मैं गांधारी नहीं हूँ ! (कविता)

गांधारी नहीं मैं कि 

सत्य का अपमान करूँ,

पत्थर की मूर्ति नहीं मैं 

जो अपनी आँखों पर पट्टी बाँध लूँ।  

हर अन्याय को सहती रहूँ,

यह मेरा धर्म नहीं

सिर्फ आँसू बहाती रहूँ,   

यह मेरा कर्म नहीं।

हर अन्याय से लड़ने की

रखती हूँ मैं साहस।

झूठ के आगे नहीं झुकने की

रखती हूँ मैं हिम्मत

मैं अपने आप को पहचानती हूँ।

अपने जिंदगी के हर पल को मैं संवारती हूँ,

शिलाओं के बीच स्वयं की राह मैं बनाती हूँ।

अंधियारे के बीच स्वयं मैं दीप जलाती हूँ

कुंती नहीं हूँ मैं कि मौन रहूँ

न ही द्रौपदी हूँ कि विलाप करूँ।

मैं गांधारी नहीं हूँ

मैं शक्ति हूँ, सत्य को पहचान

सच का साथ देने की इच्छा रखती हूँ।

अपनी सोच अपनी दृष्टि से

सत्य की कहानी लिखती हूँ 

मैं गांधारी नहीं हूँ।

पुत्र मोह में पड़कर

धर्म से मुँह नहीं मोड़ सकती

जो सत्य है वही कहूँगी।

न्याय की राह चलूँगी

मैं गांधारी नहीं बनूँगी मैं आँखों पर पट्टी नहीं बाधूँगी।

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