हीर रांझा प्रेम (कहानी)

आज के समय में ‘लव मैरिज’ का बोलबाला है। लव के बाद मैरिज हो रहा है या मैरिज के बाद लव।यह कहना बड़ा मुश्किल है। ‘लव’ तो उन लोगों ने किया था। जिसका उदाहरण हम आज भी देते हैं। ‘लैला ने मजनू’ के साथ, ‘श्री ने फरहाद’ के साथ ‘सोनी ने महीवाल’ के साथ और ‘हीर ने रांझा’ के साथ किया था। लव (प्यार) आत्मिक होना चाहिए। मैं उन्हीं में से एक की कहानी लिख रही हूं।

पाकिस्तान के चेनाब नदी के किनारे ‘एक हजारा’ नामक गाँव था। यहा पर रांझा जन जाति के लोग रहते थे। ‘मौजू चौधरी’ नाम का व्यक्ति इस गाँव का ज़मींदार था। उसके चार पुत्र थे। रांझा उन चारों भाइयों में सबसे छोटा था। रांझा का असली नाम ‘ढीदो’ और उसका उपनाम रांझा था। इसलिए उसे गांव के सभी लोग उसे रांझा के नाम से ही बुलाते थे। राझा चारों भाइयों में सबसे छोटा होने के कारण अपने पिता का बहुत प्यारा और लाडला था। रांझा के दुसरे भाई खेती-बाड़ी करते थे और रांझा सिर्फ बाँसुरी बजाता रहता था।
अपने भाइयों के साथ जमीन के वाद विवाद होने के कारण रांझा ने घर छोड़ दिया।

उस रात रांझा ने एक मस्जिद में शरण लिया। सोने से पहले वह समय बीताने के लिए बांसुरी बजाने लगा। मस्जिद के मौलवी ने जब बांसुरी के संगीत को सुना तब उसे बांसुरी बजाना बंद करने के लिए कहा। रांझा ने कारण पूछा तो मौलवी ने बताया कि इस बांसुरी का संगीत इस्लामिक नही है और ऐसा संगीत मस्जिद में बजाना वर्जित है। जवाब में रांझा ने कहा कि उसकी धुन इस्लाम में नही है। वहां ठहरने का दूसरा कोई विकल्प नही था इसलिए मौलवी ने उसे रात के समय मस्जिद में ठहरने दिया।
अगली सुबह रांझा मस्जिद से चला गया।रांझा एक दुसरे गाँव में पंहुचा जहां हीर का गाँव था। ‘सियाल’ जनजाति के सम्पन्न जाट परिवार में सुंदर युवती हीर का जन्म हुआ था। जो आज पंजाब के पाकिस्तान में है। हीर के पिता ने रांझा को मवेशी चराने का काम सौंप दिया। हीर, रांझा के बांसुरी की आवाज सुनकर हीर मंत्रमुग्ध हो जाती थी। धीरे धीरे हीर को रांझा से प्यार हो गया। वे दोनों कई सालों तक गुप्त जगहों पर मिलते रहते थे। एक दिन हीर के चाचा ‘कैदो’ ने उन दोनों को साथ-साथ देख लिया था। और सारी बात हीर के पिता ‘चुचक’ और उसकी माँ ‘मालकी’ को बता दिया।
कुछ समय बाद हीर के घरवालो ने रांझा को नौकरी से निकाल दिया और दोनों को मिलने से मना कर दिया। हीर के पिता ने ‘सैदाखेरा’ नाम के व्यक्ति से उसकी शादी करने के लिए बाध्य किया मौलवियों और उसके परिवार के दबाव में आकर उसने सैदाखेरा से निकाह कर लिया। जब इस बात की खबर रांझा को चली तो उसका दिल टूट गया। वह ग्रामीण इलाको में अकेला दर-दर भटकता रहा। एक दिन उसे एक जोगी ‘गोरखनाथ’ मिले। गोरखनाथ जोगी “कनफटा” सम्प्रदाय’ के थे। उनके सानिध्य में रांझा भी जोगी बन गया। रांझा ने भी कानफटा समुदाय की प्रथा को स्वीकार कर लिया और अपने कान छीदा लिया। भौतिक संसार को त्याग दिया।
भगवान का नाम लेता हुआ रांझा पूरे पंजाब में भटकता रहा। भटकते-भटकते एक दिन रांझा को हीर का गाँव मिल गया जहां वो रहती थी। रांझा हीर के पति ‘सैदा’ के घर गया और उसका दरवाजा खटखटाया। ‘सैदा’ की बहन ‘सहती’ ने दरवाजा खोला। सहती ने हीर के प्यार के बारे में पहले ही सुन रखा था। सहती अपने भाई के इस अनैच्छिक शादी के विरुद्ध थी और अपने भाई की गलतियों को सुधारने के लिए उसने हीर को रांझा के साथ भागने में मदद की। हीर और रांझा वहा से भाग गये लेकिन उनको राजा ने पकड़ लिया। राजा ने उनकी पुरी कहानी सूनी और मामले को सुलझाने के लिए काजी के पास लेकर गये। हीर ने अपने प्यार की परीक्षा देने के लिए आग पर हाथ रख दिया। राजा उनके असीम प्रेम को समझ गया और उन्हें छोड़ दिया।
वो दोनों वहा से हीर के गाँव गये जहां उसके माता-पिता निकाह के लिए राजी हो गये। शादी के दिन हीर के चाचा कैदो ने उसके खाने में जहर मिला दिया ताकि ये शादी रुक जाये। यह सूचना जैसे ही रांझा को मिली वह दौड़ता हुआ हीर के पास पहुचा लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। हीर ने भी जान बूझ कर वो खाना खा लिया। जिसमे जहर मिला हुआ था। रांझा अपने प्यार की मौत के दुःख को झेल नही पाया और उसने भी वो जहर वाला खाना खा लिया और उसके करीब उसकी मौत हो गई। रांझा को उनके पैतृक गाँव झंग में दफना दिया गया।

ऐसा माना जाता है कि हीर रांझा की कहानी का सुखद अंत था। वारिस शाह ने स्थानीय लोकगीतों और पंजाब के लोगो से हीर रांझा की प्रेम कहानी के बारे में पता कर कविता लिखी थी जिसे सभी लोग अनुसरण करते है। उसके अनुसार ये घटना आज से 200 साल पहले वास्तविकता में घटित हुई थी। जब पंजाब पर लोदी वंश का शासन था।

इस कहानी से प्रेरित होकर भारत और पाकिस्तान में कई फिल्में भी बनाई गई। क्योंकि इस घटना के वक़्त भारत-पाकिस्तान विभाजन नही हुआ था।

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