वर्ड्सवर्थ का काव्य भाषा सिद्धांत

विलियन वर्ड्सवर्थ       जन्म - 7 अप्रैल 1770 ई. में इंग्लैंड में हुआ था।       निधन -  23 अप्रैल 1850 ई. को हुआ था।       वर्ड्सवर्थ को कवि के रूप में विशेष ख्याति मिली। उन्हें 'रोमानी काव्यायुग' का प्रवर्तक कहा गया। लगभग 20 वर्ष कि अवस्था में ही उन्होंने साहित्य लिखना आरंभ कर दिया था।… Continue reading वर्ड्सवर्थ का काव्य भाषा सिद्धांत

काव्य के लक्षण

काव्य - कवि के द्वारा जो कार्य संपन्न हो उसे 'काव्य' कहते हैं।       लक्षण- किसी वस्तु अथवा विषय के 'असाधारण' अथार्त 'विशेष धर्म' के विषय में कथन करना उसका 'लक्षण' कहलाता है।       काव्य शब्द की व्युत्पत्ति - 'काव्य' शब्द 'कवि' में 'य' प्रत्यय के योग से बना है, जिसका अर्थ होता है, कवि… Continue reading काव्य के लक्षण

अरस्तू: त्रासदी सिद्धांत

त्रासदी का अर्थ: 'त्रासदी' अंग्रेजी के 'ट्रेजडी' शब्द का हिंदी रूपांतरण है। इसका आशय है- दुखांतक या दुःखपूर्ण रचना अथार्त जिस रचना का अंत दुःखपूर्ण हो। अरस्तू ने 'पेरिपोइतिकेस' (पायटिक्स) के 6 से 19 वें तक के अध्यायों में त्रासदी की विस्तार से विवेचन किया है। (विशेषतः 11वें अध्याय में है।) त्रासदी की परिभाषाएँ:      … Continue reading अरस्तू: त्रासदी सिद्धांत

अरस्तू: विरेचन (Catharsis) सिद्धांत

विरेचन का अर्थ: यूनानी भाषा के 'कथार्सिस' शब्द के लिए संस्कृत एवं हिंदी में रेचन  / विरेशन शब्द का प्रयोग किया जाता है।       विरेचन का शाब्दिक अर्थ है- 'शुद्धिकरण' अथार्त विचारों का शुद्धिकरण या निष्कासन करना। 'विरेचन' शब्द चिकित्साशास्त्र का शब्द है, जिसका अरस्तू ने काव्यशास्त्र में लाक्षणिक प्रयोग किया है।       'विरेचन' भारतीय… Continue reading अरस्तू: विरेचन (Catharsis) सिद्धांत

कॉलरिज: कल्पना और फैंटेसी

कॉलरिज - समय: (1772 - 1834 ई.)       जन्म - (1772 ई.), लंदन,       पूरानाम - सैमुअल टेलर कॉलरिज, ये आत्मदार्शनिक थे।       निधन - 1834 ई.       वर्ड्सवर्थ कॉलरिज के प्रिय मित्र थे। वर्ड्सवर्थ के साथ मिलकर कॉलरिज ने 'रोमांटिसिज्म' का प्रवर्तन किया। कॉलरिज की प्रमुख रचनाएँ: (कॉलरिज का सिद्धांत 'जैववादी' सिद्धांत पर आधारित… Continue reading कॉलरिज: कल्पना और फैंटेसी

साधारणीकरण

प्राचीन भारतीय साहित्य के सन्दर्भ में, साधारणीकरण रस-निष्पत्ति की वह स्थिति है, जिसमें दर्शक या पाठक कोई अभिनय देखकर या काव्य पढ़कर उससे तादात्मय स्थापित करता हुआ उसका पूरा-पूरा रसास्वादन करता है।       यह वह स्थिति होती है जिसमे दर्शक या पाठकों के मन में 'मैं' और 'पर' का भाव दूर हो जाता है और… Continue reading साधारणीकरण

रस निष्पत्ति

'रस निष्पत्ति' का अर्थ है - 'रस अस्वादन' की प्रक्रिया। भरतमुनि ने 'नाट्यशास्त्र' में रसों की संख्या आठ मानी है- श्रृंगार, हास्य, करुण, रौद्र, वीर, भयानक, वीभत्स, अद्भुत। दण्डी ने भी आठ रसों का उल्लेख किया है। भरतमुनि ने 'नाट्यशास्त्र' के 'छठे अध्याय' में रस निष्पत्ति की प्रक्रिया का सूत्र देते हुए कहा है -… Continue reading रस निष्पत्ति

सरस्वती पत्रिका

सरस्वती पत्रिका के संपादक/प्रकाशक - चिंतामणि घोष ने आरंभ करवाया। सरस्वती पत्रिका की स्थापना वर्ष - 1900 ई. सरस्वती पत्रिका के संपादक (मंडल)       1. जनवरी 1900 ई से दिसंबर 1900 ई. तक       सरस्वती पत्रिका के संपादक मंडल में 5 संपादक थे-             जगन्नाथ दास रत्नाकर             किशोरीलाल गोस्वामी              श्यामसुन्दर दास             राधाकृष्ण… Continue reading सरस्वती पत्रिका

खड़ीबोली आन्दोलन

खड़ीबोली आन्दोलन के सन्दर्भ में विशेष तथ्य:       खड़ीबोली पश्चिमी हिंदी के अंतर्गत आती है       19 वीं शताब्दी के पहले ही खड़ी बोली की रचनाएँ मिलना शुरू हो जाती है। इसके बाद  फोर्ट विलियम कॉलेज ने इसमें अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।       > 1908 ई. में लल्लूलाल के द्वारा लिखी गई रचना 'प्रेम… Continue reading खड़ीबोली आन्दोलन

नागरी प्रचारिणी सभा, काशी

नागरी प्रचारिणी सभा काशी की स्थापना- 16 जुलाई 1893 ई. को हुई थी।       > इसकी स्थापना वाराणसी 'क्वींस कॉलेज' के, कक्षा 9वीं के तीन विद्यार्थियों-       > रामनारायण मिश्र, श्यामसुंदर दास, शिवकुमार सिंह के द्वारा किया गया।       > इसके प्रथम अध्यक्ष राधाकृष्ण दास थे।       > काशी के सप्तसागर मोहल्ले के घुड़साल में… Continue reading नागरी प्रचारिणी सभा, काशी