फोर्ट विलियम कॉलेज की स्थापना (Fort William College) की स्थापना 10 जुलाई सन् 1800 ई. को तत्कालीन गवर्नर जनरल लॉर्ड वेलेजली के द्वारा की गई थी। इसकी स्थापना का मुख्य उद्देश्य था भारत में आने वाले नए ब्रिटिश व्यापारियों, शासकों और कर्मचारियों को भारतीय रहन-सहन, संस्कृति, भाषा, एवं प्रशासनिक ज्ञान से परिचित करवाना तथा सिविल अधिकारियों को भारतीय भाषा, राजनीति आदि का ज्ञान तथा भाषिक आदान-प्रदान करना था।
फोर्ट विलिम कॉलेज में हिन्दुस्तानी भाषा के प्रोफ़ेसर:
जॉन गिलक्रिस्ट / गिलक्राइस्ट- को 18 अगस्त 1800 ई. को हिन्दुस्तानी भाषा के प्रथम प्रोफ़ेसर के लिए नियुक्त किया गया था। 23 फरवरी 1804 ई. को जॉन गिलक्राइस्ट इस्तीफा देकर इंग्लैंड चले गए।
कैप्टन जेमल मेयर- 6 जनवरी से 1806 ई. से 2 फ़रवरी 1908 ई. तक रहे।
कैप्टन जॉन विलियम टेलर- फ़रवरी 1808 ई. से मई 1823 ई. तक रहे।
मेजर विलियम प्राइज – मई 1823 ई. से दिसंबर 1831 ई. तक रहे। मेजर विलियम प्राइज फोर्ट विलियम कॉलेज के अंतिम अंग्रेज प्रोफ़ेसर थे। मेजर विलियम प्राइज के बाद ‘हिन्दुस्तानी’ भाषा के प्रोफ़ेसर पद को समाप्त कर दिया गया।
24 फ़रवरी 1854 ई. में फोर्ट विलियम कोलेज को बंद कर दिया गया था।
फोर्ट विलियम कॉलेज एवं जॉन गिलक्राइस्ट की देन:
भारतीयों में स्वदेशी भाषाओँ के प्रति जागरूकता पैदा हुई। उन्होंने इस कॉलेज में हिन्दुस्तानी भाषा के प्रोफ़ेसर पद पर रहते हुए निम्नलिखित महत्वपूर्ण कार्य किये। उन्होंने भारतीय विद्वानों से हिंदी और उर्दू में अनेक पुस्तकें तैयार करवायी।
लल्लूलाल के द्वारा – ‘प्रेमसागर’
सदल मिश्र के द्वारा – ‘नासिकेतोपाख्यान’
सिंहासन बत्तीसी, बेताल पचीसी, अभिज्ञानशाकुन्तल आदि रचनाओं का हिंदी अनुवाद करवाया।
हिंदी, उर्दू, हिन्दुस्तानी एवं रेख्ता भाषाओँ को एक ही माना गया
जॉन गिलक्राइस्ट ने खड़ी बोली के निम्नलिखित तीन शैली माने थे-
(i) दरबारी या फ़ारसी शैली (इसमें फारसी शब्दों की प्रधानता थी)
(ii) हिन्दुस्तानी शैली (इसमें हिंदी, फारसी मिश्रित शब्द का प्रयोग था)
(iii) हिंदवी शैली (इसमें तत्सम शब्दों की प्रधानता थी)
> जॉन गिलक्राइस्ट को हिन्दुस्तानी शैली सबसे ज्यादा पसंद थी।
> इसी भाषा को महात्मा गाँधी ने राष्ट्रभाषा बनाने की वकालत की थी।
> हिन्दुस्तानी शैली को जॉन गिलक्राइस्ट ‘द ग्रेट पॉपुलर ऑफ हिन्दुस्तान’ कहते थे।
> कैप्टन विलियम व कैप्टन विलियम प्राइस ने ‘हिंदी अंग्रेजी शब्दकोष’ का निर्माण किया।
> फोर्ट विलियम कॉलेज में हिन्दुस्तानी के स्थान पर हिंदी स्थापित करने का श्रेय विलियम प्राइस को है
> फोर्ट विलियम कॉलेज में हिन्दुस्तानी, उर्दू एवं हिंदी का अध्यापन होता था।
> फोर्ट विलियम कॉलेज में भारत की लगभग सभी भाषाओं की पुस्तकों का अनुवाद कार्य किया जाता था।
जॉन गिलक्राइस्ट ने 19 पुस्तकों की रचना की जिसमे निम्नलिखित प्रमुख है:
1. ए डिक्सनरी इंग्लिश एंड हिन्दुस्तानी – इस पुस्तक के दो भाग हैं
प्रथम भाग- 1787 ई. और दूसरा भाग- 1790 ई. में
2. ए ग्राम ऑफ दी हिन्दुस्तानी लैंग्वेज विद ए सप्लीमेंट (1798 ई.)
3. दि हिंदी मैनुअल (1802 ई.)
4. डॉयलॉग्स इंग्लिस एण्ड हिन्दुस्तानी (1820 ई.)
कैप्टन जॉन विलियम टेलर का योगदान:
जॉन विलियम टेलर सच्चे भारत भक्त थे। इन्हें संस्कृत और भारतीय भाषाओं से बहुत प्रेम था।
इन्होंने कालिदास के ‘अभिज्ञानशाकुन्तलम्’ का 1828 ई. में ‘Impotent of Love’ नाम से अंग्रेजी भाषा में अनुवाद करवाया
‘इंग्लिश एंड हिन्दुस्तानी ग्रामर’ 1022 ई. और ‘अंग्रेजी हिंदी शब्दकोष’ 1831 ई. में तैयार करवाया।
फोर्ट विलियम कॉलेज के भाखा मुंशी: (लल्लूलाल और सदल मिश्र)
लल्लूलाल- भाखा मुंशी (1763 – 1825)
जन्म – 1763 ई., निधन – 1825 ई.
लल्लूलाल 1800 ई. से लेकर 1825 ई. तक फोर्ट विलियम कॉलेज के भाखा मुंशी के पद पर रहें। इन्होंने 1824 ई. में आगरा में संस्कृत प्रेस की स्थापना की
लल्लूलाल की प्रमुख रचनाएँ:
1. सिंहासन बत्तीसी (1799 ई.)
2. बेताल पच्चीसी (1799 ई.)
3. शकुंतला (1802 ई.)
4. माधोनल (1801 ई.)
5. प्रेमसागर या नागरीदशम -(1802 ई.) यह श्रीमद् भगवतपुराण के ‘दशम स्कंद’ का हिंदी अनुवाद है।
6. राजनीति (1809 ई.) ये ‘हितोपदेश’ का ब्रजभाषा में अनुवाद है।
7. भाषा कायदा – यह रचना प्राप्त नहीं है। (यह ब्रजभाषा का अप्रकाशित व्याकरण है।)
8. लातायक-ई-हिंदी नकलियात – 1810 ई. (यह खड़ी बोली, ब्रजभाषा एवं हिन्दुस्तानी भाषाओं में रचित 100 लघु कथाओं का संग्रह है।)
9. सभा विलास – 1813 ई. ( यह पद संग्रह ब्रज, खड़ी बोली में है)
10. माधव विलास 1817 ई. (यह चंपू रचना ब्रज भाषा में है)
11. लाल चंद्रिका (1818 ई.)
12. यह बिहारी सतसई की टीका (ब्रज भाषा में है)
13. जनरल प्रिंसपल ऑफ इन्फलैक्सन कौन्जुगेशन इन द ब्रज भाषा (1811 ई.) यह ब्रज भाषा का व्याकरण है (यह एक मौलिक रचना है शेष सभी रचनाएँ अनुदित या संपादित है)
इस पुस्तक की भूमिका में लल्लूलाल जी ने अपनी रचनाओं की भाषा के तीन रूप माने है।
i. खड़ी बोली ii. ब्रजभाषा iii रेख्ता
आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने लल्लूलाल की भाषा को साफ़ सुथरी नहीं कहा है।
14. ‘जनरल प्रिंसपल ऑफ इनफ्लैक्स्न कौन्जुगेशन इन द ब्रज भाषा’ (1811 ई.)
लल्लूलाल की एकमात्र यही रचना मौलिक है। शेष सभी रचनाएँ अनुदित है।
लल्लूलाल की भाषा संबंधी विशेषताएँ:
> इनपर सबसे अधिक ब्रज भाषा का प्रभाव था। (ब्रजरंजित खड़ीबोली)।
> लल्लूलाल उर्दू भाषा को ‘यामिनी’ भाषा कहते थे और उससे दूर रहने का सलाह देते थे।
> शुक्ल जी ने इनकी भाषा को साफ सुथरी भाषा नहीं कहा है।
> ग्रियर्सन के अनुसार- ‘प्रेमसागर’ की भाषा हिंदी गद्द का स्टैंडर्ड बनी।
> डॉ बच्चन सिंह के अनुसार- ‘प्रेमसागर’ की भाषा ब्रजरंजित एवं शैली पंडिताऊ है।
> ‘लाल चंद्रिका’ की भूमिका में लल्लूलाल ने अपने ग्रंथों की भाषा के तीन भेद दिए हैं – ब्रज, खड़ी बोली, रेख्ते की बोली।
सदल मिश्र- भाखा मुंशी (1767 – 1848 ई.)
जन्म – 1767 ई. ध्रुवीडीह, शाहाबाद, बिहार, निधन – (1848 ई.)
ये फोर्ट विलियम कॉलेज के अस्थाई भाखा मुंशी के पद पर थे।
इनकी भाषा पुरबीपन युक्त थी।
इनकी नियुक्ति 1803 में हुई थी। 1848 ई. तक कार्यरत रहे थे।
सदल मिश्र की प्रमुख रचनाएँ:
1. नासिकेतोपाख्यान या चंद्रावली (1803 ई.)
2. रामचरित (1806 ई.)
3. ‘अध्यात्म रामायण’ का ठेठ बोली या खड़ी बोली में अनुवाद (1807 ई.)
4. हिंदी- पर्शियन वोकेबुलरी (1809 ई.)
भाषा संबंधी विशेषताएँ:
इनकी भाषा में अरबी, फ़ारसी, तत्सम् शब्दों का मिश्रण था।
इनकी भाषा पूर्वीपन तथा पंडिताऊ थी।
शुक्ल जी ने इनकी भाषा को साफ़-सुथरी एवं व्यावहारोपयोगी कहा है।
श्यामसुन्दर दास ने इन चारों गद्द लेखकों में से इंशा अल्ला खाँ के बाद दूसरा स्थान सदल मिश्र को दिया है।”
डॉ बच्चन सिंह के अनुसार -“नासिकेतोपाख्यान पर ब्रजी और भोजपुरी का प्रभाव है, किन्तु सीधे संस्कृत होने के कारण हिंदी की प्रकृति के अनुरूप है।”
फोर्ट विलियम कॉलेज से बाहर के लेखक:
मुंशी सदासुखलाल नियाज
इंशा अल्ला खाँ
राजा लक्षमण सिंह
राजा शिवप्रसाद शितारे ‘हिंद’
रामप्रसाद ‘निरंजनी’
सैययद मुंशी इंशा अल्ला खाँ (1756 – 1817 ई.)
जन्म – 1756 ई., निधन – 1817 ई.
इनकी भाषा- चटकीली, मटकीली, और मुहावरेदार थी।
प्रमुख रचनाएँ:
1. रानी केतकी की कहानी / उदयभान चरित (1803 ई. सर्वमान्य मत है)
यह खड़ी बोली, गद्य में रचित एक प्रेम कथा है।
बच्चन सिंह ने इसे 1800 – 1803 ई. के बीच हिंदी की प्रथम मौलिक गद्य कथा भी कहा है।
2. दरिया-ए-लताफत (1808 ई फ़ारसी में रचित है)
इंशाअल्लाह खाँ के विषय में विशेष तथ्य:
1. इन्होंने अपने भाषा में तीन प्रकार के शब्दों से परहेज रखने का प्रण लिया था-
i. बाहर की बोली के शब्द (अरबी, फारसी, तुर्की)
ii. गँवारू शब्द (ब्रज एवं अवधी भाषा के शब्द)
iii. भाखापन अथार्त (संस्कृत के शब्द)
2. इनकी भाषा ‘तत्सम् शब्द प्रधान’ है।
3. इन्होने हास्य शैली का प्रयोग किया है।
डॉ श्यामसुन्दरदास के शब्दों में – “हिंदी के प्रारंभिक गद्य लेखकों में पहला स्थान सदल मिश्र और तीसरा स्थान लल्लूलाल को मिलाना चाहिए।”
मुंशी सदासुखलाल – (1746 – 1824 ई.)
जन्म – 1745 ई. चुनार (उ. प्र. ), निधन – 1824 ई.
इनकी भाषा- संस्कृत मिश्रित थी।
मुंशी सदासुखलाल नियाज – ये ‘निसार’ उपनाम से उर्दू में रचनाएँ लिखते थे और हिंदी में ‘सुखसागर’ उपनाम से लिखते थे।
सदासुख लाल चुनार में 1793 ई. 1811 ई. तक कंपनी शासन के तहसीदार रहे थे। बाद में सरकारी सेवा से त्याग पत्र देकर वे प्रयागराज चले गए।
प्रमुख रचनाएँ:
1. ‘मुंतखबुत्तवारीख'(1818 ई.)इसमें उन्होंने अपना संक्षिप्त जीवन परिचय लिखा है।
2. ‘सुखसागर’ (इसमें विष्णुपुराण की कथाओं का अनुवाद है)
3. ‘बुद्धि प्रकाश’ (हिंदी पत्र) इस पत्र का संपादन आगरा से किया।
4. नुरू बाजार (उर्दू पत्र)
5. ‘सुरासुर निर्णय’ (1782 ई.) यह निबंध है।
इनकी भाषा में तत्सम् शब्दों की प्रधानता थी।
नियाज के प्रसिद्ध कथन:
“भाखापन हिन्दुस्तान की विशेषता है और यह बना रहना चाहिए।”
“रस्मों-रिवाज भाषा का दुनिया से उठ गया।”