रचना - मुर्दहिया, (1910 ई.), दूसरा भाग- मणिकर्णिका (2014 ई.) रचनाकार - तुलसीराम (दलित आत्मकथा) * संभवतः यह हिंदी की पहली आत्मकथा है, जिसमें केवल दलित ही नहीं अपितु गाँव का संपूर्ण लोक जीवन ही केंद्र में है। * 'मुर्दहिया' दलित समाज की त्रासदी और भारतीय समाज की विडंबना का सांस्कृतिक, सामाजिक, आर्थिक और… Continue reading तुलसीराम : मुर्दहिया
Author: इंदु सिंह
महादेवी वर्मा : ठकुरी बाबा (संस्मरण)
रचना - ठकुरी बाबा (संस्मरण) रचनाकार - महादेवी वर्मा (1907 - 1987 ई.) * महादेवी ने अपने रेखाचित्र में, अपने संपर्क में आनेवाले शोषित व्यक्तियों, दीन-हीन नारियों, साहित्यकारों, जीव-जंतुओं आदि का संवेगात्मक चित्रण किया है। * महादेवी के रेखाचित्र में अनुभूति की अभिव्यक्ति, चित्र का बिंब-विधान और सूक्ति का प्रभाव एक साथ दिखाई देता है।… Continue reading महादेवी वर्मा : ठकुरी बाबा (संस्मरण)
रामवृक्ष बेनीपुरी : माटी की मूरतें (रेखाचित्र)
1. रचना - माटी की मूरतें (रेखाचित्र) रचनाकार - रामवृक्ष बेनीपुरी जन्म - 1902 ई. बेनीपुर, मुजफ्फ़र (बिहार) निधन - ( 1968 ई.) > 'माटी की मूरतें' 1941 ई. से 1945 ई. के बीच में लिखें गए संस्मरणात्मक रेखाचित्रों का संग्रह है। > इन सभी संस्मरणात्मक रेखाचित्रों को बेनीपुरी जी ने स्वयं 'शब्दचित्र' कहा है।… Continue reading रामवृक्ष बेनीपुरी : माटी की मूरतें (रेखाचित्र)
काव्य-प्रयोजन
काव्य प्रयोजन - (काव्य प्रयोजन का उद्देश्य) काव्य प्रयोजन का तात्पर्य - 'काव्य रचना के उद्देश्य से है। 1. संस्कृत के आचार्यो के अनुसार काव्य प्रयोजन 2. हिंदी के आचार्यो के अनुसार काव्य प्रयोजन 3. पाश्चात्य आचार्यो के अनुसार काव्य प्रयोजन संस्कृत के आचार्यो के अनुसार काव्य के प्रयोजन: 1. भरतमुनि के… Continue reading काव्य-प्रयोजन
पाश्चात्य काव्यशास्त्र: प्लेटो का काव्य सिद्धांत
'पाश्चात्य' साहित्यशास्त्र की परंपरा अत्यंत प्राचीन व समृद्ध रही है। पाश्चात्य साहित्य का प्रारंभ ईसा की पाँचवीं शताब्दी पूर्व सुप्रसिद्ध यूनानी चिंतक प्लेटो से माना जाता है। प्लेटो से पहले वहाँ अनेक चिंतकों और दार्शनिकों का अविर्भाव हो चुका था। प्राचीन ग्रीक साहित्य चिंतन का प्रादुर्भाव नाटकों के संदर्भ में हुआ था। प्राचीन ग्रीस में… Continue reading पाश्चात्य काव्यशास्त्र: प्लेटो का काव्य सिद्धांत
रूपवाद (Formalism)
प्रथम विश्वयुद्ध के समय रूस में रूपवाद का आरंभ हुआ। इसलिए इसे रुसी रुपवाद भी कहा जाता है। रुपवाद के मुख्य दो केंद्र थे- पहला- मॉस्को - मॉस्को में इसकी शुरुआत 1915 ई. में हुई दूसरा- सेंट पीटर्सबर्ग - सेंट पीटर्सबर्ग में इसकी शुरुआत 1916 ई. से मानी जाती है। सोवियत संघ के गठन के पश्चात् रूपवादियों का… Continue reading रूपवाद (Formalism)
फैंटेसी (Fantasy)
काव्यशास्त्र में 'फैंटेसी' शब्द यूनानी भाषा के 'फैंटेसिया' से बना है, जिसका अर्थ होता है- कोरी कल्पना, तृष्णा, कपोल कल्पना, भ्रम, दिवास्वपन आदि। फैंटेसी की परिभाषाएँ- मानविकी कोश के अनुसार - "फैंटेसी स्वप्न चित्र मूलक साहित्य है, जिसमे असंभाव्य संभावनाओं का प्राथमिकता दी जाती है।" फ्रायड के अनुसार - "काव्य में शब्द बद्ध… Continue reading फैंटेसी (Fantasy)
बिंब (Image)
'बिंब' वह शब्दचित्र है जो कल्पना द्वारा ऐन्द्रिक (इन्द्रियों से संबंधित) अनुभवों के आधार पर निर्मित होता है। विश्वकोष के अनुसार - "बिंब चेतन स्मृतियाँ हैं, जो मौलिक उत्तेजना के अभाव में उस विचार को संपूर्ण या आंशिक रूप से प्रस्तुत करती है।" 'बिंब' अंग्रेजी के 'Image' इमेज शब्द का हिंदी रूपांतरण है।… Continue reading बिंब (Image)
कल्पना (Imagination)
'कल्पना' 'Imagination' शब्द की उत्पत्ति लैटिन भाषा के 'इमाजीनाटीओ' शब्द से हुई है, जिसका अर्थ होता है 'कल्पना'। > 'संभाव्य (जिसकी होने की संभावना हो) के विषय में सोचना' 'कल्पना' होता है। पाश्चात्य काव्य शास्त्र में 'कल्पना' का वही स्थान है, जो भारतीय काव्य शास्त्र में 'प्रतिभा' का स्थान है। > प्लेटो ने… Continue reading कल्पना (Imagination)
मिथक (myth)
मिथक का अर्थ - मिथक शब्द अंग्रेजी भाषा के 'मिथ' (myth) शब्द का हिंदी रूपांतरण या पर्यायवाची शब्द है। मूलतः इस शब्द की उत्पत्ति यूनानी भाषा के 'माइथॉस', लैटिन के भाषा के 'मिथस' और जर्मन भाषा के 'मिथोस' से हुई है, जिसका अर्थ होता है मौखिक या काल्पनिक कथा। मिथक की परिभाषाएँ- (पाश्चात्य विद्वानों के… Continue reading मिथक (myth)