सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’- जागो फिर एक बार (कविता)

‘जागो फिर एक बार’ कविता के रचयिता सूर्यकांत त्रिपाठी निराला जी है। निराला जी की यह कविता ‘परिमल’ कविता संग्रह में संकलित है। जिसका प्रकाशन 1930 में हुआ था। इस कविता में कवि ने भारत के अतीत का गौरवमय चित्रण किया है। इसी संदर्भ में कवि भारतियों को जागते रहने का संदेश देते हुए कहते… Continue reading सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’- जागो फिर एक बार (कविता)

गजानन माधव ‘मुक्तिबोध’-अंधरे में (कविता)

हिन्दी साहित्य की लम्बी कविताओं में गजानन माधव मुक्तिबोध जी की कविता ‘अंधेरे में’ का विशेष स्थान है। ये कविता मुक्तिबोध की श्रेष्ठतम कविताओं में से एक है। इसकी रचना मुक्तिबोध जी ने राजनांद गाँव में रहते हुए किया था। वे उस समय वहीं पर दिग्विजय कॉलेज में व्याख्याता के तौर पर कार्य कर रहे… Continue reading गजानन माधव ‘मुक्तिबोध’-अंधरे में (कविता)

अज्ञेय – यह दीप अकेला (कविता)

‘यह दीप अकेला’ कविवर अज्ञेय जी की प्रसिद्ध कविताओं में से एक है। अज्ञेय एक मनोविश्लेषणवादी और व्यक्तिवादी कवि हैं। इस कविता का प्रकाशन एवं संकलन नई दिल्ली ‘आल्पस कहवा घर’ में (18 ऑक्तुबर 1953) ‘बावरी अहेरी’ नामक कविता संग्रह में किया गया है। इस कविता का संदेश है कि व्यक्ति और समाज दोनों एक… Continue reading अज्ञेय – यह दीप अकेला (कविता)

अज्ञेय – कलगी बाजरे की (कविता)

‘कलगी बाजरे की’ कविता अज्ञेय जी की प्रसिद्ध कविताओं में से एक है। यह कविता ‘हरि घास में क्षण भर’ काव्य संग्रह से लिया गया है। इसका प्रकाशन 1949 में हुआ था। इस कविता में कवि ने अपनी प्रेमिका की तुलना तारा, कुमुदनी या चम्पे की कली जैसी पुराने प्रतीकों को छोड़कर ‘चिकनी हरि घास’… Continue reading अज्ञेय – कलगी बाजरे की (कविता)

अज्ञेय–असाध्य वीणा (कविता)

प्रयोगवाद और नई कविता के प्रवर्तक ‘अज्ञेय’ जी ने अपनी सभी विधाओं में अद्भूत प्रयोगात्मक प्रगति का परिचय दिया है। साहित्य सृजन के क्षेत्र में अज्ञेय जी ने एक साथ कवि, कथाकार, आलोचक, संपादक आदि विविध रूपों में साहित्य प्रेमियों को चौकाया तथा व्यावहारिक जगत में भी उन्होंने फोटोग्राफी, चर्म-शिल्प, पर्वतारोहन आदि से भी लोगों… Continue reading अज्ञेय–असाध्य वीणा (कविता)

ज्ञानपीठ पुरस्कार

ज्ञानपीठ पुरस्कार- भारतीय ज्ञानपीठ न्यास द्वारा भारतीय साहित्य के लिए दिया जाने वाला सर्वोच्च पुरस्कार है। भारत का कोई भी नागरिक जो आठवीं अनुसूची में बताई गई 22 भाषाओं में से किसी भी भाषा में लिखता हो, वह इस पुरस्कार के योग्य है। पुरस्कार में 11 लाख रुपये की धन राशि, प्रशस्ति पत्र और वाग्देवी… Continue reading ज्ञानपीठ पुरस्कार

जयशंकर प्रसाद – कामायनी ‘लज्जा सर्ग’ (कविता)

भाग-1 "कोमल किसलय के अंचल में नन्हीं कलिका ज्यों छिपती-सी, गोधूली के धूमिल पट में दीपक के स्वर में दिपती-सी। मंजुल स्वप्नों की विस्मृति में मन का उन्माद निखरता ज्यों- सुरभित लहरों की छाया में बुल्ले का विभव बिखरता ज्यों- वैसी ही माया में लिपटी अधरों पर उँगली धरे हुए, माधव के सरस कुतूहल का… Continue reading जयशंकर प्रसाद – कामायनी ‘लज्जा सर्ग’ (कविता)

जयशंकर प्रसाद – कामायनी ‘श्रद्धा सर्ग’ (कविता)

भाग-1 कौन हो तुम? संसृति-जलनिधि तीर-तरंगों से फेंकी मणि एक, कर रहे निर्जन का चुपचाप प्रभा की धारा से अभिषेक? मधुर विश्रांत और एकांत-जगत का सुलझा हुआ रहस्य, एक करुणामय सुंदर मौन और चंचल मन का आलस्य" सुना यह मनु ने मधु गुंजार मधुकरी का-सा जब सानंद, किये मुख नीचा कमल समान प्रथम कवि का… Continue reading जयशंकर प्रसाद – कामायनी ‘श्रद्धा सर्ग’ (कविता)

जयशंकर प्रसाद – कामायनी ‘इड़ा सर्ग’ (कविता)

भाग-1 "किस गहन गुहा से अति अधीर झंझा-प्रवाह-सा निकला यह जीवन विक्षुब्ध महासमीर ले साथ विकल परमाणु-पुंज नभ, अनिल, अनल, भयभीत सभी को भय देता भय की उपासना में विलीन प्राणी कटुता को बाँट रहा जगती को करता अधिक दीन निर्माण और प्रतिपद-विनाश में दिखलाता अपनी क्षमता संघर्ष कर रहा-सा सब से, सब से विराग… Continue reading जयशंकर प्रसाद – कामायनी ‘इड़ा सर्ग’ (कविता)

जयशंकर प्रसाद ‘कामायनी महाकाव्य’ (कविता)

‘कामायनी’ हिन्दी भाषा का एक ‘महाकाव्य’ और जयशंकर प्रसाद की अमर कृति है। यह आधुनिक छायावादी युग की सर्वोतम प्रतिनिधि काव्य है। इसे छायावाद का ‘उपनिषद’ भी कहा जाता है। यह प्रसाद जी की अंतिम काव्यकृति है। यह महाकाव्य 1936 में प्रकाशित हुई थी। इसकी भाषा साहित्यिक खड़ी बोली और छंद तोटक है। इसमें पंद्रह… Continue reading जयशंकर प्रसाद ‘कामायनी महाकाव्य’ (कविता)