सुंदर विचार

‘तार सप्तक’ कवि और कविताएँ

'तारसप्तक' एक काव्य संग्रह है, इसका प्रकाशन 1943 ई. में हुआ था। इसमें सात कवियों की कविताएँ संकलित हैं। 'तारसप्तक' की परिकल्पना अज्ञेय की नहीं थी, यह 'प्रभाकर माचवे' और 'नेमीचंद जैन' के दिमाग की उपज माना जाता है। तारसप्तक के प्रकाशन से ही प्रयोगवाद का प्रारंभ माना जाता है। इसलिए प्रयोगवाद के प्रवर्तन का… Continue reading ‘तार सप्तक’ कवि और कविताएँ

आदिकाल साहित्य के महत्वपूर्ण तथ्य

> आचार्य रामचंद्र शुक्ल के अनुसार 'आदिकाल' की सर्वमान्य समय सीमा वीं.सं 1050 से 1375 और (993 ई. से 1318 ई.) है। > हजारीप्रसाद द्विवेदी के अनुसार 'आदिकाल' का सर्वमान्य नाम 'आदिकाल' ही है। > आदिकाल को अत्यधिक 'विरोधों' और 'व्याघातों' का युग कहने वाले आलोचक आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी जी हैं। > आदिकाल को 'अपभ्रंश'… Continue reading आदिकाल साहित्य के महत्वपूर्ण तथ्य

रीतिकालीन साहित्य के महत्वपूर्ण तथ्य

आचर्य रामचंद्र शुक्ल के अनुसार-  'ऐतिहासिक' परिप्रेक्ष्य के आधार पर- 'उत्तर मध्यकाल' 'प्रवृति' के आधार पर- 'रीतिकाल' (विं.सं.1700-1900)-(1643- 1843 ई.) आचार्य शुक्ल ने 'रीतिकाल' को तीन प्रकरणों में बाँटा है: प्रकारण-1: सामान्य परिचय प्रकरण-2: रीतिग्रंथकार प्रकरण-3: रीतिकाल के आश्रित कवि रीतिकाल का समय सीमा- आचार्य रामचंद्र शुक्ल के अनुसार विं.सं.1700-1900 (सर्वमान्य मत) विश्वनाथ प्रसाद मिश्र… Continue reading रीतिकालीन साहित्य के महत्वपूर्ण तथ्य

हिंदी : उद्भव एवं विकास

हिंदी की उत्पत्ति:       हिंदी भाषा के उद्भव और विकास की जब भी बात की जाती है तब हमें आधुनिक हिंदी साहित्य के पितामह कहे जाने वाले महान साहित्यकार भारतेंदु हरिश्चंद्र की वे पंक्तियाँ याद आने लगती हैं -             "निज भाषा उन्नति अहै,  सब उन्नति के मूल ।             बिन निज भाषा-ज्ञान के, मिटत… Continue reading हिंदी : उद्भव एवं विकास

एक प्रमुख हिंदी लेखक के साथ साक्षात्कार

बात सन् 2018 की है 'दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा' हैदराबाद से मैं लघु शोध के लिए प्रवेश-परीक्षा पास कर चुकी थी। अब शोध विषय के चयन करने की बारी थी। मुझे समझ में नहीं आ रहा था कि किस विषय का चुनाव करूँ। मैं परेशान और चिंतित थी। मैंने अपने गाइड से सम्पर्क किया… Continue reading एक प्रमुख हिंदी लेखक के साथ साक्षात्कार

महावीर प्रसाद द्विवेदी और हिंदी नवजागरण

द्विवेदी जी ने 1903-1920 ई. तक 'सरस्वती' का संपादन किया। इसी के माध्यम से उनहोंने नवजागरण के संबंध में अपने विचारों को आगे बढ़ाया।       'सरस्वती' हिंदी नवजागरण की एक सशक्त पत्रिका के रूप में स्थापित हुई। महावीर प्रसाद द्विवेदी जी ने सरस्वती पत्रिका के माध्यम से भारतीयों में राजनीतिक चेतना जाग्रत करने का अथक… Continue reading महावीर प्रसाद द्विवेदी और हिंदी नवजागरण

भारतेंदु और हिंदी नवजागरण

नवजागरण का शाब्दिक अर्थ है- "नये रूप से जागना"       हिंदी साहित्य में आधुनिक युग का आरंभ भारतेंदु से माना जाता है। उन्होंने समाज में चल रही नवजागरण की प्रक्रिया का न केवल वैचारिक धरातल पर संज्ञान लिया, बल्कि उन मूल्यों को साहित्य से जोड़कर उसे आधुनिक भाव-बोध से समृद्ध भी किया।       * भारतेंदुयुगीन… Continue reading भारतेंदु और हिंदी नवजागरण

भारतीय नवजागरण और स्वाधीनता आंदोलन की वैचारिक पृष्ठभूमि : हिंदी नवजागरण

नवजागरण से तात्पर्य एक नयी विचार से है, जिसके कारण देश में सामाजिक आर्थिक धार्मिक एवं राजनीतिक बदलाव लाया जा सके।       किसी देश या समाज की वैचारिकी सुसुप्ति (सोने की अवस्था) का अंत, 'जागरण' का नवीनतम रूप ही 'नवजागरण' है।       नवजागरण के लिए प्रायः कई पर्यायवाची शब्दों का प्रयोग किया जाता है जैसे… Continue reading भारतीय नवजागरण और स्वाधीनता आंदोलन की वैचारिक पृष्ठभूमि : हिंदी नवजागरण

औचित्य संप्रदाय

क्षेमेन्द्र : (समय 11वीं शताब्दी) ये काशी के निवासी थे। रचना - 'औचित्यविचार चर्चा' * क्षेमेन्द्र आचार्य अभिनवगुप्त के शिष्य थे।   * क्षेमेन्द्र ने 'औचित्यविचार चर्चा' में 'औचित्य' को काव्य की 'आत्मा' मानकर काव्यशास्त्र के विभिन्न सिद्धांतों के बीच एक समन्वयकारी औचित्य सिद्धांत का स्थापना किया है। * इन्हें 'समन्वयकारी आचार्य' भी कहा जाता… Continue reading औचित्य संप्रदाय