झारखण्ड का साहित्य और भाषा:
झारखंड राज्य की भाषा और वहाँ की बोली का क्षेत्र बहुत ही विस्तृत है। भाषा के आधार पर झारखण्ड की भाषाओं और साहित्य को तीन भागों में बाँटा गया है:
1. मुंडारी भाषा (ऑस्ट्रो एशियाटिक) परिवार
2. द्रविड़ भाषा – (द्रविडियन) परिवार
3. इंडो-आर्यन – भाषा परिवार
1. मुंडारी भाषा (ऑस्ट्रो एशियाटिक) परिवार
इस भाषा परिवार के अंतर्गत निम्नलिखित प्रमुख भाषाएँ है: संथाली, मुंडारी, खड़िया, भूमिज, हो, करयाली, महाली, बिरजिया, असुरी, कोरबा, आदि भाषाएँ आती हैं।
- ‘संथाली’ भाषा:
- संथाल राज्य में रहने वाले संथाल जनजाति द्वारा बोली जाने वाली भाषा को संथाली भाषा कहते हैं। यह भाषा संथाल परगना के संपूर्ण क्षेत्र में बोली जाती है।
- संथाली भाषा कुछ अन्य क्षेत्रों में भी बोली जाती है। जैसे- बिहार, बंगाल, उड़ीसा, असम और बंगलादेश अदि।
- संथाली भाषा को ‘होड़ रोड़’ अथार्त ‘होड़’ लोगों की बोली भी कहते हैं।
- यह भाषा संख्या की दृष्टि से राज्य में बोली जानेवाली दूसरी भाषा है।
- संथाली भाषा के लिए रघुनाथ मुर्मू द्वारा 1941 ई. में ‘ओलचिकी’ लिपि का आविष्कार किया गया।
- झारखंड में बोली जानेवाली सर्वाधिक जनजातीय भाषा संथाली है।
संथाली भाषा के दो रूप हैं –
- प्रथम शुद्ध संथाली- इसमें अन्य किसी भी भाषा का मिलावट नहीं होता है।
- दूसरा मिलावट वाली संथाली भाषा है, जिसमे बांग्ला, उड़िया, मैथिली आदि का मिश्रण रहता है।
- संविधान के 42वें संशोधन, 2003 ई. द्वारा संविधान के 8वीं अनुसूची में स्थान प्राप्त करनेवाली यह एकमात्र क्षेत्रीय भाषा है।
संथाली भाषा का साहित्य:
- संथाली भाषा का लोक साहित्य, लोकगीत, लोककथा एवं लोकोक्तियों में विभक्त है।
- संथाली लोकसाहित्य में प्रकृति से संबंधित धर्म, कर्म, राष्ट्रीयता, मनोविज्ञान आदि जीवन पर विषय-वस्तु मिलती है।
- संथाली भाषा का लोक साहित्य बहुत ही समृद्ध है।
- जे. फिलिप्स द्वारा रचित ‘एन इंट्रोडक्शन टू द संथाल लैंग्वेज’ (1852 ई.) है। यह संथाली भाषा में लिखी गई प्रथम पुस्तक है।
- ई.एल. पक्सुलेने ने 1868 ई. में प्रथम संथाली शब्दकोष ‘वोकेब्युलारी ऑफ द संथाली लैंग्वेज’ लिखा। इसमें ईसाई मिशनरियों द्वारा रोमन लिपि में 1887 ई. में ‘होडको रने हांपडाप कोरेयमाक’ पुस्तक प्रकाशित किया गया।
- डोमन साहू समीर ने 1915 ई. में सर्वप्रथम देवनागरी लिपि में ‘संथाली प्रवेशिका’ प्रकाशित किया तथा केवल सोरेन ने ‘हिंदी-कोश’ की रचना प्रकाशित की।
- संथाली भाषा का कविता संग्रह ओनोंडहें बाहा डालवाक 1936 ई. में प्रकाशित किया गया। यह पाल जुसार सोरेन की कविताओं का संकलन है।
- सन् 1936 ई. के बाद प्रकाशित हुए अन्य कविता संग्रह- श्री पंचानन मरांडी द्वारा लिखित ‘सेरेन इता’ जिसका अर्थ होता है ‘गीत के बीज’। उसके बाद ठाकुर प्रसाद द्वारा लिखित ‘एभेन अडाड्’ है। यह ‘जागरण गान’ है।
- संथाली लोक कथाओं का संग्रह पी. ओ. बोंडींग ने 1926 ई. में ‘होड़’ कहानी तथा 1995 ई. में ‘गाम’ कहानी नाम से प्रकाशित किया।
- संथाली भाषा का पहला उपन्यास ‘हाडमवाक् आतो’ (हड़मा गाँव) है। इसे आर कारर्टेयर्स ने 1946 ई. में रोमन लिपि में प्रकाशित किया।
- संथाली भाषा का पहला साहित्यिक नाटक विदू-चान्दन है। इसके लेखक रघुनाथ मुर्मू हैं। इस नाटक को 1942 ई में प्रकाशित किया गया।
- संथाली भाषा के अन्य नाटकों में श्री रूपनारायण श्याम द्वारा लिखित ‘आले आतो’ है इसका अर्थ हुआ हमारा गाँव और बालकिशोर बासुकी द्वारा लिखित ‘आकिल आरसी’ इसका अर्थ ‘ज्ञान दर्पण’ है।
- ‘मुण्डारी’ भाषा:
- मुण्डारी भाषा ‘मुंडा’ तथा ‘हो’ जनजाति की भाषा है।
- मुण्डारी भाषा परिवार की यह बोली झारखंड के राँची, सिंहभूम, हजारीबाग, गुमला, सरायकेला और खरसावाँ आदि क्षेत्रों में बोली जाती है।
- अन्य कई क्षेत्रों में जहाँ मुण्डा जनजातियाँ रहती हैं, वहाँ भी यह भाषा बोली जाती है। यह झारखण्ड, छत्तीसगढ़, ओड़िसा, पश्चिम बंगाल, असम, अंडमान, निकोबार द्वीप समूह और बांग्लादेश में भी यही भाषा बोली जाती है।
- खूँटी और मुरहु क्षेत्र के पूर्वी अंचलों में बोली जानेवाली मुंडारी भाषा को ‘हसद मुंडारी’ कहा जाता है।
- तमाड़ क्षेत्र के आसपास बोली जानेवाली मुंडारी भाषा को ‘तमड़िया मुंडारी’ कहा जाता है।
- मुंडा जनजाति अपनी भाषा को ‘डोड़ो जगर’ कहते हैं।
- राज्य के कुछ अन्य क्षेत्रों में तोरपा, कोलेबिरा, कर्रा और बानों में नागपुरी मिश्रित भाषा बोली जाती है, जिसे ‘नगुरी मुंडारी’ कहते हैं।
मुंडारी भाषा का साहित्य:
- मुंडारी भाषा-साहित्य प्रकृति, आदर्श विचार, आनंद, सुख और भूत-प्रेत आदि से संबंधित है।
- मुंडारी साहित्य की सर्वप्रथम पुस्तक जे.सी. हिटली ने ‘मुंडारी प्राइमर’ 1873 ई. में प्रकाशित की थी। यह मुंडारी भाषा की व्याकरण पर आधारित प्रथम पुस्तक थी।
- ए. नोट्रोट की मुंडारी भाषा की दूसरी पुस्तक ‘मुंडारी ग्रामर’ 1882 ई. में प्रकाशित हुई थी। यह मुंडारी भाषा की व्याकरण पर आधारित प्रथम पुस्तक थी।
- मुंडारी भाषा की प्रसिद्ध पुस्तक ‘सिंगा-बोंगा’ है, जिसे कथा गीत के रूप में लिखा गया है। यह जातीय परंपराओं एवं विकास की विभिन्न अवस्थाओं पर प्रकाश डालती है।
- जगदीश त्रिगुणायत द्वारा ‘मुंडारी लोक कथाएँ’ नामक पुस्तक लिखी गई है।
- ‘हो’ भाषा
- यह ‘हो’ जाती द्वारा बोली जाने वाली भाषा है। इस भाषा का अभी अधिक विकास नहीं हुआ है। यह झारखंड में मुख्य रूप से कोल्हान प्रमंडल, राँची आदि क्षेत्रों में बोली जाती है।
- यह भाषा पश्चिम बंगाल तथा उड़ीसा में भी बोली जाती है। यह झारखंड में बोली जाने वाली चौथी बड़ी भाषा है।
‘हो’ भाषा का साहित्य:
- ‘हो’ भाषा के साहित्य का आरंभ 19वीं सदी से माना जाता है। यह भाषा लोककथा, लोकोक्त्ति, पहेली, मुहावरों से निर्मित है।
- ‘हो’ साहित्य का प्रथम प्रकाशन 1840 ई. में ‘द ग्रामेटिकल कंस्ट्रक्संस ऑफ द हो लैंग्वेज’ प्रकाशित हुआ था।
- ‘हो’ लोकगीतों की प्रथम पुस्तक ‘फोकलोर ऑफ द कोल्हान’ है। इसे 1902 ई. में सी.एच. बोम्बास तथा एन.के. बोस ने प्रकाशित किया था।
- ‘हो’ भाषा साहित्य का महाकाव्य ‘हो दुरं’ है। इस पुस्तक को डब्ल्यू. जी. आर्चर ने लिखा था। यह महाकाव्य देवनागरी लिपि में लिखा गया है।
- ‘हो’ साहित्य की अन्य पुस्तकें- ‘बाँसुरी’ यह जगदीश त्रिगुणायत के द्वारा लिखा गया है।
- ‘रुमुल’ पुस्तक सतीस कोड़ा सेंगल के द्वारा लिखा गया है।
- ट्राईब ऑफ सिहभूमि’ यह पुस्तक सी.पी. सिंह के द्वारा लिखा गया है।
- ‘खड़िया’ भाषा:
- ‘खगड़िया’ जनजाति की भाषा का अन्य नाम ‘खड़िया’ है।
- खड़िया जनजाति द्वारा बोली जानेवाली भाषा को ‘खड़िया’ भाषा कहते हैं। यह मुंडा भाषा की उपभाषा है। यह भाषा मुख्यतः झारखण्ड के सिंहभूम में बोली जाती है।
खड़िया भाषा का साहित्य:
- खड़िया लोक साहित्य को लोकगीत, लोककथा, लोकोक्ति आदि में विभाजित किया गया है।
- इसकी साहित्यिक विषय-वस्तु प्रकृति, ऐतिहासिक, युद्ध, जीवन-दर्शन, सामाजिक व्यवस्था आदि से संबंधित है।
- खड़िया साहित्य का आरंभ 1866 ई. से माना जाता है।
- जी.सी. बनर्जी ने 1894 ई. में ‘इंट्रोडक्शन टू द खड़िया लैंग्वेज’ और 1934 ई. में ‘फ्लोर चेईसंस’ की रचना की थी।
- ‘खड़िया शब्दकोश’ की रचना डुअर्ट ने की थी।
- ‘द खडियाज’ नामाक रचना 1937 ई. में एस.सी. राय ने प्रकाशित किया जिसमे लोकगीतों, लोककथाओं और मंत्रों को स्थान दिया गया है
- ‘खड़िया ओलोग’ नामक पुस्तक डब्ल्यू. सी. आर्चर ने प्रकाशित की यह भी लोकगीतों का संग्रह है।
2. द्रविड़ भाषा – (द्रविडियन) परिवार
- इस भाषा परिवार में निम्नलिखित प्रमुख भाषा परिवार है: ‘उराँव’ और ‘माल्तो’ (सौरिया, पहाड़ियाँ और पाल पहाड़ियाँ) भाषा शामिल है।
- उराँव या कुडुख भाषा:
- उराँव भाषा को कुडुख के नाम से भी जाना जाता है। यह भाषा मुख्य रूप से पलामू, राँची, गुमला, हजारीबाग, लोहरदागा आदि क्षेत्रों में बोली जाती है।
उराँव या कुडुख भाषा का साहित्य:
- उराँव भाषा का साहित्य लोककथा, लोकवार्ता, पहेलियाँ, कहावतें तथा मुहावरों में विभक्त है।
- उँराव लोक साहित्य में सर्वाधिक योगदान ईसाई मिशनरियों का रहा है। ओ. फलैक्स ने 1874 ई. में ‘एम् उँराव लैंग्वेज’ प्रकाशित किया जिसमे उँराव भाषा की जानकारी मिलती है।
- 1941 ई. में धर्मपाल लकड़ा, डब्ल्यू. जी. आर्चर एवं रेवाहॉन की पुस्तक ‘लील- खोरा-खेखेल’ प्रकाशित हुई, जिसमे नागपुरी एवं उँराव के गीतों का संग्रह हैं।
- उँराव हिंदी-इंग्लिश डिक्सनरी का प्रकाशन मिखाइल तिग्गा ने किया था।
उँराव साहित्य की अन्य रचनाएँ निम्नलिखित हैं –
1. खल्ली अयंग (इन्द्रजीत उँराव),
2. हिंदी कुडुख शब्दकोश (स्वर्णलता प्रसाद),
3. कुडुख कोश (ब्रजबिहारी कुमार),
4. मौसपी राग (जॉन लकड़ा),
5. कुडुख परकला (पी. सी. बेक) आदि हैं।
- माल्तो भाषा:
- माल्तो भी कुडुख भाषा का एक रूप है। इसके अंतर्गत माल पहाड़िया, सौरिया पहाड़िया, गोंड, भाग, कुमार भाषाएँ आदि आती है।
3. इंडो-आर्यन भाषा परिवार:
इंडो आर्यन भाषा परिवार के अंतर्गत हिंदी, कुडमाली, पंचपरगनिया, खोरठा, नागपुरी भाषा को शामिल किया जाता है। इस परिवार की प्रमुख भाषाओं का विवरण इस प्रकार है-
- हिदी भाषा- यह इस राज्य की पहली राज्य भाषा है। यह भाषा राज्य के प्रत्येक क्षेत्र में बोली जाती है। यह राज्य में सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषा है।
- कुड़माली भाषा:
- इस भाषा को मूल रूप से कुर्मी जाती के लोग बोलते हैं। यह राँची, हजारीबाग गिरिडीह, बोकारो, धनबाद एवं संथाल परगना आदि जगहों पर बोली जाती है। इसे ‘कुर्म’ में ‘आली’ प्रत्यय लगाकर बनाया गया। जिसे ‘कुड़माली’ कहते हैं।
कुड़माली भाषा का साहित्य:
- कुड़माली लोक साहित्य को ‘गद्य’ और ‘पद्य’ दो भागों में बाँटा गया है।
- गद्य साहित्य में लोक कथा, मुहावरा और पहेलियाँ आती हैं।
- पद्य में लोक गीत और उसके विविध रूप होते हैं।
- कुड़माली साहित्य का आरंभ मध्यकाल से मान जाता है। लगभग 14वीं सदी से करमालिक घंघर नामक पुस्तक की रचना चण्डीदास ने की थी।
- कुड़माली भाषा के मुख्य कवि विनंदन सिंह गौराँगिया हैं। इन्हें कुड़माली का सूर कहा जाता है। उन्होंने ‘आदि झूमर संगीत’ नामक पुस्तक का संकलन किया।
- कुड़माली भाषा का लोक साहित्य अति विशा है जिसका प्रमाण उनके लोक कथाओं के अध्ययन तथा लोक परंपराओं में मिलता है।
कुड़माली साहित्य की प्रमुख रचनाएँ हैं –
1. करमाली भाषा तत्त्व (खुदी राम महतो),
2. करम गीत (बुधु महतो)
3. पाला (निरंजन महतो)
4. कपिला मंगल (राजेन्द्र प्रसाद महतो)
5. पाथें चकल लेहा नमस्कार (नंद कशोर सिंह) आदि।
- पंचपरगनिया:
- राज्य के पंचपरगना क्षेत्र तमाड़, बुडू, राहे सोनाहातु और सिल्ली में प्रचलित भाषा पंचपरगनिया या सदानी कहलाती है।
- पंचपरगनिया भाषा नागपुर भाषा या कुरमाली भाषा का विस्तार है।
- इस भाषा के अंतर्गत क्षेत्र एवं परिवंश के प्रति सजगता एवं वैष्णव भक्ति का चित्रण मिलता है।
पंचपरगनिया भाषा का साहित्य:
- पंचपरगनिया साहित्य में लोककथा और लोकगीत आती है।
- इसमें प्रकृति परिवेश, संस्कार संस्कृति, रीति-रिवाज आदि का चित्रण मिलता है।
- पंचपरगनिया साहित्य का श्रेष्ठ कवि विनन्द को माना जाता है।
- पंचपरगनिया साहित्य में कबीर पंथी धारा को उच्च स्थान कवि सोबरन ने दिलाया है।
- पंचपरगनिया के पाँच प्रमुख कवि है- विनन्द, गौराँगिया, सोबरन, बरजुराम और दीना।
- पंचपरगनिया साहित्य के प्रमुख कवि विपिन बिहारी, राजकिशोर सिंह, प्रेमानंद, सृष्टिधर महतो, दुर्गा प्रसाद, ज्योतीलाल महादानी, रामकीष्टो आदि हैं।
- खोरठा भाषा:
- इस भाषा का विकास मागधी प्राकृत से हुआ है। इसका संबंध प्राचीन खरोष्ठी लिपि से है।
- यह भाषा हजारीबाग, धनबाद, गिरिडीह, संथालपरगना, राँची के उत्तरी भाग तथा पलामू के उत्तरी पूर्वी भाग में बोली जाती है।
- इस भाषा के अंतर्गत देशवाली, रमगढ़िया, खटारी, गोलवारी, खोट्टाही, खण्डटाही, आदि बोलियाँ बोली जाती है।
खोरठा भाषा का साहित्य:
- खोरठा साहित्य के अंतर्गत लोकगीत एवं लोककथा आती हैं।
- खोरठा साहित्य में राजा-रजवाड़ों की कथाओं का अधिक विवरण मिलता है।
- खोरठा साहित्य का आरंभ 1947 ई. से पहले का माना जाता है। खोरठा भाषा का शिष्ट साहित्य और लोकसाहित्य अधिक समृद्ध है।
- धनबाद के श्रीनिवास पानुरी ने खोरठा संकलनों का प्रकाशन ‘मेघदूत’ नाम से 1950 ई. में किया था। गजाधर महतो की पुस्तक ‘कहानी संग्रह’ के रूप में ‘पुटुस फुल’ का प्रकाशन 1988 में हुआ था।
खोरठा साहित्य की अन्य रचनाएँ:
1. ‘सेवाती और झिंगुर’ (सुकुमार),
2. ‘एक पथिया डांगल महुआ’ (संतोष कुमार महतो),
3. ‘बोनेक बोल’ (रमणिका गुप्ता),
4. ‘सोंधमाती’ (विनोद कुमार),
5. डिंडाक डोआनी (वंशीडाल), और
6. मुक्तिक डेहर (श्याम सुंदर) आदि हैं।
- नागपुरी भाषा:
- इस भाषा को नागवंशी राजाओं की मातृभाषा होने का गौरव मिला है। इसे ‘नागपुरी’ या ‘सदानी’ भाषा भी कहा जाता है।
- सदानी एवं गँवारी के नाम से बोली जानेवाली इस भाषा का विकास मागधी प्राकृत से हुआ है।
- यह भाषा पूरे झारखंड में संपर्क भाषा के रूप में प्रचलित है।
नागपुरी भाषा का साहित्य:
- नागपुरी साहित्य लोकगीत, लोककथा, पहेली आदि में बंटा हुआ है। यह साहित्य नागपुरी एवं बांग्ला का मिश्रण है।
- नागपुरी लोककथा, जातक कथा, कथा सरित सागर, बैताल पच्चीसी, सिहांसन हितोपदेश आदि कथाओं बत्तीसी, पंचतंत्र, से मिलती-जुलती है। नागपुरी भाषा का प्रथम कवि रघुनाथ, नृपति को माना जाता है।
- नागपुरी साहित्य दो भागों में विभक्त है- ‘सगुण’ भक्ति और ‘निर्गुण’ भक्ति।
- सगुण भक्ति के कवि- हनुमान सिंह, बरजुराम, जय गोविंद, घासीराम कंचन आदि हैं।
- निर्गुण भक्ति के कवि- सोबरन, महंत घासी, खंगदु पलार, अर्जुन, मृत्युंजय आदि हैं।
- आधुनिक काल में कवि प्रफुल्ल कुमार राय, शिव अवतार चौधरी, बी.पी. केसरी, रामदयाल मुण्डा, गिरधारी राय गोंझू गिरिराज आदि हैं।
- नागपुरी भाषा का प्रथम व्याकरण 1896 ई. में ‘नोट्स ऑन दि गँवारी डायलेक्ट ऑफ छोटानागपुरी’ है। इसे ई.एच. ह्विटली ने लिखा था।
- नागपुरी गद्य साहित्य का विकास ईसाई मिशनरियों द्वारा 1900 ई. के आसपास किया गया।
नागपुरी साहित्य की अन्य प्रमुख रचना है–
1. ‘हेंनागवंशावाली’ (बेनीराम महथा),
2. ‘नागवंशावाली’ (घासीराम),
3. ‘सुदामाचरित’ (कंचन),
4. ‘मोह लीला’ (धनीराम बक्शी),
5. ‘सेवा और नौकरी’ (श्रावन कुमार गोस्वामी) आदि हैं।
राज्य की अन्य भाषाएँ:
- राज्य में मुंडारी, द्रविड व इंडो-आर्यन भाषा परिवार के अतिरिक्त अन्य भाषाएँ भोजपुरी, मैथिली, मगही, अंगिका आदि भी बोली जाती है।
- राज्य में भोजपुरी मुख्यतः पलामू व राँची में बोली जाती है। राज्य में भोजपुरी दो वर्गों में प्रचलित है- प्रथम आदर्श भोजपुरी जो पलामू के कुछ क्षेत्रों में बोली जाती है तथा दूसरी नागपुरिया, सदरी व सदानी भोजपुरी जो मुख्यतः छोटानागपुर के गैर आदिवासी क्षेत्रों में बोली जाती है।
राज्य के प्रमुख साहित्यकार:
राज्य में प्रमुख साहित्यकारों का वर्णन निम्नलिखित है:
- पं. रघुनाथ मुर्मू:
- रघुनाथ मुर्मू का जन्म 5 मई, 1905 ई. को ओड़िसा के मयुरभंज जिले में जोडबुस गाँव में हुआ था। उन्होंने संथाली लिखने के लिए ‘ओलचिकी लिपि’ का आविष्कार किया।
- इनकी प्रमुख पुस्तक बिंदु चन्दन, दरेज जन, सिद्धू-कान्हू, खरगोश बीर आदि हैं उनहोंने वर्ष 1977 ई. में आड़ग्राम के बेताकुंडरीडाही ग्राम में एक संथाली विश्वविद्यालय की स्थापना की।
- मयूरभंज आदिवासी महासभा ने उन्हें ‘गुरु गोमके’ (महान शिक्षक) की उपाधि प्रदान की तथा राँची विश्वविद्यालय ने उन्हें डी.लिट् की उपाधि से सम्मानित किया।
- इनका निधन 1 फ़रवरी 1982 ई. को हुआ।
- राधाकृष्ण-
- राधाकृष्ण का जन्म 8 सितंबर, 1910 ई. को राँची, झारखंड में हुआ था।
- ये राज्य के प्रमुख उपन्यासकार, कहानीकार, नाटककार, व्यंग्यकार व कवि थे। राधाकृष्ण ने राँची में एक समाज कल्याण विभाग की पत्रिका का संपादन किया।
- इनका सबसे चर्चित उपन्यास सपने बिकाऊ हैं, 1963 ई. है। इनकी अन्य प्रमुख रचनाएँ रामलीला, सजला, गेंद और गूल, रूपांतरण, गल्पिका, फुटपाथ आदि हैं।
- इनका निधन 3 फ़रवरी, 1979 ई. को हुआ था।
- श्रीनिवास पानुरी:
- श्रीनिवास पानुरी का जन्म 25 दिसंबर 1920 ई. को धनबाद, झारखंड में हुआ था। वे खोरठा साहित्य के प्रसिद्ध साहित्यकार थे।
- उनकी रचनाओं में कविता, गीत, लघुकथा, नाटक एवं अनुवाद शामिल है। उनका पहला कविता संगः ‘बाल किरण’ 1959 ई. में प्रकाशित हुआ था।
- उन्होंने 1957 ई. में खोरठा भाषा में मासिक पत्रिका ‘मातृभाषा’ का प्रकाशन किया।
- उन्होंने 1968 ई. में कलिदास के ‘मेघदूत’ का अनुवाद खोरठा भाषा में किया।
- श्रीनिवास पानुरी का निधन 7 ऑक्टूबर 1986 ई. में हुआ था।
- जगदीश त्रिगुणायत:
- जगदीश त्रिगुणायत का जन्म देवरिया उत्तरप्रदेश में 1 मार्च, 1923 ई. को हुआ था।
- वे 1941 ई, में गाँधी और राजेन्द्र प्रसाद की प्रेरणा से खाड़ी के प्रचार-प्रसार में राँची चले गए बाद में वे खूँटी हाई स्कूल में प्राध्यापक हो गए वे मुण्डा भाषा के प्रमुख कवि थे।
- उनकी दो प्रमुख पुस्तकें हैं ‘बांसुरी बज रही है’ और मुण्डा लोक कथाएँ हैं।
- मुण्डा जाति के इतिहास पर प्रकाश डालनेवाली इनकी प्रमुख रचना ‘सोसोबोंगा’ है, जो मुण्डा जातियों के संघर्ष को दर्शाता है।
- डोमन साहू समीर:
- डोमन साहू समीर का जन्म झारखंड राज्य के गोड्डा जिले के पंदाहा गाँव 30 जुलाई 1924 ई. में हुआ था।
- ये 1947 ई. में सोम्बाद, संथाली साप्ताहिक के संपादक बने इनकी प्रमुख पुस्तकें- दिसाम बाबा, आखर आरोम, गांधी बाबा, मालाल सेताक, सेडाम गाते आदि हैं।
- ये संथाली एवं हिंदी साहित्य के प्रमुख साहित्यकार हैं।
- वंदना टेटे:
- वंदना टेटे का जन्म 13 सितंबर 1969 को सिमडेगा, झारखंड में हुआ था। इन्होंने हिंदी खड़िया, नागपुरी भाषा में साहित्य रचना किया।
इनकी प्रमुख रचनाएँ निम्नलिखित हैं-
- पुरखा लड़ाके, किसका राज है, समरगाथा, असुर सिंरिंग, आदिम टाग आदि रचनाएँ हैं।
- इन्हें अदिवासी पत्रकारिता के लिए झारखण्ड सरकार के तरफ से ‘राज सम्मान’ 2012 ई. में सम्मानित किया गया था।
- अनुज लुगुन:
- अनुज लुगुन का जन्म 10 जनवरी 1986 ई. को सिमडेगा झारखंड में हुआ था।
- ये मुंडारी भाषा के प्रख्यात युवा साहित्यकार हैं।
- इनकी प्रमुख कृतियाँ ‘बाघ’ और ‘सुगुना मुण्डा की बेटी’ है। गुरिल्ले की आत्मकथन, अनायास, एकलव्य से संवाद आदि है।
- इन्हें 2011 ई. में भारत सरकार द्वारा भारत भूषण अग्रवाल पुरस्कार से सम्मानित किया गया वर्तमान में वे मुण्डा आदिवासी गीतों में आदिम जीवन-राग पर शोध कर रहे हैं।
- डॉ. द्वारिक प्रसाद:
- डॉ. द्वारिक प्रसाद का नाम उपन्यास के क्षेत्र में लोकप्रिय रहा है ये मनोवैज्ञानिक उपन्यासकार हैं।
- घर के बाहर, उनका सबसे अधिक चर्चित रहा है।
- डॉ. द्वारिक प्रसाद के अन्य उपन्यास- स्वंसेवक, सर्द छाया मम्मी बिगड़ेगी, संगीता के मामा रति, बेड़िया, अंकुश आदि हैं।
- एलिस एक्का:
- एलिस एक्का आदिवासी साहित्यकार हैं। एलिस एक्का ने पचास के दसक ने कथा लेखन का कार्य आरम्भ किया।
- कथाकार राधाकृष्ण के संपादन में ‘आदिवासी’ नामक साप्ताहिक पत्रिका से एलिस एक्का का जुड़ाव रहा है।
- इनकी प्रमुख पुस्तकें – वनकन्या, सलगी जुगनू, अम्बा गाछ, कोयल की लाड़ली सुमरी आदि हैं।
- एलिस एक्का ने आदिवासी भाषाओँ के साथ-साथ नागपुरी, खोरठा आदि क्षेत्रीय भाषाओं में भी पुस्तकें लिखी हैं।
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