पिता

‘माँ’ विश्व की अद्भूत और अनोखी देन है क्योंकि वह अपने बच्चों को नौ महीनों तक कोख में रखकर पालती-पोषती है और उसे इस नयी दुनिया से परिचित करवाती है। यानी उसे जन्म देती है, उसे अपना दूध पिलाकर उस पौधा रूपी बालक को सींचती और संवारती हैं। उसी प्रकार पिता का भी स्थान हमारे जीवन में कम महत्वपूर्ण नहीं है। जिस प्रकार सूर्य प्रतिदिन उदय होकर अपने प्रकश और उर्जा से समस्त विश्व को जीवन प्रदान करता है, जो समस्त प्राणियों के जीवन को सुचारू रूप से चलाने की व्यवस्था करता है, ठिक उसी प्रकार परिवार में पिता का स्थान है। जिसकी दिनचर्या अपने परिवार की सुचारू जीवन के लिए होती है। वह सिर्फ बीज प्रदान कर अपनी संतान का निर्माण ही नहीं करता है, बल्कि उसे हर रोज अपनी आजीविका से सींच कर एक विशाल वृक्ष तैयार करने में अपना पूर्ण सहयोग करता है। पिता एक असीमित विषय है। जिसपर जितना भी लिखा या कहा जाये उतना ही कम है। हम सब हमारे जीवन में हर चीज की परिभाषा पढ़ते और लिखते हैं। ये परिभाषाएँ तथ्यों पर आधारित होती है लेकिन हमरा भारतवर्ष एक ऐसा देश है जहाँ कुछ परिभाषाएँ भावनाओं से बन जाती है। जैसे- प्रेम की परिभाषा, भावना की परिभाषा, लगाव की परिभाषाएँ आदि। आज हम ऐसी ही परिभाषा लिखने की कोशिश कर रही हूँ। जिसे ‘पिता’ कहते है। एक बच्चें के जन्म देने में माँ और पिता दोनों बराबर के सहभागी है। वैसे तो ‘माँ’ के लिए बहुत सारी कहानियाँ, कविताएँ, संगीत आदि लिखें गए हैं, लेकिन क्या हमने कभी पिता को समर्पित कहानियाँ, कविताएँ संगीत आदि लिखने की कोशिश की है, शायद हाँ लेकिन बहुत कम। सब कहते हैं कि ‘बच्चा’ पहला शब्द ‘माँ’ ही बोलता है, ऐसा नहीं है कुछ बच्चे ‘माँ’ कुछ ‘बाबा’ कुछ ‘पापा’ आदि शब्द भी बोलते हैं। जिस प्रकार माँ अपने बच्चों का पालन-पोषण करने में सब कुछ न्योछावर कर देती है। उसी तरह पिता भी अपना सबकुछ अपने बच्चे के लिए समर्पित कर देता है। ये अलग बात है कि पिता अपने प्यार को दर्शाता नहीं है, पर वह अपने बच्चे को माँ से कम प्यार नहीं करता है ।

पिता उम्मीद, आस, हिम्मत और विश्वास है। वह संघर्ष की आँधियों में हौसलों की दीवार की तरह है, जो हमें कई तरह की परेशानियों से लड़ने की हिम्मत देता है। पिता परिवार की जिम्मेदारियों से लदी उस रथ का सारथी है जो सभी को समान हक़ दिलाना चाहता है। हर पिता अपनी प्रतिबिम्ब अपने संतान में ही देखता है या देखना चाहता है। भारतीय संस्कृति में माता-पिता दोनों का स्थान सर्वोच्च है। गणेश भागवान जी ने अपनी माता-पिता की परिक्रमा कर संपूर्ण ‘सृष्टि’ के परिक्रमा करने की श्रेष्ठता सिद्ध कर माता-पिता को श्रेष्ठ साबित कर दिया है। हम सभी किसी न किसी माता-पिता के संतान हैं। अक्सर हमारी गलतियों पर टोकने जैसे- दोस्तों के साथ घूमने, बाल बढ़ाने, टी.वी आदि देखने के लिए डांटने और गुस्सा करने वाले पिता ही होते हैं। तत्कालीन समय में हमें उनकी बातें अच्छी नहीं लगती है, किंतु जब हम बड़े होते हैं तब हमें समझ आने लगता है कि उनके इस कठोर व्यवहार के पीछे उनका स्नेह ही होता है। पिता खुद को कठोर बनाकर हमें कठिनाइयों से लड़ना सिखाता है और अपने बच्चों की खुशी के लिए अपनी खुशियों का त्याग कर देता है। पिता अपने बच्चों के लिए एक कवच है, जिसकी सुरक्षा में रहकर बच्चे अपने जीवन को एक दिशा दे सकते हैं। कई बार तो बच्चों को यह भी महसूस नहीं होता कि पिता उनकी सुख-सुविधाओं की व्यवस्था कैसे और कहाँ से कर रहे हैं। पिता के अनेक संतान हो सकते हैं परन्तु पिता का भाव हमेशा सबके लिए समान होता है। पिता के हृदय की यही विशालता है। पिता चाहे कैसा भी हो अमीर-गरीब, शिक्षित-अशिक्षित, सफल-असफल लेकिन उसका भाव हमेशा अपने संतान को हर क्षेत्र में अपने से अधिक सफल देखने की होती है। यह बात बच्चों को तब समझ में आती है, जब वे खुद पिता बन जाते हैं। पिता ही दुनिया का एक मात्र ऐसा सक्श है जो अपने बच्चों को अपने से भी अधिक तरक्की पर देखना चाहता है। कई बार इसके चलते वे सख्त भी हो जाते हैं, क्योंकि जीवन में आगे बढ़ने के लिए ‘अनुशासन’ की आवश्यकता अवश्यक होती है। हालाँकि, बदलते समय के साथ पिता का स्वरूप भी बदल गया है। हमेशा कठोर और गम्भीर दिखने वाले पिता की जगह आज अपने बच्चों के साथ खेलने और मस्ती करने वाले पिता ने ले लिया है। समय के साथ बदलाव स्वभाविक है, लेकिन पिता के कर्तव्य में कभी बदलाव नहीं आएगा क्योंकि यही हमारी संस्कृति है।

“जिंदगी के अंधेरे में पिता मशाल होते हैं, मुसीबतों से बचाने में परिवार की ढाल होते हैं। नहीं जी पातें हैं वे अपनी जिंदगी अपने हिसाब से, क्योंकि पिता आम शख्स नहीं त्याग के मिसाल होते है।”

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