पाश्चात्य काव्यशास्त्री (इकाई-3) : अरस्तू का अनुकरण सिद्धांत

“अरस्तू यूरोपीय काव्यशास्त्र के मेरुदंड है”   

अरस्तू का जन्म: 384 ई० से 322 ई० पूर्व (मकदूनिया, यूनान)

यूनानी नाम: अरिस्तोतिलेस (अरस्तू) था।

गुरु: प्लेटो

अरस्तू का शिष्य: सिकंदर था।

रचनाएँ: इनकी रचनाओं की संख्या लगभग 400 मानी जाती है।

प्राप्त रचनाएँ तीन है

  • पेरिपोएइतिकेश (काव्यशास्त्र से संबंधित रचना )
  • तेखनेस रितोरिकेश (भाषण शास्त्र से संबंधित रचना )
  • वसीयतनामा (दासता के मुक्ति का पहला घोषणापत्र)

पेरिपोएइतिकेश (काव्यशास्त्र)

  • इस रचना में कूल 26 अध्याय है।
  • 1 से 5 तक के अध्यायों में त्रासदी, महाकाव्य, कॉमेडी/कामदी आदि की विवेचना है।
  • 6 से 19 तक के अध्यायों में त्रासदी का विस्तार से वर्णन है। यह रचना का केंद्रीय भाग है।
  • 20वां अध्याय में व्याकरणिक जानकारी मिलता है।
  • 21 से 22 तक के अध्यायों में पदावली और लक्षणा का निरूपण है।
  • 23 और 24 अध्याय में महाकाव्य के स्वरुप का वर्णन है।
  • 25वां अध्याय में प्लेटो और अन्य लोगों के द्वारा काव्य पर लगाए गए आक्षेपों का निराकरण है।
  • 26वां अध्याय में त्रासदी और महाकाव्य की तुलना की गई है।

पेरिपोएइतिकेश का अंग्रेजी में अनुवाद:

  • ‘ऑन पोएटिक्स’ के नाम से 1780 ई० में टी. विन्स्टैली द्वारा अनुवाद।
  • ‘पोएटिक्स’ के नाम से 1894 ई० में बुचर द्वारा अनुवाद
  • ‘पोएटिक्स’ के नाम से 1894 ई० में इनग्रेम बाइवाटर के द्वारा अनुवाद किया गया। (2 और 3 प्रामाणिक माना जाता है)

‘पेरिपोएइतिकेश’ का हिन्दी में अनुवाद:

  • काव्यशास्त्र की यूनानी अवधारणा’ के नाम से डॉ० लक्ष्मीसागर वार्ष्णेय द्वारा किया गया था। इसे अज्ञेय और मुक्तिबोध ने भी किया है।

अरस्तू के प्रमुख सिद्धांत:

  • अरस्तू का अनुकरण सिद्धांत:
  • अरस्तू का विरेचन सिद्धांत
  • अरस्तू का त्रासदी सिद्धांत

अरस्तू के ‘अनुकरण’ सिद्धांत:

  • अरस्तू के ‘अनुकरण’ सिद्धांत की प्रक्रिया 
  • अरस्तू के ‘अनुकरण’ सिद्धांत की विषय में आलोचकों के मत
  • अरस्तू के ‘अनुकरण’ सिद्धांत की कमियाँ
  • प्लेटो और ‘अनुकरण’ सिद्धांत में अंतर
  • ‘अनुकरण’ यूनानी भाषा के ‘मिमेसिस’ एवं अंग्रेजी के ‘एमिटेशन’का हिन्दी रूपांतरण है। इसका आशय ‘नक़ल करना’ होता है।
  • अरस्तू का मानना था कि मनुष्य में जन्मजात अनुकरण करने की प्रवृति होती है। अतः अनुकरण एक स्वाभाविक प्रक्रिया है।
  • अनुकरण कुछ नया सिखने और सीखे हुए को स्थाई बनाने के लिए होता है। किन्तु सामान्य व्यक्ति के द्वारा तथा कलाकार के द्वारा किया गया अनुकरण में अंतर होता है।

अरस्तू के अनुसार- कलाकार के द्वारा किया गया ‘अनुकरण’ तीन रूपों में होता है।

प्रतीयमान रूप- जैसा दिखे उसी का वैसे ही अनुकरण करे (त्याज्य माना है)

संभाव्य रूप – जैसा को सकता है। (माध्यम माना है)

आदर्श रूप- जैसा होना चाहिए। (इसे सर्वश्रेष्ठ माना है)

“अरस्तू मानते है कि कलाकार प्रकृति का सीधे अनुसरण नहीं करता। अपितु वह उसकी सृजन प्रक्रिया का अनुसरण करता है।”

अरस्तू के अनुसरण सिद्धांत के तथ्य:

  • प्लेटो ने काव्यशास्त्र को दर्शनशास्त्र एवं राजनीतिशास्त्र से जोड़कर वर्णन किया है। जबकि अरस्तू ने काव्य को एक स्वतंत्र विद्दा माना है।
  • अरस्तू के अनुसार कविता संसार की अनुकृति है तथा मनुष्य की मूल प्रवृति है।
  • अनुकरण की प्रक्रिया आनंददायक होती है।
  • मनुष्य अनुकृत वस्तु में मूल का सादृश्य देखकर आनंदित होता है।
  • अनुकरण के द्वारा भय उत्पादक वस्तुओं का भी इस रूप में चित्रण किया जा सकता है कि वे आनंददायक प्रतीत होती है।
  • काव्य कला सर्वोतम अनुकरण कला है।
  • नाटक काव्य का सर्वश्रेष्ठ रूप है।
  • कवि अपनी रचना का हुबहू अनुकरण नहीं करता है। वह वस्तु को श्रेष्ठ या हीन रूप में प्रस्तुत करता है।
  • अनुकरण केवल बाहरी आकृति का नहीं किया जाता है। अपितु आतंरिक मनोभाव एवं सृजन प्रक्रिया का भी अनुकरण होता है।
  • कलाकार प्रकृति की वस्तुओं का अपनी कला के माध्यम से पुनः सृजन करता है तथा प्रकृति प्रदत्त कमियों को दूर करता है अंतः अनुकरण उदात्त होता है।

अरस्तू के अनुकरण सिद्धांत के विषयों में आलोचकों के प्रमुख कथन:

प्रो० बूचर के शब्दों में- “अरस्तू का अनुकरण सादृश्य के द्वारा मूल का पुनराख्यान है।”

स्कॉट जेम्स के शब्दों में- “अनुकरण जीवन के कलात्मक पुनर्निर्माण का पर्याय है।”

एडकिन्स के शब्दों में- “अरस्तू के अनुकरण का वास्तविक अर्थ है पुनः सृजन करना।”

पॉट्स के शब्दों में- “अनुकरण का अर्थ है वस्तु का पुनः सृजन करना।”

एवरक्रोम्बे के शब्दों में- “वस्तु का पुनः प्रस्तुतिकरण ही अनुकरण है।”

डॉ नगेन्द्र के शब्दों में- “अरस्तू के अनुकरण सिद्धांत अभावात्मक सिद्धांत है क्योंकि अरस्तू ने काव्य की आत्मा के स्थान पर प्रकृति के अनुकरण पर बल दिया है।”

अरस्तू के अनुकरण सिद्धांत के दोष:

  • अरस्तू ने कवि के निर्माण क्षमता पर तो बल दिया है, परन्तु जीवन के विभिन्न अनुभवों से निर्मित कवि की अंतस्चेतना के विषय में कुछ भी नहीं कहा है।
  • अरस्तू ने आतंरिक अनुभूतियों के अनुकरण की भी बात कही है, जबकि इनका अनुकरण असंभव है।
  • अरस्तू का अनुकरण वस्तु तत्व पर अधिक बल देता है। भावतत्व पर मौन है।
  • आज के उपलक्ष्य में अनुकरण का कोई महत्व नहीं रह गया है। आज अनुकरण के स्थान पर कल्पना को अधिक महत्व दिया जाता है।

प्लेटो और अरस्तू के अनुकरण सिद्धांत में अंतर:

  • प्लेटो ने अनुकरण का अर्थ हू-ब-हू नकल बताया था जबकि अरस्तू का अनुकरण पुनः सृजन का पर्याय है।
  • प्लेटो का मानना था कि कला अनुकृति की अनुकृति है जबकि अरस्तू के अनुसार कला वस्तु का पुनः प्रस्तुतिकरण है।
  • प्लेटो ने कलाकार को अनुकर्ता (नकल करता) बताया है जबकि अरस्तू उसे कर्ता मानते है।

प्लेटो ने कला को नैतिक, आदर्शवादी एवं उपयोगितावादी दृष्टिकोण से देखा था, जबकि अरस्तू ने कला को सौंदर्यवादी दृष्टि से देखा है।

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  Change )

Google photo

You are commenting using your Google account. Log Out /  Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  Change )

Connecting to %s

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.