ध्वनि संप्रदाय

आचार्य अनंदवर्धन : (समय – 9वीं शताब्दी का मध्य भाग) ‘ध्वनि’ संप्रदाय के प्रवर्तक।

* डॉ. भगीरथ मिश्र ने इनका इनका समय 9वीं शताब्दी का उतरार्द्ध माना है।

* ये कश्मीर के राजा अवंती वर्मा के सभा पंडित थे।

प्रमुख रचनाएँ:

      1. ध्वन्यलोक

      2. अर्जुन चरित (महा काव्य)

      3. विषम वाण  लीला (खंड काव्य)

      4. देवी शतक (स्तुति काव्य)

      5. धर्मोत्तमा टीका

      ‘ध्वनायालोक’ में चार अध्याय है। इन अध्यायों को ‘उद्दोत’ कहा गया है।

यह रचना तीन भागों में विभक्त है- कारिका (129), वृत्ति (इसमें कारिकाओं की व्याख्या है) और उदाहरण।

आनंदवर्धन का ध्वनि सिद्धांत-

* ध्वनि का प्राचीनतम प्रयोग अथर्ववेद में मिलता है।

* ध्वनि संप्रदाय के प्रवर्तक आचार्य आनंदवर्धन हैं।

* इन्होंने अपने ग्रन्थ ‘ध्वन्यालोक’ में ‘ध्वनिरात्मा काव्यस्य’ कहा है।

* आनंदवर्धन ने ध्वनि को काव्य की आत्मा मानते हुए कहा है कि –

      “कावस्य आत्मा ध्वनिरिति” अथार्त काव्य की आत्मा ध्वनि है।

* आनंदवर्धन के ध्वनि सिद्धांत का आधार ‘स्फोटवाद’ है। यह ‘स्फोटवाद’ क्या है? इसके प्रवर्तक अज्ञात है।

स्फोटवाद की परिभाषा – “प्रत्येक शब्द का सूक्ष्म प्रतिरूप हमारे मन में नित्य विद्यमान रहत है उससे ही अर्थ प्रस्फुटित होता है। यह अर्थ जिस शब्द से फूटता है उसे ही स्फोट कहते हैं  यही स्फोट ध्वनि है

आनंदवर्धन के अनुसार ध्वनि की परिभाषा:

      यत्रार्थ: शब्दों वा तमर्थमुपसर्जनीकृतस्वार्थौ

      व्यक्त: कव्यविशेशः स ध्वनिरिती सुरभि कथितः (ध्वन्यालोक)

अथार्त जहाँ शब्द तथा अर्थ मूल अर्थ को त्यागकर काव्य में विशेष अर्थ को प्रकट करे विद्वानों ने उसे ध्वनि कहा है।

अभिनवगुप्त के अनुसार ध्वनि की परिभाषा:

            “एवं घंटानादस्थानीय अनुरणनान्तयोयलाक्षित।

            व्यंग्योप्यर्थ: ध्वनिरिति व्यवहृत:।।”

      जिस तरह घंटे पर अघात करने से पहले टंकार और फिर मधुर झंकार एक के बाद एक मधुर होकर निकलती है, उसी प्रकार यही व्यंग्यार्थ ही ध्वनि है।

अभिनवगुप्त ने 35 भेदों का वर्णन किया है।      

मम्मट के अनुसार ध्वनि की परिभाषा:

            “इदंमुत्तमातिशायिनी व्यंग्ये”।

            वाच्य ध्वनि बुधै कथित:।।”

* वाच्यार्थ से अधिक उत्कृष्ट व्यंग्यार्थ ही विद्धानों के द्वारा ध्वनि कहा गया है।

* मम्मट ने 51 मुख्य भेद और 10,455 उपभेदों का वर्णन किया है।

विश्वनाथ के अनुसार ध्वनि की परिभाषा:

      “वाच्यातिशयिनी व्यंग्ये ध्वनिस्तत्तका व्युत्तम:।”

      वाच्यार्थ से अधिक चमत्कार युक्त व्यंग्यार्थ ध्वनि है।

* विश्वनाथ ने ध्वनि के 51 मुख्य भेद और 5304 अन्य भेदों का वर्णन किया है।

* ध्वनि सिद्धांत का प्रवल विरोध प्रतिहारेंदुराज, कुंतक, भट्टनायक, महिमभट्ट, क्षेमेन्द्र आदि ने किया है फिर भी यह सिद्धांत व्यापक रूप से मान्य रहा है।

* मुकुलभट्ट ने ध्वनि का अंतर्भाव ‘लक्षणा’ में, कुंतक ने ‘व्यंजना’ में, महिमभट्ट ने ‘अनुमान’ में, प्रतिहारेंदुराज ने ‘अलंकार’ में और धनंजय धनिक ने ‘तात्पर्या’ शक्ति में माना है।

* आनंदवर्धन, मम्मट, अभिनवगुप्त, रुय्यक, पंडितराज जगन्नाथ  और विद्याधर ये प्रमुख ध्वनिवादी आचार्य हैं।

आचार्य आनंदवर्धन ने तीन संप्रदायों के उल्लेखों का खंडन किया-

      (i) अभाववादी (ii) भक्तिवादी (iii) अनिर्वचनियतावादी

आचार्य मम्मट ने ‘काव्यप्रकाश’ के प्रथम उल्लास में काव्य की तीन ध्वनियों का उल्लेख किये हैं-

      (i) ध्वनि काव्य (i) गुणिभूत काव्य (i) चित्र काव्य

आचार्य मम्मट ने ‘ध्वनि काव्य’ को श्रेष्ठ माना है।

आचार्य आनंदवर्धन ने सर्वप्रथम ध्वनि के दो भेद किये हैं-

      1. अविवक्षित वाच्य ध्वनि अथवा लक्षणामूला ध्वनि

      2. विवक्षितान्यपर वाच्य धवनी अथवा अभिधामूला ध्वनि 

उपर्युक्त दोनों ध्वनियों के भेद और उपभेद भी हैं।

ध्वनि के मुख्यतः तीन भेद माने जाए हैं

      वस्तु ध्वनि – वस्तु ध्वनि में एक बात से दूसरी बात की व्यंजना की जाति है।

      अलंकार ध्वनि – अलंकार ध्वनि में अलंकार की अभिव्यक्ति व्यंग्यार्थ के रूप में होती है।  

      रस ध्वनि – रस के अंतर्गत नौ रस के साथ भाव, भावाभास, भावोंदय, भावशबलता, भावसंधि आदि की भी गणना होती है।

डॉ नगेंद्र के अनुसार – “ध्वनि स्थापन के द्वारा वास्तव में ध्वनिकार ने काव्य में कल्पना तत्व के महत्व की ही प्रतिष्ठा की है।”सुमित्रानंदन पंत – पल्लव की भूमिका में लिखा है- भाषा संसार का नादमय चित्र है, ध्वनिमय रूप है, यह विश्व के ह्रतंत्री की झंकार है, जिसके स्वर में वह अभिव्यक्ति पाता है।”

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