हिन्दी साहित्य की गद्य विधाएँ: नाटक (इकाई- 2)

‘नाटक’ शब्द संस्कृत की ‘नट्’ धातु से बना है, जिसका अर्थ होता है- ‘अभिनय करना’।

नाटक की व्युत्पति नट + अक = नाटक ( अर्थ अभिनय करना है।)

परिभाषा- “अवस्थानुकृतिनार्ट्यं रूपं दृष्यतयोच्यते।” अथार्त किसी अवस्था का अनुकृति ही नाटक है। (यह धनंजय के नाटक ‘दशरूपक’ में है।)

भारतेंदु हरिश्चंद्र के शब्दों में- “नाटक का अर्थ है, नटों के द्वारा की जाने वाली क्रिया।”

सेक्सपियर के शब्दों में- “नाटक दर्पण के सामान है, जिसमे प्रकृति स्वरुप बिंब, युग, आकृति तथा उसके प्रभाव बिम्बित होते है।”

नाटकों की उत्पत्ति से संबंधित विविध मत:

  • भारतीय विद्वान नाट्यशास्त्र के प्रणेता आचार्य भरतमुनि ‘दैवीए सिद्धांत’ को मानते है। उनके अनुसार- ब्रह्मा जी के द्वारा नाटक की रचना की गई थी। ऋग्वेद से पाठ ‘कथावस्तु’ सामवेद से ‘गान’ यजुर्वेद से ‘अभिनय’ अथर्ववेद से ‘रस’ लिया गया। रंगमंच का निर्माण विश्वकर्मा के द्वारा किया गया। शिव के द्वारा ‘तांडव’ नृत्य, पार्वती के द्वारा ‘लास्य’ नृत्य। प्रथम नाटक समुंद्र मंथन देवताओं एवं राक्षस के द्वारा खेला गया था।

पिशेल के शब्दों में- “कठपुतली कला से नाटकों की उत्पति हुई।” (सर्वमान्य है)

डॉ० रिजवे के शब्दों में- “मृतक वीर पूजा से मानते है।”

डॉ० हिलेब्रा एवं प्रो० कोने के शब्दों में- “ये दोनों स्वांगों के द्वारा मानते है।”

आचार्य धंनजय के अनुसार ‘रूपक’ के दस भेद होते है:

भाण- (एक अंक) भाण में केवल एक अंक एक ही पात्र होता है।

प्रहसन- (एक अंक) हास्य प्रधान एकांकी होता है।

इसके तीन भेद है- (i) शुद्ध (ii) शंकर (iii) संकर  

वीथि-  (एक अंक) इस एकांकी की कथावस्तु कल्पित होता है। कोशिकी वृति प्रधान होती है।

व्यायोग- (एक अंक) इसमें पुरुषपात्र अधिक और स्त्रीपात्र बहुत कम होते है। यह भी एकांकी ही होता है। 

अंक- (एक या चार अंक) यह एकांकी करुण रस प्रधान होता है। स्त्रियों का विलाप इसमें खूब होता है। इसमें भारती वृति प्रधान होता है।

ईहामृग- (एक या चार अंक) यह चार अंक वाली एकांकी है। इसका नायक धीरोद्धत होता है

समवकार- (तीन अंक) यह वीर रस प्रधान होता है। इसमें तीन अंक होता है।

डिम- (चार अंक) इसमें चार अंक होते है। रौद्ररस प्रधान होता है। इसमें प्रधान आरभट्टी वृति होती है।

नाटक- (पाँच से दस अंक)

प्रकरण- कल्पित / लौकिक कथानक

अंक – दस (10)

1. भाण: यह एकांकी होता है।

अंक- 1, कथा कल्पित

पात्र- 1 होता है (धूर्त, चालाक, कामुक)

2. प्रहसन- यह हास्य प्रधान एकांकी होता है। प्रहसन परम्परा के जन्मदाता भी भारतेंदु ही हैं

कथानक- कल्पित

अंक- 1, हास्य रस प्रधान होता है।

नायक- धूर्त, कामुक और चालाक

3. वीथी- यह एकांकी होता है। इसका पात्र मध्यम कोटि का होता है।

कथानक- कल्पित

नायक- श्रृंगार प्रिय

अंक- एक (1) होता है।

वृति- कौशिकी

4. व्यायोग- इसमें कथा वस्तु तथा नायक प्रसिद्ध होता है।  

कथावस्तु – ऐतिहासिक या पौराणिक

नायक- धोरोदत्त

अंक- एक (1)

पात्र- स्त्रीपात्र नहीं होना चाहिए।

घटना- एक दिन की धटना का वर्णन।

वृति- सात्विकी, आर्यभटी

5. अंक- इसका विषय वस्तु प्रधान होता है।

कथानक- पौराणिक

अंक- एक या चार  

नायक- साधारण पुरुष

रस- करुण रस ( स्त्री विलाप जरुरी है।)

वृति- ‘भारती’ वृति का प्रयोग होता है।

6. ईहामृग-  

कथानक- मिश्रित होगा ऐतिहासिक, पौराणिक, काल्पनिक प्रतिनायक (खलनायक) के द्वारा आसक्ति भी हो सकता है।

नायक नायिका को हरिणी की तरह खोजना अतः इसका नाम इहामृग

अंक-  एक (1) या चार (4)

7. समवकार- यह वीर रस प्रधान होता है।

कथानक- केवल पौराणिक (राक्षसों और दैत्यों से संबंधित)

अंक- 4 होगा

नायक- धीरोदात्त

वृति- सात्विकी या आर्यभट्टी

8. डिम

कथानक-  ऐतिहासिक या पौराणिक

अंक- 4 होते है

नायक- धोरोदत्त

9. प्रकरण-

कथानक- कल्पित या लौकिक

अंक- 10 होता है।

प्रधान रस- श्रृंगार

नायक धीर प्रसान्त

वृति- कौशिकी

10. नाटक-

कथानक ऐतिहासिक पौराणिक

अंग – 5 होनी चाहिए।

प्रधानरस- श्रृंगार या वीररस होना चाहिए।

5 – संधियाँ

5 – प्रकृतियाँ

5 – कार्य की अवस्थाएँ

वृतियाँ कौशिकी या सात्विकी

नायक- धिरोदाथोना चाहिए

नाटक के लक्षण:

  • कथानक इतिहास प्रसिद्ध या पौराणिक होना चाहिए
  • 5 और 3 का प्रयोग होना चाहिए।
  • 5 और 3 का मतलब होता है।
  • 5 संधियाँ, 5 अर्थ प्रकृतियाँ और 5 कार्य अवस्थाएँ

अर्थ प्रकृति- कार्य अवस्था- संधि

बीज – आरम्भ – मुख

बिंदु – प्रयत्न – प्रतिमुख

पताका – प्राप्त्याशा- गर्भ

प्रकारी – नियताप्ति –विमर्श, अवमर्श

कार्य – फलागम- निर्वहन

  • नाटक में पाँच से 10 अंक होना चाहिए।
  • श्रृंगार या वीर में से एक प्रधान रस होना चाहिए।
  • धीरोदात्त नायक होना चाहिए।

नाटक के तत्व:

संस्कृत साहित्य के अनुसार  – कथावस्तु, नेता,  रस

भारतीय नाट्यशास्त्र के अनुसार – वस्तु, नेता, रस, अभिनय

पाश्चत्य नाट्यशास्त्र के अनुसार – वस्तु, नेता, रस अभिनेता, संवाद संकलनत्रय

सर्वमान्य मत के अनुसार:

वस्तु-कथानक

पात्र-नेता

रस (आत्मा)

उद्देश्य

अभिनेता

शैली (बाह्य तत्व)- वृति (आतंरिक तत्व)

संवाद

संकलनत्रय

कथावस्तु/ कथानक या वस्तु / घटना

कथानक के तीन भेद है-

ऐतिहासिक, पौराणिक, प्रख्यात

काल्पनिक, उत्पाद्द

मिश्रित

पात्र-चरित्र:

नाटक का मुख्य पात्र नायक उसकी पत्नी या प्रेमिका नायिका के रूप में चित्रित होती है। कुछ नाटक नायिका प्रधान भी होते है। जैसे- ‘ध्रुवस्वामिनी’ नाटक।

नाटक में नायक के चार प्रकार हो सकते हैं:

धीरोदात्त – श्रेष्ठ गुणों से संपन्न शूरवीर नायक (राम, युधिष्ठिर)

धीरललित – श्रेष्ठ गुणों से संपन्न कलाप्रिय नायक (दुष्यंत, वत्सराज)

धीरप्रशांत – श्रेष्ठ गुणों से संपन्न किंतु धैर्यशाली नायक (चारुदत्त)

धीरोद्धत – श्रेष्ठ गुणों से संपन्न किंतु अभिमानी नायक (रावण, परशुराम, भीम)

श्रृंगाररस की दृष्टि से नायक के चार भेद है-

अनुकूल नायक – एक नायिका से अनुरक्त

दक्षिण नायक – एक से अधिक पत्नीवाला होता है। एक साथ सबको प्रसन्न रख सकता है।

शठ नायक – अन्य नायिका से प्रेम करता है, किन्तु प्रकट नहीं करता।

धृष्टनायक – दुराचारी और निर्लज्ज होता है ।

नाट्यशास्त्र के अनुसार नायिका के मुख्य तीन भेद माने गए है:

स्वकीय- जो एकनिष्ट अपने पति या प्रेमी के साथ रहती है।   

परकीय- जो अलग- अलग पुरुषों से प्रेम करती हो।  

सामन्या (गणिका)- ये वेश्या श्रेणी में आती है।

कथानक की अर्थ प्रवृतियाँ:

नाटक के प्रयोजन हेतु किए गए कार्य अर्थ प्रकृतियाँ कहलाती है।

ये अर्थ प्रकृतियाँ निम्न पाँच होती है:

बीज- कथानक का आरम्भ

बिंदु- एक से अधिक कथाओं की उत्पति

पताका- ऐसे पात्र जो मुख्य कथा के मध्य में आरम्भ होती है, और दूर-दूर तक चलती है। जैसे- रामचरित मानस में सुग्रीव की कथा।

प्रकरी- आधिकारिक के मध्य में उत्पन्न तथा शीघ्र ही समाप्त हो जाती है।

जैसे- रामायण में जटायु और सबरी की कथा।

कार्य- कथा के अंतिम लक्ष्य तक पहुँचाने वाली प्रकृति।

कथानक की कार्य अवस्थाएँ की पाँच कार्य अवस्थाएँ होती है:

नायक – कार्य का आरम्भ  

प्रयत्न – फल प्राप्ति के लिए प्रयत्न करना

प्राप्त्याशा – फल प्राप्ति की आशा होना

नियताप्ति – फल प्राप्त होना निश्चित

फलागम – फल की प्राप्ति होना

कथानक-संधियाँ – अर्थ, प्रकृति एवं कार्य अवस्था के संयोग को ‘कथानक’ संधियाँ कहते है।

बीज + आरम्भ = मुख संधि

बिंदु + प्रयत्न = प्रतिमुख संधि

पताका + प्रप्त्यासा = गर्भ संधि

प्रकारी + नियताप्ति = विमर्श या अवमर्श संधि  

कार्य + फलागम = निर्वहन संधि  

हिन्दी का पहला नाटक विभिन्न विद्वानों के अनुसार-

डॉ० दशरथ के अनुसार- ‘गय सुकुमार रास’ (देल्हन), रचनाकाल- अज्ञात है।

भारतेंदु हरिश्चंद्र के अनुसार – नहुष (गोपालचंद्र/ गिरिधरदास, भारतेंदु के पिता)

डॉ० बच्चन सिंह एवं रामचंद्र शुक्ल के अनुसार- ‘आनंद रघुनंदन’ (रीवा नरेश महाराजा विश्वनाथ सिंह) सर्वमान्य मत

गंपतिचंद्र गुप के अनुसार- ‘गोरक्ष विजय’

रचनाकार- विद्दापति, समय- 13वीं शताब्दी  

नागरी प्रचारिणी सभा, काशी- ‘आनंद रघुनंदन’

हिन्दी नाटकों के अन्य विशेष तथ्य:

  • हिन्दी का प्रथम दुखांत नाटक- ‘रणधीर प्रेममोहिनी’ प्रकाशन (1878 ई०), लाला श्रीनिवास दास
  • हिन्दी का प्रथम राजनैतिक नाटक ‘भारत दुर्दशा’ (1880 ई०), भारतेंदु हरिश्चंद्र
  • हिन्दी के ऐतिहासिक नाटकों के जन्मदाता- जयशंकर प्रसाद
  • हिन्दी का प्रथम गीतिनाट्य ‘करुणालय’ (1913 ई०), जयशंकर प्रसाद
  • हिन्दी का पहला प्रतीकात्मक नाटक ‘कामना’ (1927 ई०), जयशंकर प्रसाद
  • हिन्दी में समस्यात्मक नाटक के ‘जनक’ लक्ष्मीनारायण मिश्र
  • हिन्दी का प्रथम अभिनित नाटक ‘जानकी मंगल’ (1868 ई०), शीतला प्रसाद त्रिपाठी
  • हिन्दी का प्रथम अनुदित नाटक ‘शाकुंतलम’ (1863 ई०), कालिदास के ‘अभिज्ञान

शाकुंतलम’ नाटक को राजा लक्षमण सिंह ने अनुदित किया था।

हिन्दी नाटकों का विकास क्रम :

रामचंद्र तिवारी के अनुसार- (समय नहीं बताया गया है।)

डॉ० नगेन्द्र के अनुसार- पूर्व भारतेंदु युग, भारतेंदु युग, द्विवेदी युग, प्रसाद युग, प्रसादोत्तर युग, समकालीन नाटक।

नागरीप्रचारिणी सभा, काशी हिन्दी साहत्यकोश भाग-2 के अनुसार:

1. पूर्व भारतेंदु युग – 1857 ई०

2. भारतेंदु युग (1857 – 1900 ई०)

3. प्रसाद युग (1900 – 1930 ई०)

4. प्रसादोत्तर युग (1930 से लगातार)

  1. पूर्व भारतेंदु युग (1857 ई० पूर्व )

नाटक – रचनाकार – रचनाकाल

संदेशरासक – अब्दुल रहमान – 13वीं शताब्दी आरम्भिक

गोरक्षविजय – विद्यापति – 13वीं शताब्दी

उषाहरण – विद्यापति – 13वीं शताब्दी

रुक्मिणीहरण – विद्यापति – 13वीं शताब्दी

पारिजात हरण – विद्यापति – 13वीं शताब्दी

रामायण महानाटक – प्राणचंद चौहान – 1610 ई०

समय सार – बनारसी दास – 1636 ई०

चंडीचरित्र – गुरुगोबिंद सिंह – 1643 ई०

प्रबोध चंद्रोदय – यशवंत सिंह – 1643 ई०

करुणा भरण – लाछिराम कृष्ण जीवन – 1656 ई०

सकुंतला (चतुर्थ) – नवाज – 1680 ई०

आनंद रघुनंदन – रेवानरेश (विश्वनाथ सिंह) – 17वीं शताब्दी

समासार – रघुराय नागर – 1700 ई०

हनुमन नाटक – कवि उदय (हृदयराम) – 1840 ई०

राम करुणाकर – कवि उदय – 1840 ई०

नहुष – गोपालचंद्र गिरिधरदास – 1857/ 1850 ई०

2. भारतेंदु युग (1857 – 1900 ई०)

भारतेंदु युग के नाटक की विशेषताएँ:

राष्ट्रप्रेम की भावना

जनवादी विचारधारा

हास्य व्यंग्य की प्रधानता थी

प्रकृति वर्णन, भारतीय संस्कृति का गौरव गान 

भारतीय एवं पाश्चात्य शैलियों का समन्वय

गद्य तथा अन्य विधाओं का विकास

छंद विधान की नवीनता थी

भारतेंदु हरिश्चंद्र के मौलिक नाटक:

नाटक: वैदिकी हिंसा हिंसा न भवति (1873 ई०)

यह ‘प्रहसन’ श्रेणी का नाटक है। इसमें सामजिक और धार्मिक विसंगतियों पर प्रहार किया गया है। पाखंडी मांसाहारी पुरोहितों, शैवों और वैष्णवों पर व्यंग्य और पशु बलि प्रथा का विरोध किया गया है।

नाटक: विषस्य विषममौषधम (1876 ई०)

यह भाण श्रेणी का नाटक है। इसमें देशी राजाओं के दुर्दशा का वर्णन है। इसमें बड़ोदा के गायकवाड के गद्दी से उतारे जाने तथा सयाजीराव को उनके स्थान पर बिठाए जाने की घटना का चित्रण किया गया है। यह एक पात्रीय, राष्ट्रभक्ति परक नाटक है।

नाटक: प्रेमयोगिनी (1875 ई०)

यह चार अंक कि लघु नाटिका है। इसमें तीर्थस्थानों पर होने वाले धार्मिक आडम्बरों एवं अनाचारों का चित्रण है। विशेषकर काशी का।

नाटक: श्री चन्द्रावली (1876 ई०)

यह लघु नाटिका है। इसमें वैष्णव भक्ति प्रेम का चित्रण है।  

नाटक: भारत दुर्दशा (1880 ई०)

इसमें प्रतीकात्मक शैली के द्वारा भारत के प्राचीन गौरव और वर्तमान की दुर्दशा का यथार्थ का चित्रण है।

प्रथम अंक – वीथी

दूसरा अंक – श्मशान

तीसरा अंक – मैदान

चौथा अंक – कमरा (अंग्रेजी ढ़ंग से सुसज्जित है)

पंचम अंक – किताब खाना

षष्ठ अंक – गंभीर वन का मध्य भाग

नाटक के पात्र:

नायक – भारत (यह प्रतीकात्मक नाटक है)

अन्य पात्र:

प्रथम अंक- योगी

दूसरा अंक – भारत, निर्लजता, आशा

तीसरा अंक – भारत दुर्देव, सत्यानाश, फौजदार

चतुर्थ अंक – रोग, आलस्य, मदिरा, अन्धकार

पंचम अंक – सभ्य लोगों की कमीटी पात्र सभापति, बंगाली, महाराष्ट्री, एडिटर, कवि, दो महाराज कूल 7 पात्र हैं।

षष्ठ अंक – भारत भाग्य

नाटक: भारत दुर्दशा में घटित घटनाएँ:

प्रथम अंक- भारत के प्राचीन गौरव और वर्तमान दुर्दशा का चित्रण है।

दूसरा अंक – भारत के द्वारा अपने दीन-दशा का वर्णन करते हुए बेहोश हो जाना और आशा के द्वारा उसे बचाना।

तृतीय अंक – भारत के सर्वनाश के कई कारणों का चित्रण है। जैसे- आपसी फूट, आलस्य, स्वार्थपरता आदि।

चतुर्थ अंक – भारत दुर्देव के द्वारा भारत के नाश का प्रयास किया गया।

पंचम अंक – सात सभ्य लोगों की कमीटी पात्र के द्वारा भारत के बचाव के लिए चिंतन।

षष्ठ अंक – भारत भाग्य द्वारा बेहोश पड़े भारत को जगाने का प्रयास कर अपने ही सीने में कतार मार लेना।

भारत दुर्दशा नाटक में गाये गए प्रमुख गीत:

  • रोवहु सब मिलिं आवहु भारत भाई।

      हा हा! भारतदुर्दशा न देखी जाई॥ (यह जोगी प्रथम अंक में गाता है)

  • कोऊ नहीं पकरत मेरो हाथ।

बीस कोटि सुत होत फिरत मैं हा हा होय अनाथ।।

(यह गीत भारत दुसरे अंक में गाता है)  

  • जागो-जागो रे भारत भाई (षष्ठ अंक में भारत भाग्य गाता है)

भारत दुर्दशा के प्रमुख कथन:

अंग्रेज राज सुख साज (प्रथम अंक में योगी का कथन है)

भारत दुर्दशा के अन्य तथ्य:

भारतेंदु हरिश्चंद्र ने भारत दुर्दशा को ‘देशवत्सला’ नाटक कहा है।

यह ‘लास्य रूपक’ नाटक माना जाता है

आरम्भ में मंगलाचरण है। मंगलाचरण को (नंदी पाठ) भी कहते है।

इसमें कलयुग की समाप्ति एवं सतयुग की स्थापना की मंगल कामना किया गया है।

भारत दुर्दशा में प्रतीकात्मक शैली में भारत के प्राचीन गौरव और वर्तमान की दुर्दशा का यथार्थ चित्रण है।

3. प्रसाद युग (1900 – 1930 ई०)

प्रसाद युग के नाटककारों का सही क्रम:

रामचरित उपाध्याय(1872 – 1938 ई०)

मुंशी प्रेमचंद (1880 – 1936 ई०)

गोबिंदवल्लभ पंत (1887 – 1961 ई०)

जयशंकर प्रसाद 1889 – 1937 ई०

माखनलाल चतुर्वेदी 1889 – 1968 ई०

वृन्दावन लाल वर्मा 1889 – 1969 ई०

गंगाप्रसाद श्रीवास्तव 1889 – 1976 ई०

सियारामशरण गुप्त 1895 – 1963 ई०

बदरीनाथ भट्ट (सुदर्शन) 1896 – 1967 ई

सेठगोविंद दास 1896 – 1974 ई०

पांडेय बेचन शर्मा ‘उग्र’ 1900 – 1967 ई०

लक्षमीनारायण मिश्र 1903 – 1967 ई०

जगन्नाथ प्रसाद ‘मिलिंद’ 1907 – 1987 ई०

हरिकृष्ण प्रेमी (1908 – 1974 ई०)

उपेन्द्रनाथ ‘अश्क’ (1910 – 1996 ई०)

1. रामचरित उपाध्याय (1872 – 1938 ई०) हिन्दी कवि एवं साहित्यकार थे।

जन्म: (1872 ई०) उत्तर प्रदेश के गाजीपुर जिले में हुआ था।

निधन: (1938 ई०)

प्रारंभ में ये ब्रजभाषा में कविता करते थे।

आचार्य महावीरप्रसाद द्विवेदी जी के प्रोत्साहन से इन्होंने खड़ी बोली में रचना प्रारंभ किया। इनकी रचनाएँ ‘सरस्वती‘ तथा हिन्दी की अन्य पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होने लगीं।

2. मुंशी प्रेमचंद- (1880 – 1936 ई०)

जन्म: 31 जुलाई (1880 ई०)

निधन: 8 ओक्टूबर (1936 ई०)

नाटक: संग्राम (1923 ई०)

यह नाटक किसानों के बीच व्याप्त कुरीतियों तथा किसानों के फिजूलखर्ची के कारण हुआ कर्ज और उसे नहीं चुका पाने के कारण अपनी फसल को कम दाम बेचने की समस्या का चित्रण है।    

नाटक: कर्बला (1924 ई०)

उस काल के मुस्लिम शासकों ने किस प्रकार मानवता प्रेमी और असहाय निर्बलों की सहायता करनेवाले हुसैन को परेशान किया और अमानवीय यातनाएँ देकर उनका  क़त्ल कर दिया। कर्बला के मैदान में यहा लड़ा गया यह युद्ध इतिहास में अपना विशेष महत्वा रखता है।      

प्रेम की वेदी (1933)

इस नाटक में हिंदू विवाह पद्धति, उसके स्वरुप, स्त्री की स्थिति, पुरुष वाद पर चर्चा है।

3. गोबिंदवल्लभ पंत- (1887 – 1961 ई०)

जन्म: 10 सितंबर (1887 ई०) अल्मोड़ा जिले के श्यामली, गाँव खूंट में हुआ था

निधन: 7 मार्च (1961 ई०)

प्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानी और वरिष्ठ भारतीय राजनेता, उत्तर प्रदेश के प्रथम मुख्यमंत्री और भारत के चौथे गृहमंत्री रहे।

इन्होने अपने साहित्य जीवन की शुरुआत नाटक लेखन से किया था।

उनकी 65 कृतियाँ प्रकाशित हुई हैं।

प्रारंभ में उनके  

महत्वपूर्ण नाटक:

वरमाला (1925 ई०)

ये नाटक मार्कंडेय पुराण की एक कथा पर आधारित है।

राजमुकुट (1935 ई०)

इस नाटक में मेवाड़ की पन्नाधाय के अभूतपूर्व त्याग और बलिदान का चित्रण हैं।

अंगूर की बेटी (1937 ई०)

यह एक सामाजिक नाटक है। इसमें मद्दपान की समस्या को सुधारवादी दृष्टि से प्रस्तुत किया गया है।

अंतः पुर का छिद्र (1940 ई०)  

ययाति (1951 ई०)

कंजूस की खोपड़ी, सुहाग बिन्दी

4. जयशंकर प्रसाद के महत्वपूर्ण नाटक

जयशंकर प्रसाद (1889 – 1937 ई०)

जन्म: (1889 ई०) गोवर्धन सराय काशी (उ.प्र.)

निधन: (1937 ई०)

महत्वपूर्ण नाटक

सज्जन (1910 ई०)

कल्याणी परिणय (एकांकी) (1912 ई०) 

करुणालय (गीतिनाट्य) (1913 ई०)

प्रायश्चित (1914 ई०)

राज्य श्री (हिन्दी पहला ऐतिहासिक नाटक) (1915 ई०)

विशाखा (पहला प्रौढ़ नाटक) (1921 ई०)

अजातशत्रु (पौराणिक नाटक) (1922 ई०)

जनमेजय का नाग यज्ञ (1926 ई०)

कामना (हिन्दी का पहला प्रतीकात्मक नाटक) (1927 ई०)

स्कंदगुप्त (1928 ई०)

एक घूँट (प्रथम एकांकी) (1929 ई०)

चन्द्रगुप्त (1931 ई०)

नाटक: ध्रुवस्वामिनी (समस्यात्मक नाटक) (1933 ई०)

अग्निमित्र (अपूर्ण)

नाटक: सज्जन (1910 ई०)

यह महाभारत के कथानक पर आधारित पौराणिक नाटक है।

इसमें दुर्योधन के प्रति युधिष्ठिर की सज्जनता का चित्रण है। (महाभारत काल)

इसमें गीतों का आधिक्य, वार्तालाप में शायरी और शैली में पारसी नाटकों का प्रभाव है।

नाटक: कल्याणी परिणय (एकांकी) (1912 ई०)

  • यह एकांकी नाटक है। इसमें चन्द्रगुप्त मौर्य और सेल्यूकस के कथा का चित्रण है।
  • चन्द्रगुप्त नाटक इसका परिवर्द्धित रूप है।
  • इस नाटक में काल्पनिकता अधिक और ऐतिहासिकता कम है।
  • इस नाटक को चन्द्रगुप्त नाटक का पूर्व संस्करण माना जाता है।

नाटक: करुणालय (गीतिनाट्य) (1913 ई०)

  • यह पौराणिक नाटक है।
  • इसमें वैदिक कालीन यज्ञ और हिंसा के विरोध में करुणा की प्रतिष्ठा है।
  • इसमें हरिश्चंद्र एवं विश्वामित्र की कथा का चित्रण है।

नाटक: प्रायश्चित (1914 ई०)

  • इस नाटक में देशद्रोह के लिए कन्नौज का शासक जयचंद से प्रायश्चित करवाता है।
  • इसमें ऐतिहासिक के तत्व कम है।
  • ‘प्रायश्चित्त’ छह दृश्यों का एकांकी नाटक है। 
  • जयचन्द द्वारा यवनों को बुलाकर पृथ्वीराज चौहान को पराजित करवाने के बाद उसके हृदय में उत्पन्न पश्चात्ताप-भाव पर केन्द्रित है।
  • यह प्रसाद जी के साहित्यिक व्यक्तित्व के निर्माण-काल का नाटक है।

राज्य श्री (हिन्दी पहला ऐतिहासिक नाटक) (1915 ई०)

  • राज्यश्री नाटक में मालवा, स्थाणेश्वर, कन्नौज और मगध की राज परिस्थितियों का वर्णन मिलता है।
  • यह उनका प्रथम ऐतिहासिक नाटक है।
  • इस नाटक में स्थानेश्वर में अपना राज्य स्थापित कर प्रभाकरवर्धन सीमा का विस्तार करता है और अपनी पुत्री राज्यश्री की विवाह कन्नौज राज ग्रहवर्मन से कर देता है।
  • स्थानेश्वर और कन्नौज का उत्कर्ष देखकर मालवा और गौड़ ईर्ष्यालु बन जाते हैं।
  • इन्हीं ईर्ष्यालु राजाओं के कुचक्रों की लीला इस नाटक में दृष्टिगोचर होता है।

नाटक: विशाखा (पहला प्रौढ़ नाटक) (1921 ई०)

  • यह जयशंकर प्रसाद का प्रथम प्रौढ़ नाटक माना जाता है। इसमें प्रेम की विजय का वर्णन है।
  • ‘विशाख’ कल्हण द्वारा संस्कृत में रचित सुप्रसिद्ध ऐतिहासिक ग्रन्थ राजतरंगिणी में वर्णित एक ऐतिहासिक घटना पर अवलम्बित है।
  • स्वयं जयशंकर प्रसाद के विचारानुसार यह घटना ईसापूर्व प्रथम शताब्दी अथवा उससे कुछ और पहले की हो सकती है। 
  • तीन अंकों के इस नाटक में प्रथम अंक में 5, द्वितीय में 7 और तृतीय में 5 दृश्य संयोजित हैं।
  • इस नाटक में कश्मीर के राजा नरदेव एक प्रमुख पात्र के रूप में उपस्थापित किये गये हैं।
  • नाटक का नायक विशाख एक स्नातक ब्राह्मण है।
  • इस नाटक में अन्याय और अत्याचारी शासन का व्यापक चित्र है, जिसमें धर्म, धन और सत्ता के बल पर प्रभुत्वकामी नेतृत्व करने वाले लोगों द्वारा सामान्य गरीब जनता का सर्वस्व अपहरण सन्दर्भ के रूप में प्रस्तुत है।
  • इस नाटक में आभूषणप्रियता की निन्दा, सत्याग्रह पर बल, सत्कर्म के प्रति निष्ठा, आत्मसम्मान की मूल्यवत्ता तथा स्वराज्य की प्रतीकात्मक आवश्यकता पर जिस प्रकार से बल दिया गया है।
  • नाटक में महात्मा गाँधी के विचारों से प्रभावित स्वाधीनता आन्दोलन का स्पष्ट संकेत मिलता है।

नाटक: अजातशत्रु (पौराणिक नाटक) (1922 ई०)

  • यह ऐतिहासिक नाटक है।
  • इसमें अतीत का गौरवगान मुख्य है।
  • लोकमंगल इसके उद्देश्य है।
  • इस नाटक में असत्य पर सत्य का विजय का वर्णन है।
  • सम्राट बिम्बसार जीवन के प्रति विरक्त भाव रखते हैं।
  • भगवान बुद्ध के आदेश से सम्पूर्ण राज्य अजातशत्रु को सौंपकर विरक्त हो जाते है। मगध में होने वाली इस घटना का प्रभाव कोशल पर पड़ता है। कोशल के राजा प्रसेनजित और युवराज विरुद्धक में अजात के राज्याभिषेक को लेकर विरोध उत्पन्न हो जाता है। विरुद्धक अपनी माता शक्तिमती के साथ पिता के विरुद्ध हो जाता है। कौशांबी की घटना इस दृष्टि से मनोरंजक है। मागधी का षडयंत्र इतना भीषण होता है कि उदयन और पद्मावती के सम्बन्ध कुछ समय के लिए बिगड़ जाते है। नाटक में अजातशत्रु और विरुद्धक के एक ओर उदयन और प्रसेनजित उनके विरोध में दिखाई देते हैं। नाटक की परिसमाप्ति में बौद्ध धर्म का स्पष्ट प्रभाव है, क्योंकि सभी व्यक्ति पश्चात्ताप प्रकट करते हैं। शांत रस की स्थापना के साथ यह नाटक समाप्त होता है।

नाटक: जन्मेजय का नागयज्ञ (1926 ई०)

पौराणिक कथा के अनुसार एक दिन राजा परीक्षित जंगल में शिकार करने गए। जहां जानवरों का पीछा करते-करते परीक्षित काफी थक गए। भूख और प्यास से उन्हें काफी परेशान कर दिया था और राजा परीक्षित अपनी प्यास बुझाने के लिये इधर उधर भटकने लगे। अंततः उन्हें एक आश्रम दिखाई दिया आश्रम देखकर राजा को यह विश्वास हुआ कि आश्रम में अवश्य ही जलपान उपलब्ध हो सकेगा इसी विश्वास के साथ राजा परीक्षित ने आश्रम में प्रवेश किया। आश्रम के चारों ओर घूम कर देखने के उपरांत कोई भी व्यक्ति नहीं दिखाई दिया शिवाय एक ऋषि के जोकि अपने आश्रम पर बैठे आंख मूंदकर साधना में लीन थे। राजा ने ना चाहते हुए भी साधु को अनेकों बार पानी और भोजन के लिए इच्छा प्रकट करते हुए पुकारा किंतु ध्यान में मग्न ऋषि ने राजा के कोई प्रतिउत्तर नहीं दिया। उत्तर ना पाकर राजा अति क्रोधित हुआ और राजा ने पास में पड़े एक म्रत सांप को धनुष्य उठाकर राशि ऋषि के गले में डाल दिया।

ऋषि समीक के पुत्र श्रृंगी को जब यह बात पता चली की राजा परीक्षित ने ध्यानावस्थित उनके पिता के गले में मरे सांप को डालकर उनके पिता का घोर अपमान किया है तो वह क्रोधित हो उठे। राजा परीक्षित द्वारा अपने पिता के अपमान से दुखी होकर श्रंगी ऋषि ने राजा को श्राप दिया कि 7 दिन के अंदर नागराज तक्षक अपने विष से परीक्षित को जला देगा। ऋषि-मुनियों द्वारा नागराज तक्षक द्वारा अपने पिता परीक्षित को भस्म करने का वृतांत को सुनकर परीक्षित के पुत्र जनमेजय बड़े दुखी हो गए और उन्होंने ऋषि मुनियों की सलाह पर नागयज्ञ का निश्चय किया जिसे जनमेजय नागयज्ञ के नाम से जाना गया।

जनमेजय नागयज्ञ हिण्डौन शहर से 15 किलोमीटर दूर पूर्व में ग्राम जगह के पास जगर नदी के समीप संपन्न हुआ जो आज भी ‘कुण्डेवा’ के नाम से प्रसिद्ध है।

नाटक: कामना (हिन्दी का पहला प्रतीकात्मक नाटक) (1927 ई०)

कामना 3 अंकों और 22 दृश्यों का एक प्रतीकात्मक नाटक है।

कामना, संतोष, विनोद, विलास, विवेक, शांतिदेव, दम्भ, दुर्वृत्त, क्रूर, लीला, लालसा, करुणा, प्रमदा, वनलक्ष्मी और महत्त्वाकांक्षा की मानवीकरण प्रक्रिया के द्वारा प्रसाद जी ने कामना, लालसा और महत्त्वाकांक्षा के कारण कैसे संतोष, शांति और विवेक के स्थान पर दंभ, दुर्वृत्त, क्रूरता, विलास, प्रमदा, विनोद आदि प्रबल होकर व्यक्ति और राष्ट्र की संस्कृति और शांति को नष्ट करते हैं।

एक घूँट (प्रथम एकांकी) (1929 ई०)

‘एक घूँट’ यह एकांकी नाटक है। इसमें कोई दृश्य और अंक विभाजन नहीं है।

नाटक: अग्निमित्र (अपूर्ण) यह नाटक अधुरा प्रकाशित हुआ था।

5. माखनलाल चतुर्वेदी (1889 – 1968 ई०)

जन्म: 4 अप्रैल (1889 ई०)

निधन: 30 जनवरी (1968 ई०)

महत्वपूर्ण नाटक

दयानंद नाटक (1917 ई०)

कृष्णार्जुन (1918 ई०)

अंजना (1923 ई०)

भाग्यचक्र (1937 ई०)

आनरेरी मजिस्ट्रेट(1917 ई०)

6. वृन्दावन लाल वर्मा (1889 – 1969 ई०)

जन्म: 9 जनवरी (1989 ई०) मऊरानी नगर

निधन: 23 फ़रवरी (1969 ई०)

महत्वपूर्ण नाटक:

सेनापति उदल (1907 ई०) इस नाटक को तत्कालीन ब्रिटिश सरकार ने जब्त कर लिया था।

धीरे-धीरे (1939 ई०)

राखी की लाज (1943 ई०)

सगुन (1946 ई०)

फूलों की बोली (1947 ई०)

मंगलसूत्र (1949 ई०)

बाँस की फाँस

काश्मीर का काँटा

हंसमयूर

रानी लक्ष्मीबाई

बीरबल (1950 ई०)

खिलौने की खोज (1950 ई०)

पूर्व की ओर (1950 ई०)

नीलकण्ठ (1951 ई०)

केवट (1951ई०)

कनेर

पीले हाथ (1952 ई०)

जहाँदारशाह (1952 ई०)

ललित विक्रम (1953 ई०)

निस्तार (1955 ई०)

लो भाई पंचों लो

देखादेखी (1955 ई०)

7. गंगाप्रसाद श्रीवास्तव 1889 – 1976 ई०

जन्म: 23 अप्रैल (1889 ई०) सारण, बिहार

निधन: 30 अगस्त (1976 ई०)

गंगाप्रसाद जी को रेडियो नाटिका का जन्मदाता माना जाता है।

उनकी पहली रचना ‘लंबी दाढ़ी’ विद्यार्थी जीवन में ही लिखी गई थी।

यह कहानी थी (1911 ई०) में काशी से प्रकाशित होने वाली इन्दु पत्रिका प्रकाशित हुई थी।

हिन्दी के हास्य लेखकों में इनका प्रमुख स्थान है।

कई नाटकों में उन्होंने सशक्त अभिनय किया था।

वे एकांकी के सशक्त अभिनेता थे।

एकांकी लेखन में माहिर, उन्हें हिन्दी एकांकीकार के रूप में जाना जाता है।

गंगा बाबू को ‘साहित्य वारिधि’ और ‘साहित्य महारथी’अलंकार से विभूषित किया गया।

महत्वपूर्ण नाटक:

दुमदार आदमी, इधर जनाना उधर मरदाना, पैदाइशी मजिस्ट्रेट आदि।  

8. सियारामशरण गुप्त 1895 – 1963 ई०

जन्म: 4 सितंबर (1895 ई०) चिरगाँव

निधन: 29 मार्च (1963 ई०)

नाटक- पुण्य पर्व

9. बदरीनाथ भट्ट (सुदर्शन) 1896 – 1967 ई

जन्म: (1896 ई०)

निधन: (1967 ई०)

प्रमुख नाटक:

कुरुवनदहन (1912 ई०) वेणीसंहार का अनुवाद

चुंगी की उम्मीदवारी (1919 ई०)

दुर्गावती (1925 ई०)

सुदर्शन प्रेमचंद युग के कहानीकार थे।

‘हार की जीत’ पंडित बदरीनाथ भट्ट की पहली कहानी थी।

सन 1935 ई० में ‘कुंवारी या विधवा’ फिल्म का निर्देशन भी किया।

उन्होंने ‘धूप-छाँव’ के प्रसिद्ध गीत “बाबा मान की आँखें खोल” का लेखन किया जो बहुत ही लोकप्रिय हुआ।

10. सेठ गोविंददास 1896 – 1974 ई०

जन्म: 16 ओक्टूबर (1896 ई०) जबलपुर के समृद्ध माहेश्वरी परिवार में जन्म हुआ।    

निधन: 18 जून (1974 ई०)

  • सन् 1917 ई० में सेठजी का पहला नाटक ‘विश्व प्रेम’ छपा और उसका मंचन भी हुआ था।
  • विदेशी नाटककार ‘इब्शन’ से प्रेरित होकर उन्होंने अपने लेखन में आमूल-चूल परिवर्तन किया।
  • हिन्दी साहित्य में दूसरा प्रभाव सेठजी पर शेक्सपियर का पड़ा। 
  • उन्होंने नई शैली का प्रयोग कर ‘प्रतीक’ शैली में नाटक लिखे।
  • ‘विकाश’ उनका स्वप्न नाटक था।
  • ‘नवरस’ उनका नाट्य-रूपक है। हिन्दी में मोनों ड्रामा सबसे पहले सेठजी ने ही लिखा।
  • ग्रहण और त्याग में गाँधीवादी और साम्यवाद में श्रेष्ठ कौन है? इस प्रश्न को उठाया।
  • ‘पाकिस्तान’ नाटक में विभाजन के उपरान्त दोनों देशों के अल्पसंख्यकों में व्याप्त असंतोष और विश्वास की भावनाओं का चित्रण है
  • निहलिस्ट कथाओं के विचारों से जोड़कर ‘गरीबी-अमीरी’ नामक नाटक की रचना की
  • ‘पंचभूत’ यह एकांकी संग्रह है।

महत्वपूर्ण नाटक:

हर्ष (1935 ई०)

प्रकाश (1935 ई०)

कर्तव्य (1935 ई०)

कर्ण (1946 ई०)

शेरशाह, नवरस (1940 ई०)

सेवापथ (1940 ई०)

विकास (1941 ई०)

संतोष कहाँ (1945 ई०)

महत्व किसे (1947 ई०) 

गरीबी-अमीरी (1947 ई०)

कुलीनता, ग्रहण, त्याग, सच्चा धर्म, प्रायश्चित

प्रमुख तथ्य:  

  • इन्होने हिन्दी में 100 से ज्यादा पुस्तकों की रचना की, जिनमें उपन्यास, काव्य संग्रह और नाटक तीनों शामिल हैं।    
  • सन् 1923 में सेठ गोविंद दास केंद्रीय सभा के लिए चुने गए, साल 1947 से 1974 तक वह जबलपुर लोकसभा सीट से सांसद रहे।    
  • स्वतंत्रता संग्राम के दौरान राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के सभी आंदोलनों में हिस्सा लिया, कई बार जेल भी गए।     
  • हिन्दी के सवाल पर संसद में मजबूती से हिन्दी का पक्ष लिया करते थे। राजभाषा का दर्जा दिलाने में उनकी अहम भूमिका रही।
  • सन् 1961 में भारत सरकार ने उन्हें देश के तीसरे सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्मभूषण से नवाजा।    
  • हिंदी में पहले-पहल मोनो ड्रामा उन्होंने ही लिखे, ‘विकास’ उनका स्वप्न नाटक है तो ‘नवरस’ उनका नाटय़-रुपक है।

11. पांडेय बेचन शर्मा ‘उग्र’ 1900 – 1967 ई०

जन्म: 29 दिसंबर (1900 ई०) चुनार

निधन: 23 मार्च (1967 ई०)

पांडेय बेचन शर्मा ‘उग्र’ में महत्वपूर्ण नाटक:

महात्मा ईसाचुंबनचार बेचारे, गंगा का बेटा, आवास, अन्नदाता माधव महाराज महान्।  

12. लक्षमीनारायण मिश्र 1903 – 1967 ई०

जन्म: (1903 ई०) आजमगढ़, उत्तर प्रदेश

निधन: (1967 ई०)

लक्ष्मीनारायण मिश्र के महार्वापूर्ण नाटक

अशोक (1926 ई०)

संन्यासी (1930 ई०) इस नाटक में विदेशी शासकों के धोखाघड़ी, गांधी के असहयोग आंदोलन, रौलट एक्ट और पंजाब के हत्या काण्ड से उत्पन्न स्थितियों का चित्रण है।

राक्षस का मन्दिर (1931 ई०)

मुक्तिका रहस्य (1932 ई०)

राजयोग और सिन्दूर की होली (1933 ई० )

आधी रात (1936 ई०)

गरुड़ध्वज (1945 ई०)

नारद की वीणा (1946 ई०)

वत्सराज और दशाश्वमेध (1950 ई०)

वितस्ता की लहरें (1953 ई०) इस नाटक में सिकंदर को कुटिल विजेता के रूप में चित्रित किया गया है।

चक्रव्युह (1955 ई०)

गंगा द्वारा (1974 ई०)

समाज के स्तम्भ

गुड़िया का घरमें

लक्ष्मीनारायण मिश्र के सभी नाटक तीन अंकों में है।

अंको का विभाजन दृश्यों में नहीं किया गया है।

13. जगन्नाथ प्रसाद ‘मिलिंद’ (1907 – 1987 ई०)

जन्म: 16 सितंबर (1907 ई०) ग्वालियर के मुरार में हुआ था 

निधन: (1987 ई०)

जगन्नाथ प्रसाद ‘मिलिंद’ महत्वपूर्ण नाटक:

उनके 6 नाटक हैं।

प्रतापप्रतिज्ञा

जीवन संगीत

नवयुवक का ज्ञान

बलिपथ के गीत

भूमि की अनुभूति

पंखुरियाँ

14. हरिकृष्ण प्रेमी (1908 – 1974 ई०)

जन्म: (1908 ई०) गुणा, ग्वालिर  (म. प्र.) में हुआ था।

निधन: (1974 ई०)

हरिकृष्ण ‘प्रेमी’ के महत्वपूर्ण नाटक:

स्वर्ण विहान (1930 ई०)

रक्षाबंधन (1934 ई०)

पाताल विजय (1936 ई०)

शिव साधना (1937 ई०)

प्रतिशोध (1937 ई०)

स्वप्न भंग (1940 ई०)

बन्धन (1940 ई०)

आहुति (1940 ई०)

छाया (1941 ई.)

उद्धार (1949 ई०)

प्रकाश स्तंभ (1954 ई०)

कीर्ति स्तंभ (1955 ई०)

शतरंज के खिलाड़ी (1955 ई०)

संगरक्षक (1958 ई०)

साँपों की सृष्टि (1959 ई०)

रक्तदान (1962 ई०)

आन का मान (1962 ई०)

अमर आन (1969 ई०)

अमर बलिदान (1968 ई०)

अमृत पुत्री (1970 ई०)

  • स्वर्ण विहान (1930 ई.) ‘प्रेमी’ जी की सर्वप्रथम प्रकाशित यह गीति-नाट्य है।
  • ‘रक्षाबंधन’ (1934 ई०) ऐतिहासिक नाटक है। इसमें गुजरात के बहादुर शाह के आक्रमण के अवसर पर चित्तौड़ की रक्षा के लिए रानी कर्मवती द्वारा मुग़ल सम्राट हुमायूँ को राखी भेजने का प्रसंग है।
  • इस रचना का मूल उद्देश्य हिंदू मुस्लिम सामंजस्य की भावना को जागाना था।
  • ‘पाताल विजय’ (1936 ई०) ‘प्रेमी’ जी का यह एकमात्र पौराणिक नाटक है।
  • ‘शिव साधना’ (1937 ई०) में शिवाजी की औरंगजेब की साम्प्रदायिक एवं तानाशाही नीति के विरोधी तथा धर्म निरपेक्षता और राष्ट्रीय भावना के संस्थापक के रूप में चित्रित किया गया है।
  • ‘प्रतिशोध’ (1937 ई० में छत्रपाल द्वारा बुंदेलखण्ड की शक्तियों को एकत्र करके औरंगजेब से टक्कर लेने का प्रसंग है।
  • स्वप्न भंग (1940 ई०) में शाहजहाँ के पुत्र द्वारा हिंदू-मुस्लिम एकता के लिए अपना बलिदान करने का चित्रण है।
  • बन्धन’ (1940 ई०) इस नाटक में मजदूरों और पूँजीपति के संघर्ष का चित्रण है।

समस्या का हल गाँधी जी की हृदय-परिवर्तन की नीति पर आधारित है।

  • ‘आहुति’ (1940 ई०) इसमें रणथम्भौर के हम्मीर देव द्वारा शरणागत रक्षा के लिए अलाउद्दीन खिलजी से संघर्ष और आत्म बलिदान की कथा है।
  • ‘छाया’ (1941 ई.) इसमें साहित्यकार के आर्थिक संघर्ष का चित्रण है। ‘
  • ‘ममता’ इसमें दाम्पत्य जीवन की समस्याओं का उद्घाटन है।

15. उपेन्द्रनाथ ‘अश्क’ 1910 – 1996 ई०

जन्म: 14 दिसंबर (1910 ई०) जालंधर

निधन: 19 जनवरी (1996 ई०) प्रयागराज

उपेन्द्रनाथ ‘अश्क’ के महत्वपूर्ण नाटक

जय-पराजय (1937 ई०)

वैश्या (1938 ई०)

लक्ष्मी का स्वागत (1938 ई०)

स्वर्ग की झलक (1939 ई०)

जोंक (1939 ई०)

आपस का समझौता (1939 ई०)

पहेली (1939 ई०)

देवताओं की छाया में (1939 ई०)

विवाह के दिन (1940 ई०)

छठा बेटा (1940 ई०) इस नाटक में अश्क जी पिता और पुत्र बदलते हुए संबंधों को चित्रित किया है।

नया-पुराना (1941 ई०)

चमत्कार (1941 ई०)

खिड़की (1941 ई०)

सूखी डाली (1941 ई०)

बहनें (1942 ई०)

कामदा (1942 ई०)

मेमुना (1942 ई०)

चिलमन (1942 ई०)

चुम्बक (1942 ई०)

तौलिये (1943 ई०)

तूफ़ान से पहले (1947 ई०)

चरवाहे ( 1948 ई०)

कस्बे के क्रिकेट क्लब का उद्घाटन (1950 ई०)

कैद और उड़ान (1950 ई०)

मस्केबाजों का स्वर्ग (1951 ई०)

पर्दा उठाओ पर्दा गिराओ (1951 ई०)

पैंतरे (1953 ई०)

अलग-अलग रास्ते (1954 ई०)

अंजो दीदी (1955 ई०) यह अश्क जी की सर्वाधिक प्रौढ़ नाटक है।

अंधी गली के आठ एकांकी (1956 ई०)

भंवर (1961 ई०) |

4. प्रसादोत्तर युग (1930 से लगातार)

1. उदयशंकर भट्ट (1898 – 1966 ई०)

जन्म: (1898 ई०) इटावा,  उत्तर प्रदेश

निधन: 28 फरवरी (1966 ई०)

विक्रमादित्य (1929 ई०)

दाहर या सिंधपतन (1933 ई०)

सागर विजय (1933 ई०)

कमला (1935 ई०)

विद्रोहिणी अम्बा (1935 ई०)

मत्स्यगंधा (1937 ई०)

विश्वामित्र (1938 ई०)

राधा (1941 ई०)

अशोकवन-बन्दिनी (1959 ई०)

गुरु द्रोण का अन्तर्निरीक्षण (1959 ई०)

अश्वत्थामा (1959 ई०)

असुरसुंदरी (1972 ई०)

अंतहीन अंत, मुक्तिपथ, शक विजय, नया समाज, पार्वती, विक्रमोवर्शीय, नहुष निपात कालिदास, संत तुलसीदास, एकला चलो रे, क्रांतिकारी, अभिनव एकांकी नाटक, स्त्री का हृदय आदिम युग, तीन नाटक, धूमशिखा, परदे के पीछे, अंधकार और प्रकाश, समस्या का अंत आज का आदमी, दस हजार एकांकी        

2. सेठ गोबिंद दास (1896 – 1974 ई०)

जन्म: 16 औक्तुबर (1896 ई०)

निधन: जून 18 (1974 ई०)

प्रमुख नाटक:

सन 1917 ई० में सेठ जी पहला नाटक ‘विश्व प्रेम’ छपा और मंचन भी हुआ था।

प्रसिद्ध विदेशी नाटककार इब्सन से प्रेरणा लेकर इन्होने नई तकनीक का प्रयोग कर ‘प्रतीक शैली’ में नाटक लिखे।

‘विकास’ उनका स्वप्न नाटक है

‘नवरस’ उनका नाट्य रूपक है

हिन्दी में ‘मोनो ड्रामा’ पहले-पहल सेठ जी ने ही लिखे थे।

‘शेरशाह’ नाटक में हिन्दु-मुश्लिम एकता और मुसलामानों राष्ट्रीय भावना का चित्रण है

‘ग्रहण और त्याग’ में गाँधीवाद और साम्यवाद में श्रेष्ठतर कौन है? इस प्रश्न को उठाया है।

‘पाकिस्तान’ नाटक में विभाजन के उपरान्त दोनों देशों के अल्पसंख्यकों में व्याप्त असंतोष और अविश्वास की भावनाओं का चित्रण है।

‘गरीबी-अमीरी’ नाटक में निहलिस्ट कथाओं के विचारों से जोड़कर रचना किया है।

3. मोहन राकेश (1925 – 1972 ई०)

जन्म: 8 जनवरी (1925 ई०) अमृतसर

निधन: 3 जनवरी (1972 ई०) दिल्ली

मोहन राकेश के महत्वपूर्ण नाटक:

अषाढ़ का एक दिन (1958 ई०)

लहरों के राजहंस (1963 ई०) यह नाटक का कथानक ‘अश्वघोष’ के ‘सौन्दरनंद’  पर आधारित है।

आधे-अधूरे (1969 ई०)

अलमगीर (1999 ई०)

पैर तले की जमीन- यह मोहन राकेश का अधूरा नाटक है जिसे कमलेश्वर ने पूरा करके प्रकाशित किया। 

4. लक्ष्मीनारायण लाल (1927- 1987 ई०)

जन्म: (1927 ई०) जलालपुर बसती (उ०प्र)

निधन: (1987 ई०)

लक्ष्मीनारायण लाल के महत्वपूर्ण नाटक:

अँधा कुआँ (1955 ई०) इस नाटक में शराबी पति द्वारा पत्नी पर किए जाने वाले अत्याचार का चित्रण है।  

मादा कैक्टस (1959 ई०) इस नाटक की विधा स्पेनिश नाटककार ‘ग्रेशियालार्का’ से मिलती जुलती है। यह अन्यायदेशिक रचना है।

तीन आँखों वाली मछली (1960 ई०) यह हिन्दी का प्रथम अस्तित्ववादी नाटक है।

सुखा सरोवर (1960 ई०)

सुंदररस (1960 ई०) इस नाटक में चर्म सौंदर्य के जगह कर्म सौंदर्य को प्रतिष्ठित किया गया है।  

नाटक बहुरंगी (1961 ई०)

नाटक तोता मैना (1962 ई०)

रात-रानी (1962 ई०)

दर्पण (1962 ई०)

कॉफी हाउस में इन्तजार (1962 ई०)  

रक्तकमल (1963 ई०)

सूर्यमूख (1968 ई०)

कलंकी (1969 ई०)

मिस्टर अभिमन्यु (1971 ई०)

करफ्यू (1972 ई०)

दूसरा दरवाजा (1972 ई०)

अब्दुल्ला दीवाना (1973 ई०)

नरसिंह कथा (1975 ई०)

व्यक्तिगत (1975 ई०)

गुरु (1976 ई०)

यक्षप्रश्न (1976 ई०)

एक सत्य हरिश्चंद्र (1976 ई०)

गंगामाटी (1977 ई०)

सगुण पक्षी (1977 ई०)

सबरंग मोहभंग (1977 ई०)

पंचपुरुष (1978 ई०)

राम की लड़ाई (1979 ई०)

कजरीवन (1980 ई०)

हाथी घोडा चूहा(1980 ई०)   

बलराम की तीर्थयात्रा (1983 ई०)

कजरीवन

5. सर्वेश्वरदयाल सक्सेना (1927- 1983 ई०)

जन्म: (1927 ई०) बसती (उ०प्र)

निधन: (1983 ई०)

महत्वपूर्ण नाटक:

बकरी (1974 ई०)

कड़ाई (1979 ई०)

अब गरीबी हटाओं (1981 ई०)

6. सुरेन्द्र वर्मा (1942 ई० आधुनिक बोध के नाटककार)

जन्म: 7 सितंबर (1942 ई०)

महत्वपूर्ण नाटक:

द्रौपदी (1972 ई०)

सेतुबंध (1972 ई०)

नायक खलनायक विदूषक (1972 ई०)

सूर्य की नतिम किरण से सूर्य की पहली किरण तक (1975 ई०)

आठवां सर्ग (1976 ई०)

छोटे सयैद बड़े सयैद (1982 ई०)

एक दुनी एक (1987 ई०)

शकुंताला की अँगूठी (1990 ई०)

कैद ए हैयात (1993 ई०)

7. मणिमधुकर (1942 ई०)

मूलनाम: मनीराम

जन्म: 9 सितंबर (1942 ई०) सेऊवा, राजगढ़, तहसील चुरू

मूलतः राजस्थानी साहित्यकार

महत्वपूर्ण नाटक:

रसगंधर्व (1975 ई०)

बुलबुल की सराय (1978 ई०)

दुलारीबाई (1978 ई०)

खेला पोलमपुर (1979 ई०) 

इकतारे की आँख (1980 ई०)

8. जगदीशचंद्र माथुर (1917 – 1978 ई०)

जन्म: 16 जुलाई (1917 ई०), खुर्जा

निधन: 14 मई (1978 ई०)

जगदीशचंद्र माथुर के महत्वपूर्ण नाटक:

भीर का तारा (1946 ई०)

ओ मेरे सपना (1950 ई०)

कोणार्क (1951 ई०)

शारदीया (1959 ई०)

दस तस्वीरें (1962 ई०)

परंपराशील नाट्य (1968 ई०)

पहला राजा (1969 ई०)

जिन्होंने जीना सीखा (1972 ई०)

दशरथ-नंदन (1974 ई०)

रघुकुलरीति (1995 ई०) मरणोपरांत

9. डॉ रामकुमार वर्मा – (1905 – 1990 ई०)

डॉ रामकुमार वर्मा को एकांकी का ‘जनक’ माना जाता है।

जन्म: 15 सितंबर (1905 ई०) सागर, मध्यप्रदेश

निधन: 5 ऑक्तुबर (1990 ई०)

रामकुमार वर्मा के महत्वपूर्ण नाटक:

कौमुदी महोत्सव (1954 ई०)

विजय पर्व (1954 ई०)

कला और कृपाण (1955 ई०)

नाना फंड़वीस (1956 ई०)

महाराणा प्रताप (1960 ई०)

शिवाजी (1965 ई०)

अशोक का शोक (1967 ई०)

जौहर और ज्योति (1967 ई०)

अग्निशिखा (1970 ई०)

जयादित्य (1971 ई०)

संत तुलसीदास (1974 ई०)

जयवर्धमान (1975 ई०)

भगवान् बुद्ध (1975 ई०)

समुंद्रगुप्त पराक्रमांक (1978 ई०)

सम्राट कनिष्क (1978 ई०)

स्वयंवरा (1980 ई०)

वत्सराज उद्यन

महामेघ वाहन खारवेल

जहिरुद्धीन मुहम्मद बाबर

10. लक्ष्मीकांत वर्मा (1922 ई०)

जन्म: 15 फ़रवरी (1922 ई०)

महत्वपूर्ण नाटक:

तिन्दुवुलम् (1958 ई०)

सीमांत के बादल (1963ई०)

अपना-अपना जूता (1964 ई०)

रोशनी एक नदी है (1974ई०)

ठहरी हुई जिंदगी (1980 ई०)

11. मोहन राकेश (1925 – 1972 ई०)

जन्म: 8 जनवरी (1925 ई०) अमृतसर

निधन: 3 जनवरी (1972 ई०) दिल्ली

महत्वपूर्ण नाटक:

अषाढ़ का एक दिन (1958 ई०)

लहरों के राजहंस (1963 ई०)

आधे-अधूरे (1969 ई०)

पैर तले की जमीन (1975 ई०)

12. भीष्म साहनी (1915 – 2003 ई०)

जन्म: 8 अगस्त (1915 ई०) रावलपिंडी, पकिस्तान

निधन: 11 जुलाई (2003 ई०) दिल्ली 

महत्वपूर्ण नाटक:

हानूश) (1977 ई०)

कबीरा खड़ा बाजार में (1981ई०)

माधवी (1985 ई०)

मुआवजे रंग दे बसंती चोला (1993 ई०)

आलमगीर (1999 ई०)

13. विष्णु प्रभाकर (1912 – 2009 ई०)

जन्म: 21 जून (1912 ई०), मीरापुर

निधन: 11 अप्रैल (2009 ई०) दिल्ली

महत्वपूर्ण नाटक:

डॉक्टर (1958 ई०)

युगे युगे क्रांति (1969 ई०)

टूटते परिवेश (1974 ई०)

कुहासा और किरण (1975 ई०)

डरे हुए लोग (1978 ई०)

वंदिनी (1979 ई०) 

अब और नहीं (1981ई०)

सत्ता के आर-पार (1981 ई०)

श्वेत कमल (1984 ई०)

14. शंकर शेष (1933 – 1981 ई०)

जन्म: 2 ऑक्तुबर (1933 ई०), बिलासपुर, छतीसगढ़

निधन: 28 ऑक्तुबर (1981 ई०), श्रीनगर (कश्मीर)

शंकर शेष के महत्वपूर्ण नाटक:

बिन बाती के दीप (मंचन 1970 ई०)

फंदी (1971 ई०)

रक्तबीज (1978 ई०)

बंधन अपने-अपने (1980 ई०)

एक और द्रोणाचार्य (1980 ई० द्वितीय सं.)

अरे! मायावी सरोवर (1981 ई० द्वितीय सं.)

कोमल गांधार (1983 ई०)

चहरे (1983 ई०)

पोस्टर (1983 ई०)

खजुराहों का शिल्पी, बाढ़ का पानी: चन्दन का दीप, घरौंदा, रत्नगर्भा, राक्षस, नयी सभ्यता: नये नमूने, आधी रात के बाद, चेतना, धर्म कुरुक्षेत्र, एक साथ की गाथा, मूर्तिकार, तिल का ताड़, कालजयी

नोट- शंकर शेष: का समग्र नाटक (3 खण्ड) में

संपादित-हेमंत कुकरेती, किताबघर, नयी दिल्ली से

15. मुद्राराक्षस (1933 – 2016 ई०)

मूलनाम: सुभाष चंद्र वर्मा, साहित्य में मुद्राराक्षस के नाम से प्रसिद्ध थे।

जन्म: 21 जून (1933 ई०) लखनऊ

निधन: 13 जून (2016 ई०) प्रसिद्ध नाटककार, उपन्यासकार आलोचक तथा व्यंग्यकार थे।

मुद्राराक्षस के महत्वपूर्ण नाटक:

तिलचट्टा मरजीवा योअर्स फेथफुली तेंदुआ संतोला गुफाएँ मालविकाग्निमित्र और हम घोटाला कोई तो कहेगा सीढ़ियाँ आला अफसर डाकू

16. गिरिराज किशोर (1938 – 2020 ई०)

जन्म: 8 जुलाई (1939 ई०) मुजफ्फर नगर

निधन: 9 फ़रवरी (2020 ई०), नई दिल्ली

गिरिराज किशोर के महत्वपूर्ण नाटक:

बादशाह बेगम गुलाम (1979 ई०)

प्रजा ही रहने दो (1977 ई०)

घोडा और घास (1980 ई०)

चेहरे-चेहरे किसके चेहरे (1983 ई०)

केवल मेरा नाम लो (1984 ई०)

जुर्म आयद (1987 ई०)

काठ की तोप (2001 ई०)

17. स्वदेश दीपक (1942 ई०)

जन्म: अगस्त (1942 ई०), अंबाला छावनी (हरियाणा)

2 जून 2004 ई० को सुबह सैर के लिए निकले और आजतक वापस नहीं आए।

स्वदेश भारती के महत्वपूर्ण नाटक:

बाल भगवान (1989 ई०)

कोर्ट मार्शल (1991 ई०)

जलता हुआ रथ (1998 ई०)

सबसे उदास कविता (1999 ई०)

काल कोठरी (1999 ई०)

मैने मांडू नहीं देखा

18. हमीदुल्ला (1908 – 2002 ई०)

जन्म: 9 फ़रवरी (1908 ई०), हैदराबाद

निधन: 17 सितंबर (2002 ई०) संयुक्त राज्य अमेरिका

हमीदुल्ला के महत्वपूर्ण नाटक:

उलझी आकृतियाँ (1973 ई०)

दरिन्दे (1975 ई०)

उत्तर उर्वशी (1979 ई०)

हरवार (1986 ई०) 

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