‘कलगी बाजरे की’ कविता अज्ञेय जी की प्रसिद्ध कविताओं में से एक है। यह कविता ‘हरि घास में क्षण भर’ काव्य संग्रह से लिया गया है। इसका प्रकाशन 1949 में हुआ था। इस कविता में कवि ने अपनी प्रेमिका की तुलना तारा, कुमुदनी या चम्पे की कली जैसी पुराने प्रतीकों को छोड़कर ‘चिकनी हरि घास’… Continue reading अज्ञेय – कलगी बाजरे की (कविता)
Author: इंदु सिंह
अज्ञेय–असाध्य वीणा (कविता)
प्रयोगवाद और नई कविता के प्रवर्तक ‘अज्ञेय’ जी ने अपनी सभी विधाओं में अद्भूत प्रयोगात्मक प्रगति का परिचय दिया है। साहित्य सृजन के क्षेत्र में अज्ञेय जी ने एक साथ कवि, कथाकार, आलोचक, संपादक आदि विविध रूपों में साहित्य प्रेमियों को चौकाया तथा व्यावहारिक जगत में भी उन्होंने फोटोग्राफी, चर्म-शिल्प, पर्वतारोहन आदि से भी लोगों… Continue reading अज्ञेय–असाध्य वीणा (कविता)
एक रहस्मय कुआँ (अगम कुआँ)
बिहार की राजधानी पटना एक खुबसूरत ऐतिहासिक शहर है। पहले इसे पाटलिपुत्र के नाम से जाना जाता था। पटना दुनिया के सबसे पुराने शहरों में से एक है। एक समय ऐसा भी था जब पटना की गिनती सबसे बड़े शहरों में होती थी। मौर्यकाल में पटना पाटलिपुत्र के नाम से जाना जाता था। इसी शहर… Continue reading एक रहस्मय कुआँ (अगम कुआँ)
महुआ (लेख)
पेड़-पौधे हम सभी जीव-जंतुओं के लिए प्रकृति के तरफ से दिया गया अनमोल उपहार है। इसके बिना हम जीवन की कल्पना नहीं कर सकते हैं। यह हमें जीवनदायनी वायु ऑक्सीजन से हमारा भरण-पोषण भी करती हैं। हम यह सब जानते हुए भी अपने सुख के लिए इन्हें उजाड़ रहे हैं। अर्थात हम जिस डाली पर… Continue reading महुआ (लेख)
पलाश के फूल
पलाश ‘फबासी’ परिवार का एक फूल है, जिसका वैज्ञानिक नाम ‘ब्यूटिया मोनोस्पर्मा’ है। इस फूल को इसके आकर्षक सुर्ख लाल रंग के कारण इसे ‘जंगल का आग’ भी कहा जाता है। पलाश का यह फूल उत्तर प्रदेश का ‘राज्य पुष्प’ है। इस पुष्प को ‘भारतीय डाकतार विभाग’ के द्वारा डाक टिकट पर प्रकाशित कर सम्मानित… Continue reading पलाश के फूल
ज्ञानपीठ पुरस्कार
ज्ञानपीठ पुरस्कार- भारतीय ज्ञानपीठ न्यास द्वारा भारतीय साहित्य के लिए दिया जाने वाला सर्वोच्च पुरस्कार है। भारत का कोई भी नागरिक जो आठवीं अनुसूची में बताई गई 22 भाषाओं में से किसी भी भाषा में लिखता हो, वह इस पुरस्कार के योग्य है। पुरस्कार में 11 लाख रुपये की धन राशि, प्रशस्ति पत्र और वाग्देवी… Continue reading ज्ञानपीठ पुरस्कार
जयशंकर प्रसाद – कामायनी ‘लज्जा सर्ग’ (कविता)
भाग-1 "कोमल किसलय के अंचल में नन्हीं कलिका ज्यों छिपती-सी, गोधूली के धूमिल पट में दीपक के स्वर में दिपती-सी। मंजुल स्वप्नों की विस्मृति में मन का उन्माद निखरता ज्यों- सुरभित लहरों की छाया में बुल्ले का विभव बिखरता ज्यों- वैसी ही माया में लिपटी अधरों पर उँगली धरे हुए, माधव के सरस कुतूहल का… Continue reading जयशंकर प्रसाद – कामायनी ‘लज्जा सर्ग’ (कविता)
जयशंकर प्रसाद – कामायनी ‘श्रद्धा सर्ग’ (कविता)
भाग-1 कौन हो तुम? संसृति-जलनिधि तीर-तरंगों से फेंकी मणि एक, कर रहे निर्जन का चुपचाप प्रभा की धारा से अभिषेक? मधुर विश्रांत और एकांत-जगत का सुलझा हुआ रहस्य, एक करुणामय सुंदर मौन और चंचल मन का आलस्य" सुना यह मनु ने मधु गुंजार मधुकरी का-सा जब सानंद, किये मुख नीचा कमल समान प्रथम कवि का… Continue reading जयशंकर प्रसाद – कामायनी ‘श्रद्धा सर्ग’ (कविता)
जयशंकर प्रसाद – कामायनी ‘इड़ा सर्ग’ (कविता)
भाग-1 "किस गहन गुहा से अति अधीर झंझा-प्रवाह-सा निकला यह जीवन विक्षुब्ध महासमीर ले साथ विकल परमाणु-पुंज नभ, अनिल, अनल, भयभीत सभी को भय देता भय की उपासना में विलीन प्राणी कटुता को बाँट रहा जगती को करता अधिक दीन निर्माण और प्रतिपद-विनाश में दिखलाता अपनी क्षमता संघर्ष कर रहा-सा सब से, सब से विराग… Continue reading जयशंकर प्रसाद – कामायनी ‘इड़ा सर्ग’ (कविता)
जयशंकर प्रसाद ‘कामायनी महाकाव्य’ (कविता)
‘कामायनी’ हिन्दी भाषा का एक ‘महाकाव्य’ और जयशंकर प्रसाद की अमर कृति है। यह आधुनिक छायावादी युग की सर्वोतम प्रतिनिधि काव्य है। इसे छायावाद का ‘उपनिषद’ भी कहा जाता है। यह प्रसाद जी की अंतिम काव्यकृति है। यह महाकाव्य 1936 में प्रकाशित हुई थी। इसकी भाषा साहित्यिक खड़ी बोली और छंद तोटक है। इसमें पंद्रह… Continue reading जयशंकर प्रसाद ‘कामायनी महाकाव्य’ (कविता)