प्रतीक (Symbol)

‘प्रतीक’ का सामान्य अर्थ ‘चिह्न’ होता है।

      परिभाषा- यही चिह्न जब वस्तु विशेष, भावना विशेष, विचार विशेष या व्यक्ति विशेष का प्रतिनिधित्व करता है तब ‘प्रतीक’ कहलाता है।

      डॉ. भागीरथ के शब्दों में – अपने रूप, गुण, कार्य या विशेषताओं के सादृश्य एवं प्रत्यक्षता के कारण जब कोई वस्तु या कार्य किसी अप्रस्तुत वस्तु भाव, विचार, क्रिया-कलाप, देश, जाति, संस्कृति आदि का प्रतिनिधित्व करता है तब वह ‘प्रतीक’ कहलाता है।”

            उदाहरण – राष्ट्रीय झंडा, कमल, दीपक आदि।

      किसी एक कवि की रचनाओं में किसी विशेष बिंब को बार-बार दुहराये जाने पर वह वह ‘प्रतीक’ बन जाता है।

      जैसे- महादेवी वर्मा की कविता में ‘दीपक’, निराला की कविता में ‘वसंत’, प्रसाद की कविता में ‘हिमालय’ आदि।

      डॉ. नगेंद्र के शब्दों में – “उपमान जब किसी पदार्थ विशेष के लिए रूढ़ हो जाता है तब वह प्रतीक बन जाता हैं।”

      डॉ. नित्यानंद शर्मा के शब्दों में – “अप्रस्तुत का प्रतिनिधित्व करनेवाला प्रस्तुत का नाम प्रतीक है।” जैसे- शिवलिंग अदृश्य का प्रतिनिधित्व करता है।

प्रतीक की निम्न विशेषताएँ मानी जा सकती हैं-

      1. प्रतीक किसी अगोचर अथवा अप्रस्तुत विषय का प्रतिनिधित्व करता है।

      2. प्रतीक दृश्यात्मक होता है।

      3. यह प्रतिनिधित्व-सदृश्य, साहचर्य तथा रूढ़ि के कारण हो सकता है।

      4. प्रतीक उपमेय के स्थान पर प्रयुक्त होने वाला उपमान है। काव्य की भाषा में इसे ‘रूप कातिश्योक्ति’ कहा जाता है।

      * हिंदी में संत कवियों ने शरीर, जगत, माया, ईश्वर आदि को व्यक्त करने के लिए अनेक प्रतीकों का प्रयोग किया है।

      * बच्चन की मधुशाला में मधुशाला, प्याला, हाला, मधुबाला आदि प्रतीकों का प्रयोग किया है।

      * फ्रांस में 19वीं शती के अंतिम चरण में ‘प्रतीकवा’द का आरंभ एक साहित्यिक आन्दोलन के रूप में हुआ। इसके पुरस्कर्ता बादलेयर मलार्मे माने जाते हैं।

      * यथार्थवाद की प्रतिक्रिया में आध्यात्मिक मूल्यों को महत्व दिया जाने लगा और इन मूल्यों की अभिव्यक्ति के लिए अमूर्त प्रयोगों की शुरुआत होने लगा। इस प्रवृति के बढ़ने से ‘प्रतीकवाद’ एक आन्दोलन बन गया।

      * सन् 1870-1885 ई. के मध्य कला-साहित्य के क्षेत्र में ‘प्रतीकवादी’ आंदोलन शुरू हो गया।

      ‘जॉन मोरआस’ ने सन् 1886 ई. में ‘फिगरो’ नाम के पत्र में ‘प्रतीकवाद’ का घोषणा पत्र प्रकाशित कराया।

      अलबर्ट ओरिएण्ट ने सन् 1886 ई. में ‘प्रतीकवाद’ की व्याख्या करते हुए एक लेख प्रकाशित कराया।

      * प्रतीकवादी आंदोलन को स्टीफन मलार्मे ने आगे बढ़ाया। बर्लेन, रिम्बो, कॉर्वे आदि प्रतीकवाद के समर्थक थे।

      * भारत में प्रतीकवाद साहित्यिक आंदोलन नहीं बन सका।

      * हिंदी साहित्य में प्रतीकों का विशेष प्रयोग छायावादी-रहस्यवादी कविता में किया गया।

      * रविन्द्रनाथ टैगोर पर ‘विलियम बटलर येट्स’ का प्रभाव था। अतः उन्होंने औपनिषदिक चेतना को कवि सुलभ रहस्य चेतना के रूप में प्रतीकों का प्रचुर मात्रा में प्रयोग किया, किन्तु उन्हें प्रतीकवादी नहीं माना गया।

प्रतीकों के प्रकार

काव्य में प्रयुक्त प्रतीकों को निम्न भागों में बाँटा गया है-

      1. प्राकृतिक प्रतीक

      2. सांस्कृतिक प्रतीक

      3. ऐतिहासिक-पौराणिक प्रतीक

      4. सामाजिक प्रतीक

      5. वैज्ञानिक प्रतीक

महत्वपूर्ण कथन:

      लैंगर के शब्दों में – “प्रतीक जिस वस्तु का प्रतीक है, उस वस्तु को नहीं उस भाव को उस धारणा को व्यक्त करता है।”

      इमर्सन के शब्दों में – “सांकेतिक अभिव्यक्ति का नाम साहित्य है।”

      डॉ नगेंद्र के शब्दों में – “प्रतीक रूढ़ उपमान का ही दूसरा नाम है, जब उपमान स्वतंत्र न रहकर पदार्थ विशेष के लिए रूढ़ हो जाता है, तब वह प्रतीक बन जाता है।”

      अज्ञेय के शब्दों में – “प्रतीक शक्ति की तलाश का साधन है।”

      रामस्वरूप चतुर्वेदी के शब्दों में – “कविता के लिए एक शाब्दिक प्रतीक होना एक आधारभूत शर्त है, पर हर शाब्दिक प्रतीक कविता नहीं होता।”    

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