आई. ए. रिचर्ड्स: मूल्य सिद्धांत, संप्रेषण सिद्धांत तथा काव्य भाषासिद्धांत

आई.ए. रिचर्ड्स – समय – (1893- 1979 ई.)

पूरानाम – इवोर आर्मस्ट्रांग रिचर्ड्स है। ये 20वीं सदी के ‘मूल्यवादी’ समीक्षक है।   

जन्म – 26 जनवरी, (1893 ई.) इंग्लैंड के ‘चेशायर‘ शहर में हुआ था।

वे ‘अर्थशास्त्र‘ एवं ‘मनोविज्ञान‘ के विद्यार्थी थे। 

      > हार्वर्ड विश्वविद्यालय में अंग्रेजी के प्रोफेसर रहे। वहीं से इन्होंने डी. लिट् की उपाधि प्राप्त की।

      > उनका रचनाकाल सन् 1924-1936 ई. के मध्य माना जाता है। उन्होंने लगभग एक दर्जन ग्रंथ लिखें।

      > सर्वाधिक महत्वपूर्ण ग्रंथ “प्रिंसिपल ऑफ लिटरेरी क्रिटिसिजम” है।

      > इनका प्रभाव हिंदी साहित्य पर स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। 

      > आचार्य रामचंद्र शुक्ल रिचर्ड्स के सिद्धांतों के समर्थक और प्रशंसक रहे हैं। ये दोनों ही मूल्यवादी समीक्षक हैं।

      > आई.ए. रिचर्ड्स मनोविज्ञान के क्षेत्र से साहित्य के क्षेत्र में आए थे। इसलिए उनके काव्य सिद्धांत मनोवैज्ञानिक आधार पर स्थित है।

      > ‘कला को जीवन के लिए उपयोगी सिद्ध करना’ रिचर्ड्स की आलोचना का केंद्र बिंदु है।

      > वे “बेंथम” और “मिल” के उपयोगितावाद से पर्याप्त प्रभावित रहे हैं।

आई. ए. रिचर्ड्स की प्रमुख रचनाएं:

      > द फाउंडेशन ऑफ एसथेटिक्स (1922 ई. ), यह रचना सी. के. ऑक्डेन और जेंम्स वुड के साथ मिलकर लिखी है।

      > मीनिंग ऑफ मीनिंग (1923 ई.), अर्थ का अर्थ, ये रचना भी सी .के. ओक्डेन के साथ मिलकर लिखी है।

      > प्रिंसिपल्स ऑफ लिटरेरी क्रिटिसिज्म (1924 ई.), साहित्य आलोचना  

      > साइन्स एंड पोयट्री (1925 ई.), विज्ञान और कविता

      > प्रैक्टिकल क्रिटिसिज्म (1929 ई.), व्यवहारिक आलोचना

      > कॉलरिज ऑन इमैजिनेशन (1935 ई.), कॉलेरिज की कल्पना शक्ति

      > द फिलॉसफी ऑफ रिटोरिक (1936 ई.), शब्दता का दर्शन

आई. ए. रिचर्ड्स के निम्नलखित दो सिद्धान्त उल्लेखनीय हैं-

      1. संप्रेषण सिद्धान्त (theory of communication)

      2. मूल्य सिद्धान्त (theory of value)

आई. ए. रिचर्ड्स का ‘संप्रेषण सिद्धांत’:

      संप्रेषण सिद्धान्त को ‘सम्प्रेषणीयता का सिद्धांत’ भी कहा जाता है। रिचर्ड्स का मानना है कि किसी अन्य व्यक्ति की अनुभूति को अनुभूत करना ही प्रेषणीयता है। विषय की रोचकता व रमणीयता से संप्रेषण में पूर्णता का समावेश होता है। कवि जब स्वयं अपनी अनुभूतियों के साथ एक रस नहीं हो जाता तब तक वे अनुभूतियां प्रेषणीयता का गुण ग्रहण नहीं कर सकती।

      संप्रेषण एक स्वाभाविक व्यापार है जिसमें निश्चय ही कवि प्रतिभा स्वत: अज्ञात रूप से कार्य करती है। अनुभूतियों का सहज प्रस्तुतीकरण उस प्रभाव दशा का निर्माण कर देता है जो कवि ने अनुभूत की थी। संप्रेषण की प्रक्रिया में भाषा का विशेष योगदान है। शब्दों के अर्थ बोध एवं बिम्ब ग्रहण से काव्यार्थ का बोध होता है। इस बोध से ही भावों एवं भावात्मक दृष्टि की अनुभूति होती है।

      रिचर्ड्स का विचार है की संप्रेषण कला का तात्विक धर्म है। एक कलाकार का अनुभव विशिष्ट और नया होने के कारण उसकी सम्प्रेषणयीता समाज के लिए मूल्यवान है। रचना में जितनी प्रबल और प्रभावशाली सम्प्रेषणयीता होती है वह उतना ही बड़ा कवि या कलाकार होता है।

रिचर्ड्स के अनुसार-

      > प्रेषणीयता को प्रभावी बनाने के लिए इन बातों की आवश्यकता होती है।

      > कवि या कलाकार की अनुभूति व्यापक और प्रभावशाली होनी चाहिए।

      > अनुभूति के क्षणों में आवेगों का व्यवस्थित ढंग से संतुलन होना चाहिए।

      > वस्तु या स्थिति के पूर्ण बोध के लिए कवि में जागरूक निरीक्षण शक्ति होनी चाहिए।

      > कवि के अनुभव और सामाजिक अनुभवों में तालमेल होना चाहिए। यदि दोनों में अंतर हो तो कल्पना की सहायता से भावों व विचारों का संप्रेषण होना चाहिए।

रिचर्ड्स ने प्रयोग की दृष्टि से भाषा के दो रूप माने हैं:

      तथ्यात्मक / वैज्ञानिक भाषा – वैज्ञानिक भाषा में सूचनात्मक, तथ्यात्मक अथवा अभिधात्मक भाषा का प्रयोग होता है।

      रागात्मक भाषा–  जबकि काव्य की भाषा रागात्मक और भाषा में भावात्मक अर्थ की प्रधानता होती है। ‘रागात्मक’ भाषा का प्रयोग रचनाकार करते हैं। इसमें प्रतीकों, बिंबों और भाव संकेतों को विशेष महत्व दिया जाता है। यही भाषा कवियों और रचनाकारों की अनुभूति को संप्रेषित करने में समर्थ होती है।  

रिचर्ड्स ने “प्रैक्टिकल क्रिटिसिजम” में ‘अर्थ’ के चार प्रकार हैं :

अभिधार्य / वाच्यार्थ (Sense)- यह वस्तु स्थिति से परिचित कराने वाली शक्ति है।

भाव ( Feeling)- वक्ता की वह भावना जो शब्दों के प्रयोग से व्यक्त करना चाहता है।

स्वर / लहजा (Tone)- टोन के माध्यम से लेखक का श्रोता या पाठक के प्रति दृष्टिकोण प्रकट होता है।

अभिप्राय ­(Intention) – इसके द्वारा वक्ता /लेखक अपना अभिप्राय व्यक्त करता है।

आई. ए. रिचर्ड्स का मूल्य सिद्धांत:

      मूल्य सिद्धान्त को कला का मूल्यवादी सिद्धांत / उपयोगितावादी सिद्धान्त भी कहा जाता है।

      रिचर्ड्स ने ब्रेडले के- “कला कला के लिए है” सिद्धान्त का खण्डन करते हुए “कला व नीति का परस्पर संबंध” स्वीकार किया है।

रिचर्ड्स के अनुसार-

      “एक श्रेष्ठ कला वह है जो मानव सुख की अभिवृद्धि में संलग्न हो, पीड़ितों के उद्धार या हमारी पारस्परिक सहानुभूति के विस्तार से जुड़ी हुई हो, जो हमारे नूतन और पुरातन सत्य का आख्यान करें, जिससे इस भूमि पर हमारी स्थिति और अधिक सुदृढ़ हो, तो वह महान कला होगी।

रिचर्ड्स के अनुसार –

      “सृजन के क्षणों में कलाकार सर्वोत्तम स्थिति में होता है, काव्य की उपयोगिता भी यही है कि पाठक भी उस मानसिक स्थिति के निकट पहुंचे। रिचर्ड्स ने इसे ही काव्य का मूल्यवान रूप माना है।”

      आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने इसे ही “हृदय की रसदशा” कहा है।

विशेष तथ्य:

      रिचर्ड्स ने संप्रेषण और भाषा पर विचार किया और वैज्ञानिक भाषा को अलग माना।

सर्वप्रथम अंग्रेजी साहित्य में पहली बार व्यवस्थित और व्यापक रूप से ‘सौंदर्यशास्त्र’ को रिचर्ड्स ने प्रतिस्थापित ने किया।

      आचार्य रामचंद्र शुक्ल रिचर्ड्स के सिद्धांतों के समर्थक प्रशंसक रहे हैं।

      आई, ए. रिचर्ड्स ने आलोचना को मनोविज्ञान की एक शाखा माना है।

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