सुंदर विचार

हिन्दी की गद्य विधाएँ ‘कहानी’ (इकाई- 2) भाग – 3

हिन्दी कहानी का विकास क्रम: प्रेमचंदोत्तर युग की कहानी  (1936 – 1950 ई०) इस युग में मनोवैज्ञानिक, यथार्थवादी, चरित्रप्रधान और व्यक्तिवादी कहानियाँ लिखी गई। प्रेमचंदोत्तर के प्रमुख कहानीकार। (क). यशपाल (1903 - 1976 ई०) (ख). इलाचंद्र जोशी (1903 - 1982 ई०) (ग). जैनेन्द्र (1905 – 1988 ई०) (घ). उपेन्द्रनाथ अश्क (1910 – 1996 ई०) (ङ).… Continue reading हिन्दी की गद्य विधाएँ ‘कहानी’ (इकाई- 2) भाग – 3

हिन्दी की गद्य विधाएँ ‘कहानी’ (इकाई- 2) भाग – 2

हिन्दी कहानी का विकास क्रम: प्रेमचंद युगीन कहानियाँ (1916 – 1936 ई०) मुंशी प्रेमचंद जन्म:  31 जुलाई (1980 ई०) वाराणसी जिले (उत्तर प्रदेश) लमही गाँव में हुआ था। निधन: 8 अक्तुबर (1936 ई०) वराणसी (उत्तर प्रदेश)  उनकी माता का नाम आनन्दी देवी तथा पिता का नाम मुंशी अजायबराय था, जो लमही में डाकमुंशी थे। प्रेमचंद का वास्तविक नाम- धनपत राय… Continue reading हिन्दी की गद्य विधाएँ ‘कहानी’ (इकाई- 2) भाग – 2

हिन्दी की गद्य विधाएँ ‘कहानी’ (इकाई- 2) भाग – 1

हिन्दी कहानी का विकास क्रम: प्रारंभिक काल की कहानियाँ  (1900 ई० पूर्व)द्विवेदी युगीन कहानियाँ 1900 -1916 ई०) ‘कहानी’ गद्य साहित्य की सबसे अधिक रोचक एवं लोकप्रिय विधा है, जो जीवन के किसी विशेष पक्ष का मार्मिक, भावनात्मक और कलात्मक वर्णन करती है। “हिन्दी गद्य की वह विधा है, जिसमे लेखक किसी घटना, पात्र अथवा समस्या का… Continue reading हिन्दी की गद्य विधाएँ ‘कहानी’ (इकाई- 2) भाग – 1

पाश्चात्य आलोचक और उनके सिद्धांत (इकाई- 3)

1. रचनाकार- प्लेटो समय- (427-387 ई० पू०) सिद्धांत- अनुकरण सिद्धांत, दैवीय प्रेरणा का सिद्धांत  रचनाएँ- रिपब्लिक, सिम्पोजिम फिडो, फीड्स, पारमनोईजीज, सोफिस्ट, स्टेट्स-मैन, फिलेबस, टाइनियस, क्रिटियस, लॉज    2. रचनाकार- अरस्तू समय- (384-322 ई० पू०)  सिद्धांत- अनुकरण, त्रासदी, विरेचन का सिद्धांत  रचना- पेरिपोइतिकेस (ऑन पोएटिक्स) 3. रचनाकार- लोंजाइनस (लोंगिनुस) सिद्धांत- ‘उद्दात विवेचन सिद्धांत’, प्रतिभा- कल्पना, परंपरा और… Continue reading पाश्चात्य आलोचक और उनके सिद्धांत (इकाई- 3)

विलोम शब्द (Opposite words)

विलोम का अर्थ ‘विपरीत’ है। परिभाषा: कामता प्रसाद गुरु के शब्दों में “पहले शब्द के भाव के विपरीत अर्थ देने वाला शब्द विलोम शब्द कहलाता है।” विलोम शब्द का निर्माण करते समय कुछ ध्यान रखने योग्य बातें: 1. ‘तत्सम’ शब्द का विलोम ‘तत्सम’ में, ‘तद्भव’ शब्द का विलोम ‘तद्भव’ में, ‘देशज’ शब्द का   विलोम देशज… Continue reading विलोम शब्द (Opposite words)

भारतीय काव्यशास्त्र की परंपरा (इकाई- 3) : संस्कृत के प्रमुख काव्यशास्त्री

भरतमुनि: भारत में भारतीय काव्यशास्त्र की परंपरा के सूत्रपात भरतमुनि से माना जाता है।बलदेव उपाध्याय ने इनका समय द्वितीय शताब्दी माना है।इनका सर्वमान्य समय 200 ई० पूर्व से 300 ई० पूर्व के मध्य माना जाता है। रचना: ‘नाट्यशास्त्र’ इनकी एकमात्र रचना है।इसमें 36 अध्याय और 5000 हजार श्लोक है।इसकी टीका ‘अभिनवगुप्त’ ने ‘अभिनव भारती’ के… Continue reading भारतीय काव्यशास्त्र की परंपरा (इकाई- 3) : संस्कृत के प्रमुख काव्यशास्त्री

पाश्चात्य काव्यशास्त्री (इकाई-3) : अरस्तू का अनुकरण सिद्धांत

“अरस्तू यूरोपीय काव्यशास्त्र के मेरुदंड है”    अरस्तू का जन्म: 384 ई० से 322 ई० पूर्व (मकदूनिया, यूनान) यूनानी नाम: अरिस्तोतिलेस (अरस्तू) था। गुरु: प्लेटो अरस्तू का शिष्य: सिकंदर था। रचनाएँ: इनकी रचनाओं की संख्या लगभग 400 मानी जाती है। प्राप्त रचनाएँ तीन है पेरिपोएइतिकेश (काव्यशास्त्र से संबंधित रचना )तेखनेस रितोरिकेश (भाषण शास्त्र से संबंधित… Continue reading पाश्चात्य काव्यशास्त्री (इकाई-3) : अरस्तू का अनुकरण सिद्धांत

भक्तिकालीन संत काव्यधारा

रचना- अभंगपद रचनाकार- नामदेव नामदेव संत काव्य के प्रवर्तक है।आरम्भ ये सगुणोंपासक रहें थे। बाद में निर्गुणोपासक हो गए।इन्हें ‘बरकरी’ संप्रदाय का प्रवर्तक भी माना जाता है।इनके सगुण पदों की भाषा ब्रजभाषा के समीप रही है।निर्गुण बानियों की भाषा खड़ी बोली मिश्रित साधुक्कड़ी कही जा सकती है।इसके अभंग पद  प्रसिद्ध है।इनका समय 1270 ई० से… Continue reading भक्तिकालीन संत काव्यधारा

भक्तिकालीन रचनाकारों में सूफी काव्य की महत्वपूर्ण पंक्तियाँ

1. रचना- हंसावली (1370 ई०) रचनाकार: असाइत भाषा: राजस्थानी हिन्दी नायक: राजकुमार नायिका हंसावली कथा का आधार: इसमें विक्रम और बैताल की कथा है। महत्वपूर्ण पंक्तियाँ: 1. बावन वीर कथा रस लीड। ऐह पावहु असाइत कहिउ।। 2. देवी अव्रधारु मुझ विनती। पेलि भवि हूं पंखिणी हती।।    इडा मेहला सेवन किउ। दव बलतउ तेणि बनि… Continue reading भक्तिकालीन रचनाकारों में सूफी काव्य की महत्वपूर्ण पंक्तियाँ

छायावाद (इकाई – 2)

‘छायावाद’ हिन्दी साहित्य के रोमांटिक उत्थान की काव्यधारा है। जिसका समय लगभग 1918 – 1936 ई० तक चला। इस काव्यधरा के प्रतिनिधि कवि जयशंकर प्रसाद, सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’, सुमित्रानंदन पंत और महादेवी वर्मा को माना जाता है। छायावाद के नामकरण का श्रेय मुकुटधर पांडेय को जाता है। ‘छायावाद’ ने हिन्दी में ‘खड़ीबोली’ कविता को पूर्णतः… Continue reading छायावाद (इकाई – 2)