रामकृष्ण परमहंस

भारत एक विशाल देश है। इस देश में अनेक भाषा भाषी, संस्कृति तथा जाति के लोग रहते हैं। यहाँ प्रकृति ने प्राणियों के लिए अनेक सुख सुविधाएँ प्रदान की है। हमारे देश की धरती पर अनेक संतों, कवियों, लेखकों, वज्ञानिकों, सैनिकों तथा ऋषि मुनिओं का जन्म हुआ है। कोलकाता शहर में एक संत रामकृष्ण का जन्म 18 फरवरी 1836 को कामारपुकुर के एक निर्धन ब्राह्मण परिवार में हुआ था। रामकृष्ण परमहंस भारत के एक महान संत और विचारक थे। वे सभी धर्मों का सम्मान करते थे। वे मानवता के पुजारी थे। रामकृष्ण के बचपन का नाम गदाधर था। ज्योतिषियों ने बालक रामकृष्ण के महान होने की भविष्यवाणी की थी। ज्योतिषियों की भविष्वाणी सुनकर माता चंद्रमणि देवी तथा पिता खुदिराम अत्यंत प्रसन्न हुए थे। पांच वर्ष की अवस्था में ही वे अपने अद्भूत प्रतिभा और स्मरण शक्ति का परिचय देने लगे थे। उन्हें अपने पूर्वजों के नाम, देवी-देवतावों की प्रार्थनायें, रामायण और महाभारत की कथाएं कंठस्थ हो गई थी।

परिवार­

सन् 1843 ई० में इनके पिता का देहांत हो गया। परिवार का पूरा भार उनके बड़े भाई रामकुमार पर आ गया। रामकृष्ण जब नौ वर्ष के हुए तो उनके यज्ञोपवित संस्कार की बात चलने लगी थी। इस संस्कार की एक प्रथा होती है – यज्ञोपवित के पश्चात् अपने किसी नजदीकि सम्बन्धी या किसी ब्राह्मण से भिक्षा प्राप्त करनी होती है। किन्तु रामकृष्ण ने एक लोहारिन से भिक्षा प्राप्त किया था। वो लुहारिन रामकृष्ण को बचपन से जानती थी। उसने रामकृष्ण से प्रार्थना की थी कि वह प्रथम बार की भिक्षा उससे ही प्राप्त करें। लुहारिन के सच्चे प्रेम से प्रेरित होकर बालक रामकृष्ण ने उसे बचन दे दिया था। अतः यज्ञोपवित के पश्चात् घरवालों के विरोध के बावजूद भी रामकृष्ण ने इस पुराने समय से चली आ रही प्रचलित प्रथा का उलंघन कर अपना वचन पूरा किया और पहली भिक्षा उस लुहारिन से ही प्राप्त किया। रामकृष्ण का मन पढ़ाई में नहीं लगता था लेकिन उनमे एक विलक्षण प्रतिभा थी। वे रामायण, महाभारत, गीता आदि के श्लोक को एक बार मे सुनकर याद कर लेते थे। उनके गाँव की जो अतिथि शाला थी उसमे साधु-संत ठहरते थे। उनके साथ बैठकर उनकी चर्चाओं को रामकृष्ण ध्यानपूर्वक सुनते थे तथा उनकी सेवा करते थे। इसमे उन्हें विशेष आनंद आता था। वे संगीत प्रेमी भी थे। भक्तिपूर्ण गानों के प्रति उनकी विशेष अभिरुचि थी। एक बार की बात है कि रामकृष्ण अपने पास के गाँव जा रहे थे तभी उन्होंने आकाश में काले बादलों के बीच सफेद रंग के बगुलों को पंक्ति में उड़ते देखा और उसे देखते ही रामकृष्ण संज्ञा शून्य हो गए। वास्तव में वह भाव समाधि थी।

पिता के मृत्यु के पश्चात रामकृष्ण अपने बड़े भाई के साथ कोलकाता आ गए। उनके बड़े भाई को दक्षिणेश्वर  काली  मंदिर  के  मुख्य  पुजारी  के  रूप  में  नियुक्त  किया गया था। रामकृष्ण और उनके भांजे हृद्य दोनों रामकुमार की सहायता करते थे। रामकृष्ण को देवी की प्रतिमा को सजाने का काम मिला था। सन् 1856 में रामकुमार की मृत्यु के पश्चात्, रामकृष्ण को काली मंदिर में पुरोहित के रूप में नियुक्त किया गया। रामकृष्ण अपने बड़े भाई की मृत्यु के पश्चात् काली माता में अधिक ध्यान मग्न रहने लगे। कहा जाता है कि श्री रामकृष्ण को काली माता का दर्शन ब्रह्माण्ड के रूप में हुआ था। यह भी कहा जाता है कि श्री रामकृष्ण माँ काली को अपने हाथों से खाना खिलाते थे तथा उनसे बातें भी करते थे और खुद नाचने–गाने लगते थे। जैसे ही काली माँ से सम्पर्क छुटता था, वे एक अबोध बालक की तरह रोने लगते थे।

मैं जब छठी कक्षा में पढ़ती थी तब मेरी एक शिक्षिका जो कोलकाता की रहने वाली थी, हमें बहुत कुछ श्री रामकृष्ण के विषय में, इस तरह की बातें बताया करती थीं। उस समय मेरे मन में एक प्रश्न उठता था कि क्या भागवान से मनुष्य सच में बातें कर सकता है ?

श्री रामकृष्ण के भक्ति के चर्चे धीरे-धीरे फैलने लगे। अफवाह यहाँ तक फैल गई कि अध्यात्मिक ‘साधनों’ के कारण रामकृष्ण का मानसिक संतुलन बिगड़ गया है। यह सब देखकर रामकृष्ण की माता ने उनको विवाह के बंधन में बांधने का निर्णय लिया। उनका विवाह ‘जयरामबाटी’ गांव के रामचंद्र मुखर्जी की पांच वर्षीय पुत्री शारदा देवी से 1859 में संपन्न हो गया। उस समय रामकृष्ण की उम्र तेईस वर्ष की थी। विवाह के पश्चात् शारदा देवी अपने गाँव में ही रहती थीं। 18 वर्ष की उम्र होने के पश्चात् वे रामकृष्ण के पास दक्षिणेश्वर में आकर रहने लगीं। रामकृष्ण जी अपनी पत्नी को माता के रुप में देखते थे। शारदा माँ भी अपने पति को ईश्वर मान कर उनके सुख में अपना सुख देखने लगी और जीवन साथी बनकर हमेशा उनकी सेवा करती रहीं।

रामकृष्ण के जीवन में अनेक गुरु आए लेकिन अंतिम गुरुओं का प्रभाव उनके जीवन पर गहरा पड़ा। उनकी एक गुरु ‘माँ भैरवी’ थी जिन्होंने उन्हें कापालिक तंत्र की साधना करायी। रामकृष्ण के अंतिम गुरु ‘श्री तोतापूरी’ थे। ‘श्री तोतापूरी’ सिद्ध योगी, तांत्रिक तथा हठयोगी थे। तोतापुरी ने जब रामकृष्ण को कहा कि मैं तुम्हें अगली मार्ग तक पंहुचा सकता हूँ और उन्होंने रामकृष्ण से कहा कि मैं तुम्हें वेदांत की शिक्षा दूंगा, तो रामकृष्ण ने सरल भाव से कहा, ‘माँ से पूछ लूँगा तब’। रामकृष्ण के इस सरल भाव से ‘तोतापुरी’ मुग्ध हो गए और मुस्कुराने लगे। बाद में माँ ने अनुमति दे दी यह कहकर रामकृष्ण ने नम्रतापूर्वक गुरु तोताराम के चरणों में पूर्ण विश्वाश के साथ आत्मसमर्पण कर दिया और रामकृष्ण समाधि की अंतिम मंजिल तक पहुँच गए। उनकी आत्मा परम सत्ता में विलिन हो गई और उन्होंने ब्राह्म ज्ञान को प्राप्त कर लिया।

सन्यास ग्रहण करने के पश्चात् उनका नया नाम रामकृष्ण परमहंस पड़ा। हिंदू धर्म में परमहंस की उपाधि उसे दी जाती है जो सभी प्रकार की सिद्धियों से युक्त हो। इसके बाद परमहंस जी ने कई धर्मो की साधना की। समय जैसे-जैसे बिताने लगा, वैसे-वैसे उनकी सिद्धियों के समाचार तेजी से फैलने लगे। बड़े-बड़े विद्वान प्रसिद्ध वैष्णव और तांत्रिक उनसे अध्यात्मिक प्रेरणा प्राप्त करते रहे। उनके कई शिष्य थे- केशवचन्द सेन, विजयचन्द गोस्वामी, ईश्वरचन्द विद्यासागर आदि, परन्तु स्वामी विवेकानंद उनके परम शिष्य थे। उनके शिष्य उन्हें ‘ठाकुर’ कह कर सम्बोधित करते थे। उनके सहृदयता और मानवतावादी विचार का एक उदाहरण इस घटना में दिखाई देता है– विवेकानंदजी एक बार उनके पास हिमालय में तपस्या के लिए जाने की अनुमति लेने गए तो परमहंस जी ने उन्हें समझाया कि यहाँ हमारे आस-पास लोग भूख और बीमारी से तड़प रहे हैं, चारों ओर अज्ञानता का अँधेरा छाया हुआ है और तुम हिमालय कि गुफा में समाधि लगाओगे? क्या तुम्हारी आत्मा इसे स्वीकार करेगी? गुरु की इन बातों को सुनकर गुरु भक्त विवेकानंद जी दिन-दुखियों की सेवा में लग गए। परमहंस जी के मानवतावादी विचारधारा का ये सबसे बड़ा उदाहरण है।

रामकृष्ण संसार को माया के रूप में देखते थे। उनके अनुसार काम, क्रोध, लोभ, क्रूरता, स्वार्थ आदि मनुष्य को निचले स्तर तक ले जाता है। निःस्वार्थ कर्म, अध्यात्मिकता, दया, पवित्रता, प्रेम और भक्ति मनुष्य को जीवन के उच्च स्तर तक ले जाती है। रामकृष्ण परमहंस जीवन के अंतिम दिनों में समाधि की स्थिति में रहने लगे थे। शरीर शिथिल पड़ने लगा था। जब उन्हें कोई आत्मियता के साथ स्वास्थ्य पर ध्यान देने का निवेदन करता, तो वे सिर्फ़ मुस्कुरा कर रह जाते थे। अंत में वह दु:खद घड़ी भी आ गई तथा 15 अगस्त 1886 की रात में वे समाधि में लीन हो गये। माना जाता है कि अंतिम दिनों में वे गले की बीमारी से काफी परेशान थे। इसप्रकार फिर से एक महान संत सदा सदा के लिए इस शरीर को त्याग कर परमसत्ता में विलिन हो गया और छोड़ गया अपने पीछे बहुत सारी कहानियां जिससे हमें बहुत कुछ सिखना है।

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