समय ना ठहरा है कभी, बदली कभी न चाल। जिसके जैसे कर्म हैं, उसका वैसा हाल ।। समय 'लेटिन' भाषा का शब्द है। समयका निर्माण सृष्टि के निर्माण के साथ हुआ होगा। समय पिछले युगों में था, इस युग में है और आनेवाले युग में भी रहेगा। जब तक सृष्टि रहेगा समय भी साथ… Continue reading समय समाज और साहित्य
Category: Article
डॉ. अहिल्या मिश्र : मेरी पहली भेंट
साहित्य समाज का दर्पण है और साहित्यकार मानव-समाज का दर्पण। साहित्यकार के अंतस में युग चेतना होती है। यही युग चेतना साहित्य सृजन करने का आधार बनती है। श्रेष्ठ साहित्य भावनात्मक स्तर पर व्यक्ति और समाज को संस्कारित करता है और उसे युग चेतना से साक्षात्कार करवाता है। साहित्यकार जिस समाज में रहता है, उस… Continue reading डॉ. अहिल्या मिश्र : मेरी पहली भेंट
भक्ति आंदोलन और रैदास
"भक्ति द्रविड़ उपजी लाए रामानंद प्रकट किया कबीर ने सप्तद्वीप नव खंड।।"1 भक्ति आन्दोलन का उदय मध्यकालीन इतिहास की एक प्रमुख घटना है। इसका उदय अकस्मात् नहीं हुआ है बल्कि पहले से ही इसकी निर्माण की प्रक्रिया शुरू हो चुकी थी, युगीन परिस्थितियों ने इसे गति प्रदान किया। भक्ति भावना का उद्भव सबसे पहले… Continue reading भक्ति आंदोलन और रैदास
संदर्भ ग्रंथ सूचि
शोध कार्य में ग्रंथ सूचि का महत्व निर्विवाद है। इसे संदर्भ ग्रंथ सूचि भी कहा जाताहै। ग्रंथ सूचि से तात्पर्य अंग्रेजी के शब्द 'बिब्लियोग्राफी' से बना है, जो बहुत ही व्यापक है। इसकी किसी एक निश्चित परिभाषा के संबंध में विद्वानों में मतभेद है। साहित्य एवं भाषा संबंधी शोध तथ्यों पर आधारित होता है। तथ्यों… Continue reading संदर्भ ग्रंथ सूचि
आत्मकथा
परिभाषा- 'आत्मकथा' किसी व्यक्ति की स्वलिखित जीवन की गाथा है। जब कोई रचनाकार अपनी स्वयं की कथा अपनी शैली में लिखता है, तो उसे 'आत्मकथा' कहते है। इसमें लेखक स्वयं की कथा को बड़ी आत्मीयता के साथ पाठक के सामने प्रस्तुत करता है। लेखक अपने जीवन की विभिन्न परिस्थितियों, पारिवारिक घटनाओं, आर्थिक तथा राजनीतिक पृष्ठभूमि… Continue reading आत्मकथा
रिपोर्ताज
'रिपोर्ताज' गद्य-लेखन की एक विधा है। हिंदी में रिपोर्ताज को 'सूचनिका' और 'रूपनिका' भी कहा जाता है। परन्तु इसका प्रचलित शब्द 'रिपोर्ताज' है। रिपोर्ताज 'फ़्रांसिसी' भाषा का शब्द है। फ़्रांस में यह शब्द अंग्रेजी के 'रिपोर्ट' शब्द के आधार पर द्वितीय विश्व युद्ध के समय बनाया गया। रिपोर्ताज की परिभाषाएँ: हिंदी साहित्य कोश के अनुसार-… Continue reading रिपोर्ताज
हालावादी काव्य
छायावाद के समानांतर चलने वाली काव्याधाराएँ हैं- 1. व्यक्ति चेतना प्रधान काव्यधारा/ हालावाद 2. राष्ट्रीय सांस्कृतिक काव्यधारा 3. समष्टि प्रधान/सामाजिक काव्यधारा हालावाद काव्यधारा- (1933-1936 ई.) परिभाषा- छायावाद के समानांतर जिन कवियों ने निजी अनिभूति के आधार पर प्रेम, मस्ती एवं अहं से संबंधित काव्य लिखा उनके द्वारा रचित काव्य व्यक्ति चेतना प्रधान या हालावाद… Continue reading हालावादी काव्य
अष्टछाप
अष्टछाप की स्थापना- विं सं 1622 (1565 ई.) में हुआ था। 'अष्टछाप' महाप्रभु श्री वाल्भाचार्य एवं उनके पुत्र विट्ठलनाथ जी के द्वारा स्थापित 8 भक्तिकालीन कवियों का एक समूह था, जिन्होंने अपनी विभिन्न पद एवं कीर्तनों के माध्यम से भगवान् श्रीकृष्ण की विभिन्न लीलाओं का गुणगान किया और वे अष्टछाप कहलायें। 'कृष्णभक्ति शाखा'… Continue reading अष्टछाप
नाथ साहित्य
परिभाषा- आदिकाल में भगवान 'शिव' के उपासक भक्त कवियों के द्वारा जनभाषा में जिस साहित्य की रचना की गई या हुई उसे नाथ साहित्य के नाम से जाना जाता है। नाथ संप्रदाय को सिद्धों की परंपरा का विकसित रूप माना जाता है। नाथ साहित्य के प्रवर्तक गोरखनाथ को माना जाता है। इनकी साधना सिद्ध साधना… Continue reading नाथ साहित्य
सिद्ध साहित्य
आदिकालीन साहित्य: आदिकालीन साहित्य केकाव्य की निम्नलिखित धाराएँ हैं - 1. सिद्ध साहित्य 2. नाथ साहित्य 3. रास साहित्य 4. रासों साहित्य 5. लौकिक साहित्य 6. गद्य साहित्य 7. अपभ्रंश साहित्य सिद्ध साहित्य- परिभाषा- आदिकाल में बौद्ध धर्म की महायान शाखा के वज्रयानी कवियों द्वारा अपने धर्म का प्रचार-प्रसार करने के लिए जो साहित्य जनभाषा… Continue reading सिद्ध साहित्य