रस निष्पत्ति

‘रस निष्पत्ति’ का अर्थ है – ‘रस अस्वादन’ की प्रक्रिया।

भरतमुनि ने ‘नाट्यशास्त्र’ में रसों की संख्या आठ मानी है- श्रृंगार, हास्य, करुण, रौद्र, वीर, भयानक, वीभत्स, अद्भुत। दण्डी ने भी आठ रसों का उल्लेख किया है।

भरतमुनि ने ‘नाट्यशास्त्र’ के ‘छठे अध्याय’ में रस निष्पत्ति की प्रक्रिया का सूत्र देते हुए कहा है – “विभावानुभाव-व्यभिचारी-संयोगाद् रसनिष्पत्तिः।

      अथार्त विभाव, अनुभव एवं व्यभिचारी भावों के संयोग से रस की निष्पत्ति होती है।

भरतमुनि के रस सूत्र में व्याख्या योग्य शब्द ‘संयोगात’ और ‘निष्पत्ति’ हैं।

‘रस निष्पत्ति’ के सूत्र को 11 आचार्यो द्वारा व्याख्या किया गया था।

इनमे से निमंलिखित चार आचार्यों के व्याख्या अति महत्वपूर्ण हैं :

      1. भट्टलोलट – उत्त्पत्तिवाद / आरोपवाद (मीमांसा दर्शन)

      2. शंकुक – अनुमितिवाद (न्यायदर्शन)

      3. भट्टनायक – भोगवाद (सांख्यदर्शन)

      4. अभिनवगुप्त – अभ्व्यक्तिवाद / अभिव्यंजनावाद (शैवदर्शन)

भट्टलोलट – उत्त्पत्तिवाद / आरोपवाद (मीमांसा दर्शन)

रस की स्थिति:

      अनुकार्य – जिसका अनुकरण किया जाए वे अनुकार्य (ऐतिहासिक या पौराणिक पात्र – राम, कृष्ण आदि) है।

      अनुकर्ता – (अभिनेता) जिन मूल पात्रों का अनुकरण करते है, वे अनुकर्ता है।

      दर्शक – (देखना) पाठक या दर्शक अभिनेताओं को ही मूल पात्र समझ लेता है। 

      सदृश्य – (सहृदय) विभाव आदि के द्वारा उसके मन में रस की उत्पत्ति हो जाती है।   

भट्टलोलट के मत की प्रमुख बातें:

      > रस मूल पात्रों (अनुकर्ता) अथार्त रक्, कृष्ण आदि पात्रों में स्थित होता है।

      > विभाव द्वारा रस की उत्पत्ति होती है।

      > रस एवं विभाव में उत्पाद्द- उत्पादक संबंध होता है।

      > अनुभवों द्वारा रस गम्य (आगे) बढ़ता है। अतः रस एवं अनुभाव में गम्य-गम्यक संबंध होता है।

      > संचारी भाव रस का पोषण करते हैं। अतः रस ‘पोष्य’ और संचारी भाव ‘पोषक’ हैं।

      > इन्होंने ‘निष्पत्ति’ का अर्थ ‘उत्पत्ति’ माना है ।

      > रस की स्थिति – मूल पात्रों / अनुकर्ता में

      > निष्पत्ति का अर्थ – उत्पत्ति लिया

      > रस एवं विभाव में – उत्पाद्द-उत्पादन संबंध माना

      > रस एवं अनुभाव में – गम्य-गम्यक संबंध माना

      > रस एवं संचारी भाव में – पोष्य-पोषक संबंध माना

      > इन्होंने संयोगात का अर्थ संबंध  ग्रहण से किया है

2. शंकुक – समय – 9वीं शताब्दी का उतरार्द्ध, ये काश्मीर के निवासी थे।

      मत का नाम – अनुमितिवाद / अनुमानवाद 

      दर्शन – न्यायदर्शन, इन्होने न्यायशास्त्र के आधार पर रस सूत्र की व्याख्या किया है

      शंकुक के अनुसार रस सूत्र का अर्थ है – “विभाव अनुभाव एवं व्यभिचारी भावों के अनुमान से रस की अनुमिति होती है।”

शंकुक का अनुमितिवाद –

      > शंकुक का मानना था कि रस मूल रूप से अनुकर्ता (नट-नटी अभिनय करने वालों) में होती है।

      > सहृदय दर्शक/व्यक्ति उन पात्रों को अभिनय करता हुआ देखकर मूल पात्रों का अनुमान ठीक उसी तरह लगा लेता है जिस तरह चित्र में घोड़े को देखकर मूल घोड़े का अनुमान लगाया जा सकता है।

शंकुक के मत की महत्वपूर्ण बातें:

      > शंकुक ने रस की स्थिति ‘अनुकर्ता’ में मानी है।

      > इन्होंने संयोगात का ‘अनुमान’ तथा निष्पत्ति का अर्थ ‘अनुमिति’ ग्रहण किया  है।

      > इन्होंने ‘चित्रतुरंग न्याय’ का आश्रय लेकर व्याख्या किया कि जिस प्रकार घोड़े के चित्र को देखकर मूल घोड़े का अनुमान लगाया जा सकता है, ठीक उसी प्रकार  मूल नायक का अभिनय करने वाले अभिनेता को ही हम मूल नायक मान लेते  हैं।

      > शंकुक के अनुसार रस की उत्पत्ति नहीं होती अपितु उसका ‘अनुमान’ लगाया जाता है।

      > इन्होंने रस एवं विभाव में अनुमापक-अनुमाप्या संबंध को स्वीकार किया है

      > शंकुक के अनुसार ‘स्थाई भाव’ रस के कारण है। अनुभाव ‘कार्य’ है तथा संचारी भाव रस के ‘सहचारी’ हैं।

      शंकुक ने रस के एवं अनुभाव तथा रस एवं संचारी भाव के संबंधों के बारे में कुछ भी नहीं कहा है।

शंकुक के अनुसार – “अनुमान की सहायत से प्राप्त ज्ञान ही अनुमिति है।”

      शंकुक ने अनुमिति के तीन भेद दिए है:

            पूर्ववत् अनुमिति (विभाव)

            शेषवत् अनुमिति ( अनुभाव)

            सामान्यत दृष्ट अनुमिति (संचारी भाव)

            शंकुक के मत का खंडन भट्टतौत ने किया था।

3. भट्टनायक – (समय – 9वीं शताब्दी का उतरार्द्ध)

      इनके मत का नाम – भोगवाद / भुक्तिवाद 

      दर्शन – इन्होंने सांख्यदर्शन दर्शन के आधार पर रस सूत्र की व्याख्या की है।

      > इनके अनुसार “विभाव अनुभाव एवं व्यभिचारी भावों के विभावन से ही रस की भुक्ति (भोग) होती है।”

      > इन्होंने अपने से पुर्ववर्ती भट्टलोलट एवं शंकुक के मतों का खंडन करते हए कहा है कि रस मूल रूप से प्रेक्षक (दर्शक) में रहता है तथा रस की न तो उत्पत्ति होती है और न ही उसका अनुमान किया जा सकता है।

      > रस ‘ब्रह्मा नंद सहोदर’ है, इसकी सत्ता अखंड होती है।

विशेष तथ्य:

      > इन्होंने निष्पत्ति का अर्थ भुक्ति (भोग) तथा संयोगात् का अर्थ भोज्य-भोजक ग्रहण किया है।

      > इन्होंने कहा कि सबसे पहले प्रेक्षक (दर्शक) अभिधा व्यापार के द्वारा काव्य/नाटक का अर्थ ग्रहण करता है। उसके बाद भावकत्व (विभाव, अनुभाव, संचारी भावों का साधारणीकरण) व्यापार के द्वारा वह साधारणीकरण की अवस्था में पहुँच जाता है। इसके बाद भोजकत्व व्यापार द्वारा वह रस का भोग करता है।

      > भट्टनायक ने भावकत्व क्रिया के माध्यम से साधारणीकरण का सर्वप्रथम सूत्र किया।

इन्होंने रस के भोग करने की तीन अवस्थाएँ मानी है:

      (क) अभिधा – अभिधा से शब्दार्थ का ज्ञान होता है।

      (ख) भावकत्व – भावकत्व व्यापार द्वारा साधारणीकृत होकर ‘स्व’ अथवा ‘पर’ के बंधनों से मुक्त होकर उपभोग योग्य बन जाता है।

      (ग) भोजकत्व – भोग के व्यापार को भट्टनायक ने भोजकत्व कहा है।

भट्टनायक के अनुसार – काव्य में तीनों व्यापार होते है, किन्तु नाटक में अंतिम दो व्यापारों की ही स्थिति रहती है।

भोजकत्व में रजोगुण और तमोगुण का नाश होकर शुद्ध सतोगुण का उद्रेक होने लगता है।

4. अभिनवगुप्त  (समय – 10वीं शताब्दी का उतरार्द्ध), ये काश्मीर के निवासी थे।

      मत का नाम – अभिव्यक्ति / अभिव्यंजनावाद

      दार्शनिक आधार – ‘शैवदर्शन’ में विशेष आस्था थी।

रचनाएँ-

      > इनकी 41 रचनाओं का उल्लेख मिलता है जिसमें से वर्तमान में 11 रचनाएँ ही उपलब्ध हैं।

      > भरतमुनि के ‘नाट्यशास्त्र’ की टीका ‘अभिनव भारती’ के नाम से लिखी।

      > ‘अनंदवर्धन’ की ‘ध्वन्यालोक’ की टीका ‘ध्वन्यालोक लोचन’ के नाम से लिखी।

      > इस रचना में इन्होंने ध्वनि विरोधी आचार्यों के मतों का खंडन किया है।

      > ‘तन्त्रालोक’ तंत्रशास्त्र का विश्वकोश (दार्शनिक रचना) है।

      > ‘ईश्वर प्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी’ कश्मीर के शैव दर्शन पर आधारित रचना है।       

      > अभिनवगुप्त भट्टलोल्लत, शंकुक और भट्टनायक की मान्यताओं का खंडन करते हुए अपना मत प्रस्तुत किया है, जो ‘अभिव्यक्ति नाम से प्रसिद्ध है।

      > अभिनवगुप्त ने भरतमुनि के रस सूत्र की व्याख्या इस प्रकार से की है-

            “विभाव, अनुभाव एवं व्यभिचारी भावों की अभिव्यंजना से रस की अभिव्यक्ति होती है।”

इन्होंने संयोगात् का अर्थ – व्यंग्य (रस) – व्यंजक (विभाव, अनुभव, संचारी भाव) माना है।

निष्पत्ति का अर्थ – अभिव्यक्ति / अभिव्यंजना ग्रहण किया है।

      इनका मानना था कि रस की उत्पत्ति ‘अनुमित’ व ‘भुक्ति’ नहीं होती है। (इन्होंने अपने से पहले के तीनों आचार्यों के मत को खंडित किया है)

      अपितु रस की अभिव्यक्ति अथवा अभिव्यंजना होती है।

      रस पहले से ही सहृदय में विद्दमान रहता है तथा वह विभाव, अनुभाव एवं संचारी भावों को स्पर्श कर ठीक उसी तरह अभिव्यक्त हो जाता है जैसे पहले वर्षा का संसर्ग प्राप्त करके मिट्टी से सोंधी-सोंधी खुशबू आने लगाती है। या मिट्टी के नए घड़े पर पानी के छींटे पड़ने से उसमे से सोंधी- सोंधी खुशबू आने लगती है।

      अभिनवगुप्त ने वास्तव में रसानुभूति के लिए ह्रदय की मुक्तावस्था को अनिवार्य माना है अतः इनका मत अन्य आचार्यों की अपेक्षा अधिक ग्राह्य और व्यापक है।

अभिनवगुप्त के अभिव्यक्ति वाद के विशेष तथ्य:

      1. संयोगात का अर्थ – व्यंजक ग्रहण किया है।

      2. निष्पत्ति का अर्थ – अभिव्यक्ति / अभिव्यंजना माना है।

      3. रस की निष्पत्ति सहृदय से मानी है।

      4. रस की अभिव्यक्ति को मिट्टी, जल एवं सोंधी खुशबू के माध्यम से स्पष्ट किया है।

      5. इनका मत शैववाद पर आधारित है।

      6. इनका मत ‘ध्वनि’ विशेषकर व्यंजना पर आधारित है।

      7. इनका मत सर्वाधिक मान्य है।

      8. रसानुभूति राग द्वेषरहित आनंदानुभूति है यही साधारणीकरण की चरम उपलब्धि  है।

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