आत्मसम्मान (कविता)

चाहे जो भी हो जाए,

आत्मसम्मान न खोने देना।

भावना से यह जुड़ा शब्द है,

स्वयं को यह सम्मान दिलाता।

जागृत जब होता सम्मान,

तब आत्मनिर्भरता आ जाता है।

बिना आत्मसम्मान के,

मानव नहीं बढ़ पाता है।

कष्टमयी हो जाता जीना,

जब आत्मसम्मान गिर जाता है।

हो जब प्राणी कर्त्तव्यपरायण,

वह आत्मनिर्भर बन जाता है।

आदतें हों अगर बुरी तो,

आत्मसम्मान मर जाता है।

लगने न देना ठेस कभी,

आत्मसम्मान की रक्षा करना है।

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