महाप्रभु जगन्नाथ जी (श्री कृष्ण)

भगवान विष्णु के अवतारों में से एक अवतार श्रीकृष्ण का भी है। कृष्ण ने इस अवतार में भागवान विष्णु का विराट रूप धारण किया था लेकिन ऐसा माना जाता है कि श्रीकृष्ण के अंतिम संस्कार के बाद उनके शरीर का एक अंग नहीं जला था। कृष्ण का जन्म मथुरा में और उनका बचपन गोकुल में गुजरा था। महाभारत युद्ध के बाद उन्होंने द्वारिका पर 36 वर्षों तक राज किया। पूरी का जगन्नाथ मंदिर हिंदू मंदिर है जो भगवान् जगन्नाथ (श्रीकृष्ण) को समर्पित है। यह वैष्णव सम्प्रदाय का मंदिर है।

जगन्नाथ मंदिर से जुड़ी एक मान्यता है कि जब भगवान श्रीकृष्ण ने अपने देह का त्याग किया और उनका अंतिम संस्कार किया गया तब उनका शरीर पाँच तत्व में तो विलिन हो गया परन्तु उनका हृदय सुरक्षित और सामान्य जिन्दा मानव की तरह धड़क रहा था। वह हृदय आज भी सुरक्षित है जो भागवान जगन्नाथ के काठ की मूर्ति में धड़कता है। महाप्रभु जगन्नाथ (श्री कृष्ण) को कलयुग का भगवान् भी कहते हैं। उड़ीसा के पूरी में जगन्नाथ स्वामी अपनी बहन सुभद्रा और बड़े भाई बलभद्र के साथ निवास करते हैं।

जगन्नाथ पूरी की यह मूर्तियाँ हर बारह साल पर बदली जाती हैं। पुरानी मूर्तियों की जगह नई मूर्तियाँ स्थापित की जाती है। जब उनकी मूर्ति  बदली जाती है। उस स्थिति में संपूर्ण पूरे शहर का बिजली काट दिया जाता है और संपूर्ण शहर में अँधेरा कर दिया जाता है। मंदिर परिसर को चारों तरफ से CRPF की सेना घेर लेती है। उस समय मंदिर में प्रवेश वर्जित होता है। मंदिर के अन्दर घना अँधेरा होता है। पुजारी की आँखों पर पट्टी बंधी रहती है। हाथ में दस्ताना पहनकर पुजारी ‘ब्रह्म पदार्थ’ निकालता है और नई मूर्ति में रख देता है।

ये ब्रह्म पदार्थ क्या है? इसे आज तक किसी ने नहीं जाना है और न ही किसी ने देखा है। हजारों वर्षों से यह क्रिया होती आ रही है। यह ‘ब्रह्म पदार्थ’ इतनी शक्तिमान है कि इसे छूने और देखने मात्र से इंसान की मृत्यु  हो सकती है। इस ‘ब्रह्म पदार्थ’ का संबंध भगवान्    श्री कृष्ण से माना जाता है। मगर यह क्या है? इसे कोई नहीं जानता है। भगवान जगन्नाथ और अन्य प्रतिमाएँ उसी वर्ष बदली जाती है जिस वर्ष असाढ़ के दो महीने लगते है। इस विधि को ‘नवकलेवर’ विधि कहते हैं। आजतक कोई पुजारी यह नहीं बता सका कि जगन्नाथ की प्रतिमा में क्या है? कुछ पुजारियों का कहना है कि हमने सिर्फ महसूस किया है की वह पदार्थ खरगोश की तरह उछल रहा था। उसे देखा नहीं है।

आज भी हर वर्ष पूरी में जगन्नाथ यात्रा के समय वहाँ के राजा सोने के झाड़ू से खुद झाड़ू लगाते हैं।

भगवान् जगन्नाथ मंदिर का रहस्य

1. सुदर्शनचक्र – जगन्नाथ मंदिर के सबसे ऊपर, शिखर पर भगवान् नारायण का सुदर्शनचक्र है, जो अष्टधातुओं से निर्मित है। इस चक्र को ‘नीलचक्र’ भी कहा जाता है। इसे पूरी के किसी भी कोने से देखा जा सकता है। इस सुदर्शन चक्र को किसी भी दिशा से देखने पर इसका मुहँ देखने वाले को अपनी तरफ ही दिखाई देता है।

2. मंदिर के शिखर पर हवा के विपरीत दिशा में लहराता ध्वज – इस मंदिर का सबसे बड़ा रहस्य यह है कि मंदिर के शिखर पर लहराता ध्वज हमेशा हवा के विपरीत दिशा में लहराता है। सबसे बड़ी बात तो यह है कि इस ध्वज को हर रोज 45 मंजिल ऊपर उलटा चढ़कर बदला जाता है। मान्यता के अनुसार अगर किसी दिन भूल से भी ध्वज नहीं बदला गया तो मंदिर आने वाले 18 वर्षों तक के लिए बंद कर दिया जाएगा।

3. विश्व का सबसे बड़ा रसोईघर – जगन्नाथ पूरी का रसोईघर में विश्व का सबसे बड़ा रसोईघर माना जाता है। इस रसोईघर में प्रतिरोज 500 रसोइए और 300 के आस-पास सहयोगी भोजन बनाते हैं। भगवान जगन्नाथ का प्रसाद बनाने के लिए एक के उपर एक 7 बर्तनों को रखा जाता है। सबसे बड़ी हैरानी की बात तो यह है कि जो पात्र सबसे ऊपर रखा जाता है। उसका प्रसाद सबसे पहले बनकर तैयार होता है। जिस पात्र में सबसे अधिक आँच लगता है यानी जो सबसे नीचे होता है उसमे प्रसाद सबसे बाद में तैयार होता है।

4. सबसे बड़ा रसोईघर का प्रसाद – इस मंदिर के रसोईघर में बना प्रसाद कभी भी कम नहीं पड़ता है। कितने भी श्रद्धालु आ जाएँ यहाँ प्रसाद कभी भी कम नहीं पड़ता है। यहाँ लगभग प्रतिदिन 20 से 30 हजार लोग प्रसाद प्राप्त करते हैं।

5. मंदिर का गुंबद पर कभी भी पक्षी नहीं बैठते हैं – इस मंदिर के गुंबद पर कभी भी पक्षी नहीं बैठते है। आमतौर पर देखा जाए तो मंदिरों के गुंबदों पर पक्षियों के झुंड बैठे रहते हैं परन्तु जगन्नाथ मंदिर के गुंबद पर एक भी पक्षी नहीं दिखाई देता है। मंदिर के ऊपर से हवाईजहाज, हेलिकॉप्टर के भी उड़ने पर मनाही है।

6. मंदिर की प्रतिछाया – इस मंदिर की प्रतिछाया नहीं बनती है। यह दुनिया का सबसे ऊँचा और सुंदर मंदिर है। इसकी ऊँचाई लगभग 214 फीट और 4 लाख वर्ग फीट में फैला भव्य मंदिर है। सबसे आश्चर्य की बात है कि इस मंदिर के गुंबद की छाया कभी भी नहीं बनती है।

7. सिंहद्वार का रहस्य  – महत्वपूर्ण बात यह है कि यह मंदिर समुद्र तट के निकट होने के बाद भी मंदिर में प्रवेश करने के साथ ही समुद्र की लहरों की आवाजें नहीं सुनाई पड़ती है। जैसे ही मंदिर के सिंहद्वार में प्रवेश करते हैं वैसे ही समुद्र की लहरों की आवाजें बंद हो जाती है। सिंहद्वार से बाहर निकलते ही समुद्र की लहरों कि आवाजें पुनः सुनाई पड़ने लगती है। सिंहद्वार का यह रहस्य अब तक रहस्य ही बना हुआ है।

8. जगन्नाथ मंदिर का पताका हमेशा हवा के विपरीत दिशा में लहराता है – समुद्र के तटीय क्षेत्रों में हवा समुद्र के लहरों की दिशा में बहती है। परन्तु जगन्नाथ मंदिर का पताका हमेशा हवा के विपरीत दिशा में लहराता है।

9. हनुमान जी समुद्र से मन्दिर की रक्षा करते हैं – माना जाता है कि समुद्र ने तीन बार जगन्नाथ जी के मंदिर को तोड़ दिया था। इसलिए महाप्रभु जगन्नाथ ने हनुमान जी को समुद्र से अपनी रक्षा करने के लिए नियुक्त किया था। यह भी माना जाता है कि कभी-कभी  हनुमान जी प्रभु के दर्शन नहीं कर पाते हैं तब वे प्रभु के दर्शन के लिए नगर में प्रवेश कर जाते थे। ऐसे में समुद्र भी उनके पीछे-पीछे प्रवेश कर जाता था। केसरीनंदन हनुमान के आदत से परेशान होकर जगन्नाथ महाप्रभु ने हनुमान जी को यहाँ स्वर्ण की बेड़ी से बांध दिया। जगन्नाथ पूरी में समुद्र तट पर बेड़ी हनुमान का प्रसिद्ध प्राचीन मंदिर है। भक्त बेड़ी से जकड़े हुए हनुमान जी का भी दर्शन करते हैं।

10. पाँच पांडव का अज्ञातवास – अज्ञातवास के समय पाँचों पांडव प्रभु जगन्नाथ जी के दर्शन के लिए यहाँ आए थे। इस मंदिर के अन्दर आज भी पाँचों पांडव के स्थान मौजूद हैं। भगवान जगन्नाथ जब पद यात्रा के लिए निकलते हैं तब पाँचों पाण्डव नरेंद्र सरोवर तक उनके साथ जाते हैं।

मोक्ष प्राप्ति – यहाँ मंदिर के बाहर एक स्वर्ण द्वार है। जहाँ मोक्ष प्राप्ति के लिए शव जलाए जाते हैं। मंदिर के अन्दर इन शवों की जलने की गंध महसूस नहीं होती है। मंदिर के बाहर निकलने पर शवों के जलने की गंध महसूस होती है।

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