छायावाद के समानांतर चलने वाली काव्याधाराएँ हैं- 1. व्यक्ति चेतना प्रधान काव्यधारा/ हालावाद 2. राष्ट्रीय सांस्कृतिक काव्यधारा 3. समष्टि प्रधान/सामाजिक काव्यधारा हालावाद काव्यधारा- (1933-1936 ई.) परिभाषा- छायावाद के समानांतर जिन कवियों ने निजी अनिभूति के आधार पर प्रेम, मस्ती एवं अहं से संबंधित काव्य लिखा उनके द्वारा रचित काव्य व्यक्ति चेतना प्रधान या हालावाद… Continue reading हालावादी काव्य
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अष्टछाप
अष्टछाप की स्थापना- विं सं 1622 (1565 ई.) में हुआ था। 'अष्टछाप' महाप्रभु श्री वाल्भाचार्य एवं उनके पुत्र विट्ठलनाथ जी के द्वारा स्थापित 8 भक्तिकालीन कवियों का एक समूह था, जिन्होंने अपनी विभिन्न पद एवं कीर्तनों के माध्यम से भगवान् श्रीकृष्ण की विभिन्न लीलाओं का गुणगान किया और वे अष्टछाप कहलायें। 'कृष्णभक्ति शाखा'… Continue reading अष्टछाप
नाथ साहित्य
परिभाषा- आदिकाल में भगवान 'शिव' के उपासक भक्त कवियों के द्वारा जनभाषा में जिस साहित्य की रचना की गई या हुई उसे नाथ साहित्य के नाम से जाना जाता है। नाथ संप्रदाय को सिद्धों की परंपरा का विकसित रूप माना जाता है। नाथ साहित्य के प्रवर्तक गोरखनाथ को माना जाता है। इनकी साधना सिद्ध साधना… Continue reading नाथ साहित्य
सिद्ध साहित्य
आदिकालीन साहित्य: आदिकालीन साहित्य केकाव्य की निम्नलिखित धाराएँ हैं - 1. सिद्ध साहित्य 2. नाथ साहित्य 3. रास साहित्य 4. रासों साहित्य 5. लौकिक साहित्य 6. गद्य साहित्य 7. अपभ्रंश साहित्य सिद्ध साहित्य- परिभाषा- आदिकाल में बौद्ध धर्म की महायान शाखा के वज्रयानी कवियों द्वारा अपने धर्म का प्रचार-प्रसार करने के लिए जो साहित्य जनभाषा… Continue reading सिद्ध साहित्य
हिंदी : उद्भव एवं विकास
हिंदी की उत्पत्ति: हिंदी भाषा के उद्भव और विकास की जब भी बात की जाती है तब हमें आधुनिक हिंदी साहित्य के पितामह कहे जाने वाले महान साहित्यकार भारतेंदु हरिश्चंद्र की वे पंक्तियाँ याद आने लगती हैं - "निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति के मूल । बिन निज भाषा-ज्ञान के, मिटत… Continue reading हिंदी : उद्भव एवं विकास
एक प्रमुख हिंदी लेखक के साथ साक्षात्कार
बात सन् 2018 की है 'दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा' हैदराबाद से मैं लघु शोध के लिए प्रवेश-परीक्षा पास कर चुकी थी। अब शोध विषय के चयन करने की बारी थी। मुझे समझ में नहीं आ रहा था कि किस विषय का चुनाव करूँ। मैं परेशान और चिंतित थी। मैंने अपने गाइड से सम्पर्क किया… Continue reading एक प्रमुख हिंदी लेखक के साथ साक्षात्कार
भारतीय संस्कृति और राष्ट्र
भूमिका- भारतीय संस्कृति प्राचीन एवं गौरवपूर्ण है। विश्व संस्कृति के इतिहास में इसका विशिष्ठ स्थान है। इस संस्कृति को समृद्ध और समुन्नत बनाने में हमारे ऋषियों, मुनियों, साधू-संतों, दार्शनिकों, विचारकों, आदि का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। गुरु वेदव्यास, बाल्मीकि, कालिदास, स्वयंभू, पुष्पदंत, संत तुलसीदास, संत कबीर दास, गरुनानक देव, गुरुगोविंद सिंह, रामधारी सिंह ‘दिनकर’, जयशंकर… Continue reading भारतीय संस्कृति और राष्ट्र
समकालीन हिंदी उपन्यासों में अभिव्यक्त आदिवासी जीवन
भूमिका- भारत विभिन्नताओं में एकता का देश है। सदियों से भारतीय समाज में अनेक वर्ण, जाति, धर्म तथा संप्रदाय के लोग एक साथ मिलकर रहते आये हैं। आदिवासी समुदाय भी अनेक क्रिया-कलापों के साथ संगठित रूप से रहते हैं। आज भी बहुत से आदिवासी जंगलों पहाड़ों और दुर्गम प्रदेशों में रहकर अपना जीवन यापन करते… Continue reading समकालीन हिंदी उपन्यासों में अभिव्यक्त आदिवासी जीवन
डॉ राम मनोहर लोहिया
लोहिया दर्शन डॉ राम मनोहर लोहिया विश्व की उन विभूतियों में से थे, जिन्होंने अपना संपूर्ण जीवन मानव सेवा में लगा दिया। वे महान राजनीतिक योद्धा, देशभक्त, स्वतंत्र चिंतक तथा निडर नेता थे। उन्होंने भारतीय स्वतंत्रता के साथ-साथ नेपाल और गोवा के स्वतंत्रता संग्राम में भी रूचि दिखाई। जीवन परिचय- जन्म- 23 मार्च… Continue reading डॉ राम मनोहर लोहिया
डॉ. भीमराव अंबेडकर
अंबेडकर का प्रारंभिक जीवन - जन्म - 14 अप्रैल, 1891 ई. के इंदौर के पास मऊ छावनी में हुआ था। अंबेडकर अपने माता-पिता की 14 वीं संतान थे। इनका परिवार कबीर पंथ को मनानेवाला मराठी मूल का था। निधन - 6 दिसंबर, 1956 ई. को हुआ था। पिता का नाम - रामजी… Continue reading डॉ. भीमराव अंबेडकर