हालावादी अप्रतिम कवि : हरिवंश राय बच्चन

भावुकता अंगूर लता से खींच कल्पना की हाला,

कवि साक़ी बनकर आया है, भरकर कविता की प्याला;

कभी न कण भर खाली होगा, लाख पिएँ, दो लाख पिएँ

पाठक गण हैं पीनेवाले, पुस्तक मेरी मधुशाला!!

आधुनिक काव्य में ‘हालावाद’ : आधुनिक काल में एक नई विचारधारा ‘हालावाद’ के प्रवर्तक हरिवंशराय राय बच्चन थे। हिन्दी साहित्य में ‘हालावाद’ की शुरुआत छायावाद के बाद शुरू हुई थी। इन कविताओं में व्यक्तिकता की प्रधानता रही है। हालावाद के कवि सभी को भूलाकर अपने प्रेम-रूपी सागर में डूबकी लगाते रहे।

बच्चन जी ‘उमर खैय्याम’ के जीवन-दर्शन से बहुत प्रभावित रहे। ‘उमर खैय्याम’ की प्रसिद्ध कृति मधुशाला की रुबाइयों से प्रेरित होकर ही ‘मधुशाला’ लिखी गई थी। मधुशाला को खूब प्रसिद्धि मिली और बच्चन काव्य प्रेमियों में लोकप्रिय हो गए। कवि ने अपना परिचय इन पंक्तियों के द्वारा दिया है:

मिट्टी का तन मस्ती का मन…

संसृति की नाटकशाला में

है पड़ा तुझे बनना ज्ञानी

है पड़ा तुझे बनना प्याला  

होना मदिरा का अभिमानी

संघर्ष यहाँ कितना किससे

यह तो सब खेल तमाशा है

वह देख, यवनिका गिरती है

समझा, कुछ अपनी नादानी!

छिप जाएँगे हम दोनों ही

लेकर अपने-अपने आशय

मिट्टी का तन, मस्ती का मन

क्षणभर, जीवन मेरा परिचय। (पृष्ठ संख्या –

‘हाला’ का शाब्दिक अर्थ होता है – मद, मदिरा, आसव, शराब, वारुणी, सुरा, मधु, सोम आदि। किन्तु बच्चन जी ने अपनी कविताओं में इसे प्रियतम, गंगाजल, हिमजल, सुख का अभिराम स्थल, जीवन का कठोर सत्य, क्षणभंगुरता आदि अनेक प्रतीकों के रूप में प्रयोग किया है। हालावादी काव्य का संबंध ईरानी साहित्य से है, जिसका भारत में आगमन अनुदित साहित्य के माध्यम से हुआ।

हिन्दी शब्दकोष के अनुसार- “साहित्य, विशेषतः काव्य की वह प्रवृति या धारा है, जिसमे ‘हाला’ या ‘मदिरा’ को वर्ण्य विषय मानकर काव्य रचना हुई हो।”

बच्चन की पहला विवाह श्यामा देवी से हुआ था। उस समय वे बच्चन 19 वर्ष के थे  और श्यामा देवी 14 वर्ष की थी। दुर्भाग्यवश उनकी यह जोड़ी अधिक समय तक नहीं रही। शादी के कुछ वर्षों बाद ही उनकी पत्नी श्यामा देवी का स्वर्गवास हो गया। पहली पत्नी के निधन के पाँच वर्ष बाद उन्होंने दूसरा विवाह तेजी बच्चन से किया।  

हालावादी कविता को अन्य कई नामों से जाना जाता है

  • नव्य-स्वछंदतावाद, उन्मुक्त प्रेमकाव्य, प्रेम और मस्ती के काव्य आदि।
  • हरिवंशराय को अन्य कई नामों से जाना जाता है। प्रबंध शिरोमणि, क्षयी रोमांस का कवि, प्रेम और रोमांस का कवि, आत्मानुभूति का कवि, मस्ती का कवि आदि।
  • इन्होंने अपनी आजीविका 1932 ई० में ‘पायोनियर’ के संवाददाता के रूप में शुरू किया। यहीं से इनका झुकाव कविता में शुरु हुआ।    
  • इनका जन्म 27 नवंबर (1907 ई०) इलाहबाद, उ.प्र में हुआ।
  • उनका निधन 18 जनवरी 2003 ई० को मुंबई में हुआ। शायद इस बात का उन्हें आभास हो रहा था कि जीवन का अन्तिम पड़ाव बहुत निकट आ गया है। निधन से पहले उन्होंने अपनी पत्नी से कहा कि मैं (बच्चन) अब अपने चिर निद्रा में सोने वाला हूँ।

उन्होंने अपनी पत्नी से कहा –

“इस पार प्रिय मधु है, तुम हो, उस पार न जाने क्या होगा!

यह चाँद उदित होकर नभ में कुछ ताप मिटाता जीवन का,

लहरालहरा ए शाखाएँ कुछ शोक भुला देती मन का,

कल मुर्झानेवाली कलियाँ हँसकर कहती हैं मगन रहो

बुलबुल तरु की फुनगी पर से संदेश सुनाती यौवन का,

तुम देकर मदिरा के प्याले मेरा मन बहला देती हो

उसपार मुझे बहलाने का उपचार न जाने क्या होगा !

इस पार, प्रिय मधु है तुम हो उस पार न जाने क्या होगा ! 

जीवन का अंत समीप महसूस हो गया था लेकिन वे अभी मरना नहीं चाहते थे। वे अपनी पत्नी से कहते हैं कि मैं ऊपर नहीं जाना चाहता हूँ – 

जग में रस की नदियाँ बहती, रसना दो बूंदें पाती है,

जीवन की झिलमिलसी झाँकी नैनों के आगे आती है,

स्वर लतामायी वीणा बजली, मिलती है बस झंकार मुझे,

मेरे सुमनों की गंध कहीं यह वायु उड़ा ले जाती है !

ऐसा सुनता, उस पार प्रिय, ये साधन भी छिन जाएँगे,

तब मानवता की चेतनता का, आधार न जाने क्या होगा !

इस पार प्रिय मधु है तुम हो उस पार जाने क्या होगा !

मधुशाला, मधुबाला और मधुकलश ये तीनों रचनाएँ हरिवंश राय की ‘त्रिवेणी’ हैं।

मधुशाला – यह वह शाला है, जहाँ बैठकर मदिरा ग्रहण की जाती है।

मघुबाला – यह वह पात्र है, जो मदिरालय में मदिरा परोसती है।

वह कहती है-

मैं मधुबाला मधुशाला की,

मैं मधुशाला की मधुबाला !

मैं मधु विक्रेता को प्यारी,

मधु के घट मुझ पर बलिहारी,

प्यालों की मैं सुषमा सारी,

मेरा दुःख देखा करती है

मधु-प्यासे नयनों की माला

मैं मधुशाला की मधुबाला !

मधुकलश – यह वह पात्र है, जिसमे मदिरा रखी जाती है-

    है आज भरा जीवन मुझमे, है आज भरी मेरी गागर !

प्रेम और मस्ती के इस काव्य में जीवन के प्रति किसी व्यापक दृष्टि का आभास नहीं  मिलता है लेकिन सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि रचनाकार ने जीवन में एक ऐसी प्रेम की भावना पर बल दिया है, जिसमे न अध्यात्मिक अमूर्तता है और न ही लौकिक संकीर्णता। मधुशाला, मधुकलश और मधुबाला, मदिरालय, प्याला आदि प्रतीकों के माध्यम से रचनाकार  ने एक धर्मनिरपेक्ष और जीवन सापेक्ष दृष्टिकोण को लोकप्रिय बनाने का प्रयास किया है।

बच्चन जी ने प्रेम के महत्व पर प्रकाश डालते हुए ‘मिलन यामिनी’ में लिखा है-

यदि प्रणय जगा न होता इस निशा में

सुप्त होती विश्व की संपूर्ण सत्ता

वह मरण की नींद होती जड़ भयंकर

और उसका टूटना होता असंभव

प्यार से संसार सोकर जागता है

इसलिए है प्यार की जग में महत्ता

हालावाद काव्य पर विद्वानों के महत्वपूर्ण कथन:

  • डॉ रामदरश मिश्र के शब्दों में- “व्यक्तिवादी कविता का प्रमुख स्वर निराशा का है, अस्वाद का है, थकान का है, टूटन का है, चाहे किसी भी परिप्रेक्ष्य में हो।”
  • डॉ बच्चन सिंह के शब्दों में- इन्होंने हालावाद को “प्रगति प्रयोग का पूर्वाभास” कहा है।
  • सुमित्रानंदन पंत के शब्दों में- “मधुशाला की मादकता अक्षय है।”
  • पंत जी कहते हैं – “मधुशाला में हाला, प्याला, मधुबाला और मधुशाला के चार प्रतीकों के माध्यम से कवि अनेक क्रांतिकारी, मर्मस्पर्शी, रागात्मक एवं रहस्यमय भावों को वाणी दी है।”
  • हजारी प्रसाद द्विवेदी के शब्दों में- “मस्ती, उमंग और उल्लास की कविता” है।
  • डॉ नगेन्द्र ने हालावादी कविता को वैयक्त्तिक कविता कहा है “वैयक्त्तिक कविता छायावाद की अनुजा और प्रगतिवाद की अग्रजा है।”

हालावादी काव्य पर फ़ारसी-साहित्य का प्रभाव लक्षित होता है। फ़ारसी के हालावादी साहित्य में ‘उमरखैयाम’ का नाम विश्व प्रसिद्ध है। ‘फिट्जराल्ड’ ने उनकी रुबाइयों का अंग्रेजी में अनुवाद किया था। बच्चन जी ने इसी अनुवाद के आधार पर ‘उमरखैयाम की मधुशाला’ और अपनी ‘मधुशाला’ लिखी थी।

हरिवंशराय बच्चन ‘हालावाद’ के प्रवर्तक माने जाते हैं। हिन्दी साहित्य में हालावाद का प्रचलन बच्चन से ही माना जाता है, किन्तु हालावाद का नामकरण करने का श्रेय रामेश्वर शुक्ल अंचल को प्राप्त है।

हरिवंशराय बच्चन भारत के दूसरे व्यक्ति थे, जिन्होंने कैंब्रिज से अंग्रेजी भाषा में डॉक्टरेट किया था। उन्हें 20वीं शदी का प्रसिद्ध और नवीनतम कवि होने का ख्याति प्राप्त है। इलाहबाद विश्वविद्यालय से उन्हें कूल 42 शब्दों की लिस्ट में ‘भूतकाल का गर्वित छात्र’ सम्मान भी प्राप्त है।

बच्चन जी ने कविताओं के साथ-साथ फिल्मों के लिए भी रचनाएँ लिखी ये रचनाएँ गीत और डायलॉग के रूप में है-

फिल्म सिलसिला के लिए उन्होंने गीत- “रंग बरसे भींगे चुनर वाली रंग बरसे” लिखा।

फिल्म आलाप के लिया उन्होंने गीत लिखा- “कोई गाता मैं सो जाता”।

 हालावाद के प्रमुख कवि – हरिवंशराय बच्चन, भगवती चरण वर्मा, रामेश्वर शुक्ल  ‘अंचल’ और नरेंद्र शर्मा आदि हैं।

भगवती चरण वर्मा

समय: (1909 – 1980 ई००)

प्रमुख रचनाएँ- मधुवन, प्रेमगीत, मानव, त्रिपथगा, विस्मृति के फूल।

भगवती चरण वर्मा की कृतियों में उनके हृदय की मस्ती का पूर्ण परिचय मिलता है। उन्होंने छायावादी रहस्यात्मकता का परित्याग कर पाठकों के सामने प्रेम, मस्ती और उल्लास भरे गीतों को प्रस्तुत किया। उनकी दीवानगी ‘मधुकर’ और ‘प्रेम संगीत’ में दिखाई पड़ता है। उनकी कृतियों में किसी तरह की मिलावट नहीं है। यह जीवन के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण का परिणाम है। आगे बढ़ना और बढ़ते चले जाना। परन्तु इस भाव-दृष्टि की सीमा यह है कि कवियों के सामने यह स्पष्ट नहीं है कि जीवन का लक्ष्य क्या है। भगवतीचरण वर्मा की यह कविता इस भावना को सशक्त ढंग से व्यक्त करती है-

हम दीवानों की क्या हस्ती,

आज यहाँ, कल वहाँ चले।

मस्ती का आलम साथ चला,

हम धूल उड़ाते जहाँ चले,

आए बनकर उल्लास अभी,

आँसू बनकर बह चले अभी,

सब कहते ही रह गए, अरे,

तुम कैसे आये, कहाँ चले?

रामेश्वर शुक्ल ‘अंचल’:

समय: (1915 – 1969 ई०)

प्रमुख काव्य रचनाएँ- मधुकर, मधुलिका, अपराजिता किरणबेला, लाल-चुनर, करील, वर्षान्त के बादल, इन आवाजों को ठहरा लो आदि।

रामेश्वर शुक्ल ‘अंचल’ की रचनाओं में मांसलवाद का प्रवर्तन हुआ है। उनकी मधुकर, अपराजिता, किरणबेला, लालचूनर, करील जैसी रचनाओं में वासनामय प्रेम से ऊपर उठकर आध्यात्म का आवरण डालने का प्रयत्न हुआ है। अंचल ने तृष्णा को जीवन का सत्य माना और लिखा है- “चिर तृष्णा में प्यासे रहना, मानव का संदेश यही है”  

नरेंद्र शर्मा

समय: (1913 – 1989 ई०)

प्रमुख काव्य रचनाएँ- प्रभातफेरी, प्रवासी के गीत, पलाश वन, मिट्टी और फूल, शूलफूल, कर्णफूल, कामिनी, हंसमाला अग्निशस्य रक्तचन्दन, द्रोपदी उत्तरजय है।

नरेंद्र शर्मा के काव्य में रोमांस के साथ-साथ निराशा और दुःख भी है। उन्होंने स्वयं को मानवीय दुर्बलताओं का कवि कहा है।

शिवदान सिंह चौहान ने हालावाद के विषय में लिखा है– “प्रसाद, पंत, निराला और महादेवी ने व्यक्ति के सुख-दुःख, उल्लास-निराशा की अनुभूति, प्रणव और विषयी प्रधान अभिव्यंजना करते हुए भी जिन नए मानव मूल्यों की सृष्टि की थी, कविता का जिन नई  अर्थ भूमियों पर प्रसार किया था और काव्य की अंतःस्वर में मानववादी उदात्तता की जो गरिमा भर दी थी, अंचल तक आते-आते उन मानव मूल्यों, अर्थ-भूमियों और अंतःस्वर की उदात्तता का संपूर्ण विघटन हो गया तथा छायावादी कविता का दायरा संकीर्णतर होता चला गया। छायावादी काव्य में उत्कर्ष और हास की या प्रक्रिया हिन्दी कविता के विकास-क्रम की एक कड़ी है।”

हिन्दी साहित्य में ‘हालावाद’ की प्रासंगिकता आज भी बरकरार है। बच्चन, भगवतीचरण वर्मा, नरेंद्र शर्मा आदि ने जो धारा प्रवाहित किया वह आज भी सतत प्रवाहित है। आधुनिक कवियों में केदारनाथ अग्रवाल के काव्य में भी यह प्रेम-रस भरपूर मात्रा में मिल जाता है। वे यथार्थ के धरातल पर रहकर भी प्रेम की दुनिया में डूबे नजर आते हैं। केदारनाथ अग्रवाल की एक कविता में प्रेम का उन्मत्त रूप और अमरता दोनों है;

“हम न रहेंगे तब भी तो रति रंग रहेंगे

लाल कमल के साथ पुलकते मृग रहेंगे मधु के दानी,

मोद मनाते, भूतल के रससिक्त बनाते,

लाल चुनरिया में लहराते अंग रहेंगे।”

मेरी समझ से मधुशाला के एक-एक पंक्ति में ज्ञान के रहस्य हैं। इसमें 139 रुबाइयां है। हिन्दी साहित्य में इस नई भूमिका के अग्रणी कवि हरिवंश राय बच्चन की अनुपस्थिति उनके प्रशंसकों के बीच हमेशा महसूस की जाएगी। उनकी श्रद्धांजलि में निम्न चार पंक्तिया मधुशाल के तर्ज पर हमने लिखी है जो हमारी भावनाओं को स्पष्ट करती हैं –

मधुकलश को खाली कर, छोड़ गए तुम मधुशाला

चिर निंद्रा में चले गए तुम, सुनि करके मधुशाला

स्वर्ग लोक में रम नहीं जाना, पीकर के तुम हाला

लौट आओ फिर से तुम, लेकर अपनी मधुशाला।

हालावाद हिन्दी साहित्य के विकास की कड़ी में एक खास अंग बन गया और यह अंग आज भी उपस्थित है। 1933 ई० में बनारस विश्वविद्यालय के शिवाजी हॉल के मंच से पहली बार हरिवंशराय बच्चन के द्वारा मधुशाला पढ़ी गई। उस समय के ‘मधुशाला’ और आज के मधुशाला के ‘नशा’ में रत्ती भर भी कमी नहीं आई है। हिन्दी भाषा ने कई उतार चढ़ाव देखे लेकिन इन सभी उतार चढ़ाव के बीच मधुशाला सिपाही की तरह बनी रही और सबके मन में बसी रही।

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