भारत की आजादी का अमृत महोत्सव

श्रीरामचरित मानस में गोस्वामी तुलसीदास ने लिखा है कि ‘पराधीन सपनेहुं सुख नाहीं’ यानी दूसरे के अधीन, परतंत्रता की बेड़ियों में जकड़ा व्यक्ति तो सपने में भी सुखी नहीं रह सकता। हमारा अतीत भी उस दर्द का साक्षी रहा है, जब इतिहास के एक लंबे कालखंड तक देश को गुलामी का दंश झेलना पड़ा।

प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी ने कहा कि आजादी के अमृत महोत्सव का अर्थ है आजादी की नई उर्जा का अमृत, स्वतंत्रता सेनानियों की स्वाधीनता का अमृत, नये विचारों का अमृत, नये संकल्पों का अमृत और आत्मनिर्भरता का अमृत। प्रधानमंत्री मोदी जी ने मार्च में गुजरात के साबरमती आश्रम से स्वतंत्रता के अमृत महोत्सव की शुरूआत की थी। इस महोत्सव को शुरू करते हुए उन्होंने कहा था कि राष्ट्र का गौरव तभी जागृत होगा जब हम अपने स्वाभिमान और बलिदान को याद करते हुए अपनी आने वाली पीढ़ी को इस विषय में बताते रहेंगे। भारत को आजाद हुए 74 साल से अधिक हो गए हैं लेकिन आज भी हमारे बहुत सारे युवा आजादी के संघर्ष के विषय में बहुत कुछ नहीं जानते हैं। उन्हें बलिदान की कहानियाँ भी नहीं मालुम है। इसलिए आजादी के महोत्सव के माध्यम से उन सभी लोगों को आजादी के संघर्ष के सही मायने बताना आवश्यक है। इसके माध्यम से हम अपने भविष्य को ध्यान में रखते हुए, इतिहास को करीब से जानने का प्रयास करें कि भारत ने कैसे-कैसे वीरों को जन्म दिया है। उन वीर योद्धाओं को अपने पर पूर्ण आत्मविश्वास और अपनी मातृभूमि से प्रेम था जिससे प्रेरित होकर वे अपना सर्वस्व त्याग करने के लिए तैयार रहते थे। यही कारण है कि बहुत सारे वीर योद्धा आजादी की लड़ाई लड़ते-लड़ते शहीद हो गए। ‘आजादी’ उन वीरों के संघर्ष और समर्पण का परिणाम है। भारत ब्रिटिश शासन से मुक्त होकर 15 अगस्त 1947 को स्वतंत्र हुआ।

हमारे देश को आजाद हुए लगभग सात दशक पूरे हो गए हैं। अबतक आजाद भारत में तीन पीढ़ियाँ जन्म ले चुकी हैं। पहली पीढ़ी वह है जिसने आजादी के लिए संघर्ष किया जिसमे असंख्य वीर शहीद हुए। दूसरी वह पीढ़ी है जिन्होंने अपने बुजुर्गो से संघर्ष की कहानियाँ सूनी और तीसरी पीढ़ी वह है जिसने यह नहीं जाना कि भारत को आजाद कराने में कितने लोगों ने संघर्ष किया और कितने वीर शहीद हुए। हलांकि कुछ माध्यमों से आज की पीढ़ी को कई तरह से कुछ जानकारियाँ प्राप्त हो रही हैं किन्तु वह पूर्ण नहीं है क्योंकि बहुत सत्य घटनाएं तो हमारे इतिहास ग्रंथों से भी गायब कर दिए गए हैं। कुछ स्वार्थी लोगों ने सत्य के साथ छेड़-छाड़ करके उसे तोड़-मरोड़ कर प्रस्तुत किया है। अतः अमृत महोत्सव के माध्यम के द्वारा अलग-अलग तरीकों से हमारी आने वाली पीढ़ी को आजादी की सच्ची गाथा को बताना हमारा परम कर्तव्य है। हमारा स्वतंत्रता आंदोलन लिखित इतिहास का एक हिस्सा है। असंख्य ऐसे भी स्वतंत्रता सेनानी हैं जिनका योगदान उजागर ही नही हुआ या उनके योगदान की अनदेखी की गई इन भूले-बिसरे नायको को याद किये बिना भारत के स्वतंत्रता आन्दोलन की कहानी को पूर्णरूप देना उनका अनादर करना होगा। भारत के उन्हीं महान सपूतों और वीरांगनाओं को आजादी के अमृत महोत्सव पर अपना श्रद्धासुमन अर्पित करते हुए मैं उनकी गाथाओं को यहाँ लिख रही हूँ- 

हम सभी भारत वासियों के लिए 75वां स्वतंत्रता दिवस मनाना गर्व की बात है। आजादी के अमृत महोत्सव की शुरुआत आजादी के 75वें वर्ष के उपलक्ष्य में साबरमती आश्रम से 12 मार्च 2021 को आरम्भ हुई। पहला अमृत महोत्सव 15 अगस्त 2021 को मनाया गया। इस महोत्सव को लेकर देश भर में कई कार्यक्रम आयोजित किए गए। आजादी के अमृत महोत्सव का अंतिम कार्यक्रम 15 अगस्त 2023 को मनाया जाएगा। प्रधान मंत्री जी का कहना है कि यह कार्यक्रम हर 25 साल के अंतराल पर मनाया जाएगा।  

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की महत्वपूर्ण घटनाएं:

1. 1857 का विद्रोह : 10 मई 1857 को  मेरठ से सुलगी चिंगारी देखते ही देखते देश भर में आग की तरह फैल गई। अंग्रेज जितनी बेरहमी से इसे दबाने की कोशिश करते रहे, यह आग किसी दावानल की तरह अलग-अलग हिस्सों में उसी तेजी से भड़कती रही। देशभक्त सेनानियों ने गोरों की सरकार के सामने अपने विद्रोह की चुनौती बहुत बड़े और संगठित स्तर पर खड़ी की थी।

1857 स्वाधीनता की दिशा में पहला संगठित प्रयास था, देश को गुलामी की बेड़ियों से मुक्त करवाने के व्यक्तिगत या असंगठित प्रयास उससे भी पहले से किए जाते रहे होंगे। ऐसे कई आंदोलन, अनगिनत संघर्ष हैं, जिनसे देश अनजान ही बना रहा। राम और कृष्ण की जिस धरा के मूल में ही स्वाधीनता की चेतना रही हो, महाराणा प्रताप और शिवाजी की जो मातृभूमि अदम्य शौर्य के असंख्य प्रमाणों की साक्षी रही हो, उस धरती के वंशजों में अन्याय, शोषण और हिंसा के खिलाफ खड़ा होना स्वाभाविकथा। यह विद्रोह, प्रथम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम, सिपाही विद्रोह और भारतीय विद्रोह के नाम से भी जाना जाता है1857 की क्रान्ति की शुरूआत ’10 मई 1857′को मेरठ मे हुई थी. 34th Bengal Native Infantry कंपनी के सैनिक मंगल पांडे ने एक सिपाही विद्रोह के रूप में इस आंदोलन को मेरठ में शुरू किया था, जो नई एनफील्ड राइफल में लगने वाले कारतूस के कारण हुआ था। ये कारतूस गाय और सूअर की चर्बी से बने होते थे जिसे सैनिक को राइफल इस्तेमाल करने के लिए मुंह से हटाना होता था और ऐसा करने से सैनिकों ने मना कर दिया था। यह विद्रोह दो वर्षों तक भारत के विभिन्न क्षेत्रों में चला। नाना साहिब, तातिया टोपे और रानी लक्ष्मीबाई इत्यादि इस आंदोलन में शामिल हुए थे।

2. भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना 28 दिसम्बर 1885 को हुई थी। Allan Octavian Hume, Dadabhai Naoroji और Theosophical Society के सदस्य Dinshaw Wacha ने मार्च 1885 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का गठन किया था। यह एशिया और अफ्रीका में ब्रिटिश साम्राज्य में उभरने वाला पहला आधुनिक राष्ट्रवादी आंदोलन था। यह आंदोलन केवल 72 प्रतिनिधियों के साथ शुरू हुआ था। 1947 में स्वतंत्रता आंदोलन के अंत तक कांग्रेस 15 मिलियन से अधिक सदस्यों के साथ एक मजबूत पार्टी के रूप में उभरी थी।

3. बंगाल का विभाजन :

मुस्लिम और हिंदू की एकता ब्रिटिशों के लिए मुख्य खतरा थी। इस खतरे को देखते हुए बंगाल विभाजन के निर्णय की घोषणा 19 जुलाई 1905 को भारत के तत्कालीन वाइसराय लॉर्ड कर्ज़न द्वारा की गयी थी। विभाजन 16 अक्टूबर 1905 से प्रभावी हुआ था।

4. महात्मा गांधी का आगमन

गोपाल कृष्ण गोखले के अनुरोध पर दक्षिण अफ्रीका में औपनिवेशिक साम्राज्य के खिलाफ लड़ने के बाद, गांधी जी 1915 में भारत आए थे। उन्होंने भूमि-कर जैसे दमनकारी औपनिवेशिक कानूनों के विरोध में किसानों और मजदूरों का आयोजन करना शुरू किया। गांधी जी 1921 में कांग्रेस पार्टी में शामिल हो गए थे और ब्रिटिश साम्राज्य के खिलाफ राष्ट्रव्यापी आंदोलनों का नेतृत्व किया था। भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में उनकी भूमिका सर्वोपरि रही है। उन्होंने अहिंसा का प्रचार किया था।

5. चम्पारण सत्याग्रह 1917 ई. (बिहार): चंपारण का किसान आंदोलन अप्रैल 1917 में हुआ था। गांधी जी ने दक्षिण अफ्रीका में सत्याग्रह और अहिंसा के अपने आजमाए हुए अस्त्र का भारत में पहला प्रयोग चंपारण की धरती पर ही किया। यहीं उन्होंने यह भी तय किया कि वे आगे से केवल एक कपड़े पर ही गुजर-बसर करेंगे। इसी आंदोलन के बाद उन्हें ‘महात्मा’ की उपाधि से विभूषित किया गया था।  

6. खेड़ा सत्याग्रह (1918) गुजरात: खेड़ा सत्याग्रह गुजरात के खेड़ा ज़िले में किसानों का अंग्रेज़ सरकार की कर-वसूली के विरुद्ध एक सत्याग्रह (आन्दोलन) था। यह महात्मा गांधी की प्रेरणा से वल्लभ भाई पटेल एवं अन्य नेताओं की अगुवाई में हुआ था।

7. जलियांवाला बाग कांड:

13 अप्रैल 1919 को जलियांवाला बाग में ब्रिगेडियर जनरल रेजीनॉल्ड डायर के नेतृत्व में अंग्रेजी फौज ने निहत्थे, बूढ़े, महिलाओं और बच्चों सहित सैकड़ों लोगों पर गोलियां चला दी। क्रूरता की हद तब हो गई जब आम जनता की भीड़ को भागने या सचेत होने का अवसर भी नहीं दिया गया। इस घटना में सैकड़ों लोग मारे गये और हज़ारों लोग घायल हो गए थे। इस जघन्य हत्याकांड ने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम पर सबसे अधिक प्रभाव डाला था। इसने भारत में स्वतंत्रता आंदोलन के स्वर को बदल दिया, भगत सिंह जैसे विद्रोहियों को जन्म दिया। रवींद्रनाथ टैगोर ने इस नरसंहार के खिलाफ विरोध किया और अंग्रेजों द्वारा दी गई अपनी knighthood की उपाधि को लौटा दिया था।

8. खिलाफत आंदोलन:

खिलाफत आन्दोलन की शुरुआत 1919 में हुई थी। यह भारत में मुख्यत: मुसलमानों द्वारा चलाया गया राजनीतिक-धार्मिक आन्दोलन था। इस आन्दोलन का उद्देश्य (सुन्नी) इस्लाम के मुखिया माने जाने वाले तुर्की के खलीफा के पद की पुनर्स्थापना के लिये अंग्रेजों पर दबाव बनाना था। सन् 1924 में मुस्तफ़ा कमाल के खलीफ़ा पद को समाप्त किये जाने के बाद यह अपने-आप समाप्त हो गया था। इस आंदोलन को एक राजनीतिक स्तर तब प्राप्त हुआ जब मुसलमानों ने कांग्रेस के साथ उपनिवेशवादियों के खिलाफ हाथ मिला लिए थे।

9. दिल्ली विधानसभा बम विस्फोट:

भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने 1929 में दिल्ली केंद्रीय विधानसभा में राजनीतिक कारणों से बम फेंका था। वे चाहते थे कि उनको गिरफ्तार किया जाए ताकि वे कानूनी मुकदमे के माध्यम से ब्रिटिश सरकार के खिलाफ अपने तर्क प्रस्तुत कर पाए।

10. असहयोग आंदोलन / नमक कानून / ‘पूर्ण स्वराज’ की मांग

ब्रिटिश सरकार द्वारा निष्पक्ष व्यवहार ना होता देख 1 अगस्त 1920 को महात्मा गांधी ने असहयोग आंदोलन शुरु किया था। यह आंदोलन 1922 तक चला और सफल रहा। नमक आंदोलन की शुरुआत महात्मा गांधी ने मार्च 1930 में अहमदाबाद स्थित साबरमती आश्रम से 390 km दूर समुद्र के किनारे बसे ‘दांडी’ शहर से की थी। यहाँ उन्होंने  अंग्रेजों के एकछत्र अधिकार वाला नमक-कानून तोड़कर नमक बनाया था।

रावी अधिवेशन, 1929 के लाहौर में रावी नदी के तट पर हुए कांग्रेस अधिवेशन में पहली बार ‘पूर्ण स्वराज’ की मांग की गई थी।

11. चौरी चौरा कांड:

4 फरवरी 1922 को चौरी चौरा कांड, ब्रिटिश भारत के गोरखपुर जिले में हुई थी।  इसको स्वतंत्रता पूर्व भारत की सबसे प्रमुख घटनाओं में से एक माना जाता है। इस दिन चौरी चौरा थाने के दारोगा गुप्तेश्वर सिंह ने आजादी की लड़ाई लड़ रहे वालंटियरों की खुलेआम पिटाई शुरू कर दी थी। इसके बाद सत्याग्रहियों की भीड़, पुलिसवालों पर पथराव करने लगी। जवाबी कार्यवाही में पुलिस ने गोलियां चलाई, जिसमें लगभग 260 व्यक्तियों की मौत हो गई। पुलिस की गोलियां तब रुकीं जब उनके सभी कारतूस समाप्त हो गए थे। इसके बाद सत्याग्रहियों का गुस्सा फूट पड़ा और उन्होंने थाने में बंद 23 पुलिसवालों को जिंदा जला दिया। इस घटना के कारण ‘असहयोग आंदोलन’ को बंद कर दिया गया था।

12. आजाद हिंद फौज/ इंडियन नेशनल आर्मी का गठन:

द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान 1942 में भारतीय राष्ट्रवादियों द्वारा राष्ट्रीय सेना ‘आजाद हिंद फौज’ का गठन किया गया था। नेताजी सुभाषचंद्र बोस के नेतृत्व में, इसका लक्ष्य ब्रिटिश शासन से भारतीय स्वतंत्रता को सुरक्षित करना था।

13. भारत छोड़ो आंदोलन:

8 अगस्त 1942 में भारत को जल्द ही आज़ादी दिलाने के लिए महात्मा गाँधी द्वारा ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ शुरू किया गया था। इसका लक्ष्य ब्रिटिश शासन से पूरी तरह आज़ादी हासिल करना था और इसके लिए ‘करो या मरो’ का नारा दिया गया था। यह आंदोलन ‘अगस्त क्रान्ति’ के नाम से भी जाना जाता है। ये वह मुख्य घटनाएं हैं जिन्होंने भारत को स्वतंत्रता दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।

भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम के महानायक

  1. मंगल पांडे

मंगल पांडे का जन्म 19 जुलाई, 1827 उत्तर प्रदेश के बलिया जिले के नगवा गांव के एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था। उनके पिता का नाम ‘दिवाकर पांडे’ तथा माता का नाम ‘अभय रानी’ था। वे सन् 1849 में 22 साल की उम्र में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना में शामिल हुए और बैरकपुर की सैनिक छावनी में “34वीं बंगाल नेटिव इन्फैंट्री” की पैदल सेना में एक सिपाही थे। यहीं पर गाय और सूअर की चर्बी वाले राइफल में नई कारतूसों का इस्तेमाल शुरू हुआ। जिससे सैनिकों में आक्रोश बढ़ गया परिणाम स्वरुप 9 फरवरी 1857 को ‘नया कारतूस’ को मंगल पाण्डेय ने इस्तेमाल करने से इनकार कर दिया। 29 मार्च सन् 1857 को अंग्रेज अफसर मेजर ह्यूसन उनकी राइफल छीनने लगे, तभी मंगल पाण्डेय ने ह्यूसन को मौत के घाट उतार दिया। साथ ही अंग्रेज अधिकारी लेफ्टिनेन्ट बॉब को भी मार डाला। इस कारण उनको 8 अप्रैल, 1857 को फांसी पर लटका दिया गया। मंगल पांडे की मौत के कुछ समय पश्चात प्रथम स्वतंत्रता संग्राम शुरू हो गया था जिसे ‘1857 का विद्रोह’ कहा जाता है।

  • भगत सिंह

शहीद भगत सिंह पंजाब के रहने वाले थे। उनके पिता का नाम ‘किशन सिंह’ और माता का नाम ‘विद्यावती’ था। वे भारत के सबसे छोटे स्वतंत्रता सेनानी थे। उन्होंने सिर्फ 23 वर्ष की उम्र में देश के लिए फाँसी को गले लगाया था। लाला लाजपत राय की मौत ने उनको अंग्रेजों के खिलाफ लड़ने के लिए उत्तेजित किया था। उन्होंने इसका बदला ब्रिटिश अधिकारी जॉन सॉंडर्स की हत्या करके लिया। भगत सिंह ने बटुकेश्वर दत्त के साथ केंद्रीय विधान सभा में बम फेंकते हुए क्रांतिकारी नारे लगाए थे। उनपर ‘लाहौर षड़यंत्र’ का मुकदमा चला और 23 मार्च, 1931 की रात को भगत सिंह को फाँसी पर लटका दिया गया।

3. महात्मा गांधी

महात्मा गांधी को भारत के सबसे महान स्वतंत्रता सेनानियों में से एक माना जाता है। उन्होंने सरल जीवन और उच्च सोच जैसे मूल्यों का प्रचार किया। सच्चाई, अहिंसा और राष्ट्रवाद उनके सिद्धांत थे। गांधी जी ने सत्याग्रह का नेतृत्व किया, हिंसा के खिलाफ आंदोलन, जिसने अंततः भारत की आजादी की नींव रखी। उनके जीवनभर की गतिविधियों में किसानों, मजदूरों के खिलाफ भूमि कर और भेदभाव का विरोध करना शामिल हैं। 30 जनवरी, 1948 को नई दिल्ली में नाथुरम गोडसे ने उनकी हत्या कर दी थी।

4. पंडित जवाहरलाल नेहरू

पंडित जवाहरलाल नेहरू का जन्म 14 नवम्बर, 1889 इलाहाबाद, उत्तर प्रदेश में हुआ था। वे भारतीय स्वतंत्रता के लिए महात्मा गांधी के साथ सम्पूर्ण ताकत से लड़े ‘असहयोग आंदोलन’ का हिस्सा रहे। वह एक बैरिस्टर और भारतीय राजनीति में केन्द्रित व्यक्ति थे। आगे चलकर वे राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष भी बने। बाद में वह उसी दृढ़ विश्वास और दृढ़ संकल्प के साथ ‘सविनय अवज्ञा आंदोलन’ में गांधीजी के साथ जुड़ गए। भारतीय स्वतंत्रता के लिए 35 साल तक लड़ाई लड़ी और तकरीबन 9 साल जेल भी गए। 15 अगस्त, 1947 से 27 मई, 1964तक पंडित जवाहरलाल नेहरू भारत के पहले प्रधान मंत्री बने थे।

5. चंद्रशेखर आजाद

उनका पूरा नाम पंडित चंद्रशेखर तिवारी था और उन्हें ‘आजाद’ कहकर भी बुलाया जाता है। उनके पिता का नाम ‘पंडित सीताराम तिवारी’ और माता का नाम ‘जगरानी देवी’ था। वे एक महान भारतीय क्रन्तिकारी थे। उनकी उग्र देशभक्ति और साहस ने लोगों को स्वतंत्रता संग्राम में भाग लेने के लिए प्रेरित किया। 1920-21 के वर्षों में वे गांधीजी के असहयोग आंदोलन से जुड़े। उन्होंने काकोरी ट्रेन डकैती (1926), वाइसराय की ट्रैन को उड़ाने का प्रयास (1926), लाला लाजपत राय की मौत का बदला लेने के लिए सॉन्डर्स पर गोलीबारी (1928) आदि घटनाओं को अन्जाम दिया। जेल में उन्होंने अपना नाम ‘आजाद’, पिता का नाम ‘स्वतंत्रता’ और ‘जेल’ को अपना निवास स्थान बताया था। वे 27 फरवरी 1931 को इलाहाबाद के अल्फ्रेड पार्क में शहीद हुए थे।

6. सुभाष चंद्र बोस

सुभाष चंद्र बोस को नेताजी के नाम से भी जाना जाता है। वे भारतीय राष्ट्रवादी थे जिन्होंने द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई लड़ी थी। उनके पिता का नाम ‘जानकीनाथ बोस’ और माता का नाम ‘प्रभावती’ था। वे 1920 के अंत तक राष्ट्रीय युवा कांग्रेस के बड़े नेता माने गए। सन् 1938 और 1939 को वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष भी बने। उन्होंने फॉरवर्ड ब्लॉक (1939-1940) नामक पार्टी की स्थापना की थी। द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान अंग्रेजों के खिलाफ जापान की सहायता से भारतीय राष्ट्रीय सेना “आजाद हिन्द फ़ौज़” का निर्माण किया था। 05 जुलाई 1943 को सिंगापुर के टाउन हाल के सामने “सुप्रीम कमांडर” बन कर सेना को संबोधित करते हुए “दिल्ली चलो” का नारा लागने वाले सुभाष चन्द्र बोस ही थे। ‘तुम मुझे खून दो और मैं तुम्हें आजादी दूँगा’ तथा ‘जय हिन्द’ उनका मुख्य नारा था। 18 अगस्त 1945 को टोक्यो (जापान) जाते समय ताइवान के पास नेताजी का एक हवाई दुर्घटना में निधन हुआ बताया जाता है, लेकिन उनका शव नहीं मिल पाया था इसलिए आज भी उनकी मृत्यु एक रहस्य बनी हुई है।

7. बाल गंगाधर तिलक

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक भारत के प्रमुख नेता, समाज सुधारक और स्वतन्त्रता सेनानी थे। भारत में ‘पूर्ण स्वराज’ की माँग उठाने वाले यह पहले नेता थे। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान उनके नारे ‘स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है और मैं इसे ले कर रहूँगा’ ने लाखों भारतियों को प्रेरित किया था। ब्रिटिश अधिकारियों ने उन्हें अशांति का जनक’ कहा था। उन्हें ‘लोकमान्य’ की उपाधी दिया गया था जिसका साहित्यिक अर्थ है ‘लोगों द्वारा सम्मानित’। वह कई बार जेल गए थे। लोकमान्य तिलक ने जनजागृति का कार्यक्रम पूरा करने के लिए महाराष्ट्र में गणेश उत्सव तथा शिवाजी उत्सव, सप्ताह भर मनाना प्रारंभ किया था। इन त्योहारों के माध्यम से जनता में देशप्रेम और अंग्रेजों के अन्यायों के विरुद्ध संघर्ष का साहस भरा गया। 1 अगस्त,1920 को मुम्बई में उनका निधन हुआ। इन्होंने स्वतंत्रता संग्राम में मुख्य भूमिका निभाई थी।


क्षेत्रिय स्तर पर सक्रिय कुछ स्वतन्त्रता सेनानी:

1. मोज़े रीबा- मोज़े रीबा सच्चे राष्ट्रभक्त और भारत माता के महान सपूतों मे से एक थे। वे परोपकार के लिए जाने जाते थे। उन्हें लोग प्यार से अबोह नईजी के नाम से पुकारते थे। अंग्रेजों ने 1947 ई० में उन्हें उस समय गिरफ़्तार किया जब वे गोपनीय बोरदोलाई के समर्थन में आलो, बसार और पासीघाट क्षेत्र में कॉग्रेस के लिए अभियान चला रहे थे। वे अरुणाचल प्रदेश के पहले व्यक्ति थे जिन्होंने 15 अगस्त 1947 को दीपा गाँव में राष्ट्रीय ध्वज फहराया था। उनके स्वतंत्रता आंदोलन में योगदान और बलिदान के लिए भारत सरकार ने उन्हें 1974 में ताम्रपत्र प्रदान करके सम्मानित किया था।

2. बसावन सिंह – बसावन सिंह का जन्म 1909 को हाजीपुर बिहार में हुआ था। वे भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के कार्यकर्ता थे। वे उपेक्षित, औद्योगिक श्रमिकों तथा खेतिहर मजदूरों के अधिकारों के लिए आन्दोलन चला रहे थे। उन्होंने ब्रिटिश भारत में करीब साढ़े अट्ठारह वर्ष जेल में बिताए थे। लाहौर षड्यंत्र मामले के बाद वे फरार हो गए। वे भुसावल, काकोरी, तिरहुत और देलुआह मामलों में सह-आरोपी थे। उन्होंने चंद्रशेखर आजाद और केशव चक्रवर्ती के साथ आंदोलन को आगे बढ़ाया था।

3. वीर नारायण सिंह- वीर नारायण सिंह भू-स्वामी थे। उन्होंने छत्तीसगढ़ी में 1857 के भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का नेतृत्व किया था। अंग्रेजों ने उन्हें 1856 में एक व्यापारी के अन्न-भण्डार को लूटने के आरोप में गिरफ़्तार किया था। उस अनाज को उन्होंने भीषण अकाल के समय निर्धनों को बाँट दिया था। 1857 में ब्रिटिश सेना के मदद से वे जेल से बाहर निकल गए थे। जेल से निकलने के बाद वे सोनाखर पहुंचे। वहाँ पहुँचकर वे 500 लोगों की एक सेना का गठन किए। स्मिथ के नेतृत्व में ब्रिटिश सेना का एक शक्तिशाली दस्ता सोनाखार सेना को दबाने के लिए भेजा गया। वे ब्रिटिश सैनिकों के विध्वंशकारी गतिविधियों से आहात हो गए थे और लोगों की जान बचाने के लिए अपने आप को ब्रिटिश सेना के सुपुर्द कर दिया। देशद्रोह का आरोप लगाकर उन्हें फाँसी की सजा सुनाई गई। 10 दिसंबर 1857 को उन्हें फाँसी दे दी गई।

4. किट्टूर चेन्नमा (रानी चेन्नम्मा) (23 औक्तुबर 1778 – 21 जनवरी 1829 ई०)

रानी चेन्नम्मा का जन्म 23 औक्तुबर 1778 ई० को दक्षिण भारत के कित्तूर (कर्नाटक) के काकतीय राजवंश में हुआ था। उनके माता-पिता ने उनका पालन-पोषण राजकुल के पुत्रों के सामान किया था। उन्हें अनेक भाषओं का ज्ञान था। वे घुड़सवारी के साथ-साथ अस्त्र-शस्त्र और युद्धकला में परांगत थी। स्वतंत्रता संग्राम की लड़ाई के संदर्भ में जो स्थान झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई का है, वही स्थान दक्षिण भारत के कर्नाटक में रानी चेन्नम्मा का है। उनहोंने लक्ष्मीबाई से पहले ही अंग्रेजों की सत्ता को सशस्त्र चुनौती दे दिया था। जिससे अंग्रेजों की सेना को उनके सामने दो बार मुँह की खानी पड़ी थी। पंद्रह वर्ष की आयु में ही उन्होंने अपने गाँव वालों की रक्षा के लिए बाघ का शिकार किया था।

23 जनवरी 1824 ई० को अंग्रेजों की सेनाओं ने कित्तूर के किले के बाहर पड़ाव डाल दिया। अंग्रेजों ने कित्तूर साम्राज्य के दो सेनानायक ‘यल्लप्प शेट्टी’ और ‘वेंकटराव’ को विलय के बाद आधा साम्राज्य देने का लालच देकर अपने साथ मिला लिया। अचानक किले का द्वार खुला और और रानी चेन्नम्मा अंग्रेजी सेना पर टूट पड़ी। रानी का रौद्र रूप देखकर अंग्रेज थर-थर काँपने लगे। बीस हजार से अधिक सिपाहियों और चार सौ से अधिक बंदूकों के बल पर लड़ने आई अंग्रेजी सेना बुरी तरह नष्ट हो गई। इस युद्ध में थैकरे मारा गया और दो अंग्रेज अधिकारी वाल्टर इलियट और स्टीवेंसन को बंधक बना लिया गया। ब्रिटिश आयुक्त चैपलिन और मुंबई के गवर्नर ने भय से रानी चेन्नम्मा से युद्ध विराम का प्रस्ताव रख दिया। कुछ समय के लिए युद्ध शांत हो गया। किन्तु बुरी तरह से हार से अपमानित चैपलिन शांत नहीं बैठा। उसने कंपनी से और सेना बुलाकर पुनः कित्तूर पर हमला कर दिया। बारह दिनों तक लगातार युद्ध चलता रहा। इस बार के युद्ध में रानी के सेनानायक सांगोली रायण्णा और गुरुसिद्दप्पा थे। इस बार फिर रानी के सेना नायको ने अंग्रेजों पर कहर ढाह दिया। सोलापुर में उप कलेक्टर थॉमस मुनरो और उसके भतीजे को मौत के घाट उतार दिया गया। तब यल्लप्प शेट्टी और वेंकटराव दो देश द्रोहियों ने रानी के साथ छल किया। उन दोनों ने तोपों में इस्तेमाल होनेवाली बारूद के साथ मिट्टी और गोबर मिला दिया। जिससे रानी को हार का सामना करना पड़ा। उन्हें गिरफ्तार कर बेलहोंगल कीले में कैदकर लिया गया। इसके बावजूद भी संगोली रायण्णा कुछ दिनों तक गोरिल्ला युद्ध करते रहे। बाद में अंग्रेजों ने पकड़कर उन्हें फाँसी पर चढ़ा दिया। रानी चेन्नम्मा ने गिरफ्तारी के पाँच वर्ष बाद 21 फरवरी 1829 को बेलहोंगल में अपना प्राण त्याग दिया। रानी चेन्नम्मा की पहली जीत पर 22 से 24 औक्तुबर के बीच कित्तूर उत्सव बड़ी ही धूम-धाम के साथ मनाया जाता है।

5. रानी गिडालू/ रानी गाइदिन्ल्यू- भारत की नागा आध्यात्मिक और राजनीतिज्ञ नेत्री थी। इन्होंने भारत में ब्रिटिश शासन के विरुद्ध विद्रोह का नेतृत्व किया था। वे नागा धर्म के अनुयाइयों को इसाई बनाने के सख्त खिलाफ थी। 13 वर्ष की अवस्था में वे हेराका धार्मिक आंदोलन में शामिल हो गईं जिसकी शुरुआत उनके चचेरे भाई ने किया था। बाद में इस आंदोलन ने राजनितिक आंदोलन का रूप ले लिया जिसके जरिए अंग्रेजों को मणिपुर तथा आसपास के नागा क्षेत्रों से भगाने का प्रयास किया गया। बाद में उन्हें गिरफ़्तार कर लिया गया। उस समय उनकी आयु 16 वर्ष की थी। अंग्रेजों ने उन्हें आजीवन कारावास की सजा दे दी थी। 1947 में उन्हें रिहा कर दिया गया। झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई जी के समान ही वीरतापूर्ण कार्य करने के लिए इन्हें नागालैंड की ‘रानी लक्ष्मीबाई’ कहा जाता है।

6. रानी वेलु नचियार (3 जनवरी 1730- 25 दिसंबर 1796 ई०)

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में अंग्रेजों से लोहा लेने वाली तमिलनाडु की वीरांगना रानी वेलु नचियार थी। वह भारत में अंग्रेजी औपनिवेशिक शक्ति के खिलाफ लड़ने वाली पहली वीरांगना थी। उन्हें तमिलनाडु में ‘वीरमंगई’ नाम से भी जाना जाता है। रानी ने ईस्ट इण्डिया कंपनी से अपने राज्य को बाहर निकाला था। रानी की एक बेटी थी जो लड़ाई के दौरान मारी गई थी। माना जाता है कि रानी नचियार ने पहली बार ‘मानव बम’ का प्रयोग किया था, जो अंग्रेजों के खिलाफ था। दस वर्ष तक शासन करने के बाद वह वीर गति को प्राप्त हो गई। प्रधान मंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने रानी वेलु नचियार के जन्म दिन पर उन्हें श्रधांजलि अर्पित किया।

7. सेनापति कुयिली (दक्षिण भारत की दलित वरांगना)

ब्रिटिश सरकार के खिलाफ जंग छेड़नेवाली रानी वेलु नचियार के साथ एक और वीरांगना, उनकी अंगरक्षक, सहेली और सेनापति कुयिली भी थी। कुयिली साहसी, ताकतवर, अस्त्र-शस्त्र और युद्ध कलाओं में पारंगत थी। उसने रानी नचियार की कई बार जान बचाई थी। रानी वेलु नाचियार और कुयिली की करीबी को ब्रिटिश शासक जानते थे। ब्रिटिश शासक चाहते थे कि रानी पर हमला और शिवगंगा की राजधानी पर कब्जा करने में कुयिली उनकी मदद करे। कुयिली टस से मस नहीं हुई। जब अंग्रेजों की सारी कोशिशे नाकाम हो गई तब ब्रिटिश सेनाओं ने शिवगंगा के दलित समुदाय पर हमला कर निहथे दलितों को बेरहमी से काटना शुरू कर दिया ताकि उसके समुदाय के लोगों की हालत को देखकर कुयिली अंग्रेजों से हाथ मिला ले। जब रानी को इस बात का पता चला तब उन्होंने कुयिली को महिला पलटन का सेनापति बना दिया, ताकि वह अपने लोगों की रक्षा कर सके। 18वीं सदी में रानी वेलू नचियार ने शिवगंगा के मरुदु पांडियर भाइयों के साथ मिलकर ब्रिटिश शासकों के विरुद्ध जंग छेड़ दिया। सेना के महिला पलटन की नेतृत्व कुयिली कर रही थी। मकसद था, शिवगंगा के किला को अंग्रेजों से मुक्त कराना। किला हमेशा ब्रिटिश सैनिकों से घिरा रहता था। वर्ष में केवल एक ही दिन बाहरवालों को महल में जाने दिया जाता था। नवरात्रि का आखिरी दिन था। उस दिन महिलाओं को विजयादशमी की पूजा करने के लिए किले के अन्दर देवी राजराजेश्वरी अम्मा के मंदिर में जाने की अनुमति थी। कुयिली ने इस मौके का फायदा उठाने के लिए एक रणनीति बनाई। कुयिली विजयादशमी के दिन अपनी पलटन के साथ शिवगंगा किले के अन्दर फूल लेकर भक्तों के भेष में प्रवेश कर गई। कुयिली अंग्रेजों के उस कमरे में चली गई जहाँ अंग्रेजों के सारे हथियार थे। कुयिली ने पहले ही अपने शरीर पर तेल और घी डाल लिया था। कमरे में पहुँचते ही उसने हाथ में रखे दीपक से खुद को आग लगा लिया और हथियारों पर कूद पड़ी। हथियारों के साथ वह भी जलकर भष्म हो गई। भारतीय इतिहास में पहली बार किसी ने दुश्मनों से हमले का यह तरीका अपनाया था। इस तरह शिवगंगा किले पर कुयिली के द्वारा जित हुई। 1913 ई० में तमिलनाडु सरकार ने उसकी स्मृति को समर्पित एक स्मारक बनवाया।

8. वी. ओ. चिदंबरम पिल्लई पूरा नाम- विल्लियप्पन उलगनाथन चिदंबरम पिल्लई (5 सितंबर 1872 – 18 नवंबर 1936)

वी. ओ. चिदंबरम पिल्लई का पूरा नाम विल्लियप्पन उलगनाथन चिदंबरम पिल्लईथा। चिदंबरम पिल्लई का जन्म 5 सितंबर1872 ई० को तमिलनाडु के तिरुनेलवेली जिले के ओट्टापिडारम नामक स्थान पर हुआ था। चिदंबरम पिल्लई के पिता का नाम उलग्नाथ था। वे उस समय के सफल वकील थे। सन् 1895 ई० में चिदंबरम पिल्लई ने वकालत पास करके त्रिची में अपनी वकालत आरम्भ किया। जन समुदाय के संपर्क में आने के बाद उन्हें जनता के दुःख-सुख का परिचय मिला। उन्होंने गरीब जनता से बिना फ़ीस लिए काम करना आरम्भ कर दिया। इस कार्य से उनके कीर्ति में चार चाँद लग गए।

1907 ई० में उन्होंने सूरत कॉग्रेस में भाग लिया। उन्होंने तिलक का साथ दिया। जनता ने उन्हें “दक्षिण के तिलक” का उपाधि दिया। चिदंबरम पिल्लई ने अंग्रेजी कंपनी को जड़-मूल से उखाड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। आरम्भ में उन्हें रोकने के लिए अंगेजों ने उन्हें कई तरह के लालच दिए लेकिन जब वे नहीं माने तब उनपर देशद्रोह का आरोप लगाकर कन्नूर जेल भेज दिया। जेल के दौरान पिल्लई को कठोर यातनाएँ दी जाती थी। ‘कारावास के दौरान पिल्लई को कोल्हू में बैल की जगह जोता जाता था। उन्हें कड़ी धूप में कोल्हू खींचकर तेल निकालना पड़ता था। 18 नवंबर, 1936 ई० भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के तूतीकोरीन कार्यालय में उनका निधन हो गया। आज भी तमिलनाडु वासी उन्हें ‘कप्पालोतिय थमिझान’ अथार्त ‘खेवनहार’ कहते हैं। 05 सितंबर, 2021 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी ने स्वतंत्रता सेनानी वी. ओ. चिदंबरम पिल्लई को उनकी 150वीं जयंती पर श्रद्धांजलि दिया था।

9. अल्लूरी सीताराम राजू (4 जुलाई 1897 – 7 जुलाई 1924 ई०)

अल्लूरी सीताराम राजू का जन्म 4 जुलाई 1897 ई० को विशाखापत्तनम के पांडुरंगा गाँव में हुआ था। बचपन से ही उनके पिता ने उन्हें क्रांतिकारी संस्कार दिए थे। उन्होंने सीताराम को अंग्रेजों के विरुद्ध आवाज उठाने के लिए प्रेरित किया था। उन्होंने अपने आदिवासी समाज को अंग्रेजों के खिलाफ लड़ने के लिए संगठित करना शुरू कर दिया। उन्होंने अंग्रेजों के विरुद्ध गोरिल्ला युद्ध छेड़ दिया। गोदावरी नदी के पास पहाड़ियों में राजू और उनके साथी युद्ध अभ्यास करते और आक्रमण की रणनीति बनाते थे। विद्रोह की ऐसी आग भड़की की अंग्रेजों के होश उड़ गए। इन्होंने अंग्रेजी सरकार के ऐसे छक्के छुडाए कि उन्हें आस-पास के राज्यों से सेना बुलानी पड़ी। अंत में अंग्रेजों ने राजू को गोली मार दी। दो वर्षों तक ब्रिटिस सत्ता की नींद हराम करने वाला यह योद्धा वीर गति को प्राप्त हो गया। आंध्रप्रदेश-वासी इस वीर योद्धा को ‘जंगल का होरो’ कहते हैं।

10. तिरुपुर कुमारन (Kodi Kaththa Kumaaran) (4 औक्तुबर 1904–11 जनवरी 1932 ई०)

तिरुपुर कुमारन का जन्म तमिलनाडु के चेन्निमलाई में सन् 1904 ई० में हुआ था। जन्म के बाद उनका नाम ‘ओकेएसआर कुमारस्वामी मुदलियार’ (OKSR Kumaraswamy Mudaliar) रखा गया। छोटी उम्र में ही वे स्वतंत्रता संग्राम में कूद पड़े थे। इन्होंने ‘देश बंधु युवा संघ’ की स्थापना किया और अंग्रेजों के खिलाफ विरोध प्रदर्शन किया। 11 जनवरी 1932 ई० को ब्रिटिश सरकार के खिलाफ उन्होंने एक विरोध मार्च निकाला जिसके दौरान तिरुपुर में नोय्याल नदी के तट पर पुलिस ने लाठी से हमला कर दिया। पुलिस की लाठी खाते हुए नोय्याल नदी के किनारे 27 वर्ष की आयु में भारत माँ का यह सपूत वीर गति को प्राप्त हो गया।

11. सुब्रह्मण्य भारती (महाकवि भारतियार) 11 दिसंबर 1882 – 11 सितंबर 1921

उनका जन्म 11 दिसंबर 1882 को मद्रास प्रेसिडेंसी के ‘एट्टीयपुरम’ गाँव में हुआ था। वे राष्ट्रवाद (1885-1920) के भारतीय लेखक थे। वे संस्कृत हिन्दी, तेलूग, अंग्रेजी और फ्रेंच के अच्छे जानकार थे। उन्हें आधुनिक तमिल शैली का ‘जनक’ माना जाता है। 10-11 वर्ष के आयु के आसपास उन्हें ‘भारती’ की उपाधि से सम्मानित किया गया।

सन् 1905 ई० में उन्होंने बनारस में आयोजित अखिल भारतीय कांग्रेस में भाग लिया। उन्होंने दादाभाई नरौजी के तहत कलकता में भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस के सत्र में भाग लिया। जिसमे स्वराज और ब्रिटिश सामानों के बहिष्कार की माँग की गई थी। अप्रैल 1906 तक उन्होंने एमपीटी आचार्य के साथ मिलकर ‘तमिल साप्ताहिक भारत’ और अंग्रेजी अखबार ‘बाला भारतम’ का संपादन शुरू कर दिया।

सन् 2018 में प्रधानमंत्री नरेद्र मोदी जी ने ‘भारती’ जी की एक तमिल कविता ‘एलारुम एलिनेलैई एडुमनल एरिएई’…सुनाते हुए उनकी 100वीं पुण्यतिथि पर श्रधांजलि अर्पित किया। प्रधानमंत्री जी ने बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में भारती के नाम पर एक कुर्सी स्थापित करने की भी घोषणा की है।

भारत की स्वतन्त्रता की लड़ाई में अनगिनत योद्धाओं ने आहूति दिया है। इस लेख की भी एक सीमा है और सभी सपूतों एवं वीरांगनाओं का नाम उल्लेख करना असम्भव है। दुर्भाग्य वश समय के साथ-साथ अपने ही देश और इतिहास में कई वीर सपूतों के नाम गुम से हो गये। भारत के इन वीर सपूतों को हमारा शत्-शत् नमन है। यहाँ मैं उन सभी को याद करते हुए अपनी श्रद्धांजलि दे रही हूँ।

उनकी समाधि पर नहीं जलते है एक भी दीया,

जिनके खूँ से जलते हैं ये चिरागे वतन।

जगमगा रहे हैं ये समाधियाँ उनकी,

जो बेचा करते थे, शहीदों के कफ़न।।

आजादी का ‘अमृत महोत्सव’

मुगलों के शासन शुरू करने से पहले, भारत 1 A.D. और 1000 A.D. के बीच दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था थी। जब मुगलों ने 1526-1793 के बीच भारत पर शासन किया, इस समय भारत की आय (17.5 मिलियन पाउंड), ग्रेट ब्रिटेन की आय से अधिक थी। वर्ष 1600 AD में भारत की प्रति व्यक्ति GDP 1305 डॉलर थी जबकि इसी समय ब्रिटेन की प्रति व्यक्ति GDP 1137 डॉलर, अमेरिका की प्रति व्यक्ति GDP 897 डॉलर और चीन की प्रति व्यक्ति GDP 940 डॉलर थी। इतिहास बताता है कि मीर जाफर ने 1757 में ईस्ट इंडिया कंपनी को 3.9 मिलियन पाउंड का भुगतान किया था। यह तथ्य भारत की सम्पन्नता को दर्शाने के लिए बड़ा सबूत है। 1500 A.D के आस-पास दुनिया की आय में भारत की हिस्सेदारी 24.5% थी जो कि पूरे यूरोप की आय के बराबर थी।

1600 ईस्वी में भारत सहित विश्व के अन्य देशों के लोगों की प्रति व्यक्ति GDP इस प्रकार थी –

देश1600 ई० (प्रति व्यक्ति GDP)
नीदरलैंड$ 2433
स्पेन$ 1896
इटली$ 1329
भारत$ 1305
फ़्रांस$ 1283
पुर्तगाल$ 1239
यूनाइटेड किंगडम$ 1137
चीन$ 940
अमेरिका$ 897
जर्मनी$ 784
जापान$ 766

उपर्युक्त सारिणी से स्पष्ट है है कि प्रति व्यक्ति GDP के अनुसार 1600 ई० के आस-पास यूरोप के तीन देशों के लोग नीदरलैंड, स्पेन और इटली सबसे अधिक धनी थे लेकिन भारत के लोग भी दुनिया के चौथे सबसे अमीर लोग थे क्योंकि यहाँ के लोगों की आय भी 1305 डॉलर प्रति वर्ष थी जो कि इटली के बराबर थी।

      सोने की चिड़िया कहे जाने वाले भारत को मुगलों ने तो नोचा खसोटा और जो कुछ बचा उसको अंग्रेजों ने उजाड़ दिया। एक आँकड़े के अनुसार अंग्रेज भारत से लगभग $ 45 ट्रिलियन धन इंग्लैण्ड ले गये थे। इस धन की उगाही में उन लोगों ने भारतियों पर अनेकों अत्याचार किया। हमारी भोली-भाली जनता पर आर्थिक और सामाजिक अत्याचार किये गये तथा उन्हें कठोर यातनायें दी गई। जिससे उब कर स्वतन्त्रता की लड़ाई में हमारे अनेक वीरों ने अपनी प्राणों की आहूति दी। जलियावाला बाग से लेकर अंदमान निकोबार के सेल्युलर जेल तक अंग्रेजों के अमानवीय यातनाओं के अनेक सबूत आज भी मौजूद हैं। आजादी के अमृत महोत्सव में हम अपने वीर सपूतों को याद करते हुए उनकी कुर्वानियों का ज्ञान अपनी अगली पीढ़ी तक पहुँचाने के साथ-साथ उनके प्रति अपनी श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं।

हालांकि अपने कुटिल नीतियों के अंतर्गत अंग्रेजों ने भारत से जाते-जाते अशोक के अखंड भारत को दो भागों में विभाजित कर दिया। इस प्रक्रिया में लाखों लोगों का कत्ल हुआ। बहुत से लोग जो विस्थापित हुए वो कई पीढ़ियों तक अपनी पहचान के लिए तरसते रहे। इतनी विपरीत परिस्थितियों से निकलकर भी पिछले 75 वर्षों में हमारे जवानों और किशानों ने अपने अथक परिश्रम से अपनी स्वाधीनता और आत्मनिर्भरता की नई ऊँचाई प्राप्त किए हैं। हमने दुनिया के शीर्ष तकनीकी संगठनों – माइक्रोसॉफ्ट, गूगल, नाशा जैसी संस्थाओं को अनेकों वैज्ञानिक दिए तो हाल ही में महामारी से जूझ रही दुनिया के कई देशों को मुफ्त वैक्सीन और दवाइयाँ भेजी। आज जब रुस-युक्रेन युद्ध के कारण दुनिया एक और विश्व-युद्ध की ओर बढ़ रही है, तब वसुधैव कुटुम्बकम की संकल्पना रखने वाले भारत को दुनिया एक शान्ति-दूत के रूप में देख रही है। दुनिया के कई देश विश्व शांति की पहल के लिए अग्रणी भूमिका निभाने के लिए भारत से आग्रह कर रहे हैं। यह भारत की विश्व में बढ़ती शाख का सबूत है। अब भारत आत्मनिर्भर भारत है जो अपने जरूरत की चीजें तो बनाता ही है, मानवता के आधार पर दुनिया के अन्य देशों की भी मदद करता है।

जय हिन्द

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