अलंकार

‘अलंकार’ शब्द की व्युत्पति दो शब्दों के योग से हुआ है।

अलम् (शोभा) + कार (करनेवाला) = अलंकार।

‘अलंकार’ का शाब्दिक अर्थ होगा ‘शोभा बढ़ानेवाला’ और संज्ञा के रूप में अलंकार शब्द का अर्थ होगा ‘आभूषण’ या ‘गहना’

अलंकार शब्द का उल्लेख सबसे पहले ऋग्वेद में नारी के आभूषणों के संदर्भ में मिलता है।

टिपण्णी: काव्यशास्त्र में अलंकार शब्द का प्रयोग सबसे पहले भारतमुनि ने ‘नाट्यशास्त्र’ में किया।

भरतमुनि के नाट्यशास्त्र में निम्नलिखित चार अलंकारों का उल्लेख मिलता है।

उपमा, दीपक, रूपक और यमक।

अलंकार शब्द का अर्थ:

भरतमुनि के अनुसार-

“अलंकरोति इति अलंकार:।” (नाट्यशास्त्र)

अथार्त अलंकार काव्य का वह तत्व है, जो उसे अलंकृत करता है।

“अलंक्रियते अनेन इति अलंकार।” (अज्ञात)

अथार्त जिसके द्वारा सुशोभित किया जाता है, वही अलंकार है।

“अलंकारणम् अलंकार।” (अज्ञात)

अथार्त सुशोभित करने वाला अलंकार है।

परिभाषा: काव्य की शोभा बढ़ाने वाले तत्व अलंकार कहे जाते है।

विभिन्न विद्वानों ने अलंकार की भिन्न-भिन्न परिभाषाएँ दी है, जो इस प्रकार है-

आचार्य दण्डी के शब्दों में-

“काव्य शोभा करान् धर्मान अलंकारान् प्रचक्षते”

काव्य के शोभा कारक धर्म (गुण) अलंकार कहलाते हैं। (काव्यादर्श)

अथार्त काव्य के शोभा करनेवाले धर्म या तत्व अलंकार कहलाते है।

आचार्य वामन के शब्दों में

“काव्यशोभाय: कर्तारो धर्मा: गुणा:।

तदतिरायहेतस्त्वलंकारा:।”

रुद्रट के शब्दों में-

“अभिधान प्रकार विशेष एव चालंकर”

अथार्त कथन की विशेष पद्धतियां ही अलंकार है।

आचार्य विश्वनाथ के शब्दों में-

“शब्दार्थयोरस्थिरा ये धर्मा शोभातिशायिन (साहित्य दर्पण)

रसादिनुपकुर्वन्तो अलंकरास्ते अंगादिवत्।”

आचार्य जयदेव के शब्दों में-

“अंगीकरोति य काव्यं शब्दार्थवनलंकृति (चंद्रालोक में)

असौ न मन्यते कस्माद, अनुष्णमनलंकृति।”

अग्निपुराणकार

“अलंकार रहिता विधवेवसरस्वती।”

अथार्त अलंकार से रहित होने पर सरस्वती विधवा के सामान है।

(अग्निपुराण में 14 अलंकारों का वर्णन है)   

आचार्य भामह के शब्दों में-

“न कांतमपि निर्भूषं विभाति वनितामुखम्।” (काव्यालंकार)

अथार्त स्त्री का मुख कितना भी सुंदर हो आभूषणों के बिना वह शोभा को नहीं प्राप्त कर सकती।  

आचार्य रामचंद्र शुक्ल के अनुसार-

“भावों का उत्कर्ष दिखाने और वस्तुओं के रूप, गुण, क्रिया का अधिक तीव्रता के साथ अनुभव कराने में सहायक उक्ति को अलंकार कहते है”

डॉ० रामकुमार वर्मा-

“अलंकारों के प्रयोग से भाषा और भावों की नग्नता दूर होकर उसमे सौंदर्य और सुषमा की सृष्टि होती है।”

अरस्तु के शब्दों में-

“भाषा को लोक सामान्य के स्तर से ऊपर उठानेवाले धर्म अलंकार कहलाते है।”

रामधारी सिंह के शब्दों में-

“मैं अलंकारों महत्व को भूल नहीं सकता, किसी प्रकार भी उनका अनादर नहीं कर सकता, क्योंकि अलंकारों ने काव्य कौशल को बहुत से ऐसे भेद खोले है जो अन्यथा अवशिष्ट रह जाते है।”     

सुमित्रानंदन पंत के शब्दों में-

“अलंकार केवल वाणी की सजावट के लिए नहीं हैं, वे भाव की अभिव्यक्ति के विशेष द्वार है, भाषा की पुष्टि के लिए, राग की परिपूर्णता के लिए आवश्यक उपादान हैं। वस्तुतः काव्य शरीर को सजाने के लिए अलंकार गहनों का प्रयोग अपेक्षित है।”

शिपले के अनुसार अलंकार के प्रयोजन-

1.विषय का स्पष्टीकरण 2. सादृश्य 3. शक्तिमता 4. सजीवता 5. साहचर्य 6. हास्य 7. अलंकृति 8. सौंदर्य 9. विशिष्ट में सामान्य का प्रदर्शन

केशवदास-

“जदपि सुजाति सुलच्छनी सरस सुवर्ण सुवृत।

भूषण बिनु न बिराजई कविता वनिता मित्त।।”

अलंकारों के विषय में विशेष तथ्य:

भामह अलंकार संप्रदाय के ‘प्रवर्तक’ है।

इन्होने सबसे पहले अलंकारों को काव्य की ‘आत्मा’ घोषित किया।

भामह ने अलंकारों का आधार ‘वक्रोक्ति’ को माना है।

भामह के ‘काव्यालंकार’ में 35 अलंकार है।

दंडी ने अलंकारों का आधार ‘अतिश्योक्ति’ को माना है।

सभी अर्थालंकारों का आधार ‘उपमा’ को माना जाता है।

अलंकारों को शब्दालंकार और अर्थालंकारों में सबसे पहले दंडी ने विभक्त किया।

दंडी के काव्यादर्श में 38 अलंकारों की विवेचना है।

अलंकारों को सामान्य और विशिष्ट इन दो श्रेणियों में केशवदास ने (कविप्रिया 1601 ई०) बाँटा है।

रुद्रट ने 66 अलंकारों की विवेचना करते हुए उन्हें निम्नलिखित चार श्रेणियों में बाँटा है-

औपम्य, वास्तव, अतिशय, श्लेष्य।

अलंकार ‘साधन’ है ‘साध्य’ नहीं है।

अलंकार और अलंकार्य भिन्न है।

प्रमुख अलंकारवादी आचार्य:

रुद्रट, जयदेव, दंडी, वामन, अप्पय दीक्षित, केशवदास, भामह, उद्भट 

अलंकारों का वर्गीकरण:

शब्दालंकार- जहाँ शब्दों के माध्यम से काव्य सौंदर्य में वृद्धि हो, वहाँ शब्दालंकार होता है। इस अलंकार की पहचान यह है कि यदि उन शब्दों के स्थान पर पर्यायवाची शब्द रख दिए जाएँ तो वह अलंकार भी नष्ट हो जाता है।

अनुप्रास, यमक, श्लेष, पुनरुक्ति प्रकाश, वक्रोक्ति

अर्थालंकार- जहाँ काव्य सौन्दर्य पर निर्भर हो वहाँ अर्थालंकार होता है, इसकी पहचान यह है कि यदि उन शब्दों के स्थान पर उनके पर्यायवाची भी रख दिए जाएँ तो वह नष्ट नहीं होता है।

उपमा, रूपक, उत्प्रेक्षा, प्रतीप, व्यतिरेक, विभावना, विशेषोक्ति, दृष्टांत, विरोधाभास,  अन्योक्ति, भ्रांतिमान आदि।  

उदाहरण:

“देख एक कबूतर हाथ में पूछा कहाँ अपर है।

छोड़ उसे कहा दिया उड़ गया अपर कहा सपर है।”     

उभयालंकार-

जहाँ शब्द और अर्थ दोनों में चमत्कार विद्यमान हो वहाँ उभयालंकार होता है।

उदाहरण- श्लेष, वक्रोक्ति (इसमें शामिल हो सकते है)

1.यमक अलंकार- काव्य में जहाँ एक ही शब्द दो या अधिक बार आए और प्रत्येक बार उसके अर्थ अलग-अलग हो वहाँ यमक अलंकार होता है।

उदहारण-

“कनक कनक ते सौ गुनी, मादकत अधिकाय।

या खाए बौराए जग वा पाए बौराए।।”

उपर्युक्त दोहे में ‘कनक शब्द की आवृति हुई है। यहाँ पहले ‘कनक’ का अर्थ ‘सोना’ तथा दूसरे ‘कनक’ का अर्थ ‘धतूरा’ है। अतः यहाँ यमक अलंकार है।

यमक अलंकार के दो उपभेद है- (i) भागावृति यमक (ii) पदावृति यमक

(i) भागावृति यमक जहाँ छंद के किसी एक भाग या शब्द की बार-बार आवृति हो और हर बार अर्थ भिन्न निकले वहाँ भागावृति यमक अलंकार होता है।

उदाहरण-

“सारंग ले सारंग चली सारंग पुगो आय

 घड़ा       सुंदरी          मेघ

सारंग में सारंग धरी सारंग सारंग माया।।”

वस्त्र       घड़ा          सुंदरी    सरोवर

उपर्युक्त छंद में एक ही शब्द की बार-बार आवृति हुई है, किन्तु हर बार उसका अर्थ भिन्न निकला है। अतः यह भागावृति यमक अलंकार है।

(ii) पदावृति यमक जिस रचना में वर्ण्य विषय के पूरे पद की बार-बार आवृति हो तथा अर्थ भिन्न निकले वहाँ पदावृती यमक होता है।

उदाहरण-

“ऊँचे घोर मन्दर के अन्दर रहनवाली

ऊँचे घोर मन्दर के अन्दर रहाती है।”

“तीन बेर खाती थी ते तीन बार खाती थी।”

2. श्लेष अलंकार- श्लेष का शाब्दिक अर्थ होता है- ‘चिपका हुआ’

जब किसी कविता में किसी एक शब्द के प्रसंगवश अनेक अर्थ निकलते हैं, तब श्लेष अलंकार होता है।

उदाहरण–

“विमाता बन गई आँधी भयावह।

हुआ चंचल न फिर श्यामघन वह।।”

उपर्युक्त पंक्ति में ‘श्यामघन’ के दो अर्थ हैं- ‘राम’ और ‘काले बदल’ विमाता कैकयी के प्रबल  आँधी बन जाने पर भी श्यामघन (राम) विचलित (चंचल) नहीं हुए।

दूसरा अर्थ- प्रबल आँधी रूपी विमाता के प्रकोप से श्यामघन (बादल) विचलित नहीं हुए।

श्लेष अलंकार के दो उपभेद है- (i) अभंग श्लेष अलंकार (ii) सभंग श्लेष अलंकार

(i).अभंग श्लेष अलंकार- जहाँ शब्द को बिना भंग किए ही शब्द में अनेक अर्थों की अभिव्यंजना हो वहाँ अभंग श्लेष होता है।

उदाहरण-

“पानी गए न उबरे मोती मानुष चुन।”

                    कांति ‘प्रतिष्ठा’ जल  

उपर्युक्त पंक्ति में पानी पद को बिना भंग किए ही तीन अर्थ निकला ‘कांति’, ‘प्रतिष्ठा’ और ‘जल’।

उदाहरण-

“मेरी भव बाधा हरो, राधा नागरी सोई।

जा तन की झाँई परे, श्यामु हरत दुति होई।।”  

यहाँ ‘स्यामु’ तीन अर्थ- कृष्ण, काला, पाप है।

‘हरित’ का तीन अर्थ- प्रसन्नता, हरा, नष्ट है। 

‘चमक’ का तीन अर्थ- चमक, पीला, मोक्ष है। 

(ii). सभंग श्लेष अलंकार- जहाँ पद विशेष को भंग करके (तोड़कर) उसके दो या अधिक अर्थ किए जाते हैं। वहाँ सभंग श्लेष अलंकार होता है।

उदाहरण- “विरह का जल जात जीवन

         विरह का-ज-ल जात।”

उपर्युक्त पंक्तियों में पद को भंग करने पर तीन अर्थ निकालते है।   

विरह का जल जात- विरह का जल अथार्त आँसू बह रहा है।

विरह का-ज-ल जात- विरह रूपी काजल बहा जा रहा है।

विरह काज लजात- विरह के कारण जीवन लज्जित हो रहा है।

“चिरजीवौ जोरी जुरे क्योंन स्नेह गम्भीर।

को घटि ए वृषभानुजा वे हलधर के वीर।।”  

उपर्युक्त पंक्तियों में पद को भंग करने पर ‘वृषभानुजा’ के दो अर्थ है (राधा, गाय)

‘हलधर’ के दो अर्थ है (कृष्ण,बैल)

3. उपमा अलंकार-

अलंकारों में ‘उपमा’ का स्थान सर्वोपरि माना गया है।

उपमा का अर्थ है- समानता या तुलना करना। समान धर्म के आधार पर जहाँ एक वस्तु की समानता या तुलना किसी दूसरी वस्तु से की जाती है। वहाँ उपमा अलंकार होता है।

इसकी पहचान- समान, तुल्य, नाई, सा, सी, सम, इव, वत में से एक शब्द उपस्थित होता है।

उपमा के अंग- उपमा अलंकार के चार अंग होते है।

उपमान – जिससे उपमा दी जाए

उपमेय – जिस वस्तु से तुलना की जाए

साधारण धर्म – जिस गुण या विशेषता के कारण तुलना की जाए

वाचक धर्म – जिससे उपमा का बोध हो

उदाहरण- “सिय मुख चंद्र सम उज्जवल”

उपमा अलंकार के भेद –

उपमा अलंकार के तीन भेद होते है- (i) पूर्णोतमा (ii) लुप्तोपमा (iii) मालोपमा।

(i).पूर्णोतमा-

जहाँ उपमा के चारों अंग विद्दमान हो, उसे ‘पूर्णोतमा’ कहते है।

उदाहरण- ‘पीपल पात सरिस मन डोला’

इसमें ‘पीपल पात’ उपमान है।

‘मन’ उपमेय है।

‘सरिस’ वाचक शब्द है ।

‘डोला’ साधारण धर्म है।

उदहारण- “नचहि जीव मर्कट की नाई, सबहि नचावत राम गोसाई”

‘मर्कट’ – उपमान है।

‘जीव’ – उपमेय है।

‘नचहि’ – साधारण धर्म है।  

‘नाई’ – वाचक धर्म है।

(ii) लुप्तोपमा अलंकार-

काव्य में जहाँ उपमा के चारों अंगों में से किसी एक अंग लुप्त हो या कमी रहती है। वहाँ लुप्तोपमा अलंकार होता है।

उदाहरण-

“कुलिस कठोर सुनत कटु बानी,

बिलखत लखन सिय सब रानी।”

‘कुलिस’ – उपमान है।

‘कटु वाणी’ – उपमेय है।

‘कठोर साधारण’ – धर्म है।

‘वाचक धर्म’ – का लोप है।

लुप्तोपमा के चार भेद है।

उपमेय लुप्तोपमा

उपमान लुप्तोपमा

धर्म लुप्तोपमा

वाचक लुप्तोपमा

(iii) मलोपमा अलंकार-

जहाँ किसी रचना में एक उपमेय के लिए बहुत से उपमान हो और उपमा के चारों अंग विद्दमान हो वहाँ मालोपमा अलंकार होता है।

उदहारण-

सो सुन्दरी मादक मदिरा सी।

खंजन दृग सुखप्रद प्रभुता सी।।

उपर्युक्त चौपाई मे सुंदरी के लिए मदिरा, खंजन तथा प्रभुता उपमानों का प्रयोग किया गया है। अतः यहाँ मालोपमा अलंकार है। 

उदाहरण-

रुपजाल नंदलाल के, परि कटि बहुरि छुटेन।

खंजरिह मृगमीन से, ब्रज लतिन के नैन।।

उपमान – खंजरित, मृगमीन

उपमेय – नेत्र

साधारण धर्म – नेत्र

वाचक – से

सुभग सुधाकर तुल्य मुख, मधुर सुधा से बैन।

उपमा के अन्य भेद निम्न है-

रसनोपमा, अनन्वयोपमा और उपमेयोपमा

रसनोपमा – जिस उपमा में उपमान या उपमेय उत्तरोतर उपमेय या उपमान होते है उसे रसनोपमा कहते है।

उदाहरण-

बच सी माधुरी मूरति, मूरति सी कलकीर्ति।

कीरति लौं सब जगत मैं, छाई रही तव नीति।।

अनन्वयोपमा – जहाँ उपयुक्त उपमान नहीं मिलने के कारण स्वयं उपमेय को ही उपमान मान लिया जाता है। वहां अनन्वयोपमा अलंकार होता है।

उदाहरण-

लही न कतहुँ हारि हिय मानी।

इन समय ये उपमा उर आनी।।

उपमेयोपमा – जहाँ उपमेय और उपमान एक दूसरे के उपमान एवं उपमेय हो जाते है। वहाँ उपमेयोपमा अलंकार होता है।

उदहारण-

“भूपर भाऊ भुवपत्ति को कर, सों मन औ मन सों ऊँचो”

“वे तुम सम, तुम उन सम स्वामी।”

4. रूपक अलंकार- जहाँ अप्रस्तुत या उपमेय पर उपमान का आरोप किया जाता है। वहा रूपक अलंकार होता है।

जैसे- ‘बंदऊँ गुरु पद कंज’ यहाँ ‘गुरु पद’ (उपमेय) है, और कंज (उपमान) एक रूप है। दोनों में अभेद की स्थिति है। अतः यहाँ रूपक अलंकार है।

ध्यातव्य- इस अलंकार में पहले उपमेय व बाद में उपमान होता है। उपमेय और उपमान सूचक शब्दों का यथाक्रम निर्धारित होता है अन्वय करने पर रूपी शब्द का प्रयोग किया जाता है।

रूपक के तीन भेद है- (i) सांग रूपक (ii) निरंग रूपक (iii) पारंपरिक रूपक

(i) सांग रूपक – जहाँ उपमेय तथा उपमान से संबंधित अन्य विशेषताओं में भी भेदरहित आरोप हो वहाँ सांगरूपक अलंकार होता है।

उदाहरण-

उदित उदय गिरी मंच पर, रघुवर बाल पतंग।

विकसे संत सरोज सब, हरसे लोचन भृंग।।

उपमेय – उपमान

उदयाचल – मंच

रघुवर बाल – पतंग

संत – सरोज

लोचन – भृंग

“संतों भाई आई ज्ञान की आँधी।

भ्रम की टाटी सबै उड़ानी माया रहै न बाँधी।।”

बंदऊँ गुरु पद कंज कृपा सिंधु नर रूप हरि।

नारि कुमुदिनी अवध सर, रघुवर बिरह दिनेस।

अस्त भये बिकसित भई, निरखि राम राकेश।।

(ii) निरंग रूपक- जहाँ संपूर्ण अंगों का साम्य नहीं, वरन् केवल एक अंग का ही आरोप किया जाता है, वहाँ निरंग रूपक अलंकार होता है।

उदाहरण-

‘चरण कमल मृदु मंजु तुम्हारे’ यहाँ चरण को कमल बताया गया है, परन्तु उसके साथ कमल के अंगों को नहीं। अतः यहाँ निरंगरूपक अलंकार है।

‘हरिमुख पंकज, भ्रुव धनुष, खंजन लोचन मित्त।

बिंब अधर, कुंडल मकर, बसे रहत मो चित्त।।’

‘हरि- मुख मृदुल मयंक।’

(iii) पारम्परिक रूपक- पारंपरिक रूपक में दो रूपक होते है। एक प्रधान रूपक एक अन्य रूपक पर आश्रित रहता है, और वह बिना दूसरे रूपक के स्पष्ट नहीं होता है।

उदहारण- “उदयो ब्रजनभ आई, हरिमुख मधुर मयंक’

यहाँ पहले ब्रज को ‘नभ’ फिर हरिमुख को ‘मयंक’ बताया गया है। दुसरे रूपक से पहला रूपक जुड़ा हुआ है, अतः ‘पारम्परिक रूपक’ है।

उदाहरण-

“प्रेम-अतिथि है खड़ा द्वार पर हृदय-कपाट खोल दो।”

“सुनिय तासु गुन ग्राम जासु नाम अध-खग बधिक।”

“राम कथा सुनकर करतारी। संसय विहग उडावन हारी।”

ध्यातव्य- उपमेय पर उपमान का आरोप दो प्रकार का होता है। एक अभेदता द्वारा और दूसरा तद्रूपता के द्वारा।

इस आधार पर रूपक के दो भेद होते हैं- (i) अभेद रूपक (ii) तद्रूप रूपक

(i)अभेद रूपक- यहाँ उपमेय और उपमान एक दिखाये जाते है, उनमे कोई भी नहीं रहता।

उदहारण- मुख चन्द्रमा है।

अभेद रूपक के तीन उपभेद हैं- (क) अधिक (ख) हीन (ग) सम

(ii) तद्रूप रूपक- इसमें उपमान, उपमेय का रूप धारण तो करता है, पर एक नहीं हो पाता है।

इसकी पहचान- दूसरा, दूसरी, दूजी, दूजा, दूजो अपर आदि शब्द होते है।

उदहारण- “एक जीभ के लछिमन दूसर सेस।”

5. उत्प्रेक्षा अलंकार – जहाँ उपमेय में उपमान की संभावना व्यक्त की जाए वहाँ उत्प्रेक्षा अलंकार होता है।

पहचान- मानो, मनो, मनु, मनहुँ, जानो, जनु, सा इत्यादि वाचक शब्द होते है।

उदाहरण-

“सोहत ओढ़े पीत-पट, स्याम सलोने गात।

मनो नीलमणि शैल पर, आतप परयो प्रभात।।”

बिहारी के इस दोहे में पीला वस्त्र ओढ़े हुए साँवले- सलोने श्रीकृष्ण ऐसे सुशोभित हो रहे हैं मानों जैसे नीलमणि पर्वत पर सूर्य की किरणें पड़ रही हों। यहाँ पीताम्बरधारी कृष्ण (उपमेय) में प्रभात की किरणों से सुशोभित नीलमणि पर्वत की संभावना व्यक्त की गई है। अतः यहा उत्प्रेक्षा अलंकार है।

उत्प्रेक्षा अलंकार के के तीन भेद हैं – (i) वस्तुत्प्रेक्षा (ii) हेतुत्प्रेक्षा (iii) फलोत्प्रेक्षा

(i) वस्तुत्प्रेक्षा- जहाँ एक वस्तु की सम्भावना दूसरी वस्तु में व्यक्त की जाती है वहां वस्तुत्प्रेक्षा अलंकार होता है।

जैसे- ‘उसका मुख मानो चन्द्रमा है’ यहाँ ‘मुख’ में ‘चंद्रमा’ की संभावना की गई है। अतः ‘चंद्रमा’ और ‘मुख’ वस्तुत्प्रेक्षा है।

(ii) हेतुत्प्रेक्षा- जहाँ हेतु नही होने पर भी हेतु की संभावना या कल्पना की जाती है। वहाँ हेतुत्प्रेक्षा होता है।

जैसे- “एकही संग निवास ते, उपजहिं एकहि संग

कालकूट की कालिमा, लगी मनो विधु अंग।।”

यहाँ ‘कालकूट’ में चंद्रमा के ‘कलंक’ के कारण की सम्भावना की गई है। यद्दपि कालकूट चन्द्रमा के कलंक का कारण नहीं है, अतः उपर्युक्त दोहे में हेतुत्य्रेक्षा अलंकार है।

“मनहूँ नील माठते काढ़े, जमुना आनि पसारे।

ताते श्याम भई कालिंदी, सूर श्याम गुण न्यारे।।”

“हँसत दसन अस चमके, पाहन उठे छरिक्क।

दरिऊँ सरि जो न करि सका, फाटेउ हिय दरक्कि।।”

(iii) फलोत्प्रेक्षा- जहाँ फल के अभाव में भी फल की म्भावना की जाए वहाँ फलोत्प्रेक्षा अलंकार होता है।

जैसे- “निश्चय ही पिनाक ने स्वपाप नष्ट करने को,

     राम कर तीर्थ पर शरीर निज छोड़ा है।”

इस उदाहरण में राम के द्वारा धनुष टूटने की घटना को लेकर यह सम्भावना व्यक्त की गई है। मानो पापों का नाश करने के लिए शिव धनुष (पिनाक) राम के हाथ रूपी तीर्थ में शरीर का परित्याग किया है। जड़ धनुष द्वारा पाप फल संभावित नहीं है, फिर भी इसकी उत्प्रेक्षा ‘फलोत्प्रेक्षा’ है।

अन्य उदाहरण:             

“तो पद समता को कमल, जल सेवत इक पाँय”

“तव मुख समता लहन को जल सेवत जल जात”

उत्प्रेक्षा के अन्य भेद-

गम्योत्प्रेक्षा- जिस उत्प्रेक्षा में वाचक शब्द लुप्त रहता है उसे गम्योत्प्रेक्षा या प्रतीयमाना उत्प्रेक्षा कहते है।

उदाहरण- वह थी एक विशाल मोतियों की लड़ी।

स्वर्ग कण्ठ से छूट धारा पर गिर पड़ी।।

6. सन्देह- जहाँ सादृश्य के कारण उपमेय और उपमान में अनिश्चय की स्थिति बानी रहे अथार्त उपमेय में किसी अन्य वस्तु का संशय उत्पन्न हो जाए, तो वहाँ संदेह अलंकार होता है।

उदाहरण- “सारी बीच नारी है नारी बीच सारी है।

        सारी ही की नारी है कि नारी ही की सारी है।।”

यहाँ द्रोपदी की साड़ी निरंतर बढ़ती जा रही थी साड़ी ही साड़ी के मध्य द्रौपदी को देखकर साड़ी में संशय होने से यहाँ ‘संदेह’ अलंकार है।

7. भ्रांतिमान- जहाँ समानता के कारण उपमेय में उपमेय का भ्रम हो जाए अथार्त उपमेय को भूल से उपमान समझ लिया जाए, वहाँ भ्रांतिमान अलंकार होगा।

उदाहरण- “कपि कर हृदय विचारि, दीन्ही मुद्रिका डारि तब।

         जनु अशोक अंगार, दीन्ही हरषि उठि कर गहेब।।”

उपर्युक्त सोरठा में हनुमान जी के द्वारा गिराई गई अँगूठी को अँगार समझकर प्रसन्नतापूर्वक उठाती हुई वर्णित की गई है मुद्रिका से अँगार का भ्रम होने से यहाँ ‘भ्रांतिमान’ अलंकार है।  

8. दृष्टांत- जहाँ उपमेय वाक्य व उपमान वाक्य बिंब –प्रतिबिंब भाव होता है वहाँ दृष्टान्त अलंकार होता है।

उदाहरण- “सठ सुधरहिं सत संगति पाई

पारस पारसि कु-धातु सुहाई।।”

उपर्युक्त चौपाई में दो वाक्य है। पहला सठ सत्संगति पाकर सुधारते है, ‘उपमेय’ वाक्य है। दूसरा पारस का स्पर्श करके लोहा स्वर्ण हो जाता है, ‘उपमान’ वाक्य है। दोनों वाक्यों में बिम्ब-प्रतिबिम्ब भाव है। दोनों वाक्यों का साधारण धर्म एक नहीं है। पहले में ‘सुधारना’ साधारण धर्म है। दूसरे में ‘सुहागा’ साधारण धर्म है। दोनों की स्थिति ठीक वैसी ही है जैसे बिम्ब और प्रतिबिम्ब की होती है। अतः यह दृष्टांत अलंकार है।

करक-करत अभ्यास के, जड़मति होत सुजान।

रसरी आवत जात ते, सिल पर परत निसान।।      

9. उदाहरण – जहाँ सामान्य रूप से कही गई बात को भलीभाँति समझाने के लिए उदाहराण दिया जाता है वहाँ उदाहरण अलंकार होता है।

इसकी पहचान- जैसे, ज्यों, जिमि, यथा, जथा, जस आदि वाचक शब्द होते है।

उदहारण-

“यों रहीम जस होत है, उपकारी को संग

बाँटन वारे को लगै, ज्यों मेंहदी को रंग।।”

उपर्युक्त दोहे के प्रथम पंक्ति में- उपकारी के साथ रहने पर यश मिलता है यह एक सामान्य बात कही गई है। दूसरी पंक्ति में- मेंहदी बाँटने वाले को भी हाथ में रंग लग जाता है यह विशेष बात कहकर ‘ज्यों’ शब्द के द्वारा दोनों की समानता बताई गई है। इसलिए यह ‘उदाहरण’ अलंकार  है

सुख बीते दुःख होत है, दुःख बीते सुख होत।

दिवस गये ज्यों निसि उदित, निसिगत दिवस उद्येत।।

जपत एक हरि नाम के, पातक कोटि बिलाहि।

ज्यों चिनगारी एक तें, घास ढेर जरि जाहिं।।

10. व्यतिरेक- उपमेय की उपमान से अधिकता या न्यूनता सूचित करने वाले अलंकार को व्यतिरेक अलंकार कहते है।

उदाहरण-

*जिनके यहस प्रताप के आगे।

ससि मलिन रवि सीतल लागे।।

*जन्म सिंधु पुनि बन्धु विष, दिन मलीन सकलंक।

सिय मुख समता पाव किमि, चन्द बापुरो रंक।।

*का सरवरि तेहि देऊँ मयंकू। चंद कलंकी, वह निकलंकू।।

*मुख है अंबुज सो सही, मीठी बात विसेखी।।

11. विरोधाभास- काव्य में जहाँ वास्तविक विरोध नहीं होने पर भी बाह्य रूप से विरोध होने का बोध हो वहाँ विरोधाभास अलंकार होता है।

उदहारण-

या अनुरागी चित्त की, गति समुझै नहिं कोय।

ज्यौं-ज्यौं बूढ़ों श्याम रंग त्यौं-त्यौं उजालो होय।।

उपर्युक्त दोहे में काले रंग के डूबने से उज्जवल होना विरोधी कथन है वस्तुतः यह विरोध नहीं है। इसका मूल भाव यह है, कि साधक ज्यों-ज्यों कृष्ण की भक्ति-भाव में डूबता जाएगा त्यों-त्यों उसमें सात्विक भाव यानी ज्ञान का प्रकाश बढ़ता चला जाएगा। अतः यह विरोध होकर मात्र ‘विरोधाभास’ है।

विषमय यह गोदावरी, अमृतन को फल देत।

केसव जीवन हार को, असेस दुःख हर लेत।।

12. असंगति- जहाँ स्वाभाविक रूप से साथ-साथ रहनेवाली वस्तुओं का असंगत व्यंजित किया जाए, वहाँ ‘असंगति’ अलंकार होता है।

उदाहरहण- सीतहि ले दसकंठ गयौ पे गयो है बिचारो समंदर बांध्यो।

असंगति के तीन प्रकार हैं- (i) प्रथम असंगति (ii) द्वितीय असंगति (iii) तृतीय असंगति

(i) प्रथम असंगति- जहाँ कार्य और कारण अलग-अलग स्थानों पर व्यंजित किए जाते है वहाँ  असंगति अलंकार होता है।

उदाहरण-

‘घाव पिया तन पीड़ित गौरा’ यहाँ घाव शिवजी के शरीर पर है परन्तु पीड़ा गौरा को हो रही है।

दृग उरझत टूटत कुटुम, जुरत चतुर चित प्रीति।

परति गाँठी दुरजन हिये, दई नई यह रीति।।

(ii) द्वितीय असंगति- किसी वस्तु का अपने उचित स्थान से अन्यत्र वर्णन करना द्वितीय असंगति अलंकार है।

उदहारण-

‘पियागमन सुनि झपटी बाला, रोली दृग अरु अंजन भाला’

यहाँ पिया के आगमन को सुनकर खुशी से बेसुध युवती अपनी आँखों में रोली और माथे पर अंजन (काजल) लगा लेती है।

पलनि पीक अंजन अधर, धरे महावर भाल।

आजु मिले सो भली करि, भले बने हो लाल।।

(iii) तृतीय असंगति- जिस वस्तु का जो स्वाभाविक कार्य है उसके विपरीत काम करने को तृतीय असंगति अलंकार कहते है।

उदाहरण-

“उदित भयो है जलद तू, जग को जीवन दानि।

मेरो जीवन लेत है, कौन बैर मन मानी।।”

उपर्युक्त दोहे में संसार को जीवन देने वाले जलद के लिए जीवन लेने के कार्य की व्यंजना हुई है। अथार्त यहाँ प्रवृत कार्य के विपरीत कार्य होने से है। यहाँ तृतीया असंगति अलंकार है।

13. विभावना अलंकार- काव्य में जहाँ बिना कारण के कार्य की निष्पति हो वहाँ विभावना अलंकार होता है।

इसकी पहचान- बिना, बिनु, बिन, रहित आदि पहचान सूचक शब्द होते है।

“बिनु पद चलै सुनै बिनु काना।

कर बिनु कर्म करै विधि नाना।।

आनन रहित सकल रस भोगी।

बिनु बानी बकता बड़ जोगी।।”

उपर्युक्त चौपाइयों में बिना पैर के चलना, बिना कानों के सुनना हाथों के बिना अनेक प्रकार के कार्य करना और जिह्वा के बिना वक्ता होना वर्णित है। इसलिए यहाँ ‘विभावना’ अलंकार है।

विभावना अलंकार के छः (6) भेद है- (i) प्रथम विभावना (ii) द्वितीय विभावना (iii) तृतीय विभावन (iv) चतुर्थ विभावना (v) पंचम विभावना (vi) षष्ठ्म  विभावना

(i) प्रथम विभावना – जहाँ कारण के अस्तित्व के बिना ही कार्य होता है।

उदहारण-

साहि तनै सिवराज की स सहज टेव यह ऐन।

अनरीझे दारिद हरै, अनखीझै रिपुसैन।।

‘लाज भरी अँखियाँ बिहँसी, बलि बोल कहे बिन उत्तर दीन्ही।’ 

(ii) द्वितीय विभावना- जहाँ अपूर्ण या अपर्याप्त कारण होने पर भी कार्य पूरा होता है।

उदाहरण-

“मंत्र परम लघु जासु बस, बिधि हरिहर सुर सर्ब।

महामत्त गजरात कहँ, बस कर अंकुश खर्ब।।”

‘आक धतूरे के फूल चढ़ाये ते रीझत हैं तिहूँ लोक साँई।’

(iii) तृतीय विभावन- जहाँ पर बाधक परिस्थिति के होते हुए भी कार्य पूरा होता है।

उदहारण-

“लाज लगाम न मानहीं, नैंना मो बस नाहिं।

ये मुँहजोर तुरंग लौ, ऐंचत हू चलि जाए।।”

(iv) चतुर्थ विभावना- जहाँ वास्तविक कारण के स्थान पर अन्य कारण से कार्य उत्पन्न होता है।

उदाहरण-

“विद्रुम के संपुट में उपजे मोती के दाने कैसे?

यह शुक फलजीवी करता चुगने की मुद्रा ऐसे।।”

(v) पंचम विभावना- जहाँ विपरीत और विरोधी कारण के द्वारा कार्य संपन्न होता है।

उदहारण-

“या अनुरागी चित्त की, गति समुझे नहिं कोय

ज्यों-ज्यों भींजे स्याम रंग, त्यों-त्यों उज्जवल होय।।”

‘वा मुख की मधुराई कहा कहौ, मीठी लगै अखियान लुनाई।’

(vi) षष्ठ्म विभावना- जहाँ पर कार्य के कारण की उत्पत्ति वर्णन की जाती है।

उदाहरण-

“भयो सिंधु ते बिंधू सुकवि, बरनत बिना विचार

उपज्यों तो मुख इन्दु ते, प्रेम पयोधि अपार।”

14. अन्योक्ति या अप्रस्तुत प्रशंसा- जहाँ अप्रस्तुत (उपमान) को ऐसे ढंग से व्यक्त क्या जाए कि उससे प्रस्तुत (उपमेय) का बोध हो वहाँ ‘अन्योक्ति या अप्रस्तुत प्रशंसा’ अलंकार होता है।

उदाहरण-

“स्वारथ सुकृत न श्रम वृथा, देखू विहंग विचारि।

बाज पराए पानि पर, तू पंछी न मारि।।”

उपर्युक्त दोहे में बाज (अप्रस्तुत)के माध्यम से मिर्जा राजा जयसिंह (प्रस्तुत) को सचेत किया है। अतः यहा अन्योक्ति या अप्रस्तुत प्रशंसा अलंकार है।

“माली आवत देखकर कालियन करि पुकारि।

फूले-फूले चून्ही लिये, काल्हि हमारी बारि।।”

15. समासोक्ति अलंकार- जहाँ पर कार्य लिंग या विशेषण की समानता के कारण प्रस्तुत के कथन में अप्रस्तुत व्यवहार का समारोप होता है, वहाँ पर ‘समासोक्ति अलंकार’ होता है।

उदाहरण-

“नहिं पराग नहिं मधुर मधु नहिं विकास इहि काल।

अलि कली ही मैं बिंध्यों, आगे कौन हवाल ।।”

उपर्युक्त दोहे में भ्रमर (प्रस्तुत) के कार्य से कामुक पुरुष (अप्रस्तुत) के कार्य की व्यंजना हुई है। अतः यहाँ ‘समासोक्ति अलंकार’ है।

16. विशेषोक्ति अलंकार- जहाँ कारण के रहते हुए भी कार्य नहीं होता, वहाँ विशेषोक्ति अलंकार होता है।

उदाहरण-

“पानी बिन मीन पियासी।

मोहि सुन-सुन आवै हाँसी।।” 

उपर्युक्त उदाहरण में मछली पानी में है, अतः उसे प्यासी नहीं होना चाहिए, लेकिन वह प्यासी है। यहाँ कारण के विधमान होने पर भीकार्य नहीं हुआ, अतः यहा ‘विशेषोक्ति’ अलंकार है।

17. अत्युक्ति अलंकार- काव्य में जहाँ किसी की झूठी वीरता, वियोग, प्रेम, उदारता, यश, सुन्दरता आदि का बहुत बढ़ा-चढ़ाकर (ऊहात्मक) वर्णन किया जाता है, वहाँ अत्युक्ति अलंकार होता है।

उदहारण-

“विरहा जब आगि लगे तन में, तब जाए परी जमुना जल में।

विरहानल ते जल सुखि गयो, सफरी जल छाड़ि गईं तल में।

रेत फट्यो सु पताल गईं, तब शेष जरयो धरती तल में।

रसखान कहैं, वह आँच मिटै, जब श्याम जी आये लगैं गल में।।”

उपर्युक्त कवित्त में विरह ताप का अत्यंत ऊहात्मक (काल्पनिक, विचारात्मक) वर्णन हुआ है, अतः यहाँ ‘अत्युक्ति’ अलंकार है।

18. अर्थान्तरन्यास अलंकार- जहाँ सामान्य कथन का विशेष और विशेष कथन का सामान्य से समर्थन किया जाए वहाँ ‘अर्थान्तरन्यास’ अलंकार होता है।

‘अर्थान्तरन्यास’ का अर्थ है- दूसरे अर्थ को न्यस्त करना या रखना। जहाँ सामान्य की पुष्टि या समर्थन के लिए विशेष अर्थ को या विशेष की पुष्टि या समर्थन के लिए सामान्य अर्थ को न्यस्त किया जाए वहाँ अर्थान्तरन्यास अलंकार होता है।

उदाहरण-

“जो रहीम उत्तम प्रकृति, का करि सकत कुसंग

चंदन विष व्याप्त नहीं, लिपटे रहत भुजंग।।”

उपर्युक्त दोहे में पहला कथन के अनुसार- अच्छी प्रकृति वालों का कुसंग कुछ नहीं कर सकता।

दूसरा कथन- ‘भुजंग के लिपटे रहने पर भी चन्दन में विष व्यापत नहीं होता है।’

विशेष कथन- यहाँ सामान्य कथन की पुष्टि के लिए दुसरे विशेष कथन को न्यस्त किया गया है।

अतः यहाँ ‘अर्थान्तरन्यास’ अलंकार हैं।

19. निदर्शना अलंकार- जहाँ उपमेय और उपमान वाक्यों के अर्थ में भिन्नता होते हुए भी उसमे समानता की कल्पना की जाती है, वहाँ निदर्शना अलंकार होता है।

उदाहरण-

“जंग जितना चाहते हैं, जो तुमसे बैर बढ़ाकर।

जीवित रखने की इच्छा, वे करते हैं विष खाकर।।”

उपर्युक्त पद्दांश में बैर बढ़ाकर जीवित रहन तथा विष खाकर जीवित रहना दोनों भिन्नार्थ बातों में सम्बन्ध स्थापित करके एक सामान बनाया गया है। इसलिए यहाँ ‘निदर्शना’ अलंकार है।

20. प्रतिवस्तुपमा अलंकार- जहाँ उपमेय और उपमान में एक ही साधारण धर्म की तुलना भिन्न-भिन्न शब्दों द्वारा की जाती है वहाँ प्रतिवस्तुपमा अलंकार होता है। इस अलंकार में उपमेय और उपमान वाक्यों में वस्तु-प्रतिवस्तु का भाव होता है।

उदाहरण- “तिन्हें सोहय न अवध बधावा। चोरहि चाँदनी राति न भावा।।”

इसके प्रथम पंक्ति में तिन्हें (देवताओं को) अवधपुरी का बधावा (मंगलध्वनि) नहीं सुहाता- ‘उपमेय वाक्य’ है।

द्वितीय पंक्ति में- चोर को चाँदनी रात नहीं भाति- ‘उपमान वाक्य’ है। दोनों में एक ही साधारण धर्म है, ‘अच्छा लगना’ अतः यहाँ प्रतिवस्तुपमा अलंकार है।  

21. अतिश्योक्ति अलंकार- जहाँ किसी विषय वस्तु को बढ़ा चढ़ाकर वर्णन किया जाता है वहाँ अतिश्योक्ति अलंकार होता है।

उदाहरण- “विधि हरि-हर कवि कोबिद बानी। कहत साधु महिमा सकुचानी।।”

अतिश्योक्ति अलंकार के छह भेद है-

रूपकांतिशयोक्ति 

भेदकांतिशयोक्ति

असम्बन्धातिशयोक्ति

सम्बन्धातिशयोक्ति

अक्रमाति शयोक्ति

अत्यन्तातिशयोक्ति    

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