संज्ञा शब्द की व्युपति- संज्ञा शब्द दो शब्दों के मेल योग से बना है। सम् + ज्ञा ‘सम्’ का अर्थ ‘सम्यक’ (पूर्ण) और ‘ज्ञ’ का अर्थ ‘ज्ञान’ अथार्त ‘पूर्णज्ञान’ होता है। संज्ञा शब्द का अर्थ होता है- ‘नाम’ (संज्ञा का एक और अर्थ ‘महानाम’ भी है।) परिभाषा- किसी वस्तु, प्राणी, स्थान, भाव आदि के ‘नाम’… Continue reading संज्ञा (Noun)
सुंदर विचार
हिन्दी साहित्य की गद्य विधाएँ: नाटक (इकाई- 2)
‘नाटक’ शब्द संस्कृत की ‘नट्’ धातु से बना है, जिसका अर्थ होता है- ‘अभिनय करना’। नाटक की व्युत्पति नट + अक = नाटक ( अर्थ अभिनय करना है।) परिभाषा- “अवस्थानुकृतिनार्ट्यं रूपं दृष्यतयोच्यते।” अथार्त किसी अवस्था का अनुकृति ही नाटक है। (यह धनंजय के नाटक ‘दशरूपक’ में है।) भारतेंदु हरिश्चंद्र के शब्दों में- “नाटक का अर्थ… Continue reading हिन्दी साहित्य की गद्य विधाएँ: नाटक (इकाई- 2)
हिन्दी साहित्य के सन्दर्भ में पुरुष विमर्श : एक विवेचन
भूमिका- परिवर्तन, विकास, क्रांति ये प्रकृति के शाश्वत नियम हैं। हर युग में क्रांतियाँ और आंदोलन हुए हैं, आज भी हो रहे हैं और आगे भी होते रहेंगे। जिसके फलस्वरूप व्यवस्था में परिवर्तन हुआ है और निरंतर विकास का मार्ग प्रसस्त होता रहा है। पृथ्वी पर जब से जीवन की उत्पत्ति हुई है, तब से… Continue reading हिन्दी साहित्य के सन्दर्भ में पुरुष विमर्श : एक विवेचन
साहित्य: अर्थ, परिभाषाएँ स्वरुप एवं भेद
साहित्य शब्द की व्युत्पति- ‘सहितस्य भाव साहित्य्’ अथार्त ‘सहित’ का भाव साहित्य है।’ सहित- स + हित = अर्थात जिसमे सभी के हित का भाव हो, वह साहित्य है। सहित- शब्द और अर्थ का स्वभाव संयोजन है। साहित्य की परिभाषाएँ: विश्वनाथ क्व शब्दों में- “वाक्यं रसात्मक काव्यम्।”(रसात्मक वाक्य काव्य है) आचार्य भामह के शब्दों… Continue reading साहित्य: अर्थ, परिभाषाएँ स्वरुप एवं भेद
संस्कृत के प्रसिद्ध काव्यशास्त्रीय ग्रंथ एवं आचार्य कालक्रमानुसार
1. भरतमुनि - (3वीं शदी ) नाट्यशास्त्र 2. मेधाविरुद्ध - अलकार ग्रंथ 3. भामह - (7वीं शदी.) काव्यालंकार 4. दंडी - (7वीं शदी.) काव्यादर्श 5. उद्भट भट्ट (8वीं शदी) – कव्यालाकार सार-संग्रह (भामह की रचना का सार) भामह विवरण – (भामह के काव्यालंकार की टीका) 6. वामन - (9वीं शदी) काव्यालंकार सूत्र 7. रुद्रट -… Continue reading संस्कृत के प्रसिद्ध काव्यशास्त्रीय ग्रंथ एवं आचार्य कालक्रमानुसार
हिन्दी साहित्य की गद्य विधा ‘आलोचना’ उद्भव और विकास (इकाई-2)
‘आलोचना’ शब्द की व्युत्पति ‘आ’ (उपसर्ग) ‘लोच्’ (धातु) ‘अन’ + ‘आ’ (प्रत्यय) = से मिलकर आलोचना शब्द बना है। जिसका अर्थ होता है देखना, व्याख्या करना, मूल्यांकन करना आदि। केवल गुण का मूल्यांकन करना प्रशंसा करना और केवल दोष का मूल्यांकन करना निंदा करना है। गुण और दोष दोनों का मूल्यांकन करना आलोचना कहलाता है।… Continue reading हिन्दी साहित्य की गद्य विधा ‘आलोचना’ उद्भव और विकास (इकाई-2)
हिन्दी का भाषिक स्वरुप: हिन्दी का स्वनिम व्यवस्था खंड्य और खंड्येतर (इकाई -1)
‘स्वनिम’ का अर्थ है ‘ध्वनि’। स्वनिम शब्द अंग्रेजी भाषा के ‘फोनिक’ का नवीनतम हिन्दी अनुवाद है। स्वनिम के लिए अब तक ‘ध्वनिग्राम’ और ‘स्वनग्राम’ शब्द का प्रयोग होता रहा है। किन्तु भारत सरकार के पारिभाषिक एवं तकनीकि शब्दावली आयोग में ‘फोनिक’ का हिन्दी अनुवाद ‘स्वनिम’ कर दिया गया। स्वनिम की परिभाषा: भोलानाथ तिवारी के शब्दों… Continue reading हिन्दी का भाषिक स्वरुप: हिन्दी का स्वनिम व्यवस्था खंड्य और खंड्येतर (इकाई -1)
प्रगतिवाद (इकाई -2)
‘प्रगतिवाद’: (1936 – 1943 ई०) सन् 1936 ई० में दो कार्य हुए- भारतीय प्रगतिशील लेखक संघ का पहला अधिवेशन मुंशी प्रेमचंद की अध्यक्षता में लखनऊ में हुआ था। उसी समय सुमित्रानंदन पंत के ‘युगांत’ रचना का प्रकाशन हुआ। तब सुमित्रानंदन पंत ने कहा था कि मैं छायावाद युग की समाप्ति की घोषणा करता हूँ। इसलिए… Continue reading प्रगतिवाद (इकाई -2)
हिन्दी व्याकरण (शब्द ज्ञान)
शब्द की परिभाषा: “ध्वनियों के सार्थक शब्द समूह को शब्द कहते है।” “अर्थ के स्तर पर ‘शब्द’ भाषा की सबसे ‘छोटी’ या ‘पहली’ इकाई है।” डॉ. भोलानाथ तिवारी के शब्दों में- “शब्द अर्थ के स्तर पर भाषा की लघुतम इकाई है।” ध्वनि- जिसे खण्ड नहीं कर सकते वह ध्वनि है। ध्वनि का लिखित रूप ‘वर्ण’… Continue reading हिन्दी व्याकरण (शब्द ज्ञान)
अलंकार
‘अलंकार’ शब्द की व्युत्पति दो शब्दों के योग से हुआ है। अलम् (शोभा) + कार (करनेवाला) = अलंकार। ‘अलंकार’ का शाब्दिक अर्थ होगा ‘शोभा बढ़ानेवाला’ और संज्ञा के रूप में अलंकार शब्द का अर्थ होगा ‘आभूषण’ या ‘गहना’। अलंकार शब्द का उल्लेख सबसे पहले ऋग्वेद में नारी के आभूषणों के संदर्भ में मिलता है। टिपण्णी:… Continue reading अलंकार