नामवर सिंह: संस्कृति और सौंदर्य- निबंध भाग-1

‘अशोक के फूल’ केवल एक फूल की कहानी नहीं, भारतीय संस्‍कृति का एक अध्‍याय है; और इस अध्‍याय का अनंगलेख पढ़ने वाले हिंदी में पहले व्‍यक्ति हैं हजारीप्रसाद द्विवेदी। पहली बार उन्‍हें ही यह अनुभव हुआ कि ‘एक-एक फूल, एक-एक पशु, एक-एक पक्षी न जाने कितनी स्‍मृतियों का भार लेकर हमारे सामने उपस्थित है। अशोक की भी अपनी स्‍मृति-परंपरा है। आम की भी है, बकुल की भी है, चंपे की भी है। सब क्‍या हमें मालूम है? जितना मालूम है उसी का अर्थ क्‍या स्‍पष्‍ट हो सका है?’ अब तो ख़ैर हिंदी में फूलों पर ‘ललित’ लेख लिखने वाले कई लेखक निकल आए हैं, लेकिन कहने की आवश्‍यकता नहीं कि ‘अशोक के फूल’ आज भी अपनी जगह है। का‍लिदास के प्रेमी पंडितों को पहली बार इस रहस्‍योद्घाटन से अवश्‍य ही धक्‍का लगा होगा कि जिस कवि को वे अब तक अपनी आर्य संस्‍कृति का महान गायक समझते आ रहे थे वह गंधर्व, यक्ष, किन्‍नर आदि आर्येतर जातियों के विश्‍वासों और सौंदर्य-कल्‍पनाओं का सबसे अधिक ऋणी है। वैसे तो भारत को ‘महामानव सागर’ कहने वाले रवींद्रनाथ ठाकुर एक अरसे से यह बतलाते आ रहे थे कि जिसे हम हिंदू रीति-नीति कहते हैं वह अनेक आर्य और आर्येतर उपादानों का मिश्रण है, किंतु यही संदेश ‘अशोक के फूल’ के माध्‍यम से आया तो उसकी चोट कुछ और ही थी। क्‍या इसलिए कि यह मनोजन्‍मा कंदर्प के धनुष से छूटा है? फूल की मार कितनी गहरी हो सकती है इसका एहसास कराने के लिए ‘अशोक के फूल’ के ये दो वाक्‍य क़ाफ़ी हैं: ‘देश और जाति की विशुद्ध संस्‍कृति केवल बात की बात है। सब कुछ में मिलावट है, सब कुछ अविशुद्ध है।’ और सच कहा जाए तो आर्य संस्‍कृति की शुद्धता के अहंकार पर चोट करने के लिए ही ‘अशोक के फूल’ लिखा गया है, प्रकृति-वर्णन करने के लिए नहीं। यह निबंध द्विवेदीजी के शुद्ध पुष्प-प्रेम का प्रमाण नहीं, बल्कि संस्‍कृति-दृष्टि का अनूठा दस्‍तावेज है।

अब तो भारत की ‘सामासिक संस्‍कृति’ की दिन-रात माला जपने वाले बहुतेरे हो गए हैं। दिनकरजी ने तो ‘संस्‍कृति के चार अध्‍याय’ नाम से एक विशाल ग्रंथ ही लिख डाला; किंतु जैसा कि अज्ञेय ने लिखा है: ‘काव्‍य की पड़ताल में तो दिनकर ‘शुद्ध’ काव्‍य की खोज में लगे थे, लेकिन संस्‍कृति की खोज में उनका आग्रह ‘मिश्र संस्‍कृति’ पर ही खोज में लगे थे, लेकिन संस्‍कृति की मिश्रता को ही उजागर करने का प्रयत्‍न है, उसकी संग्राहकता को नहीं। संस्‍कृति का चिंतन करने वाले किसी भी विद्वान के सामने यह बात स्‍पष्‍ट होनी चाहिए कि संस्‍कृतियाँ प्रभाव ग्रहण करती हैं, अपने अनुभव को समृद्धतर बनाती हैं, लेकिन यह प्रक्रिया मिश्रण की नहीं है। संस्‍कार नाम ही इस बात को स्‍पष्‍ट कर देता है। यह मानना कठिन है कि संस्‍कृति की यह परिभाषा दिनकर की जानी हुई नहीं थी; उनका जीवन भी कहीं उस मिश्रता को स्‍वीकार करता नहीं जान पड़ता था, जिसकी वकालत उन्‍होंने की। तब क्‍या यह संदेह संगत नहीं कि उनकी अवधारणा एक वकालत ही थी, दृष्टि का उन्‍मेष नहीं? और अगर वकालत ही थी तो उनका मुवक्किल क्‍या समकालीन राजनीति का एक पक्ष ही नहीं था, जिसके सांस्‍कृतिक कर्णधार स्‍वयं भी मिश्रता का सिद्धांत नहीं मानते थे, लेकिन अपनी स्थिति दृढ़तर बनाने के लिए उसे अपना रहे थे?’ (स्‍मृतिलेखा, पृ.सं.118)

इस ‘मिश्र संस्‍कृति’ की राजनीति से द्विवेदीजी कितने अलग थे, इसका प्रमाण यह है कि स्‍वाधीनता प्राप्ति के बाद जब से राष्‍ट्रीय स्‍तर पर अनुमोदित और प्रोत्‍साहित नीति के रूप में ‘सामासिक संस्‍कृति’ का बोलबाला हुआ, द्विवेदीजी ने इस विषय पर लिखना लगभग बंद कर दिया। स्‍पष्‍ट है कि वे ‘मिश्र संस्‍कृति’ के वकील न थे और न एक वकील की तरह अपने पक्ष के लिए इतिहास से तथ्‍य बटोरने ही गए थे। उन्‍होंने तो उस अनुभूति को वाणी दी जो अपने अतीत के साहित्‍य को पढ़ते और कलाकृतियों को देखते समय अंतर्तम में उठी थी; और इस बात से तो संभवत: अज्ञेय भी इनकार न करेंगे कि द्विवेदीजी के लिए वह एक अमूर्त बौद्धिक ‘अवधारणा’ नहीं थी, बल्कि ‘दृष्टि का उन्‍मेष’ था। इसीलिए जब द्विवेदीजी कहते हैं कि ‘सबकुछ अविशुद्ध है’, तो तुरंत बाद यह भी जोड़ते हैं कि ‘शुद्ध है केवल मनुष्‍य की जिजीविषा।’ ‘वह गंगा की अबाधित-अनाहत धारा के समान सब कुछ को हजम करने के बाद भी पवित्र है!’

इस संदर्भ में उल्‍लेखनीय है कि अज्ञेय जहाँ संस्‍कृति की केवल ‘संग्राहकता’ की हिमायत करते हैं, वहाँ द्विवेदीजी ‘त्‍याग’ का ज़िक्र करना नहीं भूलते। ‘अशोक के फूल’ में ही, उसी अनुच्‍छेद के अंतर्गत एक द्रष्‍टा की तरह ‘मानवजाति की दुर्दम-निर्मम धारा के हज़ारों वर्ष का रूप साफ़’ देखते हुए वे कहते हैं: ‘मनुष्‍य की जीवन-शक्ति बड़ी निर्मम है, वह सभ्‍यता और संस्‍कृति के वृथा मोहों को रौंदती चली आ रही है। न जाने कितने धर्माचारों, विश्‍वासों, उत्‍सवों और व्रतों को धोती-बहाती यह जीवनधारा आगे बढ़ी है। संघर्षों से मनुष्‍य ने नई शक्ति पाई है। हमारे सामने समाज का आज जो रूप है वह न जाने कितने ग्रहण और त्‍याग का रूप है।’

इसलिए द्विवेदीजी के सामने योजनाबद्ध रूप से एक ‘मिश्र संस्‍कृति’ तैयार करने की समस्‍या नहीं है, समस्‍या यह है कि ‘आज हमारे भीतर जो मोह है, संस्‍कृति और कला के नाम पर जो आसक्ति है, धर्माचार और सत्‍यनिष्‍ठा के नाम पर जो जड़िमा है’ उसे किस प्रकार ध्‍वस्‍त किया जाए?

इस दृष्टि से यदि दिनकर की ‘मिश्र संस्‍कृति’ की एक राजनीति है जो अज्ञेय की संस्‍कार-धर्मी संग्राहक संस्‍कृति भी किसी और राजनीति के अनुषंग से बच नहीं सकती। जब वे कहते हैं कि संस्‍कृतियाँ प्रभाव ग्रहण करती हैं, अपने अनुभव को समृद्धतर बनाती है तो उसमें एक ‘मूल संस्‍कृति’ का अस्तित्‍व पहले ही से स्‍वीकार कर लिया गया है जो किसी प्रभाव से पहले ‘विशुद्ध’ है। आकस्मिक नहीं है कि अज्ञेय द्वारा स्‍थापित वत्‍सल निधि की ‘हीरानंद शास्‍त्री स्‍मारक व्‍याख्यानमाला’ के प्रथम आयोजन में प्रकाशित ‘भारतीय परंपरा के मूल स्‍वर’ में डॉ. गोविंदचंद्र पांडे भी लगभग ऐसे ही शब्‍दों में ‘सामासिक संस्‍कृति’ का विरोध करते हैं। डॉ. पांडे यह स्‍वीकार करते हैं कि ‘विज्ञान, प्रविधि और भौतिक उपादानों के स्‍तर पर नाना समाजों में आदान-प्रदान अनायास और चिरपरिचित है; और इन साधनों का उपयोग समाज को प्रभावित करता है।’ किंतु इसके साथ ही वे यह भी मानते हैं कि ‘अतर्क्‍य भावों, अनुभूतियों और आध्‍यात्मिक उपलब्धियों के स्‍तर पर संस्‍कृतियों का वास्‍तविक मिलन अत्‍यंत कठिन होता है।’ (पृ.सं.18-19) कुल मिलाकर ‘इस‍ विमर्श का निष्‍कर्ष यह है कि भारतीय संस्‍कृति की तथाकथित सामासिकता वास्‍तव में सभ्‍यता के क्षेत्र में ही लागू होती है और इस क्षेत्र में वह भारत की कोई विशेषता नहीं है।’ (पृ.सं.20)

सवाल यह है कि ‘सभ्‍यता’ और ‘संस्‍कृति’ की जिन दो यूरोपीय अवधारणाओं को डॉ. पांडे ने भारत की संस्‍कृति के विवेचन के लिए अपनाया है, उनका संबंध ‘सभ्‍यता’ से है या संस्‍कृति से? आदान-प्रदान यदि सभ्यता के ही क्षेत्र में संभव होता है तो फिर भारतीय चिंतन में ये पाश्चत्य अवधारणाएँ कैसे शामिल हो गई? वस्तुतः अवधारणा के रूप में संस्कृति को स्वीकार करने के साथ ही डॉ. पांडे ने यहस्वीकार कर लिया कि संस्कृति के क्षेत्र में भी आदान-प्रदान होता है। फिर भी जिस तरह ‘राष्ट्रीय स्तर पर अनुमोदित और प्रोत्साहित सामासिक संस्कृति का विरोध डॉ. पांडे ने किया है उसे किसी अन्य पक्ष की राजनीति की वकालत न मानना अज्ञेय के लिए भी कठिन होगा। तर्क वही है जिसका इस्‍तेमाल उन्‍होंने दिनकर के संदर्भ में किया है। यदि दिनकर की ‘सामाजिक संस्‍कृति’ का संबंध राजनीति के एक पक्ष से है तो स्‍वयं अज्ञेय और गोविंदचंद्र पांडे की ‘शुद्ध संस्‍कृति’ का संबंध भी राजनीति के दूसरे पक्ष से जोड़ा जा सकता है। शुद्ध होने से ही वह राजनीति से मुक्‍त नहीं हो जाती।

द्विवेदीजी की दृष्टि में संस्‍कृति का यह आग्रह भी एक प्रकार का ‘मोह’ है जो बाधा उपस्थित करता है। संस्‍कृति में निहित जिस ‘संस्‍कार’ की ओर अज्ञेय ने संकेत किया है, उसकी अर्थवत्ता से द्विवेदीजी अपरिचित हैं, यह तो स्‍वयं अज्ञेय भी न स्‍वीकार करेंगे; फिर भी उन्‍हें यह देखकर आश्‍चर्य न होना चाहिए कि उन्‍होंने अक्‍सर इस ‘संस्‍कार’ को भी बाधा माना है। लखनऊ विश्‍वविद्यालय के ‘साहित्‍य का मर्म’ (1948) शीर्षक व्‍याख्‍यानों में उनका ज़ोर इसी बात पर है कि विवेक के परिष्‍करण के लिए किए गए संस्‍कार भी काल पाकर किसी नए सृजन के ग्रहण के लिए बाधा बन जाते हैं। कहते हैं: ‘संस्‍कार’ शब्‍द का प्रयोग करते समय मुझे थोड़ा संकोच ही हो रहा है। संस्‍कार शब्‍द अच्‍छे अर्थ में ही प्रयुक्‍त होता है, परंतु मनुष्‍य स्‍वभाव से ही प्राचीन के प्रति श्रद्धापरायण होता है और प्राचीनकाल से संबंद्ध होने के कारण कुछ ऐसी धारणाओं को श्रद्धा की दृष्टि से देखने लगता है जो जब शुरू हुई होंगी तो निश्‍चय ही उपयोगी रही होगी परंतु बाद में उनकी उपयोगिता घिस गई और वे रुढ़ि‍ मात्र रह गईं। ऐसे संस्‍कार सब समय वृहत्तर मानव पट भूमिका पर खरे नहीं उतरते।’ इन कालगत संस्‍कारों की चर्चा करने के बाद वे उन देशगत और जातिगत संस्‍कारों की ओर भी संकेत करते हैं जो ‘अन्‍य देश और अन्‍य जाति के विश्‍वासों पर आधारित साहित्‍य को समझने में बाधक होते हैं।’ प्रसंग यद्यपि साहित्‍य का है फिर भी संस्‍कार की यह भूमिका संस्‍कृति के क्षेत्र में भी स्‍वीकार की जा सकती है। इस प्रकार स्‍पष्‍ट है कि संस्‍कार के उल्‍लेख मात्र से संस्‍कृति के क्षेत्र में दृष्टिगत होने वाली संकीर्णता का परिहार नहीं हो जाता। ‘संस्‍कार’ की प्रक्रिया अंतत: संस्‍कृति के क्षेत्र में उस शुद्धीकरण की ओर ले जाती है जिसकी परिणति वर्जनशीलता में होती है- यह वही ‘वर्जनशीलता’ है जिस पर भारतीय संस्‍कृति के बहुत से हिमायतियों को अभिमान है। ‘हमारे यहाँ’ वाला ब्रम्हास्‍त्र इस वर्जनशील अहंकार की उपज है, जिसका मुक़ाबला द्विवेदीजी को अक्‍सर करना पड़ता था।

बहुत क्‍लेश होने पर ही ‘हिंदी साहित्‍य की भूमिका’ के उपसंहार में उन्‍होंने लिखा: ‘आए दिन श्रद्धापरायण आलोचक यूरोपियन मतवादों को धकिया देने के लिए भारतीय आचार्य-विशेष का मत उद्धृत करते हैं और आत्‍मगौरव के उल्‍लास से घोषित कर देते हैं कि ‘हमारे यहाँ’ यह बात इस रूप में मानी या कही गई है। मानो भारतवर्ष का मत केवल वही एक आचार्य उपस्‍थापित कर सकता है, मानो भारतवर्ष के हज़ारों वर्ष के सुदीर्घ इतिहास में नाम लेने योग्‍य एक ही कोई आचार्य हुआ है, और दूसरे या तो हैं ही नहीं, या हैं भी तो एक ही बात मान बैठे हैं। यह रास्‍ता ग़लत है। किसी भी मत के विषय में भारतीय मनीषा ने गड्डलिका-प्रवाह की नीति का अनुसरण नहीं किया है। प्रत्‍येक बात में ऐसे बहुत से मत पाए जाते हैं जो परस्‍पर एक दूसरे के विरुद्ध पड़ते हैं।’ (पृ.सं. 129)

पंडितों की समझ का यह इकहरापन द्विवेदीजी की दृष्टि में एक बड़ी बाधा है। इस संकीर्ण इकहरेपन के ख़िलाफ़ संघर्ष करते हुए उन्‍होंने भारतीय संस्‍कृति की विविधता, जटिलता, परस्‍पर विरोधी जीवंतता और समृद्धि का पुन: सृजन किया। भारतीय संस्‍कृति के अंतर्गत आर्येतर जातियों के अवदान की उल्‍लसित चर्चा का कारण यही है। यदि इस प्रयास में कहीं आर्य-श्रेष्‍ठता के अहंकार को ठेस लगती है तो द्विवेदीजी इस बात से चिंतित नहीं दिखते। वस्‍तुत: यह दूसरी परंपरा की खोज का प्रयास है जिसका प्रयोजन मुख्‍यत: पंडितों की इकहरी परंपरा की संकीर्णता का निदर्शन है।

प्रसंगवश द्विवेदीजी के इस प्रयास की एक परंपरा हिंदी में पहले से दिखाई पड़ती है। एक दशक पहले जयशंकर प्रसाद को भी ऐसे ही भारत-व्‍याकुल लोगों से पाला पड़ा था, जिनके जवाब में कवि को ‘काव्‍य और कला’ तथा ‘रहस्‍यवाद’ आदि निबंध लिखने पड़े थे। नए काव्‍य-प्रयोगों की ‘प्रतिक्रिया के रूप में’ उन्‍हें भी ‘भारतीयता की दुहाई’ सुनाई पड़ी थी। ‘काव्‍य और कला’ निबंध का आरंभ ही इस प्रकार होता है कि ‘भारतीय वाड़्मय की’ ‘सुरुचि-संबंधी विचित्रताओं को बिना देखे ही अत्‍यंत शीघ्रता में आजकल अमुक वस्‍तु अभारतीय है अथवा भारतीय संस्‍कृति की सुरुचि के विरुद्ध है, कह देने की परिपाटी चल पड़ी है।’ प्रसाद ने भी यह लक्षित किया था कि ‘ये सब भावनाएँ साधारणत: हमारे विचारों की संकीर्णता से और प्रधानत: अपनी स्‍वरूप-विस्‍मृति से उत्‍पन्‍न हैं।’ यह संकीर्णता और स्‍वरूप-विस्‍मृति अपनी परंपरा के ऐतिहासिक और वैज्ञानिक विवेचन से ही दूर हो सकती है। किंतु प्रसाद ने अनुभव किया कि ‘इसका ऐतिहासिक और वैज्ञानिक विवेचन होने की संभावना जैसी पाश्‍चात्‍य साहित्‍य में है, वैसी भारतीय साहित्‍य में नहीं। उनके पास अरस्‍तू से लेकर वर्तमान काल तक ही सौंदर्यानुभूति-सबंधिनी विचारधारा का क्रम विकास और प्रतीकों के साथ-साथ उनका इतिहास तो है ही, सबसे अच्‍छा साधन उनकी अविछिन्‍न सांस्‍कृतिक एकता भी है। हमारी भाषा के साहित्‍य में वैसा सामंजस्‍य नहीं है। बीच-बीच में इतने अभाव या अंधकार-काल हैं कि उनमें कितनी ही विरुद्ध संस्‍कृतियाँ भारतीय रंग स्‍थल पर अवतीर्ण और लोप होती दिखाई देती हैं; जिन्‍होंने हमारी सौंदर्यानुभूति के प्रतीकों को अनेक प्रकर से विकृत करने का ही उद्योग किया है।’

अपनी परंपरा में इस अभाव और अंधकार-काल के बावजूद प्रसाद ने ‘रहस्‍यवाद’ शीर्षक निबंध में सौंदर्यानुभूति की परंपरा को पुननिर्मित करने का प्रयास किया। इस परंपरा का आरंभ भी ऋग्‍वेद से ही होता है, किंतु यह आर्यजन की वह परंपरा है जिसके प्रतिनिधि इंद्र हैं और जिसमें ‘काम’ की पूर्ण स्‍वीकृति है। वह वरुण के अधिनायकत्‍व में विकसित होने वाली असुर परंपरा से सर्वथा भिन्‍न है जो विधि-विधान और विवेक को विशेष महत्त्व देती थी। प्रसाद ने इन दोनों परस्‍पर-विरोधी परंपराओं के विकास की मनोरंजक रूपरेखा प्रस्‍तुत की है और कहने की आवश्‍यकता नहीं कि उनकी दृष्टि में जीवन में ‘काम’ को पूर्णत: स्‍वीकार करके चलने वाली आनंदवादी परंपरा ही मुख्‍य है अथच काम्‍य भी।

किसी प्रकार की प्रतिक्रिया प्राप्‍त न होने के कारण यह कहना कठिन है कि द्विवेदीजी प्रसाद द्वारा निरूपित आनंदवादी परंपरा से किस हद तक परिचित थे, किंतु तत्त्वत: यह वही परंपरा है जिसका श्रेय वे गंधर्व, नाग, द्रविड़ आदि आर्येतर जातियों को देते हैं। ‘विचार और वितर्क’ (1945) में संकलित अपने एक आरंभिक निबंध ‘हमारी संस्‍कृति और साहित्‍य का संबंध’ में लिखा है कि ‘सबसे अधिक आर्येतर-संश्रव साहित्‍य और ललित कलाओं के क्षेत्र में हुआ है। अजंता के चित्रित, साँची, भरहुत आदि में उत्‍कीर्ण चित्र और मूर्तियाँ आर्येतर सभ्‍यता की समृद्धि के परिचायक हैं। महाभारत और कालिदास के काव्‍यों की तुलना करने में जान पड़ेगा कि दोनों दो चीज़ें हैं। एक में तेज है, दृप्तता है और अभिव्‍यक्ति का वेग है, तो दूसरे में लालित्‍य है, माधुर्य है और व्‍यंजना की छटा है। महाभारत में आर्य उपादान अधिक है, कालिदास के काव्‍यों में आर्येतर। जिन लोगों ने भारतीय शिल्‍पशास्‍त्र का अनुशीलन किया है, वे जानते हैं कि भारतीय शिल्‍प में कितने आर्येतर उपादान हैं और काव्‍यों तथा नाटकों में उनका कैसा अद्भुत प्रभाव पड़ा है। पता चला है कि साँची, भरहुत आदि के चित्रकार यक्षों और नागों की पूजा करने वाली एक सौंदर्य-प्रिय जाति थी, जो संभवत: उत्तर भारत से लेकर असम तक फैली हुई थी। बहुत-सी ऐसी बातें कालिदास आदि कवियों ने इन सौंदर्य-प्रेमी जातियों से ग्रहण की, जिनका पता आर्यों को न था। कामदेव और अप्‍सराएँ उनकी देव-देवियाँ हैं, सुंदरियों के पदाघात से अशोक का पुष्पित होना उनके घर की चीज़ है, अलकापुरी उनका स्‍वर्ग है- इस प्रकार की अन्‍य अनेक बातें उनसे और उन्‍हीं की तरह अन्‍यान्‍य आर्येतर जातियों से महाकवि ने ली हैं।’ इसी क्रम में आगे भरतमुनि के नाट्यशास्‍त्र के बारे में भी, उसके आर्यों की विद्या न मानने वाले मत का ज़िक्र करते हुए कहते हैं: ‘शुरू में एक कथा में बताया गया है कि ब्रम्‍हा ने नाट्यवेद नामक पाँचवे वेद की सृष्टि की थी। अगर आर्यों के वेदों से इसका कुछ भी संबंध होता तो पंडितों का अनुमान है, इस कथा की ज़रूरत न हुई होती। वास्‍तव में भारतीय नाटक पहले केवल अभि‍नय के रूप में ही दिखाए जाते थे। उनमें भाषा का प्रयोग करना आर्य संशोधन का परिवर्धन है।’ (प्रथम संस्‍करण, पृ.सं.186-87) आर्येतर अवदान की इस सूची में यदि ‘भक्‍ती द्राविड़ ऊपजी’ और आभीरों के आराध्‍यवदेव बालकृष्‍ण तथा देवी राधा को जोड़ लें तो हमारी परंपरा में सुंदर माना जाने वाला ऐसा कुछ भी नहीं बचता जो आर्येतर न हो! एक भक्तिकाव्‍य को छोड़कर प्रसाद और हजारीप्रसाद द्विवेदी में इस बात को लेकर कोई मतभेद नहीं है कि क्‍या-क्‍या सुंदर है? अंतर केवल यह है कि प्रसाद जिसे आर्यों के एक समुदाय की परंपरा कहते हैं, हजारीप्रसाद द्विवेदी उसे ही विभिन्‍न आर्येतर जातियों का अवदान मानते हैं। फिर भी एक बात में उभयत्र समानता है कि हमारी परंपरा में जो भी सुंदर है वह आर्य नाम से प्रचारित मिथक से भिन्‍न है। इस मिथकीय आर्य से इतनी चिढ़ इसलिए है कि इसके ध्‍वजाधारियों को ‘सुंदर’ से परहेज है। जैसा कि प्रसाद ने ‘रहस्‍यवाद’ शीर्षक निबंध में स्‍पष्‍ट लिखा है: ‘आनंद पथ को उनके कल्पित भारतीयोचित विवेक में सम्मिलित कर लेने से आदर्शवाद का ढाँचा ढीला पड़ जाता है। इसलिए वे इस बात को स्‍वीकार करने में डरते हैं कि जीवन में यथार्थ वस्‍तु आनंद है, ज्ञान से वा अज्ञान से मनुष्‍य उसी की खोज में लगा है। आदर्शवाद ने विवेक के नाम पर आनंद और उसके पथ के लिए जो जनरव फैलाया है, वही उसे अपनी वस्‍तु कहकर स्‍वीकार करने में बाधक है।’ इसलिए नैतिकतावादियों को प्रत्‍युत्तर देने के लिए प्रसाद ने यदि ‘सुंदर’ की परंपरा को अपनी ही परंपरा के अंदर आर्येतर तत्त्वों के अभिन्‍न मिश्रण के रूप में विवेचित किया। एक की परंपरा और दूसरे की प्रति-परंपरा दो दिशाओं से चलकर एक ही बिंदु पर मिलती है- थोथे नैतिकतावाद के विरुद्ध ‘सुंदर’ की प्रतिष्‍ठा! ‘सुंदर’ को ही लेकर यह सारा विवाद इसलिए है कि जैसा कि प्रसाद ने कहा है: ‘संस्‍कृति सौंदर्यबोध के विकसित होने की मौलिक चेष्‍टा है।’

यह आकस्मिक नहीं है कि भारतीय संस्‍कृति के नाम पर नैतिकता की ध्‍वजा फहरानेवाले प्रकृति के सौंदर्य को तो किसी प्रकार सह लेते हैं, पर नारी-सौंदर्य के सामने आँखे चुराने लगते हैं। उदाहरण के लिए शुक्लजी के लोकमंगल में प्रकृति के सौंदर्य के लिए तो पूरी जगह है, लेकिन छायावादियों की कौन कहे स्‍वयं विद्यापति और सूर जैसे भक्‍त कवियों का नारी-सौंदर्य भी ग्राह्य नहीं है। आनंद और माधुर्य को लोकमंगल की सिद्धावस्‍था का गौरवपूर्ण पद देकर उन्‍होंने साधनावस्‍था का मार्ग अपनी ओर से सर्वथा निष्‍कटंक कर लिया, क्‍योंकि साधना के मार्ग में माधुर्य से बाधा पहुँचने की आशंका है।

जय हिन्द

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