क्रोचे का अभिव्यंजना सिद्धांत

बेनदेतो क्रोचे- (आत्मवादी दार्शनिक)

जन्म – 1866 ई. इटली

निधन – 1952 ई.

      बेनदेतो क्रोचे, इटली के प्रसिद्ध दार्शनिक थे। उन्होंने आत्मवादी दर्शन के आधार पर सौंदर्य-सिद्धांत की व्याख्या किया है, जो अभिव्यंजनावाद के (Expressionism) नाम से प्रसिद्ध है।

      ‘अभिव्यंजनावाद’ का मूल स्रोत वस्तुतः ‘स्वछंदतावाद’ की उस प्रवृति में है, जो रुढ़ि परंपरा, नियम आदि का विरोध करती है। 

निबंध – “फंडामेंटल थीसिस ऑफ एस्थेटिक एज सायंस ऑफ एक्स्प्रेसन एण्ड जनरल लिंग्विस्टिक” (1900 ई.)

रचना – ‘एस्थेटिक’ (दो भाग में)

प्रकाशन – 1902 ई.

सिद्धांत – अभिव्यंजनावाद (सौंदर्यशास्त्र)

प्रवर्तक – बेनदेत्तो क्रोचे, प्रवर्तन वर्ष – 1900 ई.

उद्देश्य – साहित्य में आत्मा की अंतः सत्ता स्थापित करना।

विशेष तथ्य:

* क्रोचे का अभिव्यंजनावाद कला के मूल तत्व की खोज का प्रयास है।

* कला का वास्तविक तत्व क्या है? अथवा उसकी आत्मा क्या है? इस विषय में क्रोचे ने अपना विवेचन प्रस्तुत किया है जिसे अभिव्यंजनावाद के नाम से जाना जाता है।

अभिव्यंजना की प्रक्रिया:

* क्रोचे की मान्यता है कि ‘अभिव्यंजना’ मानसिक व्यापारों पर आधारित है।

* इन मानसिक व्यापारों की दो कोटियाँ होती है-

      1. सैद्धांतिक या मानसिक 2. व्यावहारिक क्रिया

1. सैद्धांतिक या मानसिक के दो भेद हैं- (i) सहज बोध (भावात्मक) (ii) बुद्धि बोध (वैचारिक)

2. व्यावहारिक क्रिया के भी दो भेद हैं- (i) नैतिक क्रिया (ii) आर्थिक क्रिया

      अभिव्यक्ति के लिए सबसे अधिक जरुरी ‘सहज अनुभूति’ है, जिसके माध्यम से कलात्मक निर्माण होता है।

* क्रोचे ने विचारात्मक क्रिया का संबंध ‘तर्कशास्त्र’ से, आर्थिक क्रिया का संबंध ‘अर्थशास्त्र’ से और नैतिक क्रिया का संबंध ‘नीतिशास्त्र’ से माना है।

* क्रोचे के अनुसार सहजज्ञान या अभिव्यंजना ज्ञान का प्रथम सोपान है।

* बुद्धिजन्य ज्ञान उसके बाद आता है।

कलात्मक निर्माण की निम्नलिखित चार श्रेणियाँ है-

      1. अंतः संस्कार- जब द्रष्टा किसी वस्तु को देखता है तब उसके चित्त पर कुछ संस्कार (प्रभाव) पड़ता है।  

      2. अभिव्यंजना- इन संस्कारों के जागृत होने से मन ही मन इसकी आतंरिक अभिव्यक्ति होने लगती है जो अभिव्यंजना कहलाती है।

      3. आनुषांगिक अनंद- इससे द्रष्टा के मन में एक प्रकार के सौंदर्य बोध होता है, जिससे अनंद की उत्पत्ति होती है

      4. अभिव्यक्ति- जब अभिव्यंजना आतंरिक नहीं रहकर शब्द आदि के माध्यम से स्थूल रूप में प्रकट हो जाती है तब इसे अभिव्यक्ति कहते है।

अभिव्यंजनावाद की प्रमुख विशेषताएँ/मान्यताएँ –

* कला सहज अनुभूति है तथा सहज अनुभूति ही अभिव्यंजना है।

* अभिव्यंजना स्वयं प्रकाश ज्ञान है।

* यह एक मानसिक क्रिया है तथा अध्यात्म की आवशयकता है।

* अभिव्यंजना अखंड है उसे वर्गों में विभाजित नहीं किया जा सकता है।

* अभिव्यंजना पूर्णतः आतंरिक होती है।

* ‘कला कला के लिए है’ कला स्वयं साध्य है।

* क्रोचे की मान्यता है कि कलाकार के लिए सुन्दर और असुंदर का कोई भेद नहीं होता है।

अभिव्यंजना वाद के दोष/ कमियाँ-

* क्रोचे की दृष्टि में सहज अनुभूति, कला तथा अभिव्यंजना एक ही है।

* यह सिद्धांत आत्म-परक है इसी आधार पर इसकी सबसे जयादा आलोचना हुई है।

* कला और शैली तथा कला व आस्वादन प्रक्रिया को एक ही मानना चाहिए।

उपलब्धियाँ:

* हिंदी में क्रोचे के ‘अभिव्यंजनावाद’ का उल्लेख सबसे पहले आचार्य शुक्ल ने किया।

* आचार्य शुक्ल के अनुसार- “क्रोचे का’ अभिव्यंजनावाद’ को भारतीय वक्रोक्तिवाद का विलायती उत्थान कहते हुए इसे वाग्वैचित्र्यवाद कहा है”।

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  Change )

Connecting to %s

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.