अष्टछाप

अष्टछाप की स्थापना– विं सं 1622 (1565 ई.) में हुआ था।   

‘अष्टछाप’ महाप्रभु श्री वाल्भाचार्य एवं उनके पुत्र विट्ठलनाथ जी के द्वारा स्थापित 8 भक्तिकालीन कवियों का एक समूह था, जिन्होंने अपनी विभिन्न पद एवं कीर्तनों के माध्यम से भगवान् श्रीकृष्ण की विभिन्न लीलाओं का गुणगान किया और वे अष्टछाप कहलायें।  

‘कृष्णभक्ति शाखा’ में वल्लभ संप्रदाय के संस्थापक वल्लभाचार्य थे। भक्ति का दार्शनिक आधार ‘शुद्धाद्वैतवाद’ था। कृष्ण का स्वरूप नित्य ‘निकुंज’ बिहारी है। वल्लभ संप्रदाय को ‘रूद्र संप्रदाय’ भी कहते हैं। वल्लभ संप्रदाय के अंतर्गत ही वल्लभाचार्य ने 1517 ई. में ‘पुष्टिमार्ग’ की स्थापना की।

‘पुष्टिमार्ग’ ‘पुष्’ धातु में ‘ति’ प्रत्यय के योग से बना है, जिसका अर्थ है ‘ईश्वर की कृपा’ या ‘ईश्वर का पूर्ण समर्थन’ करना। यानि ईश्वर भक्त का समर्थन करने लगता है। अथार्त जब भक्त संसार से पूर्णतया विरक्त होकर ईश्वर की शरण में चला जाता है तो उसे ईश्वर की ‘पुष्टि’ अथार्त ‘कृपा’ या समर्थन प्राप्त हो जाता है। उसे ‘पुष्टि मार्ग’ कहते हैं।

‘पुष्टिमार्ग’ में वल्लभाचार्य ने भक्तों की निम्नलिखित चार श्रेणियाँ बताई है-

1. प्रवाह पुष्टि भक्त- जो भक्त संसार में रहकर सांसारिक कार्यों को करते हुए ईश्वर की उपासना करते हैं उसे प्रवाह पुष्टि भक्त कहते हैं।

2. मर्यादा पुष्टि भक्त- वह भक्त जो सांसारिक कर्मों को त्यागकर ईश्वर की उपासना में लीन हो जाते हैं उन्हें मर्यादा पुष्टि भक्त कहते हैं।   

3. पुष्ट पुष्टि भक्त- वह भक्त जिसे ईश्वर के गुणगान करने का व्यसन अथार्त नशा हो जाता है उसे पुष्ट पुष्टि भक्त कहते हैं।

4. शुद्ध पुष्टि भक्त- वह भक्त जो पूर्णतया ईश्वर की कृपा पर आश्रित रहता है उसे शुद्ध पुष्टि भक्त कहते हैं। इसे सर्वश्रेष्ठ भक्त माना जाता है।

‘पुष्टिमार्ग’ में ईश्वर तक पहुँचने के तीन मार्ग बताया गया है-

1. प्रवाहमार्ग- सांसारिक कर्मों को करते हुए ईश्वर की उपासना करना प्रवाहमार्ग है 

2. मर्यादामार्ग- वेद शास्त्र आदि में बताएँ गए नियमों का पालन करते हुए ईश्वर की उपासना करना मर्यादा मार्ग है।

3. पुष्टिमार्ग- पूर्णतया कृष्ण की कृपा पर आश्रित हो जाना पुष्टिमार्ग है।

* उपर्युक्त तीनों तरह के मार्गों पर चलने वाले भक्तों को आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने तीन तरह का ‘जीव’ कहा है।

* पुष्टिमार्ग के उपासकों के लिए वल्लभाचार्य ने गोवर्धन पर्वत पर विं सं 1517 में श्रीनाथ जी के मंदिर का निर्माण कार्य आरंभ करवाया।

* पुष्टिमार्ग के अंतर्गत ही 1565 ई. में वल्लभाचार्य के पुत्र विट्ठलनाथ द्वारा चार अपने और चार अपने पिता के शिष्यों को लेकर ‘अष्टछाप’ की स्थापना की।

* अष्टछाप को अष्टसखी और अष्टविनायक के नाम से भी जाना जाता है।

अष्टछाप के कवि में चार वल्लभाचार्य के शिष्य थे –

1. कुम्भनदास (1468-1583 ई.)

      कुभंदास के जीवन चरित के विषय में बहुत कम जानकारी प्राप्त है। ये अष्टछाप के कवियों में सबसे वरिष्ठ, परमानंद जी के समकालीन थे। इन्होंने सबसे पहले 1492 ई. में वल्लभाचार्य से पुष्टिमार्ग की दीक्षा ली थी। इनका कंठ मधुर था इसलिए वल्लभाचार्य ने इन्हें मंदिर में कीर्तन का कार्य सौंपा था। इनकी गायन की प्रशंसा सुनकर अकबर ने इन्हें फतेहपुर सीकरी बुलाया था। जहाँ उन्होंने बिना इच्छा के निम्नलिखित पद सुनाया था।

      “संतन को कहा सीकरी सों काम?

      आवत मुख पहनियाँ टूटी, बिसरि गयो हरि नाम।।”

कुंभनदास की कोई स्वतंत्र रचना उपलब्ध नहीं है। आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने कुंभनदास के बारे में लिखा है- “ये पूरे विरक्त होकर धन, मान मर्यादा की इच्छा से कोसों दूर रहते थे।”  

2. सूरदास ((1478-1583 ई.)

जन्म- डॉ नगेंद्र, गंपतिचंद्र गुप्त और वार्ता के अनुसार सीही नामक स्थान में

निधन- ‘पारसौली’ में हुआ था।

पारसौली में ही 1509-10 ई. में उन्होंने वल्लभाचार्य से ‘पुष्टिमार्ग’ में दीक्षा ली थी।

सूरदास के उपनाम:

* जिवानोत्सव का कवि- शुक्ल जी ने

* वात्सल्य रस सम्राट- शुक्ल जी ने

* भावादिपति- आचार्य शुक्ल ने  

* हिंदी साहित्य के आकाश का सूर्य- भिखारीदास

* पुष्टिमार्ग का जहाज- विट्ठलनाथ ने

* खंजन नयन- अमृतलाल नागर ने

सूरदास कि रचनाएँ- 1. सूरसागर 2. सूरसारावली 3. साहित्य लहरी है।

सूरसागर- इसमें कुल पदों की संख्या 4936 (लगभग 5000) हैं।

इसका प्रकाशन नागरी प्रचारारिणी सभा, काशी द्वारा हुआ था। इसके संपादक आचार्य नंददुलारे वाजपेयी हैं। सूरसागर में 12 स्कंद है।

1 से 8 तक में पौराणिक कथाएँ है।

9 स्कंद में राम कथा का वर्णन है।

इसका 10वाँ स्कन्द सबसे बड़ा है। इसमें बाललीला और रासलीला का वर्णन है।

11वाँ और 12वाँ स्कन्द में गोपियों के विरह का वर्णन एवं भ्रमरगीत से संबंधित पद हैं।

इसमें भ्रमरगीत से संबंधित 4078 से 4710 तक है।

सूरसारावली- सूरसारावली में कुल 1107 पद हैं। इसमें सूरसागर का सार प्रस्तुत किया गया है। कुछ पद ज्यों का त्यों ही सूरसागर से ले लिए गया है। इसमें सूरदास ने अपनी अवस्था 67 वर्ष बताई है। यह सूरदास की अप्रमाणित रचना भी मानी जाती है।

साहित्य लहरी- साहित्य लहरी में कुल 118 दृष्टकूट पद हैं। यह रीति परक रचना है। इसकी रचना सूरदास ने नंददास को रस, अलंकार आदि काव्यांगों की शिक्षा देने के लिए की थी। शुक्ल जी के अनुसार इस रचना में सूरदास ने स्वयं को चंदबरदाई का वंशज बताया है।          

* अष्टछाप के कवियों में सर्वाधिक महत्वपूर्ण ‘सूरदास’ हैं, जिन्होंने अपनी महान रचना सूरसागर में कृष्ण के बाल-रूप, सखा-रूप तथा प्रेमी-रूप का अत्यंत विस्तृत, सूक्ष्म व मनोग्राही अंकन किया है। यही कारण है कि स्वयं वल्लभाचार्य ने सूर को ‘पुष्टिमार्ग का जहाज’ कहा।

* आचार्य रामचंद्र शुक्ल के शब्दों में- “आचार्यों की छाप लगी आठ कवियों की जो वीणाएँ कृष्ण माधुरी के गान में प्रवृत हुईं, उनमें सर्वाधिक मधुर, सरस व मादक स्वर अंधे गायक सूर की वीणा का था।”

* अष्टछाप में सूरदास के अतिरिक्त दो अन्य कवि भी साहित्यिक दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं- नंददास और कुम्भनदास

* नंददास ने ‘भँवरगीत’ और ‘पदावली’ जैसी रचनाएँ लिखीं जिनमें कृष्ण के सगुण रूप को स्थापित किया गया।

* कुम्भनदास का भी साहित्य की दृष्टि से पर्याप्त महत्व है। उनकी प्रसिद्ध पंक्तियाँ हैं-

      “संतन को कहाँ सीकरी सों काम।

      आवत जात पन्हैया टूटी, बिसरि गयो हरि नाम।”

* सूरदास का सिर्फ कृष्ण परंपरा में ही नहीं बल्कि संपूर्ण हिंदी काव्य में अनूठा स्थान है। इन कवियों ने ब्रज भाषा में निहित गंभीर कलात्मकता और संगितात्मकता तत्व को जो ऊँचाई प्रदान की वह किसी भी माधुर्य भाव की कविता के लिए अनुकरणीय है।

3. परमानंददास (1493-1572 ई.)

जन्म- 1493 ई. में कन्नौज के ब्राह्मण परिवार में हुआ था।

निधन- 1572 ई. में हुआ था। इनके दीक्षा

गुरु- वल्लभाचार्य थे।

इनकी कोई स्वतंत्र रचना उपलब्ध नहीं है। इनके पदों का संग्रह ‘परमानंद सागर’ के नाम से प्रकाशित हुआ था।

इसमें 835 पद है। काव्य सौष्ठव की दृष्टि से परमानंद दास सूरदास व नंददास के बाद अष्टछाप के तीसरे बड़े कवि है। सूरदास के बाद वात्सल्य से संबंधित सबसे ज्यादा पद परमानंद दास ने लिखे है। परमानंद दास अष्टछाप के एक मात्र कवि है जिन्होंने विष्णु के सभी दस अवतारों का वर्णन किया है।

आचार्य रामचंद्र शुक्ल के अनुसार- “वात्सल्य में परमानंद दास जी को तन्मयता है। वह सूर के समकक्ष ठहरती और कहीं-कहीं उनसे भी अधिक।”

4. कृष्णदास (1496-1578 ई.)

जन्म- 1496 ई. चिलोतारा (गुजरात) में हुआ था

निधन- 1578 ई. में हुआ।

इन्होंने 1510 ई. में वल्लभाचार्य से पुष्टिमार्ग की दीक्षा ली थी

      ये कुशाग्र बुद्धि के थे। अतः वल्लभाचार्य ने इन्हें मंदिर में प्रबंधन का कार्य सौंपा था। अपने साथियों के बीच ये ‘अधिकारी’ के नाम से प्रसद्धि थे। अष्टछाप के कवियों में शुद्र जाति के एक मात्र व्यक्ति थे। इन्होंने श्रीनाथ जी के मंदिर को बंगालियों के प्रभाव से मुक्त करवाया था। विट्ठलनाथ नाथ से कृष्णदास का अनबन होने पर बीरबल ने इन्हें बंदी बना लिया था। बाद में विट्ठलनाथ जी ने ही इन्हें मुक्त करवाया था। एक कुआँ बनवाते समय उसी में गिर जाने से इनका निधन हो गया।

रचनाएँ- 1. जुगलमान चरित 2. भ्रमरगीत 3. प्रेमतत्व निरूपण

आचार्य रामचंद्र शुक्ल के अनुसार- “कृष्णदास का मातृभाषा गुजराती है, किन्तु इनकी पदों की भाषा ब्रज भाषा है। सूरदास तथा नंददास के सामने इनकी कविता साधारण कोटि की है।”    

अष्टछाप में चार कवि विट्ठलनाथ के शिष्य थे

1. गोविन्द दास (1505-1585 ई.)

जन्म- (1505 ई.) ग्राम आंतरी, भरतपुर (राज)

निधन- (1585 ई.), गुरु विट्ठलनाथ

      इनकी कोई स्वतंत्र रचना उपलब्ध नहीं है। इनके 252 पदों का प्रकाशन गोविंद स्वामी के पद नाम से करवाया गया। ये अष्टछाप के कवियों में सूरदास के बाद दूसरे बड़े संगीतज्ञ थे। ऐसा माना जाता है कि अकबर के दरबारी गायक तानसेन ने इनसे भी संगीत की शिक्षा ली थी। ऐसी किवदंती है कि अकबर ने किसी पेड़ की ओट लेकर इनके किसी पद को सुना था। इन्होंने गोवर्धन के महावन क्षेत्र में कदम के पेड़ लगवाएँ थे। वह स्थान आज भी गोविंद स्वामी की ‘कदंब खड़ी’ नाम से प्रसिद्ध है।   

2. छीतस्वामी (1515- 1585 ई.)

जन्म- 1515 ई. मथुरा, चतुर्वेदी ब्राह्मण परिवार में

निधन- 1558 ई.

गुरु- विट्ठलनाथ

      इनकी कोई भी स्वतंत्र रचना उपलब्ध नहीं है। इनकी 200 पदों का संकलन पदावली के नाम से प्रकाशित हुआ। इनके अधिकांश पदों में ब्रजभूमि के प्रति प्रेम की भावना व्यक्त हुई है। ये स्वभाव से उदंड थे। इन्होंने विट्ठलनाथ को खोटा सिक्का एवं थोथा नारियल देने की योजना बनाई थी। ये अपने साथियों में छीतू चौबे नाम से प्रसिद्ध थे।

प्रसिद्द पंक्तियाँ-

“हे विधना! तोसो अंचरा पसारि के माँगो।

जन्म जन्म दीजौ मोही ब्रज में बसिबौ।।”

3. चतुर्भुजदास (1530-1585 ई.)

जन्म- 1530 ई. जमुनावती, गोवर्धन क्षेत्र (उ. प्र.)

निधन- 1585 ई.

ये कुंभनदास के सबसे छोटे पुत्र थे इन्होने विट्ठल से पुष्टिमार्ग की शिक्षा ली थी

रचनाएँ: चतुर्भुज कीर्तन संग्रह, मधुमालती, द्वादस यश, भक्ति प्रताप, हितजू को मंगल,      किर्तानावाली, दानलीला।

डॉ. नगेंद्र के अनुसार- “मधुमालती, द्वादस यश और भक्ति प्रताप को अष्टछाप के चतुर्भुज दास की रचनाएँ नहीं मानकर राधावल्लभ संप्रदाय के चतुर्भुज दास की रचनाएँ माना है।”

4. नंददास (1533-1583 ई.)

जन्म- 1533 ई. गाँव रामपुर  (सोरो क्षेत्र उ. प्र.)

निधन- 1583 ई.

गुरु- विट्ठलनाथ

      ये अष्टछाप के कवियों में सबसे कनिष्ट थे। ये तुलसी के चचेरे भाई माने जाते हैं। इनके पिता का नाम जीवन राम था। जो तुलसी के पिता आत्माराम के छोटे भाई थे। इन्होंने नृसिंह पंडित से संस्कृत का ज्ञान प्राप्त किया था। ये आरंभ में राम भक्त थे। बाद में विट्ठलनाथ के प्रभाव से कृष्ण भक्त हो गए।

नंददास की रचनाएँ:

1. अनेकार्थ मंजरी

2. मान मंजरी

3. विराहमंजरी

4. रुपमंजरी

5. रसमंजरी

6. भवरगान

7. रास पंचाध्यायी

8. सिद्धांत पंचाध्यायी

9. सुदामा चरित

10. नंददास पदावली

11. रुक्मिणी मंगल

12. श्याम सगाई

13. प्रेम बारहखड़ी

14. गोवर्धन लीला

15. दशम स्कंध भगवत

16. अनेकार्थ माला

नागरी प्रचारिणी सभा, काशी ने इनकी निम्नलिखित और रचनाओं की सूचि प्रस्तुत की है।

1.दानलीला 2. मनलीला 3. ज्ञानमंजरी 4. नाम चिंतामणि।

नंददास के संदर्भ में विशेष तथ्य:

* दो सौ बावन वैष्णवन की वार्ता में नंददास को तुलसी का चचेरा भाई बताया गया है।

* मूलगोसाई (बेनि माधावदास) चरित में नंददास को तुलसी का गुरु भाई बताया गया है।

* गुलाबराय ने नंददास को तुलसी का चचेरा एवं गुरु भाई दोनों माना है।             

* अष्टछाप के कवियों में सबसे जयादा काव्य शास्त्रीय ज्ञान नंददास को था।

* अष्टछाप के कवियों में सबसे ज्यादा रचनाएँ नंददास ने ही लिखी है।

* भाव व कला पक्ष की दृष्टि से अष्टछाप के कवियों में सूरदास के बाद दूसरा स्थान नंददास का ही है।

गुलाबराय के शब्दों में- “नंददास की गोपियों में बुद्धिवाद का बाहुल्य है। उन्होंने उद्धव को दर्शन की तर्कभूमि में पछाड़ने का प्रयत्न किया है।”

गंपतिचंद्र गुप्त के शब्दों में- “भक्ति काव्य और लौकिक काव्य की कड़ी को जोड़ने वाले कवि नंददास ही है।”

आचार्य रामचंद्र शुक्ल के शब्दों में- “नंददास कृत ‘रूपमंजरी’ दोहा चौपाई में रचित प्रेमाख्यान काव्य है। इसकी नायिका निर्भयपुर की राजा धर्मवीर की पुत्री रूपमंजरी है। रूपमंजरी प्रबंध काव्य है, जिसमे परकीया भाव है।”

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