ये नव वर्ष हमें स्वीकार नहीं

अनेक बाहरी आक्रमणकारियों ने भारत पर राज करने के लिए, सबसे पहले हमारे भारतीय संस्कृति और सनातन धर्म पर कुठाराघात किया। जिससे कि हम हिंदवासी अपनी संस्कृति को भूला कर उनकी पाश्चात्य संस्कृति को अपना ले। हमारी अपनी ही संस्कृति का पूर्णरूप से ज्ञान नहीं होने के कारण, हम भारतवासी 31 दिसंबर के रात्रि में… Continue reading ये नव वर्ष हमें स्वीकार नहीं

हिन्दी साहित्य में रीतिकाल के प्रमुख काव्यशास्त्री (इकाई-2)

1. कृपाराम- (16 वीं शताब्दी) हिन्दी काव्यशास्त्र के प्रथम काव्यशास्त्री थे। रचना: हित-तरंगिणी (हित-तरंगिणी को रीतिकाल का भी प्रथम रचना माना जाता है।) रचनाकाल: (1541 ई०), इस रचना में 5 तरंग (अध्याय को तरंग कहा गया है) इसमें 400 सौ छंद है।यह नायिका भेद से संबंधित रचना है। 2. केशवदास- (रीतिबद्ध कवि) मूलनाम: वेदांती मिश्र… Continue reading हिन्दी साहित्य में रीतिकाल के प्रमुख काव्यशास्त्री (इकाई-2)

अव्यय

अव्यय या अविकारी शब्द: प्रयोग या अर्थ के आधार पर शब्द दो तरह के होते है। 1. व्ययी या विकारी शब्द 2. अव्यय या अविकारी शब्द नोट: कारक, काल, वचन, लिंग के आधार पर जिनका रूप बदल जाता है, उसे व्ययी या विकारी शब्द कहते है। नोट: कारक, काल, वचन, लिंग के आधार पर जिनका… Continue reading अव्यय

हालावादी अप्रतिम कवि : हरिवंश राय बच्चन 

भावुकता अंगूर लता से खींच कल्पना की हाला, कवि साक़ी बनकर आया है, भरकर कविता की प्याला; कभी न कण भर खाली होगा, लाख पिएँ, दो लाख पिएँ पाठक गण हैं पीनेवाले, पुस्तक मेरी मधुशाला!! आधुनिक काव्य में ‘हालावाद’ : आधुनिक काल में एक नई विचारधारा ‘हालावाद’ के प्रवर्तक हरिवंशराय राय बच्चन थे। हिन्दी साहित्य… Continue reading हालावादी अप्रतिम कवि : हरिवंश राय बच्चन 

हिन्दी व्याकरण (संधि)

संधि का व्युत्पति- यह दो शब्दों के योग से बना है। सम् + धि = ‘सम्’ का अर्थ होता है, ‘पूर्णतया’ और ‘धि’ का अर्थ होता है, ‘मिलना’ अथार्त दो ध्वनियों या वर्णों का पूर्णतया मिलना संधि कहलाता है। परिभाषा- दो ध्वनियों या वर्णों के परस्पर मेल से उत्पन्न ध्वनि-विकार को संधि कहते है। उदाहरण-… Continue reading हिन्दी व्याकरण (संधि)

वर्ण विचार

वर्ण की परिभाषा: कामताप्रसाद गुरु के शब्दों में- “वर्ण उस मूल ध्वनि को कहते हैं, जिसके खण्ड नहीं किए जा सकते है।” (क, अ, ट इसे खण्ड नहीं किया जा सकता है) आचार्य किशोरीदास वाजपेयी के अनुसार- “वर्ण वह छोटी से छोटी ध्वनि है जो कान का विषय है और जिसके टुकड़े नहीं किए जा… Continue reading वर्ण विचार

सर्वनाम (Pronoun)

सर्वनाम की व्युत्पति- सर्वनाम दो शब्दों के मिलने से बना है। सर्व + नाम अथार्त सर्वनाम का शाब्दिक अर्थ होता है, सभी का नाम। परिभाषा- वे शब्द जो संज्ञा के स्थान पर किसी प्राणी, वस्तु, स्थान के लिए प्रयुक्त होते है, उसे सर्वनाम कहते है। कामता प्रसाद गुरु के शब्दों में- “वाक्य में वस्तु या… Continue reading सर्वनाम (Pronoun)

संज्ञा (Noun) 

संज्ञा शब्द की व्युपति- संज्ञा शब्द दो शब्दों के मेल योग से बना है। सम् + ज्ञा ‘सम्’ का अर्थ ‘सम्यक’ (पूर्ण) और ‘ज्ञ’ का अर्थ ‘ज्ञान’ अथार्त ‘पूर्णज्ञान’ होता है। संज्ञा शब्द का अर्थ होता है- ‘नाम’ (संज्ञा का एक और अर्थ ‘महानाम’ भी है।) परिभाषा- किसी वस्तु, प्राणी, स्थान, भाव आदि के ‘नाम’… Continue reading संज्ञा (Noun) 

हिन्दी साहित्य की गद्य विधाएँ: नाटक (इकाई- 2)

‘नाटक’ शब्द संस्कृत की ‘नट्’ धातु से बना है, जिसका अर्थ होता है- ‘अभिनय करना’। नाटक की व्युत्पति नट + अक = नाटक ( अर्थ अभिनय करना है।) परिभाषा- “अवस्थानुकृतिनार्ट्यं रूपं दृष्यतयोच्यते।” अथार्त किसी अवस्था का अनुकृति ही नाटक है। (यह धनंजय के नाटक ‘दशरूपक’ में है।) भारतेंदु हरिश्चंद्र के शब्दों में- “नाटक का अर्थ… Continue reading हिन्दी साहित्य की गद्य विधाएँ: नाटक (इकाई- 2)

हिन्दी साहित्य के सन्दर्भ में पुरुष विमर्श : एक विवेचन

भूमिका- परिवर्तन, विकास, क्रांति ये प्रकृति के शाश्वत नियम हैं। हर युग में क्रांतियाँ और आंदोलन हुए हैं, आज भी हो रहे हैं और आगे भी होते रहेंगे। जिसके फलस्वरूप व्यवस्था में परिवर्तन हुआ है और निरंतर विकास का मार्ग प्रसस्त होता रहा है। पृथ्वी पर जब से जीवन की उत्पत्ति हुई है, तब से… Continue reading हिन्दी साहित्य के सन्दर्भ में पुरुष विमर्श : एक विवेचन