनी पड़ेगी। इसपर ब्रह्मा जी ने ऋषि पुत्र को आशीर्वाद दिया और द्वापर से पहले त्रेता युग आया। त्रेता में रामावतार हुआ और भगवान श्रीराम के चरण स्पर्श से गौतम ऋषि की पत्नी अहिल्या का उद्धार हुआ। यह वही स्थान है। यहाँ से कुछ ही दूर पर श्रृंगी ऋषि का आश्रम भी है। इतना ही नहीं रिविलगंज में हनुमान जी का ननिहाल माना जाता है। यहाँ नवरात्री में हनुमान जी की विशाल प्रतिमा स्थापित की जाती है। यहाँ पूजा-पाठ के साथ-साथ लोग परंपरागत नृत्य और अखाड़ा के साथ विसर्जन जुलुस भी बड़ी धूम-धाम के साथ निकालते हैं।

2. शिल्हौरी– मढ़ौरा अनुमंडल में स्थित शिल्हौड़ी में भगवान श्री हरि जी का मंदिर है। यहाँ के विषय में यह कहा जाता है कि जब नारद को अपने ब्रहमचर्य का घमंड हो गया तब उनके घमंड को तोड़ने के लिए भगवान श्री विष्णु ने एक मायानगरी बनाई थी। उस नगर में शिलनिधि नाम का एक वैभवशाली राजा रहता था। उस राजा की विश्वमोहिनी नाम की एक रूपवती कन्या थी। इनकी पुत्री के रूप में माता लक्ष्मी विश्वमोहिनी के रूप में उत्पन्न हुई जिसके लिए स्वयंवर रचा गया था। नारद जी ने विश्वमोहिनी पर मोहित होकर भगवान विष्णु से अपने लिए सुन्दरता का वरदान माँगा था लेकिन भगवान विष्णु जी ने नारद जी की जन्मों की तपस्या भंग न हो ऐसा सोंचकर उनको सुन्दर शरीर तो दिया लेकिन चेहरा बन्दर का बना दिया था। जिसका अवशेष आज भी यहाँ शिल्हौड़ी में मौजूद है।

3. गढ़देवी– यह स्थान भी मढ़ौरा में ही पड़ता है। यहाँ की धार्मिक मान्यता है कि जब पार्वती जी हवन कुंड में कुद कर सती हो गई थी। उसके बाद शंकर जी ने उनके अधजले शरीर को लेकर तांडव करना शुरू कर दिया। इस विनाशकारी स्थिति से निपटने के लिए भगवान विष्णु जी ने अपने सुदर्शन चक्र से माता के शरीर को काटना शुरू किया जिसके अंश अलग अलग स्थानों पर गिरे। माना जाता है कि उनके खून के छींटे यहाँ मढ़ौरा में भी गिरे थे। इसलिए यह स्थान गढ़देवी के रूप में प्रसिद्ध है।

4. अम्बिका भवानी– छपरा (सारण), बिहार के दिघवारा के पास आमी एक गाँव है जहाँ अम्बिका भवानी माता का मंदिर है। इसे शक्ति पीठ होने का भी दावा किया जाता है। पौराणिक कथा के अनुसार, दुर्गा सप्तशती में यह वर्णित है कि ‘राजा सूरथ’ और ‘समाधि’ के राजपाट खत्म हो गए थे। उसी समय दोनों राजा वैश्य मुनि के आश्रम में गये और अपनी स्थिति से उबरने का उपाय पूछा। मुनि ने उन्हें वहाँ पर दुर्गा माता (जो पुरे ब्रह्मांड को नियंत्रित करती हैं) की पूजा करने की सलाह दिया। मुनि के सलाह पर ‘राजा सुरथ’ और ‘समाधि’ दोनों ने वहाँ गंगा नदी के किनारे मिट्टी से माँ की पिंडी बनाकर पूजा अर्चना किया था। तभी माता प्रकट होकर उनकी इच्छा पूर्ण होने का आशिर्वाद दिया था। यही ऐसा एकमात्र स्थान है जो दुर्गा सप्तशती के वर्णन से मिलता-जुलता है। ‘कल्याण’ की धार्मिक पुस्तक के शक्ति अंक से यह पुष्टि होता है कि यह स्थान एक ‘शक्तिपीठ’ है। आमी को राजा दक्ष प्रजापति का यज्ञ स्थान भी कहा जाता है। इस मंदिर से जुड़ी एक पौराणिक कहानी भी है। कथा के अनुसार दक्ष प्रजापति द्वरा आयोजित यज्ञ में महादेव जी को आमंत्रित नहीं किया गया था। दक्ष प्रजापति सती माता (पार्वती जी) के पिता थे। माता सती ने पिता की इक्षा के विरुद्ध भगवान शिव से विवाह किया था। दक्ष प्रजापति भगवान शिव के मुण्डमाल रूप से प्रसन्न नहीं थे। इसलिए उन्हें यज्ञ में आमन्त्रित नहीं किया गया। सती माता ने इसे पिता द्वरा अपने पति का अपमान समझा और हवन कुंड में कूदकर आत्मदाह कर लिया। भगवान शिव ने माता सती को मना किया था कि बिना निमन्त्रण के किसी के भी यज्ञ या आयोजन में नहीं जाना चाहिए। भले ही वो अपने पिता का ही घर क्यों न हो लेकिन सती माता ने तर्क देते हुए भगवान शिव की इस बात को मानने से इनकार कर दिया कि पिता के घर जाने के लिए किस तरह का निमन्त्रण? पिता के घर कभी भी बिना निमन्त्रण के भी जा सकते हैं। भगवान शिव के परामर्श को अस्वीकार करने का परिणाम माता सती को पश्चाताप के रूप में आत्मदाह करके चुकानी पड़ी थी। सती द्वारा आत्मदाह की घटना को देखकर भगवान शंकर आक्रोशित हो गये और सती के शव को लेकर तांडव करने लगे। भगवान शिव के इस प्रलयंकारी रूप को देखकर चारों तरफ हाहाकार मच गया। तब सभी देवताओं के आग्रह पर उन्हें शांत करने के लिए भगवान विष्णु ने अपने चक्र से सती के शव को टुकड़े-टुकड़े कर दिए (क्योंकि सबको यही लगा कि जब तक भगवान शिव के कंधे पर सती का शव है तब तक उनको शांत करना असंभव है)। उनके शरीर के टुकड़े जहाँ-जहाँ गिरे वह स्थान ‘शक्तिपीठ’ कहलाया। आमी भी एक ‘शक्तिपीठ’ माना जाता है। आमी में प्रतिमा स्थापित नहीं की जाती है बल्कि माँ के पिंडी रूप की ही पूजा होती है।   

5. हरिहर नाथ बाबा का मंदिर– बिहार की राजधानी पटना से 5 किलोमीटर दूर गंगा के दुसरे तट पर ‘सोनपुर’ है जो गंगा और गंडक के संगम पर स्थित है। इसे ‘हरिहर क्षेत्र’ भी कहा जाता है। यहाँ के मन्दिर में भगवान हरिहर नाथ की मूर्ति की पूजा होती है माना जाता है कि यह एक मात्र ऐसा मन्दिर है जहाँ भगवान ‘हरि’ (अर्थात विष्णु) और ‘हर’ (अर्थात शिव) को एक साथ मूर्ति के रूप में पूजा जाता है। यहाँ आज भी कार्तिक महिने की पूर्णिमा के दिन विश्व प्रसिद्ध पशु मेला लगता है जो लगभग एक महिने तक चलता है। एक और मान्यता है कि इसी स्थान पर द्वापर युग में गज (हाथी) और ग्राह (मगर अर्थात घड़ियाल) की प्रसिद्ध लड़ाई भी हुई थी। कई दिनों तक के संघर्ष में कभी हाथी भारी पड़ता था और घड़ियाल को नदी से खींचकर बाहर रेत पर लेकर आ जाता था तो कभी घड़ियाल भारी पड़ता था और हाथी को खींचकर गंडक नदी में लेकर चला जाता था। कई दिनों के संघर्ष के बाद जब हाथी थक गया और उसे अपनी हार निश्चित दीखने लगी तो उसने भगवान कृष्ण से मदद की गुहार लगाई और उसकी प्रार्थना सुनकर भगवान कृष्ण प्रगट हुए तथा अपने चक्र सुदर्शन से घड़ियाल का बध किया और हाथी की जान बचाई।

6. चिरांद या चिरान– चिरांद, छपरा से 11 किलोमीटर पूरब, छपरा–पटना राज्यमार्ग पर स्थित सारण जिला का सबसे महत्वपूर्ण पुरातत्व स्थल है। आठवीं शदी में यहाँ पाल शासकों का अधिपत्य था। घाघरा नदी के किनारे बना हुआ स्तूपोंनुमा भराव को हिन्दू, बौद्ध तथा मुस्लिम प्रभाव से जोड़कर देखा जाता है। यहाँ पर हुई खुदाई से पता चलता है कि यह भारत में नव पाषाण काल का पहला ज्ञात स्थल है। स्थानीय लोग चिरांद टीले को द्वापर युग में ईश्वर के परम भक्त राजा मौर्यध्वज के किले का अवशेष एवं ‘च्यवन’ ऋषि का आश्रम मानते हैं। 1960 के दशक में हुई खुदाई में यहाँ बुद्ध की मूर्तियाँ एवं धम्म से जुड़ी कई चीजें भी मिली हैं। दानवीर राजा मोरध्वज– एक बार अर्जुन को अपने श्री कृष्ण भक्त होने का अहंकार हो  गया था। अर्जुन ने भगवान श्री कृष्ण से कहा हे प्रभु इस संसार में मैं ही आपका सबसे बड़ा भक्त हूँ। भगवान श्री कृष्ण ने कहा हाँ अर्जुन लेकिन तुमसे भी बड़ा मेरा एक और भक्त है। अर्जुन ने कहा- वह कौन है प्रभु! श्री कृष्ण बोले- वह है ‘राजा मोरध्वज’। अर्जुन बोले वह कैसे प्रभु! भगवान श्री कृष्ण बोले चलो हम चलकर देखते हैं। भगवान श्री कृष्ण अर्जुन के अहंकार को तोड़ना चाहते थे। भगवान श्री कृष्ण और अर्जुन ऋषि के वेश में और युधिष्टिर शेर का रूप बदल कर राजा मोरध्वज के नगर में पहुंचे। भगवान श्री कृष्ण ने- कहा राजन हम सब को बहुत भूख लगी है। राजा मोरध्वज ऋषियों का स्वागत करते हुए बोले- हम अभी आप सब के लिए भोजन का प्रबंध करते हैं। तभी श्री कृष्ण जी बोले- राजन! आप हमारे लिए तो भोजन का प्रबंध कर देंगे लेकिन मेरे शेर के लिए? यह भी बहुत भूखा है। राजा ने कहा ऋषिवर इनके लिए भी भोजन का प्रबंध हो जायेगा। तभी ऋषिवर बोले- यह शेर सिर्फ आदमी का मांस खाता है। यह सुनकर राजा मोरध्वज बोले मेरा मांस खिला देंगे। यह सुनकर श्री कृष्ण भगवान बोले यह सिर्फ बच्चे का मांस खाता है। यह सुनकर राजा मोरध्वज बोले ठीक है प्रभु इसे मेरे बच्चे का मांस खिला देंगे। यह सुनकर भगवान श्री कृष्ण बोले लेकिन एक बात का ध्यान रहे बच्चे को तुम दोनों पति-पत्नी को मिलकर चीरना होगा और उस समय दोनों के आँख से आँसू भी नहीं निकलना चाहिए। अगर आँसू निकल गया तो शेर मांस नहीं खाएगा। राजा मोरध्वज इसे स्वीकार कर लेते हैं। अपने पुत्र ताम्रध्वज को बुलाकर दोनों पति-पत्नी अपने ही बेटे को आरी से चिर कर शेर को खिला देते हैं। भगवान श्री कृष्ण प्रसन्न होकर अपने असली रूप में प्रकट होकर बोले हे राजन तुम धन्य हो। भगवान श्रीकृष्ण बोले- राजन तुम अपने बेटे को उसका नाम लेकर बुलाओ। राजा मोरध्वज बोले- प्रभु वह तो अब इस दुनिया में नहीं है, मैं अब उसे कैसे बुलाऊँ? श्री कृष्ण बोले! तुम बुलाओ राजन! तभी राजा मोरध्वज अपने पुत्र का नाम लेकर बुलाते हैं। उसी समय ताम्रध्वज दौड़कर अपने पिता के पास आकर लिपट जाता है। यह देखकर अर्जुन को विश्वास हो गया कि राजा मोरध्वज मुझ से भी बड़ा भक्त है। दानवीर राजा मोरध्वज ने अपना धर्म निभाते हुए अतिथि की याचना पर, अपने पुत्र को ही आरी से चीरकर अतिथि को परोस दिया था। इस त्याग और समर्पण की कहानी के नाम पर ही इस गांव का नाम ‘चिरांद’ पड़ा था जिसे वर्तमान में ‘चिरान’ के नाम से जाना जाता है।

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