शब्द-भेद (Parts Of Speech)

विकार की दृष्टि से शब्दों के भेद

विकार की दृष्टि से शब्दों के दो भेद होते हैं – (अ) विकारी शब्द और (आ) अविकारी शब्द

(अ) विकारी शब्द के चार प्रकार होते हैं- संज्ञा, सर्वनाम, विशेषण और क्रिया।

(आ) अविकारी शब्द के भी चार प्रकार होते हैं- क्रिया विशेषण, सम्बन्ध बोधक, समुच्चय बोधक और विस्मयादि बोधक

प्रयोग के अनुसार शब्दों के भेद

प्रयोग के अनुसार शब्दों के आठ भेद होते हैं-

(अ) विकारी शब्द: 1. संज्ञा 2. सर्वनाम 3. विशेषण 4. क्रिया

(आ) अविकारी शब्द: 5. क्रियाविशेषण 6. सम्बन्ध बोधक 7. समुच्चय बोधक 8. विस्मयादि बोधक

  1. संज्ञा (Noun) – किसी भी व्यक्ति, वस्तु, स्थान, जाति, गुण, और भाव को संज्ञा कहते हैं। जैसे- राम, श्याम, आम, मिठास, गाय, पटना, दिल्ली आदि।

संज्ञा के पाँच भेद होते हैं।

(क) व्यक्तिवाचक संज्ञा (Proper noun) जिस संज्ञा शब्द से किसी विशेष व्यक्ति, स्थान या वस्तु के नाम का बोध होता हैं, उसे व्यक्तिवाचक संज्ञा कहते हैं जैसे-

विशेष व्यक्ति- लालबहादुर शास्त्री, महात्मा गांधी आदि

विशेष स्थान- काशी, पटना, दिल्ली, आदि

विशेष वस्तु- ताजमहल, लालकिला, शालीमार आदि

(ख) जातिवाचक संज्ञा  (Common noun) जिस संज्ञा शब्द से किसी सम्पूर्ण जाति या समुदाय का बोध होता है, उसे जातिवाचक संज्ञा कहते हैं जैसे- पर्वत, मनुष्य, नदी, आदि।

(ग) समूहवाचक संज्ञा  (Collective noun) जिस संज्ञा शब्द से किसी एक व्यक्ति का बोध नहीं होकर पूरे समाज, समूह या समुदाय का बोध होता है, उसे समूह वाचक संज्ञा कहते है जैसे- कक्षा, सेना, संगठन, दल आदि।

(घ) द्रव्यवाचक संज्ञा और (Material noun) जिस संज्ञा शब्द से किसी धातु, द्रव्य या नापने-तौलने के वस्तुओं आदि का बोध होता है, उसे द्रव्यवाचक संज्ञा कहते है जैसे- सोना, लोहा, दूध, तेल, घी आदि।

(ङ) भाववाचक संज्ञा- (Abstract noun) जिस संज्ञा शब्द से किसी वस्तु या पदार्थ में पाए जाने वाले उसके धर्म, गुण, भाव, दशा आदि का बोध होता है, उसे भाववाचक संज्ञा कहते है जैसे- मिठाई, बुराई, भय, दया आदि।

  1. सर्वनाम (pronoun)

सर्वनाम– संज्ञा के स्थान पर प्रयोग होने वाले शब्द को सर्वनाम कहते हैं। हिन्दी में प्राय: ग्यारह सर्वनाम का प्रयोग किया जाता हैं, जो इस प्रकार हैं- मैं, तू, आप, यह, वह, सो, जो, कोई, कुछ, कौन, क्या।

2.1. प्रयोग के अनुसार सर्वनाम के छह भेद हैं-

(क) पुरुषवाचक सर्वनाम- जब हम किसी से बातचीत करते हैं या लिखते हैं तब केवल तीन व्यक्तियों का ही उल्लेख होता है। एक ‘बोलने’ वाला, दूसरा ‘सुनने’ वाला या ‘श्रोता’ और तीसरा ‘जिसके बारे में बातचीत’ करते हैं। इन तीनों प्रकार के व्यक्तियों को व्याकरण की शब्दावली में ‘पुरुष’ कहा जाता है। अथार्त जो सर्वनाम बोलने वाला, सुनने वाला और जिसके विषय में कुछ कहा जाए, इन तीनों पुरुषों के स्थान पर प्रयुक्त होता है, उसे ‘पुरुषवाचक सर्वनाम’ कहते हैं।

पुरुषवाचक सर्वनाम के तीन प्रकार हैं-

(i) उत्तम पुरुष- बोलने वाला अपने लिए जिस सर्वनाम का प्रयोग करता है, उसे ‘उत्तम पुरुष’ कहते है। जैस- ‘मैं’ पुस्तक पढता हूँ। ‘हम’ पाठशाला जायेंगे। यहाँ ‘मैं’ तथा ‘हम’ उत्तम पुरुष सर्वनाम है।

(ii) मध्यम पुरुष- सुनने वाला व्यक्ति के लिए जिस सर्वनाम का प्रयोग किया जाता है, उसे ‘मध्यम पुरुष सर्वनाम’ कहते हैं। जैसे- ‘तू’ अच्छा लड़का है। ‘तुम’ कविता याद कर लो। ‘आप’ के दर्शन दुर्लभ हैं।  यहाँ ‘तू’, ‘तुम’ तथा ‘आप’ मध्यम पुरुष सर्वनाम है।

(iii) अन्य पुरुष- ‘वक्ता’ और ‘श्रोता’ को छोड़कर जब किसी अन्य व्यक्तियों के लिए जिस सर्वनाम का प्रयोग किया जाता है, उसे ‘अन्य पुरुष सर्वनाम’ कहते हैं।

जैसे- श्याम ने उत्तर दिया ‘वह’ मेरा साथी है। उनसे कहो- ‘वे’ घुमने चले जाएँ। यहाँ ‘वह’ तथा ‘वे’ अन्य पुरुष सर्वनाम है।

(ख) निश्चयवाचक सर्वनाम- वे सर्वनाम जो किसी दूर या निकट के व्यक्ति, वस्तु की निश्चितता का बोध कराता है उसे ‘निश्चयवाचक सर्वनाम’ कहते हैं। जैसे- पास के लिए ‘यह’, दूर के लिए ‘वह’ का प्रयोग किया जाता है।

(ग) अनिश्चयवाचक सर्वनाम- जिस सर्वनाम से किसी निश्चित वस्तु अथवा प्राणी का बोध नहीं होता है, तब उसे अनिश्चयवाचक सर्वनाम कहते है। जैसे- आपको बाहर ‘कोई’ व्यक्ति बुला रहा है। उसे ‘कुछ’ दे दो।

(घ) सम्बन्धवाचक सर्वनाम- जो सर्वनाम एक बात का दूसरी बात के साथ संबन्ध प्रकट करता है, उसे सम्बन्धवाचक सर्वनाम कहते हैं। जैसे- ‘जो’ हुआ ‘सो’ हुआ। ‘जो’ बोया ‘सो’ काटा। ‘जो’ करेगा ‘सो’ भरेगा आदि।

(ङ) प्रश्नवाचक सर्वनाम- जिस सर्वनाम से किसी प्रकार के प्रश्न का बोध होता है, उसे प्रश्नवाचक सर्वनाम कहते हैं। जैसे- ‘क्या’ बात है? ‘कौन’ जा रहा है? आदि। यहाँ पर ‘कौन’ शब्द का प्रयोग जीवधारियों के लिए और ‘क्या’ शब्द का प्रयोग निर्जीव पदार्थो के लिए किया जाता है।

(च) निजवाचक सर्वनाम- जिन सर्वनाम शब्दों का प्रयोग ‘अपने आप’ यानी ‘स्वयं’ के लिए किया जाता है, उसे निजवाचक सर्वनाम कहते हैं। जैसे- यह काम मैं ‘अपने आप’ कर लूंगी। मैं यह काम ‘स्वयं’ कर लूँगा।

  1. विशेषण(Adjective)

विशेषण- जो शब्द संज्ञा तथा सर्वनाम की विशेषता बताते हैं, उसे विशेषण कहते हैं। वह ‘विशेषण’ जो किसी शब्द की ‘विशेषता’ को प्रकट करता है, उसे ‘विशेष्य’ कहते है। जैसे- बालक बहुत ‘सुन्दर’ है। फल बहुत ‘मीठा’ है। सीता के बाल ‘लम्बे’ हैं आदि। इन वाक्यों में ‘मीठा’, ‘सुन्दर’ और ‘लम्बे’ शब्द विशेषण हैं तथा ‘फल’ ‘बालक’ और ‘बाल’ विशेष्य हैं।

विशेष्य के साथ विशेषण का प्रयोग दो प्रकार से होता है।

विशेष्य के पहले विशेषण का प्रयोग। इसे विशेष्य-विशेषण कहते हैं।

जैसे- मैंने ‘लाल’ घोडा देखा। मैंने ‘मीठा’ फल खाया।   

विशेष्य के बाद अथवा क्रिया से पहले विशेषण का प्रयोग। इसे ‘विधेय-विशेषण’ कहते हैं।

जैसे- राम का भाई ‘छोटा’ है। मुझे चाँद ‘सुन्दर’ लगता है।

विशेषण के चार भेद होते हैं-

(क) गुणवाचक विशेषण-(Adjectives of Quality )  जिस शब्द से किसी पदार्थ के गुण, दोष, रंग, आकार आदि का बोध होता है, उसे गुणवाचक विशेषण कहते हैं। जैसे-

विशाल, समुन्द्र, पुराना वस्त्र, लाल महल, लोभी मानव आदि।

रंग- लाल, हरा, नीला, पीला, काला, सफेद आदि।

आकर- गोल, चौकोर, नुकीला, सुडौल, सुन्दर आदि।

स्थान- ऊँचा, नीचा, लम्बा, चौड़ा, बाहरी, भीतरी आदि।

समय- नया, पुराना, पिछला, अगला, आगामी आदि।

दशा- पतला, दुबला, मोटा, पतला, निर्धन, रोगी आदि।

गुण- दानी, दयालु, वीर, शांत, भला, आदि।

दोष- लोभी, पापी, बुरा, दुष्ट, नीच आदि।

(ख) परिमाणवाचक विशेषण (Adjectives of Quantity) – जिस शब्द से किसी पदार्थ के परिमाण यानी नाप-तोल का बोध होता है, उसे परिमाणवाचक विशेषण कहते हैं। जैसे- ‘थोड़ा’ पानी, ‘बहुत’ दूध आदि। यहाँ पर थोड़ा और बहुत दोनों विशेषण है। जो दूध और पानी के परिमाण को बतलाता है। परिमाणवाचक विशेषण के दो भेद हैं-

     (i) निश्चित परिमाणवाचक विशेषण- जिस शब्द से निश्चित मापतोल का बोध होता है उसे निश्चित परिमाणवाचक विशेषण कहते हैं। जैसे- बीस एकड़ भूमि, दो तोला सोना आदि।

     (ii) अनिश्चित परिमाणवाचक विशेषण- जिस शब्द से किसी अनिश्चित माप-तोल का बोध होता है उसे अनिश्चित परिमाणवाचक विशेषण कहते हैं। जैसे- बहुत दूध, थोडा घी, कुछ सोना आदि।

(ग) संख्यावाचक विशेषण (Numeral Adjectives) जिस शब्द से पदार्थो कि संख्या का बोध होता है उसे संख्यावाचक विशेषण कहते हैं। जैसे- दस लड़के, पाँच कवि, तीसरी गली आदि।

संख्यावाचक विशेषण भी दो प्रकार के होते हैं-

     (i) निश्चित संख्यावाचक विशेषण- जिस शब्द से निश्चित संख्या का बोध होता है, उसे निश्चित संख्यावाचक विशेषण कहते हैं। जैसे- चार औरतें, पाँच लड़कियाँ, पहला कमरा, दो लडकें आदि।

     (ii) अनिश्चित संख्यावाचक विशेषण- जिस शब्द से अनिश्चित संख्या का बोध होता है, उसे अनिश्चित संख्यावाचक विशेषण कहते हैं। जैसे- सभी लड़के, कुछ लड़कियाँ, बहुत पंक्षी आदि।

(घ) निर्देशक या सार्वनामिक विशेषण- ( Demonstrative Adjectives) वे विशेषण जो किसी व्यक्ति या वस्तु के विषय में संकेत या निर्देश का बोध कराता है, उसे निर्देशक या सार्वनामिक विशेषण कहते हैं। ये निर्देशक या संकेत करने वाले शब्द सर्वनाम ही होते हैं। अतः इसका नाम सार्वनामिक विशेषण है। जैसे- यह बालक पाठशाला में पढता है। वह पुस्तक मेरे घर पड़ी है। इनमे ‘यह’ और ‘वह’ सर्वनाम है। ‘बालक’ और ‘पुस्तक’ विशेषण बनकर आयें है। अतः ये सार्वनामिक विशेषण कहलाते है।

  1. क्रिया (Verb)

क्रिया की परिभाषा- जिस शब्द से किसी कार्य का करने या होने का बोध होता है, उसे क्रिया कहते हैं। जैसे- खाना, पढ़ना, लिखना, चलना, सोना आदि। क्रिया एक विकारी शब्द है, जिसका  रूप लिंग, वचन और पुरुष के अनुसार बदलते रहता है। क्रिया के मूल रूप को धातु कहते हैं, अर्थात जिन मूल अक्षरों से क्रियाएँ बनती है, उन्हें धातु कहते हैं; जैसे- पढ़ (मूल धातु ) + ना (प्रत्यय)। अतः पढ़ में ना प्रत्यय लगाकर बना ‘पढ़ना’। क्रिया के कुछ उदहारण: मोहन पढ़ता है। राम चलता है। घोड़ा दौड़ता है। दिए गए वाक्यों में पढ़ता है, चलता है, दौड़ता है आदि शब्दों से किसी काम के करने या होने का बोध हो रहा है। इसलिए ये शब्द क्रिया कहलायेंगे।

क्रिया के दो भेद होते हैं – (क) अकर्मक क्रिया और (ख) सकर्मक क्रिया

(क) अकर्मक क्रिया- (Intransitivi verb) जिस क्रिया का असर ‘कर्ता’ पर ही पड़ता है और उस वाक्य में ‘कर्म’ नहीं हो, उसे अकर्मक क्रिया कहते हैं। अकर्मक क्रिया को कर्म की आवश्यकता नहीं होती है। जैसे- राकेश रोता है। बस चलती है। मछली तैरती है। पूजा हंसती है। दिए गए उदाहरणों में हम देख सकते हैं कि इन वाक्यों में ‘कर्म’ का अभाव है और क्रिया का फल कर्ता पर ही पड़ रहा है। अतः यह अकर्मक क्रिया के उदहारण हैं।

(ख) सकर्मक क्रिया- (Transitive Verb) जिस क्रिया का असर कर्ता पर नहीं बल्कि ‘कर्म’ पर पड़ता है, उसे सकर्मक क्रिया कहते हैं। जैसे- मैं कहानी लिखता हूँ। राम फल खाता है। रमेश स्कूल जाता है। मीरा फूल लाती है आदि। इन उदाहरणों में क्रिया का फल कर्ता पर नहीं पड़के ‘कर्म’ पर पड़ रहा है। इसलिए इसे सकर्मक क्रिया कहते हैं।

क्रिया विभाजन के दो आधार हैं  – कर्म के आधार पर और रचना के आधार पर

(अ) कर्म के आधार पर क्रिया के तीन भेद होते हैं

(क) सहायक क्रिया

(ख)  पूर्णकालिक क्रिया

(ग) द्वीकर्मक क्रिया

 (क) सहायक क्रिया – सहायक क्रिया मुख्य क्रिया के साथ प्रयुक्त होकर वाक्य के अर्थ को स्पष्ट एवं पूर्ण करता है। जैसेमोहन अख़बार पढ़ चुका है। उषा खाना बनाने लगी इन वाक्यों में मुख्य क्रियापढ़तथाबनानेके साथ ‘चुका’ और ‘लगी’ सहायक क्रिया जुड़ी है।

 (ख) पूर्णकालिक क्रिया- जब कर्ता के द्वारा एक क्रिया को पूर्ण करने के बाद दूसरी क्रिया   संपन्न होती है। तब पहले वाली क्रिया को पूर्ण कालिक क्रिया कहते हैं। जैसे- मोहन खाना ‘खाने’ के बाद ‘खेलता’ है। यहाँ ‘खाने’ (पूर्ण कालिक क्रिया) के बाद ‘खेलता’ है।

(ग)  द्वीकर्मक क्रिया- जिस क्रिया के साथ दो कर्म होते हैं, उसे द्वीकर्मक क्रिया कहते हैं। द्वीकर्मक का अर्थ होता है, दो कर्मो से युक्त होना। सकर्मक क्रियाओं में एक साथ दो कर्म होते हैं, वे द्वीकर्म सकर्मक क्रिया कहलाते हैं। द्वीकर्मक क्रिया में एक कर्म मुख्य होता है, तथा दूसरा गौण या आश्रित होता है। ‘मुख्य’ कर्म क्रिया से पहले तथा ‘गौण’ कर्म के बाद आता है। मुख्य कर्म अप्रणीवाचक होता है, जबकि गौण कर्म प्राणीवाचक होता है। इसमें गौण कर्म के साथ ‘को’ विभक्ति का प्रयोग किया जाता है, जो कई बार अप्रत्यक्ष भी हो सकता है। जैसे- राम ने राहुल को थप्पड़ मारा। सोहन ने श्याम को खाना खिलाया। शिक्षक ने छात्रों को हिन्दी सिखाया।

(आ) रचना के आधार पर क्रिया के भेद- रचना के आधार पर क्रिया के पांच भेद होते हैं –

  • (क) सामान्य क्रिया
  • (ख) संयुक्त क्रिया
  • (ग) नामधातु क्रिया
  • (घ) प्रेरणार्थक क्रिया
  • (ङ) पूर्वकालिक क्रिया
  • (क) सामान्य क्रिया जब किसी वाक्य में केवल एक क्रिया का प्रयोग होता है, तब उसे सामान्य क्रिया कहते हैं। जैसे- तुम खेलो। मोहन पढ़ा। नीतू गई आदि।

(ख) संयुक्त क्रिया- दो या दो के मेल से बनी क्रियाएँ संयुक्त क्रिया कहलाती हैं। दो या दो से अधिक क्रियाएँ जब किसी एक पूर्ण क्रिया का बोध कराती है, तब उन्हें संयुक्त क्रिया कहते हैं। संयुक्त क्रिया में पहली क्रिया मुख्य होती है तथा दूसरी क्रिया ‘रंजक क्रिया’ (सहायक क्रिया) होती है। रंजक क्रिया मुख्य क्रिया के साथ जुड़कर अर्थ में विशेषता लाती है। जैसे- मोहन नाचने लगा। उसने काम कर लिया। वह घर पहुँच गया। वह खा चुका आदि। इन वाक्यों, मैं नाचने लगा, कर लिया, खा चुका। इन शब्दों को संयुक्त क्रिया कहते हैं। इनमे दो क्रियाओं का योग है। इसमें पहली क्रिया मुख्य और दूसरी क्रिया सहायक क्रिया है, जो मुख्य क्रिया में विशेषता लाती है।

(ग) नामधातु क्रिया- क्रिया को छोड़कर दूसरे अन्य शब्दों जैसे संज्ञा, सर्वनाम, एवं विशेषण जो धातु बनते हैं, उसे नामधातु क्रिया कहते हैं। जैसे- लुटेरों ने जमीन हथिया ली। हमें उन्हें अपनाना चाहिए। उपर्युक्त वाक्यों में ‘हथियाना’ और ‘अपनाना’ ये क्रियाएँ हैं। हथियाना ‘हाथ’ संज्ञा तथा अपनाना ‘अपना’ सर्वनाम से बना है। अतः यह नामधातु क्रिया है।

(घ) प्रेरणार्थक क्रिया- जब कर्ता स्वयं कार्य नहीं करके किसी अन्य से करवाता है, तब उसे प्रेरणार्थक क्रिया कहते है। जैसे- मैंने पत्र लिखवाया। उसने खाना खिलवाया। अध्यापिका छात्र से पाठ पढ़वाती है। अतः उपर्युक्त वाक्यों में लिखवाया, खिलवाया, पढ़वाया प्रेरणार्थक क्रियाएँ हैं। प्रेरणार्थक क्रिया में दो कर्ता होते हैं। पहला- प्रेरक कर्ता- प्रेरणा देने वाला को प्रेरक कर्ता कहते हैं जैसे- अध्यापिका, मालिक आदि। दूसरा- प्रेरित कर्ता- जिसे प्रेरणा दिया जाता है। जैसे- नौकर, छात्र आदि।

(ङ) पूर्वकालिक क्रिया- जब कर्ता एक क्रिया को समाप्त करके दूसरी क्रिया करता है, तब पहली क्रिया पूर्वकालिक क्रिया कहलाती है। जैसे- वह पढ़कर चला गया। मैं दौड़कर जाउँगा। रीता ने घर पहुँच कर फोन किया। माँ ने नहाकर पूजा की। इन वाक्यों में पूजा की तथा फोन किया मुख्य क्रियाएँ हैं। पूर्वकालिक का शाब्दिक अर्थ है- पहले समय में किया गया कार्य। पूर्वकालिक क्रिया मूल धातु में ‘कर’ अथवा ‘करके’ लगाकर बनाया जाता है। जैसे- उसने पुस्तक से देखकर उत्तर लिखा। चोर सामान चुराकर भाग गया। सोहन ने भागकर बस पकड़ी आदि।

(आ) अविकारी शब्द चार प्रकार के होते हैं – 5. क्रियाविशेषण 6. सम्बन्ध बोधक 7. समुच्चय बोधक 8. विस्मयादि बोधक

अविकारी शब्द को अव्यय भी कहते हैं। वे शब्द जिनमे लिंग, वचन करक आदि के कारण कोई भी परिवर्तन नहीं होता है, उसे अव्यय या अविकारी शब्द कहते हैं- जैसे- कैसे, कहां, कितना आदि। अव्यय के मुख्य चार प्रकार हैं –

(5) क्रिया विशेषण- वे शब्द जो क्रिया की विशेषता को प्रकट करता है, उसे क्रिया विशेषण कहते हैं। क्रिया विशेषण के चार भेद होते हैं।

     (i) कालवाचक– जिस क्रिया के करने या होने के समय का ज्ञान होता हो वह कालवाचक विशेषण कहलाता है। जैसे- आजकल, प्रतिदिन, कभी, रोज, सुबह अक्सर, रात को, हर साल आदि।

     (ii) स्थान वाचक– जिस शब्द से क्रिया के होने या करने के स्थान का बोध होता है, उसे स्थान वाचक क्रिया विशेषण कहते है। जैसे- यहाँ, वहाँ, इधर, उधर, निचे, ऊपर, बाहर, भीत, आसपास आदि।

     (iii) परिमाण वाचक– जिन शब्दों से क्रिया के परिमाण या मात्रा से सम्बंधित विशेषण का बोध होता है उसे परिमाणवाचक क्रिया विशेषण कहते हैं। जैसे- थोड़ा, बहुत, कम, ज्यादा, जितना आदि।

     (iv) रीति वाचक– जिससे क्रिया के होने या करने के ढंग का बोध होता है, उसे रीतिवाचाक क्रिया विशेषण कहते है। जैसे- निश्चय पूर्वक करूँगा, सहसा बम फट गया आदि।

(6) संबंध बोधक विशेषण- जिस अव्यय शब्द से संज्ञा अथवा सर्वनाम का सम्बन्ध वाक्य के दूसरे शब्दों के साथ प्रकट होता है, उसे सम्बन्ध बोधक अव्यय कहते हैं। जैसे- के बिना, के अलावा, से पहले, के भीतर, के साथ, के संग, के बदले, के विपरीत आदि।

(7) समुच्चय बोधक विशेषण या योजक- जो अव्यय दो शब्दों या दो वाक्यों को जोड़ने का काम करता है, उसे समुच्चयबोधक अव्यय या योजक कहते हैं। जैसे- तथा, किन्तु, परन्तु, एवं, मगर, लेकिन, इस कारण, अतः, क्योंकि, अथवा, चाहे आदि।

(8) विस्मयादि बोधक विशेषण- जिन अविकारी शब्दों से हर्ष, शोक, घृणा, दुःख, पीड़ा आदि का बोध होता है उसे विस्मयादि बोधक अव्यय कहते हैं। जैसे- ओह!, हे!, अरे!, वह!, अति, सुन्दर!, उफ!, हाय!, सावधान!, बहत अच्छा!, तौबा-तौबा!, धिक्कार! आदि।

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