भारतीय नवजागरण और स्वाधीनता आंदोलन की वैचारिक पृष्ठभूमि : हिंदी नवजागरण

नवजागरण से तात्पर्य एक नयी विचार से है, जिसके कारण देश में सामाजिक आर्थिक धार्मिक एवं राजनीतिक बदलाव लाया जा सके।

      किसी देश या समाज की वैचारिकी सुसुप्ति (सोने की अवस्था) का अंत, ‘जागरण’ का नवीनतम रूप ही ‘नवजागरण’ है।

      नवजागरण के लिए प्रायः कई पर्यायवाची शब्दों का प्रयोग किया जाता है जैसे – पुनर्जागरण, पुनरुत्थान, नवजागृति आदि।

      यूरोप में 14वीं सदी से 17वीं सदी तक होने वाले सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक और सांस्कृतिक परिवर्तनों ने नवजागरण की भूमिका निभायी।

हिंदी में पहली बार   

      * 19वीं सदी के समाज सुधार आंदोलन को इतिहासकारों ने ‘रैनेसां’ नाम दिया है।

      * रैनेसां अंग्रेजी का शब्द है जिसका अर्थ होता है ‘पुनर्जागरण’।

      * इसी ‘रैनेसां’ के लिए डॉ रामविलास शर्मा ने ‘नवजागरण’ शब्द का प्रयोग किया है।

      * ‘पुनर्जागरण’ में दूबारा जागृति का भाव है।

      * ‘नवजागरण’ में नई जागृति का भाव है।

      * भारतीय नवजागरण की शुरुआत बंगाल से हुई थी।

      * बंगाल के जमींदार परिवार में जन्मे राजा राममोहन राय इसके प्रवर्तक माने जाते हैं।

      * राजा राममोहन राय ने 1828 ई. में बंगाल में ‘ब्रह्म समाज’ की स्थापना की थी।

      * महाराष्ट्र में महादेव गोविंद रानाडे द्वारा ‘प्रार्थना समाज’ की स्थापना की गई।

      * स्वामी दयानंद सरस्वती ने 1875 ई. में ‘आर्य समाज’ की स्थापना की।

      * राजा राममोहन राय ने सती प्रथा के विरुद्ध केवल लोगों को जागरूक ही नहीं बनाया बल्कि कानून द्वारा प्रतिबंध के लिए प्रयास किए और सती प्रथा पर प्रतिबंध लगवाया।

      * इसी तरह ईश्वरचंद्र विद्यासागर के प्रयासों से विधवा विवाह को कानूनी स्वीकृति मिली। बाल विवाह पर रोक लागाये गए और विवाह की उम्र भी तय की गई। नवजागरण के आंदोलन ने अनमेल विवाह को कुछ हद तक रोकने में सफलता पाई थी।

      * जातिप्रथा का विरोध भी एक मुख्य मुद्दा उपस्थित हुआ। समाज के एक वर्ग को दलित समझ कर उसके साथ छुआछूत का व्यवहार कर उन्हें मानव अधिकारों से वंचित किया गया। इस सोच का प्रभाव स्वयं दलित जाति के लोगों पर भी दिखाई पड़ने लगा।

      * इसमें महाराष्ट्र के ज्योतिबा फूले का नाम सबसे पहले आता है जिन्होंने अपनी पत्नी सावित्रीबाई फुले के साथ मिलकर जन जागरण का काम किया।

      * दूसरा महत्वपूर्ण नाम केरल के नारायण गुरु का है जिन्होंने जाति प्रथा का विरोध किया और आधुनिक शिक्षा के विकास पर बल दिया।

      * तमिलनाडु की द्रविड़ आंदोलन ने भी विभिन्न जातियों के उत्थान के लिए जनजागृति का कार्य किया।

      * नवजागरण के अग्रदूतों ने दूसरा महत्वपूर्ण काम शिक्षा का प्रचार किया। इसके लिए नए तरह के संस्थान स्थापित किए गए। स्त्री शिक्षा प्रदान करने के लिए लड़कियों के लिए स्कूल खोले गए। इस क्षेत्र में ईश्वरचंद्र विद्यासागर और महाराष्ट्र के ज्योतिबा फुले का योगदान सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण है। फुले ने सत्यशोधक मंडल नामक सामाजिक संस्था को स्थापित किया।

      * नवजागरण के दौरान कई पत्र-पत्रिकाएँ प्रकाशित की गईं। नवजागरण ने मानव जीवन को केंद्र से हटाकर मानव और उसके लौकिक हितों को केंद्र में रखा। यह एक महत्त्वपूर्ण प्रस्थान बिंदु था।

      * नवजागरण आंदोलन के कारण जो नवीन चेतना जागृत हो रही थी उसने साहित्य पर भी गहरा प्रभाव डाला। इस दौर के लेखकों ने भारत की आधुनिक भाषाओं में नवजागरण के दौर के सामाजिक और राष्ट्रीय मुद्दों को अपने साहित्य का विषय बनाया ।

      * पश्चिमी साहित्य के संपर्क में आने से प्रेस की स्थापना ने साहित्य में गद्य की नयी विधाओं जैसे- उपन्यास, कहानी, निबंध आदि में रचना करने की प्रेरणा दिया। नाटक की पुरानी विधा जो मध्ययुग में शिथिल पड़ गई थी उसका पुनरुद्धार हुआ।

      * 19वीं शताब्दी में भारतीय समाज संक्रमण के जिस तीव्र दौर से गुजरा उसे कुछ चिंतक पुनर्जागरण कहते हैं तो कुछ पुनरुथान, कुछ अन्य इसे नवजागरण भी कहते हैं। ये सभी शब्द इतिहास के प्रति विशेष दृष्टिकोण को प्रकट करते हैं।

      * नवजागरण का अर्थ है- नए तरीके से जागना। इसमें निहित है कि पहले भी हम जगे हुए थे मगर अब जागने की दृष्टिकोण को बदलना होगा। यह व्याख्या मध्यकाल के इतिहास को इस्लाम व हिंदुत्व की टकराहट नहीं मानती और न ही उसे अंधकार या पतन का काल मानती है। डॉ. रामविलास शर्मा जैसे चिंतकों ने 19वीं शताब्दी के सुधार आंदोलनों की व्याख्या हेतु इसी शब्द को उचित माना है।

      * नवजागरण एक विशेष प्रकार के सांस्कृतिक संक्रमण का दौर है जिसमें कोई समाज किसी अन्य संस्कृति से टकरा कर नए दृष्टिकोण से जीने का प्रयास करती है। जिन देशों के पास गौरवमय अतीत है, उनमे अतीत की स्मृतियाँ भी नवजागरण का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाती हैं। शेष समाजों में अन्य संस्कृतियों से परिचित होना और उनकी तुलना में अपना मूल्यांकन करना नवजागरण का कारण बनता है।

      * डॉ. रामस्वरूप चतुर्वेदी के अनुसार– “नवजागरण दो संस्कृतियों की टकराहट से उत्पन्न रचनात्मक उर्जा है। इस उर्जा के प्रभाव स्वरूप दोनों संस्कृतियाँ एक दूसरे की अच्छाईयों को ग्रहण करना चाहती हैं और अपनी बुराइयों को छोड़ना चाहती हैं। यही संपूर्ण सांस्कृतिक प्रक्रिया समाज के इतिहास में नवजागरण कहलाती है।”

भारतीय इतिहास में इस तरह के दो जागरण सर्वाधिक महत्वपूर्ण हैं-

      पहला जागरण (मध्यकाल)- जब भारत में इस्लाम का आगमन हुआ तब इस्लामी संस्कृति समतामूलक किन्तु कट्टर धार्मिक विचारों पर आधारित थी, जबकि भारतीय संस्कृति धार्मिक लचीलेपन किन्तु विषमतामूलक सामाजिक संरचना पर आधारित थी। इन दोनों की टकराहट से भक्तिकालीन जागरण का उदय और सामजिक संस्कृति उत्पन्न हुई। संस्कृतियाँ-पहले टकराती हैं, फिर तटस्थ होती हैं और अंत में धीरे-धीरे परिचित होकर परस्पर घुल-मिल जाति हैं। घुलने-मिलने का यही स्तर सामासिक संस्कृति को जन्म देती है।

      दूसरा नवजागरण- यह 19वीं शताब्दी से संबंधित है जहाँ पश्चिमी (यूरोपीय) संस्कृति की टकराहट भारतीय संस्कृति से हुई। अंग्रेजों की व्यापारिक गतिविधियों के जरिए भारत ब्रिटेन का उपनिवेष बनता चला गया। मुगलों के पराभव ने भारत की राजनैतिक परिस्थितियों को कमजोर कर दिया जिसका लाभ अंग्रेजों ने उठाया। मुग़ल, मराठा, सिक्ख आदि सत्ताओं के पराजय से देश का बड़ा हिस्सा ब्रिटेन का गुलाम हो गया।

      अंग्रेजों की नीतियों तथा ईसाई धर्म प्रचारकों व प्राच्य संस्कृति को हेय समझने वाले अधिकारियों आदि ने भारतीयों के सांस्कृतिक गौरव को आघात पहुँचाया।

      अंग्रेजों ने अपने औपनिवेशिक नीति के तहत जमीन का नया बंदोबस्त किया। इससे अपने आप में सिमटे हुए गाँवों की जड़ता टूटी। अंग्रेजी शिक्षा के माध्यम से हम यूरोपीय ज्ञान-विज्ञान से परिचित हुये और प्रगति का एक नया मार्ग मिला। यातायात के नये साधनों से व्यापार में वृद्धि हुई जिससे हमारे आवागमन की गति में तेजी आई। प्रेस के आने के कारण विचार-विनिमय में सुविधा हुई। विचारों की स्वंत्रता का द्वार उन्मुक्त हुआ। यह नवजागरण ही भारतीय स्वंतत्रता आन्दोलन की पृष्ठभूमि बना।

      भारतीय समाज की रुढ़िवादी व धार्मिक संकीर्णता ने भी स्वयं यहाँ के एक वर्ग को सोचने को मजबूर कर दिया।

      निःसंदेह अंग्रेजों की शिक्षानीति उपनिवेशीकरण की प्रक्रिया के तहत ही थी, परंतु इसने दो संस्कृतियों की टकराहट के बीच आधुनिकता के प्रसार का मार्ग प्रशस्त किया।

      आधुनिक भावबोध की संगठित अभिव्यक्ति नवजागरण के माध्यम से हुई। विश्व चिंतन की तमाम आधुनिक स्थापनाएँ पहली बार नवजागरण के माष्यम से 19वीं सदी में अभिव्यक्त हुईं।

नवजागरण सबसे पहले बंगाल में घटित हुआ:

      प्लासी का युद्ध के बाद 1757 ई. में ही बंगाल अंग्रेजों के अधीन होकर उनके विकसित पूंजीवादी संस्कृति-शिक्षा-साहित्य के संपर्क में आ चुका था। स्वाभाविक है कि बंगाल को इसका लाभ मिला।

      सामाजिक धार्मिक सुधार आन्दोलन- नवजागरण परंपरा और संस्कृति को वैज्ञानिक तर्क विधान व सामाजिक-राजनीतिक अभिप्रायों से जोड़ने वाली चेतना है। इसका सीधा प्रभाव भारत पर पड़ा। यही कारण है कि भारत में नवजागरण का सबसे महत्वपूर्ण प्रभाव विविध सामाजिक, धार्मिक सुधार आंदोलनों के रूप में देखा जा सकता है।

      ये आंदोलन बुद्धि व तर्क पर केंद्रित थे। आस्था व कोरी भावुकता पर नहीं। इन्होंने  भारतीय समाज में नारी व निम्न जातियों की शोचनीय स्थिति का जमकर विरोध किया। जहाँ सती प्रथा, बालिका शिशु हत्या जैसी विरोधी परंपराएँ व्याप्त थीं वही निम्न जातियों को छुआछूत व सामाजिक-आर्थिक शोषण का शिकार होना पड़ा था। इसके अलावा बाल विवाह, दास प्रथा आदि प्रथाओं का भी प्रचलन था।

      समाज में व्याप्त सभी बुराइयाँ धार्मिक संरचना से जुड़ी हुई थी इसलिए भारतीय संरचना में परिवर्तन लाने के लिए धार्मिक ढाँचे में परिवर्तन लाना जरुरी था।

      समाज सुधारकों ने धर्म का मानवतावादी और उपयोगितावादी दृष्टिकोण प्रस्तुत किया। इन आंदोलनों का उद्देश्य सुधारात्मक परिवर्तन था, संरचनात्मक परिवर्तन नहीं। इन आंदोलनों के तरीकों में लोगों को जागरूक करना, सामाजिक कार्य करना, विधि-कानून के माध्यम से सुधार करना शामिल था।

      राजाराममोहन राय को भारतीय नवजागरण का अग्रदूत माना जाता है इनके प्रयासों से सती प्रथा पर प्रतिबन्ध लगाया गया।

      ईश्वरचंद्र विद्यासागर ने विधवा पुनर्विवाह के लिए महती भूमिका निभाई।

      दयानंद सरस्वती ने धार्मिक कर्मकांडों का जमकर विरोध किया। वे वेद के इतर हिन्दू धार्मिक पुस्तकों को खारिज कर दिए। इन्होंने नारी व निम्न जातियों के शोषण का विरोध किया तथा हिंदी भाषा के पक्ष में बहुत योगदान किया। ज्योतिबाफुले और सावित्रीबाई फुले ने जाति-उत्पीड़न के विरोध में आवाज उठाई।

      सभी समाज सुधारक कर्मकांड विरोधी, आधुनिक शिक्षा और पुरानी परंपराओं के समर्थक और सामाजिक अत्याचार के विरोधी थे।

      भारतीय नवजागरण से संबद्ध महापुरुषों ने अपनी अस्मिता की प्रतिष्ठा तथा जनता में जागरूकता के लिए भारतीय संस्कृति का आधार ग्रहण किया। राजाराममोहन राय ने उपनिषदों का सहारा लिया, विवेकानंद ने अद्वैत वेदांत का, स्वामी दयानंद सरस्वती ने वेद का, तिलक और गाँधी ने गीता का। इसके आधार पर उन्होंने धार्मिक भेद-भाव, ऊँच-नीच, छुआछूत, बाह्याडंबर, जाति-पाँति का जमकर विरोध किया। स्पष्ट है कि उनके विचारों को नई दिशा देने का कार्य अंग्रेजी उपनिवेशवाद तथा तत्कालीन समाज की ज्वलंत समस्याओं ने किया।

नवजागरण का प्रभाव:

      नवजागरण के आधुनिक-भावबोध ने लोगों को जागरूक किया। लोगों ने अंग्रेजों के उत्पीड़न को समझा। किसानों ने अपनी दुर्दशा का कारण केवल जमींदारों को मानना छोड़कर अंग्रेजों के नीतियों को माना। यही कारण है कि 20 वीं सदी में ये आन्दोलन राष्ट्रीय आंदोलनों से जुड़े।

      * अंग्रेजों ने भारत का शोषण, आर्थिक संदर्भ में आरंभ किया शिक्षा और आधुनिक ज्ञान-विज्ञान से लैस दादा भाई नारौजी ने अंग्रेजों की आर्थिक नीतियों की पोल खोली।

      * लोगों को अपने अधिकार समझ में आने लगे कई पत्र-पत्रिकाएँ निकालकर विचारों को अभिव्यक्त किया गया। इससे नवजागरण का प्रभाव फैलता चला गया।

      * कई संस्थाओं की स्थापना हुई। इन्होंने भारत के राजनीतिक-सामाजिक अधिकारों की माँगों को रखना शुरू किया। कॉग्रेस की स्थापना (1885 ई.) इस क्रम में महत्वपूर्ण थी।

      * लोगों ने स्वतंत्रता, समानता, भाईचारा के अर्थो को समझा और इन्हीं मूल्यों पर भारतीय स्वाधीनता की लड़ाई भी लड़ी गई।

      * इन सबका परिणाम था कि 20वीं सदी के आरंभ से ही राष्ट्रवाद की जो अवधारण मुकम्मल रूप लेने लगी थी उसने आगे के स्वतंत्रता समर का मार्गदर्शन किया। भारतीय संदर्भ में इस आधुनिकता से परिपूर्ण राष्ट्रवाद के उदय को सबसे महत्वपूर्ण माना जा सकता है।

      * ‘स्वदेशी’ की मांग और स्वदेशी आन्दोलन में इस नवजागरण का पहला परिपक्व रूप देखा जा सकता है।

      * आगे के तमाम आंदोलन, संवैधानिक सुधारों और देश की आजादी में नवजागरण की इन्हीं विशेषताओं का योगदान था जिसने तर्क, वैज्ञानिकता, स्वदेशी, राष्ट्रवाद अवधारणाओं को भारत में प्रस्थापित किया।

      * नवजागरण मात्र सांस्कृतिक, सामाजिक या धार्मिक आन्दोलन नहीं था बल्कि, अंग्रेजों के द्वारा भारतीय जनता के शोषण के विरुद्ध विद्रोह भी था। इसलिए भारतीय नवजागरण और राष्ट्रीय आंदोलन को एक-दूसरे से अलग करके नहीं देखा जा सकता है। आरंभ में यह जागरण सामंत विरोधी था और काफी हद तक अंग्रेजियत का शिकार था। धीरे-धीरे यह साम्राज्यवाद, उपनिवेषवाद और गुलामी के विरोध का रूप ग्रहण करने लगा। विशाल भू-भाग पर जनसंख्या के कारण हिंदी क्षेत्र का नवजागरण महत्वपूर्ण है।

      * हिंदी नवजागरण का आरंभ सन् 1857 ई. के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम से माना जाता है। हिंदी नाजागरण बंगाल, महाराष्ट्र के नवजागरण से मूलतः भिन्न नहीं होकर अपने आरंभ में दृष्टिकोण व तेवर को लेकर भिन्न हो गया। बंगाल का नवजागरण सांप्रदायिक व क्षेत्रीय दृष्टिकोण से समग्र नहीं हो सका तथा महाराष्ट्र में जातिय संदर्भ बने रहे। परंतु भारतेंदु मंडल में संकीर्णताएँ नहीं थीं। भारतेंदु का प्रसिद्ध निबंध ‘भारतवर्षोंनन्ति कैसे हो सकती है’ इसका प्रमाण है।

      * आत्मचेतस के जिस भाव की अभिव्यक्ति संपूर्ण भारतीय नवजागरण में है, उसका केंद्रीय भाव सांस्कृतिक अस्मिता से संबंधित है। भारतेंदु ने इस आत्म-चेतस को समष्टि चेतस की ओर उन्मुख किया।

हिंदी नवजागरण को तीन चरणों में देखा जा सकता है:

      1. 1857 ई. का स्वतंत्रता संग्राम

      2. भारतेंदु युग

      3. ‘सरस्वती’ पत्रिका का प्रकाशन और महावीर प्रसाद द्विवेदी

      हिंदी नवजागरण पर बंगाल और महाराष्ट्र के नवजागरण, अंग्रेजी-पश्चिमी ज्ञान एवं आंदोलन के प्रभाव को देखा जा सकता है। रामविलास शर्मा ने हिंदी नवजागरण में अंग्रेजी ज्ञान और पश्चिमी ज्ञान की उल्लेखनीय भूमिका नहीं मानी है।

हिंदी जाति की अवधारणा:

      मीर, भारतेंदु, डॉ इकबाल, धीरेन्द्र वर्मा, सुनीति कुमार चटर्जी, फ्रेडरिक पिंकेट आदि के चिंतन में हिंदी जाति की अवधारणा किसी न किसी रूप में मौजूद है।

      रामविलास शर्मा ने पहली बार इस अवधारणा को एक व्यवस्थित आकार दिया। उन्होंने भारत को बहुजातीय राष्ट्र बताते हुए हिंदीभाषियों को भी बांग्ला, तमिल, मराठी आदि जातियों की तरह एक जाति माना। उनहोंने लिखा है – “इस बहुजातिय राष्ट्र में एक जाति हिंदी भी है इसके मजबूत हुए बिना बहुजातीय राष्ट्रीयता सुदृढ़ नहीं हो सकती है।”

      उनकी महत्वपूर्ण स्थापना है कि – “हिंदी का जातीय विकास 13वीं-14वीं सदी में खुसरो की ‘खालिकबारी’ खड़ी बोली की रचनाओं से शुरू हो जाता है। उन्होंने हिंदी नवजागरण या आधुनिक काल के दो हिस्से किये। एक को लोक जागरण और दूसरे को नवजागरण कहा। पहला चरण जातीय निर्माण का आंदोलन था। यह दौर व्यापारिक पूँजीवाद का था। भक्ति आंदोलन का काव्य लोकजागरण का ही काव्य है।

      रामविलास शर्मा के शब्दों में – “भारतेंदु हरिश्चंद्र से जो नवजागरण शुरू होता है वह नयी परिस्थितियों में पुराने लोक जागरण का विकास है।”

      रामविलास शर्मा ने ‘महावीरप्रसाद द्विवेदी और हिंदी नवजागरण’ में सर्वप्रथम नवजागरण शब्द का प्रयोग किया तथा 1857 ई. के स्वाधीनता संग्राम से नवजागरण की शुरुआत मानी।

हिंदी नवजागरण की समस्याएँ:

      एक समय के बाद सांप्रदायिकता की समस्या इसमें आई। इसका कारण अंग्रेजों की मुस्लिम तुष्टिकरण की नीति थी। 1909 ई. में ‘पृथक निर्वाचन मंडल का’ प्रावधान इसका प्रमाण है।

      हिंदी-उर्दू विवाद ने न केवल भाषा में खाइयाँ पैदा की, बल्कि भाषा की समस्या को धर्म से जोड़कर सांप्रदायिकता को भी बढ़ाया।

      बहुभाषी देश में राष्ट्रभाषा के सवाल के कारण भी हिंदी नवजागरण पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा।

      19वीं शताब्दी का नवजागरण हिंदी साहित्य के इतिहास का दूसरा जागरण है जिसमे एक ओर भारतीय सामासिक संस्कृति है, तो दूसरी ओर पाश्चात्य संस्कृति। इस समय भारतीय संस्कृति अध्यात्म-प्रधान और मध्यकालीन दौर से गुजर रही थी जबकि पाश्चात्य संस्कृति वैज्ञानिक तथा मशीनी क्रांति के आधार पर भौतिकवाद तथा पूँजीवाद का प्रतिनिधित्व कर रही थी। उसका अध्यात्मिक पक्ष तुलनात्मक रूप से कमजोर था। उसके पास वैज्ञानिक तार्किक शिक्षा थी, इहलौकिक मानसिकता थी। समानता, स्वतंत्रता, न्याय और बंधुत्व के आधुनिक आदर्श थे जो तत्कालीन भारतीय समाज के लिए अनर्जित थे। इन दोनों की टकराहट से भारतीय संस्कृति ने आधुनिक शिक्षा व भौतिकता सीखी, तो पाश्चात्य संस्कृति यहाँ के अध्यात्म से प्रभावित हुई।

साहित्य में नवजागरण की अभिव्यक्ति:

      किसी साहित्य में नवजागरण की चेतना कुछ विशेष रूप में दिखाई पड़ती है। ये इस प्रकार है- आत्म-मूल्यांकन का भाव नवजागरण का केंद्रीय भाव है क्योंकि दूसरी संस्कृति से परिचित होने पर समाज उसकी तुलना में आत्म-मूल्यांकन करता है। इसके साथ-साथ आत्म-आलोचना तथा आत्म-परिष्कार जैसी मानसिकता भी नवजागरण में अनिवार्य रुप से पनपती है, क्योंकि अपनी कमियों की पहचान कर चोट करना तथा कुछ नई चीजें सीखना इस स्थिति में स्वाभाविक होता है।

      अपने अतीत के प्रति रोमानी बोध भी नवजागरण में सामान्यतः दिखता है क्योंकि समाज को रचनात्मक प्रेरणा देने के लिए ऐतिहासिक या मिथकीय प्रशंग बेहद कारगर भूमिका निभाते हैं। यहाँ इतिहास तटस्थ रुप में नहीं आता बल्कि एक आदर्श तथा रोमानियत भरे रूप में प्रयुक्त होता है। जो संस्कृति हमारे समक्ष उपस्थित है, उसके सकारात्मक तत्वों को ग्रहण करने की चेतना नवजागरण में काफी प्रमुख होती है। 19वीं सदी के नवजागरण में यूरोपीय संस्कृति के जिन तत्वों का प्रभाव दिखता है, वे हैं वैज्ञानिक, तार्किक शिक्षा, आधुनिक और इह्लोकवादी दृष्टिकोण, समानता, स्वतंत्रता, न्याय व बंधुत्व जैसे सामाजिक-राजनितिक आदर्श इत्यादि। जहाँ-जहाँ साहित्य में ये तत्व नजर आते हैं, वे सभी बिंदु नवजागरण के रूप में देखे जाते हैं।

रामविलास शर्मा द्वारा लिखित दो पुस्तक:

      महावीरप्रसाद द्विवेदी और हिंदी नवजागरण

      भारतेंदु हरिश्चंद्र : हिंदी नवजागरण की समस्याएँ

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