सन् 1857 ई० के प्रथम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में भारतीय सेनानियों का नेतृत्व नाना साहब पेशवा कर रहे थे। देश को आजाद कराने के लिए हजारों-लाखों क्रांतिकारियों ने अपने-अपने ढंग से अपनी-अपनी भूमिका निभाया था। उन्हीं में से एक क्रांतिकारी नाना साहेब पेशवा द्वितीय भी थे। वे 1857 के प्रथम शिल्पकार थे। इस दौरान नाना साहेब ने कानपुर में अंग्रेजों के विरुद्ध ‘स्वतंत्रता संग्राम’ का नेतृत्व किया था। इस संग्राम के प्रारंभ में भारतीय क्रांतिकारियों ने जीत हासिल कर लिया था लेकिन कुछ समय बाद अंग्रेजों का पलड़ा भारी होने लगा था। इस स्थिति में नाना साहेब पेशवा ने अपने सहयोगियों के आग्रह पर बिठूर के महल को छोड़ने का निर्णय लिया। इसके पीछे उनकी योजना थी कि वे किसी सुरक्षित स्थान पर रहकर फिर से सेना एकत्रित करें और अंग्रेजों से नये सिरे से मोर्चा लें। जब नाना साहेब महल छोड़कर जाने लगे तब उनकी दत्तक पुत्री मैना कुमारी ने उनके साथ जाने से इनकार कर दिया। अपनी बेटी के इस निर्णय से नाना साहेब असमंजस में पड़ गए। मैना का मानना था कि उसकी सुरक्षा के कारण पिता को देश सेवा करने में कोई अड़चन पैदा न हो जाए। इस कारण मैना कुमारी ने बिठूर के महल में ही रहना उचित समझा। महल छोड़ने से पहले नाना साहेब ने अपनी बेटी को समझाया था कि अंग्रेज अपने दुश्मनों के साथ बहुत ही दुष्टता का व्यवहार करते हैं। मैना अपने पिता की ही तरह साहसी और बहादुर थी। वह पूर्णरूप से अस्त्र-शस्त्र चलाना भी जानती थी। उसने अपने पिता से कहा- “मैं क्रांतिकारी की पुत्री हूँ, मुझे अपने शरीर और नारीधर्म की रक्षा करना अच्छी तरह आता है। आप निश्चिंत रहें, चिंता न करें। मैं अपनी रक्षा करने का हर संभव प्रयास करुँगी।” नाना को अपनी पुत्री की बातों से गर्व और हिम्मत मिला, वे जंग के लिए महल से निकल पड़े।
ब्रिटिश सरकार पहले ही नाना साहेब पर 1 लाख रुपये का इनाम घोषित कर चूकी थी। इसी बीच ब्रिटिश सैनिकों को जैसे ही पता चला कि नाना साहेब महल से बाहर हैं वैसे ही उनलोगों ने महल को अपने कब्जे में ले लिए। मैना कुमारी अपने महल के सभी गुप्त स्थानों और तहखानों से परिचित थी जैसे ही ब्रिटिश सैनिक उसे पकड़ने के लिए आगे बढ़े, मैना कुमारी वहाँ से गायब हो गई। सेनापति ने महल को तोपों से उड़ाने का आदेश दे दिया। कुछ ही समय में महल ध्वस्त हो गया। सेनापति ने सोचा मैना कुमारी भी महल में जल गई होगी। यह सोचकर सेनापति वापस चले गए। मैना कुमारी जीवित थी। मैना कुमारी बहुत समय के बाद अपने गुप्त स्थान से बहार निकली। वह सोचने लगी अब उसे क्या करना चाहिए? मैना को यह मालुम नहीं था कि महल के ध्वस्त होने के बाद भी सैनिक बाहर होंगे। वो जैसे ही बाहर निकली उन्हें दो सैनिकों ने गिरफ़्तार कर लिया और उन्हें जनरल आउटरम के सामने ले गए। इस दौरान जनरल आउटरम को लगा कि नाना साहेब पर 1 लाख का इनाम है। ऐसे में अगर वह आंदोलन को कुचल देगा तो उसे ब्रिटिश सरकार और हुक्मरानों से शाबासी मिलेगी। उसने मैना को बहुत धमकाया लेकिन मैना चुप होकर सब सुनती रही। बाद में उसने मैना को ज़िंदा जलाने की धमकी दी लेकिन मैना अंग्रेजों के किसी भी धमकी से विचलित नहीं हुई। मैना कुमारी के जिद्द से आग बबूला होकर जनरल आउटरम ने उसे एक पेड़ से बाँध दिया। जनरल ने बच्ची से नाना साहेब और क्रांति के अन्य जानकारियों को प्राप्त करने की पूरी कोशिश किया लेकिन मैना कुमारी ने उसके सामने अपना मुँह नही खोला। उसने साफ़-साफ़ कह दिया कि वे एक क्रांतिकारी की बेटी है। मृत्यु से नहीं डरती है। मैना की इस बात को सुनकर जनरल आउटरम तिलमिला उठा और उसने मैना को जिन्दा जलाने का आदेश दे दिया।
3 सितंबर 1857 का दिन था। उत्तर प्रदेश के बिठूर में ब्रिटिश सेना ने 13 वर्ष की मैना कुमारी को एक पेड़ में बाँधकर जिन्दा जला दिया। धूँ-धूँ कर जलती हुई मैना ने उफ़ तक नहीं किया, ताकि क्रांति की मशाल कभी बूझे नहीं।
फिल्म ‘जागृति’ के लिए लिखी गई कवि प्रदीप के गीत की ये पंक्तियाँ “दे दी हमे आजादी बिना खड़क बिना ढाल—— सौ प्रतिशत गलत है। हम नहीं जानते हैं कि उन्होंने किस परिस्थिति में, किसके कहने पर और किसके डर से यह गीत लिखा था। यह कठोर सत्य है कि अनेकों भारतीय नर-नारी अपने प्राणों की आहुति देकर स्वतन्त्रता प्राप्त किए लेकिन उनकी बलिदान को याद भी नहीं किया गया। इतिहासकारों ने प्राणों की आहुति देने वाले उन वीरों को भूला दिया। आज स्वतन्त्रता के 75 वीं वर्ष गाँठ पर उन वीर सपूतों को हमारा कोटि-कोटि प्रणाम है।
जय हिन्द
खून खौला दिया आपने ! न जाने कितने ऐसे रण बाँकुरे गुमनामी की चादर ओढ़े बैठे हैं | साधुवाद आपको इस कहानी को उजागर करने केलिए !
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धन्यवाद सर
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