हिन्दी भाषा के विकास में दक्षिण भारतीय लेखकों का योगदान

भाषा का कोई रंग, रूप, जाति या आकर नहीं होता है। इसे तो सिर्फ सुनकर, समझकर महसूस किया जा सकता है। हिन्दी भारत की एकमात्र ऐसी भाषा है, जिसे भारत के अधिकांश लोग जानते और समझते हैं। यह पूरे भारत की सम्पर्क भाषा है। हिन्दी भाषा अघोषित राष्ट्रभाषा ही नहीं बल्कि राज्य भाषा और संपर्क भाषा भी है। उत्तर से लेकर दक्षिण और पूरब से लेकर पश्चिम तक सभी के साथ संपर्क स्थापित करने के लिए यदि कोई एक भारतीय भाषा है, तो वह हिन्दी है। आज देश के लगभग सभी क्षेत्रों में हिन्दी सृजन के कार्य चल रहे हैं। हिन्दी भाषा का पठन-पाठन अब अहिन्दी क्षेत्रों की शिक्षण संस्थाओं में भी बड़े व्यापक स्तर पर हो रहा है। वर्तमान समय में भारत का कोई भी ऐसा प्रान्त नहीं है, जहाँ हिन्दी का अध्ययन-अध्यापन और साहित्य सृजन के कार्य नहीं हो रहे हैं। हिन्दी भाषा ने हर क्षेत्र में अपना अस्तित्व स्थापित किया है।

हिन्दी, भारत में अधिकांश लोगों के द्वारा समझी और बोली जाने वाली भाषा है। हिन्दी केवल उत्तर भारत की भाषा नहीं बल्कि यह संपूर्ण भारत की भाषा बन गई है। आज के समय में यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगी की हिन्दी ने विश्व स्तर पर अपनी पहचान बना ली है। आज अहिन्दी राज्यों में भी हिन्दी साहित्य सृजन का कार्य बड़े पैमाने से हो रहा है। इसलिये हम कह सकते हैं कि वर्तमान समय में हिन्दी केवल उत्तर भारत की ही भाषा नहीं रही अब यह अहिन्दी प्रदेशों की भी भाषा बन गई है। निश्चित रूप से इसका श्रेय दक्षिण भारत के साहित्यकारों को जाता है।

राजमणि शर्मा ने अपनी पुस्तक ‘हिन्दी भाषा: इतिहास और स्वरुप’ में लिखा है- “आदिकाल से ही हिन्दी संतों-महात्माओं, व्यापारियों, सैनिकों और तीर्थयात्रियों के द्वारा समस्त भारत में व्याप्त होकर भारत की राष्ट्रीय आत्मा की अभिव्यक्ति में समर्थ हो चुकी थी।”1 19वीं सदी में हिन्दी का विशेष उपयोग होने लगा था। हिन्दी के विकास के लिए कई संस्थाएँ बनी। फोर्ट विलियम कोलेज के साथ-साथ टेक्स्ट बुक सोसायटी, नागरी प्रचारिणी सभा काशी, हिन्दी साहित्य सम्मलेन प्रयाग, दक्षिण भारत हिन्दी प्रचार सभा मद्रास, राष्ट्रभाषा प्रचार समिति वर्धा, गुजरात विद्यापीठ अहमदाबाद, हिन्दुस्तानी प्रचार सभा वर्धा, हिन्दी विद्यापीठ बम्बई, महाराष्ट्र राष्ट्रभाषा सभा पुणे, बिहार राष्ट्रभाषा परिषद् पटना, मैसूर हिन्दी प्रचार परिषद् बैंगलोर आदि। इसके साथ-साथ ब्रह्मसमाज, आर्य समाज, सनातन धर्म सभा, प्रार्थना सभा, थियोसॉफिकल सोसायटी, रामकृष्ण मिशन, राधास्वामी संप्रदाय आदि संस्थाओं की भी हिन्दी के विकाश में महत्वपूर्ण भूमिका रही है। महात्मा गांधी का स्पष्ट मानना था कि हिन्दी को ही भारत की राष्ट्रभाषा बनने का गौरव मिलना चाहिए। गांधी जी ने 1918 ई० में इंदौर के आठवें हिन्दी सम्मलेन की अध्यक्षता करते हुए हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनाने पर बल दिया था। इसी सम्मलेन में उन्होंने हिन्दी के प्रचार-प्रसार के लिए कार्यकर्ताओं को दक्षिण भारत में जाने के लिए प्रेरित किया था। गांधी जी ने अपने पुत्र देवदास गांधी को भी हिन्दी के प्रचार-प्रसार के लिए भेजा था।        

दक्षिण भारत के हर राज्यों में हिन्दी के प्रचार-प्रसार के उद्देश्य से महात्मा गांधी ने सनˎ1918 ई० में मद्रास में ‘दक्षिण भारत हिन्दी प्रचार सभा’ की स्थापन की थी। महात्मा गांधी के पुत्र देवदास गांधी इस संस्थान के पहले प्रचारक थे। अतः इस सभा के द्वारा हिन्दी भाषा को दक्षिण से जोड़ने का यह पहला कदम था। मद्रास स्थित दक्षिण भारत हिन्दी प्रचार सभा के मुख्यालय के अंतर्गत अनेक शाखाएँ-उपशाखाएँ हिन्दी के प्रचार-प्रसार का कार्य करती हैं। इसी सभा के योगदान से आज दक्षिण भारत के लोग हिन्दी पढ़ने-लिखने और साहित्य सृजन करने में लगे हैं। हिन्दी के विकास में दक्षिण भारत के सभी राज्यों के अनेक साहित्य प्रेमियों ने योगदान दिया है। उनमे प्रमुख सी पी रामास्वामी अय्यर, टी आर वेंकटराम शास्त्री, एन० सुंदरअय्यर आदि हैं।

हिन्दी साहित्य सम्मलेन प्रचार कार्यालय के रूप में हिन्दी प्रचार सभा की स्थापना 1918 में मद्रास में हुई थी। 17 जून को होमरूल कार्यालय में सी पी रामास्वामी अय्यर की अध्यक्षता में एनी बेसेंट ने प्रथम हिन्दी वर्ष का उद्घाटन किया था। उसी वर्ष पंडित हरिहर शर्मा, श्री शिवराम शर्मा को प्रयाग भेजा गया। प्रयाग से लौटकर आने के बाद उन्होंने दक्षिण के हिन्दी प्रचार के कार्य को संभाला। स्वामी सत्यदेव जी ने हिन्दी सिखने के लिए ‘हिन्दी की पहली पुस्तक’ लिखी जो दक्षिण के लोगों के लिए तथा हिन्दी प्रचार के लिए बहुत ही उपयुक्त थी। 1922 तक हिन्दी प्रचार-प्रसार का कार्य इतना विस्तृत हो गया कि प्रेस भी खोलना पड़ा। मोटूरी सत्यनारायण की सहायता से नेल्लूर में आंध्र शाखा खुली। तमिलनाडु की शाखा तिरुचिरापल्ली में श्री अवध नंदन के संचालन में खुली। केरल 1932 ई० में और कर्नाटक 1935 ई० में शाखाएँ शुरू हुई। हिन्दी के विकास में दक्षिण राज्य तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, कर्नाटक एवं केरल के अनेक साहित्यकारों का योगदान रहा है।

शताब्दियों पूर्व भी दक्षिण भारत में हिन्दी भाषा के प्रचलन के संबंध में एक और तथ्यात्मक उदाहरण केरल प्रांत से मिलता है। केरल में स्वाति तिरुनाल नाम के एक सुविख्यात तिरुवितांकूर राजवंश के राजा रामवर्मा (1813-1846) न केवल हिन्दी के निष्णात विद्वान थे, बल्कि स्वयं उन्होंने हिन्दी में कई रचनाएँ लिखी थी। मिशाल के तौर पर उनके यह गीत प्रस्तुत है-

“मैं तो नहीं जाऊँ जननी जमुना के तीर।

इतनी सुनके मात यशोदा पूछति मुरहर से,

क्यों नहिं जावत धेन चरावत बालक कह हमसे।

कहत हरि कब ग्वालिन मिल हम मचित धन कुछ से,

जब सब लाज भारी ब्रजवासिन कहें, न कहो दृग से।

ऐसी लीला कोटि कियो कैसे जायो मधुवन से,

पदमनाभ प्रभु दीन उधारण पालो सब दुःख से।”

स्वाति तिरुनाल के ये गीत दो सौ वर्ष पूर्व दक्षिण में हिन्दी की सर्जना के श्रेष्ठ उदाहरण है। वर्तमान में दक्षिण भारत कि स्थिति यह है कि यहाँ हिन्दी बोलने, समझने और पढने-लिखने वालों की संख्या अनगिनत हो गई है। इसका श्रेय अहिन्दी भाषी साहित्यकारों, प्रचारकों तथा हिन्दी प्रचार-प्रसार के संस्थाओं को जाता है। इस संबंध में तेलगु के प्रख्यात कवि डॉ० सी० नारायण रेड्डी कहते हैं- “आंध्रप्रदेश में हिन्दी के लिए कभी प्रतिकूल वातावरण नहीं रहा। महात्मा गांधी जी के द्वारा हिन्दी प्रचार सभा की स्थापना के कई वर्ष पूर्व ही आंध्रप्रदेश में हिन्दी के नाटक लिखे गए और उन नाटकों का कतिपय कुछ वर्षों तक मंचन भी हुआ। हिन्दी प्रचार सभा की स्थापना के बाद लाखों की संख्या में लोग हिन्दी सीख चुके थे, इतना ही नहीं वे अपनी मौलिक कृतियों से हिन्दी साहित्य को अलंकृत कर चुके थे।”2

यह भी कहा जाता है कि गांधी जी के द्वारा शुरू किये गए हिन्दी प्रचार-प्रसार आंदोलन के पहले से ही दक्षिण भारत में हिन्दी भाषा के प्रचारकों और साहित्यकारों का उदय हो चुका था। इस संबंध में डॉ आदेश्वर राव लिखते हैं- “हिन्दी साहित्य की सतसई परंपरा को बिहारी सतसई’को प्रभावित करने वाले प्राकृत भाषा में लिखित ‘गाथा सप्तशती’ के रचयिता महाराज हल (शालिवाहन) आंध्रप्रदेश के थे। हिन्दी साहित्य में कृष्णभक्ति शाखा के प्रवर्तक आचार्य श्री वल्लभ गोदावरी नदी के किनारे स्थित खंभापांडू के तेलंग ब्राहमण थे। उनकी मातृभाषा तेलुगु थी। इन्हीं से प्रभावित प्रेरणा प्राप्त करके संत कवि सूरदास जी ने सूरसागर की रचना की थी।”3

दक्षिण भारत में मुख्यतः पाँच राज्य शामिल हैं – तेलंगाना, आंद्रप्रदेश, तमिलनाडु, कर्नाटक और केरल। इन पाँचों राज्यों में भिन्न-भिन्न भाषाएँ बोली जाती है। इसके बावजूद भी दक्षिण भारत में हिन्दी भाषा के विस्तार के कई प्रमाण मिलते हैं, जिनके आधार पर यह कहा जा सकता है कि दक्षिण में प्राचीन काल से ही हिन्दी तथा दक्खिनी का प्रचार एवं व्यवहार मिलते रहे हैं। जब कभी भी दक्षिण भारत में हिन्दी के प्रचार-प्रसार की चर्चा होती है, तब सबसे पहले उसमे तेलंगाना का नाम लिया जाता है। इस राज्य की सीमाएँ कई पड़ोसी राज्यों के साथ सटी हुई है। इन पड़ोसी राज्यों के संपर्क के कारण तेलंगाना और आंध्रप्रदेश दोनों राज्यों में हिन्दी का गहरा प्रभाव दृष्टिगोचर होता है। तेलंगाना में विशेषकर निजामों के शासन के कारण यहाँ उर्दू-दक्खिनी हिन्दी का वर्चस्व रहा है। तेलुगु भाषी राज्यों में 15वीं शदी से ही हिन्दी भाषा का थोड़ा बहुत प्रयोग होता आ रहा है।

तेलंगाना एवं आंध्रप्रदेश में हिन्दी साहित्य लेखन की समृद्ध परंपरा रही है। इस परंपरा को और भी समृद्ध बनाने और आगे बढ़ाने के लिए अनेक अहिन्दी भाषा के रचनाकारों का योगदान रहा है। जिन्होंने अपनी अनेक रचनाओं के द्वारा हिन्दी भाषा और साहित्य को एक नई पहचान दी है। इस परंपरा के साहित्यकार श्री आरिगपूडि, डॉ० बालशौरि रेड्डी, प्रो० सुंदर रेड्डी, प्रो० आदेश्वर राव, प्रो० रामा नायुडू, डॉ शेषण, पूर्व प्रधानमंत्री श्री पी० वी० नरसिंहा राव, प्रो० भीमसेन निर्मल, डॉ सूर्यनारायण भानू, श्री मोटूरि सत्यनारायण आदि। दक्षिण भारत से कई पत्र-पत्रिकाएँ हिन्दी में प्रकाशित होती हैं – कल्पना, संकल्य, पूर्ण कुंभ, भारतवाणी, श्रवंती, स्वतंत्र हिन्दी वार्ता, हिन्दी मिलाप, दक्षिण भारत, श्री मिलिंद आदि। इन पत्र-पत्रिकाओं का भी हिन्दी प्रचार-प्रसार में महत्वपूर्ण योगदान रहा है।

‘वंदेमातरम्’ के उर्जस्वल उद्गाता बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय (चटर्जी) ने एक समय कहा था, “हिन्दी एक दिन भारत की राष्ट्रभाषा बनकर रहेगी। हिन्दी भाषा की सहायता से ही भारत के विभिन्न प्रदेशों के मध्य में जो एक्य बंधन को स्थापित करने में समर्थ होंगे, वही सच्चे भारतबंधु पुकारे जाने योग्य हैं।” बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय की यह भविष्यवाणी आज हमारे सामने एक नहीं है बल्कि अनेकों भारत बंधुओं को उपस्थित कर दिया है।

दक्षिण भारत में हिन्दी साहित्य के प्रचारक साहित्यकार:

दक्षिण भारत में हिन्दी प्रचार-प्रसार का इतिहास बहुत ही उज्जवल रहा है। आंध्र में हिन्दी लेखन की परंपरा एवं विकास के संबंध में डॉ भीमसेन निर्मल लिखते हैं कि “दक्षिण भारत में हिन्दी को समृद्ध एवं उन्नत बनाने के लिए मध्ययुग में ही आंध्रप्रदेश के रचनाकार हिन्दी भाषा में साहित्यिक सृजन का काम करने लगे थे। मध्ययुगीन इतिहास के अध्ययन से यह ज्ञात होता है कि हिन्दी लेखन की परंपरा आंध्र के लिए नई नहीं है। इस दिशा में हिन्दी के राष्ट्रीय रूप खड़ीबोली के मूल स्त्रोत दक्खिनी का उल्लेख किया जा सकता है। दक्खिनी हिन्दी साहित्य का संबंध पुराने हैदराबाद राज्य तेलंगाना और कर्नाटक प्रान्तों में अधिक रहा है।”4 इसलिए यह कहा जा सकता है कि दक्षिण में हिन्दी लेखन की परंपरा का इतिहास बहुत पुराना है। दक्षिण भारत में हिन्दी के विकास और लेखन परंपरा को आगे बढ़ाने में अनेकों साहित्यकारों ने अपना योगदान दिया है। भारतीय नवजागरण से वर्तमान समय तक दक्षिण भारतीय साहित्यकारों ने हिन्दी भाषा एवं साहित्य की पुरजोर सेवा किया। 

श्री मोटूरि सत्यनारायण: श्री मोटूरि सत्यनारायण आंध्र प्रदेश एवं दक्षिण भारत के आधार स्तंभ हिन्दी प्रचारक थे। इन्होने हिन्दी के प्रचार-प्रसार के आंदोलन में जितना सक्रिय योगदान दिया, उतना शायद दक्षिण भारत में किसी और व्यक्ति ने नहीं दिया होगा। इन्होने हिन्दी के लिए अनेक पदों पर कार्य करते हुए जीवन भर अपनी सेवाएँ हिन्दी को दिया। वे महात्मा गांधी के बहुत ही विश्वसनीय थे। उन्होंने दक्षिण के साहित्य पर अनेक लेख लिखकर हिन्दी पाठकों को दक्षिण के साहित्य से परिचित कराया। उनके संपादन में ‘हिन्दी विश्व कोश’ दस भागों में निकला था।

नादेल्ला पुरुषोत्तम: श्री नादेल्ला पुरुषोत्तम कवि का जन्म 1863 ई० में कृष्णा जिले के सितारामपुरी नामक गाँव में हुआ था। इन्होने 32 नाटक लिखे। कवि नादेल्ला पुरुषोत्तम ने सिमतिनी चरित्र, भद्रायूरभ्युदय, किर्तिमालिनी प्रदान, अपूर्व दांपत्य, अहल्या संक्रदनीम, रामदास चरित्र आदि नाटक हिन्दी में लिखकर हिन्दी भाषा और साहित्य में अपना योगदान दिया।

कर्णवीर नागेश्वर राव: कर्णवीर नागेश्वर राव को हिन्दी और संस्कृत के उच्चकोटि का रचयिता माना जाता है। ‘साहित्य-सौरभ’ उनके मौलिक निबंधों का संकलन है, जिसमे उन्होंने कुछ आलोचनात्मक और कुछ व्यावहारिक निबंध लिखे हैं। ‘कथामंजारी’ उनकी मौलिक कहानियों का संकलन है। उन्होंने समकालीनता परिस्थितियों, बाह्यडंबारों एवं ढ़ोंगी-पाखंडी गुरुओं पर व्यंग्य के माध्यम से प्रहार किया। कर्णवीर राव जी ने ‘दलितों की विनती’ शीर्षक नाम से एक ग्रंथ ‘सतसई’ दोहा छंद में लिखा।

सी बालकृष्ण राव: श्री बालकृष्ण राव हिन्दी के प्रमुख कवि हुए जिन्होंने ‘कौमुदी’, ‘आभास’, ‘कवि और छवि’, ‘रात बीती’, ‘हमारी राह’, तथा ‘अर्द्धरात्रि’ जैसे ग्रंथों के रचयिता तथा तेलुगु राष्ट्र के ख्यातिप्राप्त हिन्दी कवि हैं। उन्होंने महाकवि सुमित्रानंदन पंत तथा डॉ नगेन्द्र के साथ मिलकर ‘कवि भारती’ शीर्षक से ‘बृहत् काव्य संकलन’ और ‘हिन्दी काव्य संग्रह’ का संपादन किया।

श्री वाराणसी राममूर्ति रेणु: श्री वाराणसी राममूर्ति रेणु जी तेलुगु भाषी होते हुए भी हिन्दी के उच्चकोटि के कवि, लेखक और अनुवादक थे। रेणु गुंटूर जिले के निवासी थे। इन्होने काशी विश्वविद्यालय से हिन्दी में प्रथम श्रेणी से एम० ए० की उपाधि प्राप्त किया। इन्होने हैदराबाद के आकाशवाणी विभाग में अपनी सेवाएँ दी। इनकी प्रमुख रचनाएँ हैं- गीत विरह (काव्य संकलन), आदान-प्रदान (आलोचना)। इन्होने आंध्र के कबीर श्री वेमना के व्यक्तित्व और कृतित्व की समीक्षा प्रस्तुत की है। तेलुगु के महान कवि जाषुआ द्वारा रचित ‘गब्बिल’ काव्य का ‘चमगादड़’ नाम से अनुवाद किया है।

अल्लूरि बैरागी: अल्लूरि बैरागी का जन्म 1924 में गुंटूरु जिले के तेनाली शहर के एक प्रतिष्ठित किसान परिवार में हुआ था। इन्होने हिन्दी के प्रचार-प्रसार के लिए महत्वपूर्ण योगदान दिया। इन्होने ‘चंदामामा’ के संपादकीय विभाग में दो वर्षों तक कार्य किया। 1951 ई० में इन्होने ‘पलायन’ जैसी रचना लिखकर हिन्दी साहित्य जगत में खलबली मचा दिया था। इन्होने पन्त और दिनकर जी के अनेक कविताओं का अनुवाद किया। इन्होने तेलुगु की आधुनिक कविताओं का आधुनिक तेलुगु कविता के नाम से अनुवाद किया जिसमे लगभग 15 कविताएँ शामिल हैं।

जंध्याल शिवन्न शास्त्री: शास्त्रीजी हिन्दी के मूर्धन्य व ‘सरस्वती’ पत्रिका के संपादक महावीर प्रसाद दिवेदी के समकालीन थे। इन्होने सरस्वती पत्रिका में अनेक लेख लिखे। खड़ी बोली के स्वरुप को सँवारने में शास्त्री जी का सहयोग महावीर प्रसाद दीवेदी जी को हमेशा मिलता रहता था। जंध्याल शिवन्न शास्त्री जी ने सर्वप्रथम तेलुगु-हिन्दी-कोश तथा व्याकरण आदि की रचना की। ‘कालिदास’ और ‘भवभूति’ नामक समालोचना एवं दुर्गादास नाटक को शास्त्री जी ने तेलुगु में अनुदित कर आंध्र के लोगों को आकर्षित किया।

ओरगंटि वेंकटेश्वर शर्मा: इन्होने ‘फ्रायड के चित्त विकलन’ तथा ‘भारतीय योग शास्त्रों के समन्वय’ पर बड़ा विद्वतापूर्ण शोध-प्रबंध लिखकर काशी विद्यापीठ से 1929 में शास्त्री की उपाधि प्राप्त की। पाल और ब्रंटन के अंग्रेजी ग्रंथ का ‘गुप्त भारत की खोज’ नाम से हिन्दी में अनुवाद किया। ‘हिन्दी तेलुगु-कोश’ तथा ‘महर्षि रमणा की जीवनी’ ग्रंथों में शर्मा जी ने अपनी शोध परक दृष्टि का परिचय दिया।

लाजपति पिंगल: लाजपति पिंगल की खड़ीबोली में प्रथम काव्य ग्रंथ रचयिता के रूप में प्रसिद्धी प्राप्त है। वे कृष्णा जिले के निवासी थे। उन्होंने अनेक वर्षों तक हिन्दी अध्ययन का कार्य किया और सनˎ 1929 ई० में ‘भक्त रामदास’ नामक प्रबंध काव्य का प्रणयन (पुरा करना) पहले ब्रजभाषा में उसके बाद खड़ी बोली में किया।

चोडवरपु रामशेषय्या: चोडवरपु रामशेषय्या आंध्र प्रदेश के प्रसिद्ध नाटककार थे। इन्होने अधिकतर पौराणिक और ऐतिहासिक नाटक लिखे है ‘सती कणणकी, इनका पौराणिक नाटक है। बोब्बिली, गृहिणी, मंत्री रामय्या, रानी मल्लम्मा उनके प्रसिद्ध नाटक है।

बोदराजु वेंकट सुब्बाराव: बोदराजु वेंकट सुब्बाराव का जन्म 1914 ई० में गुंटूरु जिले के स्वर्ण गाँव के एक संपन्न परिवार में हुआ था। बोदराजु वेंकट सुब्बाराव जी ने ‘प्रणय’ और ‘मृणालिनी’ नामक दो खण्ड-काव्यों की रचना किया है। उनके दो काव्य-संग्रह ‘रेशमी कुरता’ और ‘भारती श्री’ प्रकाशित हुए है। इन दो काव्य ग्रंथों में कवि ने भारत की नवीन सभ्यता पर बड़ा ही व्यंग्यात्मक प्रहार किया है।

प्रोफेसर जी शंकर रेड्डी: प्रोफेसर जी शंकर रेड्डी जी का जन्म आंध्र प्रदेश के नेल्लूर जिले के बत्तुलपल्लि गाँव के एक प्रतिष्ठित रेड्डी परिवार में हुआ था। वे आंध्र विश्वविद्यालय में हिन्दी विभाग के आचार्य और अध्यक्ष थे। इन्होने विभिन्न विषयों पर 12 ग्रंथों की रचना की है। वे एक सफल निबंधकार, आलोचक, एवं चिंतक थे। ‘साहित्य और समाज’ ‘मेरे विचार और वैचारिकी’ इनके निबंध संग्रह हैं। इनके द्वारा रचित ‘हिन्दी और तेलुगु: एक तुलनात्मक अध्ययन’ ग्रंथ है जो पूरे दक्षिण भारत में तुलनात्मक क्षेत्र का पहला ग्रंथ है। इस ग्रंथ में हिन्दी और तेलुगु भाषा के विशिष्ट विधाओं के साथ-साथ दोनों साहित्यों के प्रमुख कवियों का तुलनात्मक मूल्यांकन भी प्रस्तुत किया गया है। ‘दक्षिण की भाषाएँ और उनका साहित्य’ रेड्डी जी का एक ऐसा आलोचनात्मक ग्रंथ है जिसमें दक्षिण की चार भाषाओं के साहित्यों की संक्षिप्त आलोचना प्रस्तुत है। ‘शोध और बोध’ इनकी अनुसंधानात्मक तथा आलोचनात्मक लेखों का संकलन है। इसमें शोध और तुलनात्मक शोध का गंभीर विवेचन किया गया है। इन्होने हिन्दी तथा द्रविड़ भाषाओं के समानरूपी समभिन्नार्थी शब्द ग्रंथ भी प्रकाशित किया।

डॉ चलसानि सुब्बाराव: इन्होने सागर विश्वविद्यालय से पी० एच० डी० की उपाधि प्राप्त किए। कई वर्षों तक वे हिन्दी के प्रचार-प्रसार के कार्यो में सक्रिय रहे। ‘रानी रुद्र्म्मा’ इनकी मौलिक नाटक है। ‘हिन्दी और तेलुगु के स्वतंत्रता पूर्व ऐतिहासिक उपन्यासों का तुलनात्मक अध्ययन’ उनके शोध-प्रबंध का प्रकाशित रूप है।

दंडमूडि वेंकट कृष्णाराव: कृष्णाराव जी का हिन्दी गद्य शैली पर अच्छा अधिकार रहा है। उन्हें अच्छे निबंधकार, लेखक और कथाकार के रूप में जाना जाता है। ‘तेलुगु के तीन महान कवि’ तथा ‘साहित्य कला’ इनका समीक्षात्मक ग्रंथ है। ‘शककर्ता शालिवाहन’ इनका एक लघु ऐतिहासिक उपन्यास है। ‘चित्रांगी’ भारतीय इतिहास की पाँच रानियों (चित्रांगी, रूद्रम्मादेवी, संयुक्ता, पद्मिनी और नूरजहाँ) की जीवनी पर आधारित यह अत्यंत प्रभावी कहानी संकलन है।

वेमूरि आंजनेय शर्मा: वेमूरि आंजनेय शर्मा एक अच्छे अनुवादक हैं। इन्होने ‘दक्षिण की कहानियाँ’ और ‘मुनिमाणिक्यमˎ की कहानियाँ’ शीर्षक नाम से दो ग्रंथों का हिन्दी में अनुवाद किया है। इन्होने ‘ग्यारह सपनों का देश’, ‘छिंर्गलिंग’ तथा ‘सूरज का सातवाँ घोडा’ आदि का तेलुगु में अनुवाद किया।

कामाक्षीराव: श्री कामाक्षीराव हिन्दी एवं तेलुगु के प्रकांड विद्वान हैं। वे श्रेष्ठ आलोचक, अनुवादक, निबंधकार और द्वीभाषी कोशकार हैं। इन्होने तेलुगु के प्रसिद्ध महाकाव्य रंगनाथ रामायण का हिन्दी में सुंदर गद्यानुवाद प्रस्तुत किया है। इन्होने डॉ हजारी प्रसाद द्विवेदी के प्रसिद्ध ऐतिहासिक उपन्यास ‘बाणभट्ट’ की आत्मकथा का तेलुगु में अनुवाद किया है।

श्री दुर्गानंद: इन्होने बचपन से ही तेलुगु और हिन्दी का विधिवत् अध्ययन आरम्भ किया था। श्री दुर्गानंद कवि, अनुवादक एवं समीक्षक हैं। इन्होने ‘वीर बालक’ शीर्षक नाम की एक खण्ड काव्य की रचना किया। इन्होने तेलुगु के प्रसिद्ध कवि गुर्रम जाषुवा के खण्ड काव्य ‘फिरदौसी’ का हिन्दी में सफलता पूर्वक रूपांतरण किया।

डॉ आई पांडुरंगाराव जी: ये हिन्दी और तेलुगु के उच्चकोटि के कवि आलोचक, एवं अनुवादक थे। ‘आंध्र हिन्दी एकक’ इनका शोध प्रबंध है, जिसमे इन्होने तेलुगु और हिन्दी नाटक साहित्य का तुलनात्मक अध्ययन प्रस्तुत किया है। इन्होने मुप्पाल्ल रंगनायकम्मा के तेलुगु उपन्यास ‘पेक मेडलु’ का सफल हिन्दी अनुवाद ‘ताश के महल’ के नाम से किया है। बाद में डॉ आई पांडुरंगाराव जी ने बलिवाड कांताराव के ‘इदे नरकम, इदे स्वर्गम’ शीर्षक से तेलुगु उपन्यास का हिन्दी अनुवाद ‘गिरा अनयन नयन बिनु बानी’ के नाम से किया। इन्होने श्री कामाक्षी विलास नामक काव्य लिखा। जयशंकर प्रसाद के ‘आँसू’ का तेलुगु पद्दानुवाद ‘कन्नीरु शीर्षक नाम से किया। सुमित्रानंन्दन पंत की प्रसिद्ध कृति ‘चिदंबरा’ तथा जयशंकर प्रसाद का महाकाव्य ‘कामायनी’ का तेलुगु में सफल अनुवाद किया है वैसे ही भगवतीचरण वर्मा के ‘भूले बिसरे चित्र’, उपन्यास का तेलुगु में अनुवाद ‘स्मृति रेखलु’ नाम से किया। डॉ पांडुरंगाराव जी ने भक्तकवि त्यागराज के गीतों का हिन्दी गद्यानुवाद कर उसकी सारगर्भित आलोचनातमक भूमिका भी लिखी है।

आरिगपुडि रमेश चौधरी- आरिगपुडिच रमेश चौधरी हिन्दी के मूर्धन्य रचनाकार थे। वे दक्षिण भारतीय हिन्दी रचनाकार थे। उन्होंने उपन्यास, कहानी, नाटक, कविता आदि लिखकर दक्षिण की हिन्दी परंपरा को समृद्ध किया और अखिल भारतीय स्तर पर अपनी पहचान बनाई। वे दक्षिण भारत हिन्दी प्रचार सभा से प्रकाशित होने वाली मासिक पत्रिका ‘दक्षिण भारत’ के संपादक भी रहे थे। ‘चंदामामा’ बाल पत्रिका के उन्नति में उनका सराहनीय योगदान था। लगभग उनकी 35 रचनाएँ है।इनकी सभी रचनाओं में दक्षिण भारत के विभिन्न अंचलों के जनजीवन के दर्शन होते है।

अतः हम कह सकते है कि आरिगपुड रमेश चौधरी जी ने साहित्य में उत्तर से लेकर दक्षिण के बीच में साहित्य सेतु का निर्माण किया।    

सन्दर्भ ग्रन्थ :

  1. राजमणि शर्मा ने अपनी पुस्तक ‘हिन्दी भाषा: इतिहास और स्वरुप’
  2. आरिगपुडिः व्यक्तित्व और रचनाकार, डॉ अनीता- पृ०-19
  3. अंतर भारती, सुंदर रेड्डी- पृष्ठ सं० 15
  4. आंध्र में हिन्दी लेखन की परंपरा, डॉ भीमसेन निर्मल- पृष्ठ सं० 76
  5. विकिपीडिया     

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