पाश्चात्य आलोचक और उनके सिद्धांत (इकाई- 3)

1. रचनाकार- प्लेटो समय- (427-387 ई० पू०) सिद्धांत- अनुकरण सिद्धांत, दैवीय प्रेरणा का सिद्धांत  रचनाएँ- रिपब्लिक, सिम्पोजिम फिडो, फीड्स, पारमनोईजीज, सोफिस्ट, स्टेट्स-मैन, फिलेबस, टाइनियस, क्रिटियस, लॉज    2. रचनाकार- अरस्तू समय- (384-322 ई० पू०)  सिद्धांत- अनुकरण, त्रासदी, विरेचन का सिद्धांत  रचना- पेरिपोइतिकेस (ऑन पोएटिक्स) 3. रचनाकार- लोंजाइनस (लोंगिनुस) सिद्धांत- ‘उद्दात विवेचन सिद्धांत’, प्रतिभा- कल्पना, परंपरा और… Continue reading पाश्चात्य आलोचक और उनके सिद्धांत (इकाई- 3)

विलोम शब्द (Opposite words)

विलोम का अर्थ ‘विपरीत’ है। परिभाषा: कामता प्रसाद गुरु के शब्दों में “पहले शब्द के भाव के विपरीत अर्थ देने वाला शब्द विलोम शब्द कहलाता है।” विलोम शब्द का निर्माण करते समय कुछ ध्यान रखने योग्य बातें: 1. ‘तत्सम’ शब्द का विलोम ‘तत्सम’ में, ‘तद्भव’ शब्द का विलोम ‘तद्भव’ में, ‘देशज’ शब्द का   विलोम देशज… Continue reading विलोम शब्द (Opposite words)

भारतीय काव्यशास्त्र की परंपरा (इकाई- 3) : संस्कृत के प्रमुख काव्यशास्त्री

भरतमुनि: भारत में भारतीय काव्यशास्त्र की परंपरा के सूत्रपात भरतमुनि से माना जाता है।बलदेव उपाध्याय ने इनका समय द्वितीय शताब्दी माना है।इनका सर्वमान्य समय 200 ई० पूर्व से 300 ई० पूर्व के मध्य माना जाता है। रचना: ‘नाट्यशास्त्र’ इनकी एकमात्र रचना है।इसमें 36 अध्याय और 5000 हजार श्लोक है।इसकी टीका ‘अभिनवगुप्त’ ने ‘अभिनव भारती’ के… Continue reading भारतीय काव्यशास्त्र की परंपरा (इकाई- 3) : संस्कृत के प्रमुख काव्यशास्त्री

पाश्चात्य काव्यशास्त्री (इकाई-3) : अरस्तू का अनुकरण सिद्धांत

“अरस्तू यूरोपीय काव्यशास्त्र के मेरुदंड है”    अरस्तू का जन्म: 384 ई० से 322 ई० पूर्व (मकदूनिया, यूनान) यूनानी नाम: अरिस्तोतिलेस (अरस्तू) था। गुरु: प्लेटो अरस्तू का शिष्य: सिकंदर था। रचनाएँ: इनकी रचनाओं की संख्या लगभग 400 मानी जाती है। प्राप्त रचनाएँ तीन है पेरिपोएइतिकेश (काव्यशास्त्र से संबंधित रचना )तेखनेस रितोरिकेश (भाषण शास्त्र से संबंधित… Continue reading पाश्चात्य काव्यशास्त्री (इकाई-3) : अरस्तू का अनुकरण सिद्धांत

भक्तिकालीन संत काव्यधारा

रचना- अभंगपद रचनाकार- नामदेव नामदेव संत काव्य के प्रवर्तक है।आरम्भ ये सगुणोंपासक रहें थे। बाद में निर्गुणोपासक हो गए।इन्हें ‘बरकरी’ संप्रदाय का प्रवर्तक भी माना जाता है।इनके सगुण पदों की भाषा ब्रजभाषा के समीप रही है।निर्गुण बानियों की भाषा खड़ी बोली मिश्रित साधुक्कड़ी कही जा सकती है।इसके अभंग पद  प्रसिद्ध है।इनका समय 1270 ई० से… Continue reading भक्तिकालीन संत काव्यधारा

भक्तिकालीन रचनाकारों में सूफी काव्य की महत्वपूर्ण पंक्तियाँ

1. रचना- हंसावली (1370 ई०) रचनाकार: असाइत भाषा: राजस्थानी हिन्दी नायक: राजकुमार नायिका हंसावली कथा का आधार: इसमें विक्रम और बैताल की कथा है। महत्वपूर्ण पंक्तियाँ: 1. बावन वीर कथा रस लीड। ऐह पावहु असाइत कहिउ।। 2. देवी अव्रधारु मुझ विनती। पेलि भवि हूं पंखिणी हती।।    इडा मेहला सेवन किउ। दव बलतउ तेणि बनि… Continue reading भक्तिकालीन रचनाकारों में सूफी काव्य की महत्वपूर्ण पंक्तियाँ

छायावाद (इकाई – 2)

‘छायावाद’ हिन्दी साहित्य के रोमांटिक उत्थान की काव्यधारा है। जिसका समय लगभग 1918 – 1936 ई० तक चला। इस काव्यधरा के प्रतिनिधि कवि जयशंकर प्रसाद, सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’, सुमित्रानंदन पंत और महादेवी वर्मा को माना जाता है। छायावाद के नामकरण का श्रेय मुकुटधर पांडेय को जाता है। ‘छायावाद’ ने हिन्दी में ‘खड़ीबोली’ कविता को पूर्णतः… Continue reading छायावाद (इकाई – 2)

राजभाषा के रूप में हिन्दी (इकाई-1)

संविधान के द्वारा जिस भाषा में शासक या शासन का कामकाज होता है उसे ‘राजभाषा’ कहते हैं।संविधान के द्वारा स्वीकृत सरकारी भाषा को ‘राजभाषा’ कहते हैं।हिन्दी को राजभाषा बनाने की माँग सबसे पहले श्री गोपाल स्वामी आयंगर ने ‘संविधान निर्मात्री सभा’ के समक्ष 14 सितंबर, 1949 ई० में रखी। इसी दिन इस सभा के द्वारा… Continue reading राजभाषा के रूप में हिन्दी (इकाई-1)

महत्वपूर्ण पत्र-पत्रिकाएँ : इकाई – 2

बंगाल गजट/ कलकाता जनरल एडवर्टाइजर/ हिक्की गजट 29 जनवरी, 1780 ई० (साप्ताहिक) संपादक- जेम्स आगस्टस हिक्की भारत का पहला समाचार पत्र ‘बंगाल गजट’ था। जो अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित होता था। उदंत मार्तंड (प्रति मंगलवार, मूल्य 2 रु० )  यह भारत का प्रथम साप्ताहिक हिन्दी समाचार पत्र था। प्रकाशन वर्ष - 30 मई (1826 ई०)… Continue reading महत्वपूर्ण पत्र-पत्रिकाएँ : इकाई – 2

भक्ति काव्यधारा के दर्शन पंथ और मत : इकाई-2

द्वैतवाद (ब्रह्म संप्रदाय) - मध्वाचार्यअद्वैतवाद (स्मार्त संप्रदाय) - शंकराचार्यद्वैताद्वैतवाद (सनकादिक, रसिकसंप्रदाय) - निंबार्काचार्यविशिष्टाद्वैतवाद (श्री संप्रदाय) - रामानुजाचार्यअंचित्यभेदाभेदवाद (गौडीय संप्रदाय) - चैतन्य महाप्रभुरूद्र संप्रदाय - विष्णु स्वामीसखी, हरिदासी, टट्टी संप्रदाय - स्वामी हरिदासविश्नोई संप्रदाय - जंभानाथ (जंभोजी)रामवत संप्रदाय – रामानंदसिक्ख संप्रदाय – गुरुनानकउदासी संप्रदाय - श्रीचंदसत्यनामी संप्रदाय – संत जगजीवनदासराधावल्लभ संप्रदाय – स्वामी हितहरिवंशनिरंजनी संप्रदाय –… Continue reading भक्ति काव्यधारा के दर्शन पंथ और मत : इकाई-2