वचन

वचन- ‘वचन’ का शाब्दिक अर्थ होता है ‘संख्या’। वचन का अर्थ ‘कहना’ भी होता है। संज्ञा, सर्वनाम, विशेषण और क्रिया के जिस रूप से संख्या का बोध होता है, उसे वचन कहते है। जैसे- शिक्षिका बच्चों को पढ़ा रही है। माली पौधों को सींच रहा है। तालाब में बच्चे स्नान कर रहे हैं।

टोकरी में सब्जियाँ हैं। इन वाक्यों में- माली, टोकरी, तालाब शब्द से एक होने का बोध होता है और शिक्षिका, सब्जियाँ, पौधों शब्द से एक से अधिक होने का बोध होता हैं।

वचन के दो प्रकार होते हैं-

  1. एकवचन- संज्ञा के जिस रूप से एक वस्तु, प्राणी या पदार्थ का बोध होता हैं, उसे एकवचन कहते है। जैसे- माता, नदी, गाय, घोडा, टोपी, सिपाही, मोर, माली आदि।
  2. बहुवचन- संज्ञा के जिस रूप से एक से अधिक वस्तुओं, प्राणियों या पदार्थों का बोध होता है उसे बहुवचन कहते है। जैसे- माताएँ, बेटियाँ, लड़कियाँ, पुस्तकें, नदियाँ, गाड़ियाँ आदि। हिंदी एकवचन के लिए एक और एक से अधिक के लिए बहुवचन का प्रयोग किया जाता है।

इसके आलवा वचन के कुछ अन्य नियम भी हैं, जिन्हें प्रयोग करते समय ध्यान में रखना आवश्यक है।

(क) आदरणीय व्यक्तियों के लिए बहुवचन का प्रयोग किया जाता है। जैसे- दादा जी कल पटना जायेंगे। शिक्षका आज नहीं आई। श्री रामचंद्र वीर थे। पापा जी कल मुंबई जायेंगे आदि।

(ख) संबंध के लिए एकवचन और बहुवचन का प्रयोग सामान रूप से किया जाता है। जैसे- नाना, मामा, मामी, चाची, चाचा, दादा, दादी आदि।

(ग) द्रव्य सूचक संज्ञाओं का प्रयोग केवल एकवचन में ही होता है। जैसे- दूध, घी, तेल, पानी, शरबत आदि।

(घ) कुछ शब्दों का प्रयोग हमेशा बहुवचन में किया जाता है। जैसे- समाचार, दर्शक, आँसू, लोग, हस्ताक्षर, आशिर्वाद, अश्रु  आदि।

(ङ) गुणवाचक और भाववाचक दोनों संज्ञाओं का प्रयोग एकवचन और बहुवचन में किया जाता है। जैसे- मैं आपकी विवशता को जानता हूँ। राजेद्र प्रसाद की सज्जनता पर सभी खुश थे। सत्य की ही विजय होती है। जाती वाचक संज्ञाएँ दोनों ही वचनों में प्रयोग किए जाते हैं। जैसे- सोना महँगा है। चाँदी सस्ता है आदि।

एकवचन से बहुवचन बनाने के नियम

(क) आकारान्त पुल्लिंग शब्दों में ‘आ’ के स्थान पर ‘ए’ लगाने से एकवचन बहुवचन में बदल जाता है। जैसे- कुत्ता-कुत्ते, लड़का-लड़के, घोड़ा-घोड़े, केला-केले, कपड़ा-कपड़े, तारा-तारे, कौआ-कौए आदि।

(ख) अकारांत स्त्रीलिंग शब्द के अंत में ‘अ’ के स्थान पर ‘एं’ लगाने से एक वचन से बहुवचन में बदला जाता है। जैसे- कलम-कलमें, बहन-बहनें, पुस्तक-पुस्तकें, सड़क-सड़कें, दवात-दवातें, रात-रातें आदि।

(ग) जिस स्त्रीलिंग संज्ञा शब्द के अंत में ‘या’ होता है, उसमे ‘या’ के जगह पर चंद्रबिंदु लगा कर एकवचन को बहुवचन में बदला जाता है। जैसे- चिड़िया-चिड़ियाँ, बुढ़िया- बुढ़ियाँ, खटिया-खटियाँ, डिबिया- डिबियाँ, चुहिया- चुहियाँ आदि।

(घ) इकारांत अथवा ईकारांत स्त्रीलिंग शब्दों के अंत में ‘याँ’ लगाकर, दीर्घ ‘ई’ को हर्स्व ‘इ’ कर देने पर शब्द बहुवचन में बदल जाता है। जैसे- तिथी – तिथियाँ, रीती – रीतियाँ, नारी – नारियाँ, नीती – नीतियाँ, कली – कलियाँ, थाली – थालियाँ आदि।

(ङ) आकारांत स्त्रीलिंग एकवचन संज्ञा शब्दों के अन्त में ‘एँ’ लगाकर एकवचन को बहुवचन में बदला जाता है। जैसे- कन्या – कन्याएँ, शाखा – शाखाएँ, अध्यापिका – अध्यापिकाएँ, माता-माताएँ, पत्रिका – पत्रिकाएँ, कविता- कविताएँ आदि।

(च) कुछ शब्दों में अंतिम ‘उ’ ‘ऊ’ और औ के साथ ‘एँ’ लगा देते हैं और दीर्घ ‘ऊ’ के स्थान पर ह्रस्व ‘उ’ हो जाता है। जैसे- गौ – गौएँ, बहू – बहूएँ, वधू- वधूएँ, धातु- धातुएँ, वस्तु – वस्तुएँ आदि।

(छ) संज्ञा के पुल्लिंग तथा स्त्रीलिंग रूपों में ‘गण’ ‘वर्ग’ ‘जन’ ‘लोग’ ‘वृन्द’ ‘दल’ आदि शब्द जोड़कर भी शब्दों का बहुवचन बना देते हैं। जैसे- सेना – सेनादल, गुरु – गुरुजन,  पाठक -पाठकगण, श्रोता – श्रोतागण, अध्यापक – अध्यापकवृंद आदि।

(ज) कुछ शब्दों के रूप ‘एकवचन’ और ‘बहुवचन’ दोनों में समान होते है जैसे- नेता – नेता, प्रेम – प्रेम, जल – जल, बाजार – बाजार, योद्धा – योद्धा’ क्रोध – क्रोध आदि।

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