विषय: आत्मनिर्भर भारत ‘अवसर और चुनौतियाँ’

“जहाँ डाल-डाल पर सोने की चिड़िया करती है बसेरा वो भारत देश है मेरा” राजेन्द्र कृष्ण जी का लिखा हुआ यह गीत सुनकर हमें लगता है कि आखिर भारत को किसकी नजर लग गई। इस ‘सोने की चिड़िया’ की जगह अब प्लास्टिक की चिड़िया पेड़ों को शोभायमान करने लगी है।

यह सत्य है कि भारत ‘विश्व गुरु’ था और भारत को ‘सोने की चिड़िया’ कहा जाता था। इतिहास गवाह है। उज्जैन के राजा विक्रमदित्य जिन्हें ज्ञान, न्याय, धर्म, वीरता और उदारता के लिए जाना जाता था। उन्होंने ही भारत को ‘सोने की चिड़िया’ का खिताब दिया था। विक्रमादित्य दो शब्दों से मिलकर बना हैं- ‘विक्रम’ और ‘आदित्य’ जिसका अर्थ होता है, सूर्य के सामान पराक्रमी। राजा विक्रमदित्य ने अपने नाम को सार्थक बनाया था। उज्जैन के महाराज विक्रमादित्य के समय से ही राजदरबारों में नवरत्नों की परंपरा की शुरुआत हुई थी। नवरत्न यानी नौ ऐसे विद्वान जो अपने-अपने क्षेत्र के महाज्ञानी हों। ये सभी नवरत्न महाज्ञानी थे- धन्वंतरि, क्षपणक, अमरसिंह, शंकु, घटखर्पर, कालिदास, वेतालभट्ट, वररुचि और वराहमिहिर।

राजा का कर्तव्य सिर्फ धर्म की रक्षा करना ही नहीं होता बल्कि अपनी प्रजा की रक्षा तथा उनकी आर्थिक स्थिति का ख्याल रखना भी राजा की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी होती है। विक्रमादित्य के राज में भारत का कपड़ा विदेशी व्यापारी सोने के वजन से खरीदते थे। उस वक्त भारत में सोने के सिक्कों का भी चलन था। भारत में विदेशी व्यापारी कई चीजों का व्यापार करते थे। इसके बदले में वे सोना देते थे। जिससे भारत में सोना अत्यधिक मात्रा में हो गया था। पद्मनाभस्वामी मंदिर में हजारो टन सोना मिला। इसके आलावा कोहिनूर, मोर सिंहासन, हीरे जवाहरातों में जड़े हुए महल की वस्तुएँ। इससे यह अंदाजा लगाया जा सकता है कि उस वक्त भारत कितना समृद्ध था। मन्दिरों की समृधि के कारण ही सोमनाथ पर कई बार आक्रमण हुए और मन्दिर को तोड़ कर सैकड़ो टन सोना आक्रमणकारी देश से बाहर ले गए।

प्रख्यात अर्थशास्त्री प्रो० अंगस मेडिसन ने अपने ग्रंथ ‘द हिस्ट्री ऑफ वर्ल्ड इकोनॉमिक्’ में विश्व के व्यापार की परिस्थिति भिन्न-भिन्न कालखंडों में किया था। उन्होंने इसका प्रत्यक्ष प्रमाणों के साथ वर्णन किया है। उनके अनुसार आज से करीब 2000 वर्ष पूर्व अथार्त पहली शताब्दी में विश्व व्यापार में भारत का हिस्सा 32 प्रतिशत था जो वर्ष 1000 में अथार्त ग्यारहवीं शाताब्दी के प्रारम्भ में 28 प्रतिशत था। उन दिनों भारत विश्व का सबसे बड़ा निर्यातक देश था जाहिर है भारतीय व्यापारी कपड़े, मसाले, रेशम आदि माल जहाजो में लाद कर विश्व के कोने-कोने में ले जाते थे।

भारत में समुंद्री जहाज से किये हुए प्रवास को ‘नौकायन’ या ‘प्राचीन काल का ‘नवगति’ कहा जाता था। ‘नवगति’ यह संस्कृत का शब्द है। ‘नवगति’ का अर्थ होता है ‘समुंद्री यात्रा करना’। इसी शब्द के आधार पर अंग्रेजी समानार्थी शब्द ‘नेविगेशन’ बना है। प्राचीन समय में भारत का नौकायन शास्त्र अत्यंत उन्नत अवस्था में था। इसके अनेक प्रमाण मिलते हैं। हमारे सबसे प्राचीन ग्रंथ ऋग्वेद में भारतियों के द्वारा समुंद्री यात्रा किये जाने के अनेक उल्लेख मिलते हैं। ऋग्वेद में वरुण को समुंद्र का देवता कहा गया है। ऋग्वेद में सूक्त कहते हैं कि जहाज़ों के द्वारा प्रयोग किया जाने वाले महासागरीय मार्गों का वरुण को ज्ञान था। ऋग्वेद में इस बात का भी उल्लेख मिलता है कि व्यापार और धन की खोज में व्यापारी महासागर के रास्ते दूसरे देशों में जाया करते थे।

पहली शताब्दी में वर्ष 23 से 79 के बीच, ‘गेअस प्लिनस सिकंदस’ जिसे ‘प्लिनी द एल्डर’ कहा जाता था, उसने भारत के विषय में बहुत लिखा है। उन्होंने अपने मृत्यु से दो वर्ष पहले भारत के रोमन साम्राज्य के साथ होने वाले व्यापार के बारे में विस्तृत रूप में लिख रखा है। ‘प्लिनी द एल्डर’ ने भारत से जिन वस्तुओं का निर्यात रोमन साम्राज्य को होता था, उसकी सूचि भी दिया था। ‘प्लिनी द एल्डर’ रोमन साम्राज्य के नौसेना में काम करता था। इसी के आधार पर उसने भारतीय जहाज़ों की भव्यता के बारे में भी लिखा है। भारत का विश्व व्यापार में हिस्सेदारी तब चरम पर थी।

पहली शताब्दी में एक ग्रीक नाविक ने अपनी डायरी में लिखा था, जो ‘पेरिप्लस ऑफ ईरिथ्रायीयन सी’ (Periplus of tha Erythraean Sea) नाम से प्रसिद्ध है। यह डायरी 40 से 50 के बीच लिखी गई थी। इस डायरी में उन्होंने कराची के पास सिंधु मुहाने से लेकर सुदूर पूर्व के कोलकाता के पास गंगा के मुहाने तक की सभी प्रमुख बंदरगाहों की सूची है। भड़ोच (भरूच) का उन दिनों के शहरों से व्यापार होता था। इसमें उज्जैन, पैठन आदि समृद्ध शहरों का भी उल्लेख मिलता है।

चन्द्रगुप्त मौर्य के कालखंड (321 से 298 ई०पु०) में भारत के जहाज विश्वप्रसिद्ध थे। इसके इन जहाजों के द्वारा विश्व भर में व्यापार होता था। इस बारे में कई ताम्रपत्र और शिलालेख प्राप्त हुए है। कुषाणकाल एवं हर्षवर्धन काल में भी समुद्री व्यापार की समृद्ध परंपरा का उल्लेख मिलता है। मुंबई में जिसे हम आज ‘नालासोपारा’ के नाम से जानते है। वहाँ लगभग हजार डेढ़ हजार वर्ष पूर्व ‘शुर्पाकर’ नाम का वैभवशाली बंदरगाह था। इस स्थान पर भारत के जहाज़ों के अलावा अनेक देशों के जहाज व्यापार करने आते थे। इसी प्रकार दाभोल, सूरत और फिर आगे चलकर विजयनगर साम्राज्य स्थापित होने के बाद दक्षिण भारत के अनेक विशाल और सुन्दर बंदरगाह का निर्माण किया गया तथा पूर्व और पश्चिम दोनों दिशाओं में व्यापार आरम्भ शुरू हुआ। जावा, सुमात्रा, मलय, सभी तत्कालीन देश जो वर्तमान में इंडोनेशिया, मलेशिया, सिंगापुर, कम्बोडिया आदि इन सभी देशों पर हिंदू संस्कृति की छाप आज भी दिखाई पड़ती है। आज से लगभग दो ढाई सौ वर्ष पहले दक्षिण भारत के हिंदू राजा इन प्रदेशों में गए थे। जाहिर है कि ये सब समुंद्री मार्ग से ही गए होंगे। तब ‘जहाजों’ का निर्माण करने वाला देश भारत की एक पहचान थी। यह उन्नीसवी शताब्दी के मध्य तक चलता रहा। भारत के समृद्ध नौकायन उद्योग को अंग्रेजों ने नष्ट कर दिया था।

भारत हमेशा से कृषि प्रधान देश रहा है। हमेशा खेतों में लागत से अधिक अनाज होते थे। इसके अलावा भारत में अनेकों प्रकार के खानिजों के खादान हैं। जिनसे कई प्रकार की वस्तुएँ हमारे देश में तैयार किये जाते थे। अंग्रेजों के भारत आगमन के पहले से भारतीय कुटीर उधोग विश्वभर में प्रसिद्ध था। भारत में सूत कातना और बुनना प्राचीन समय से ही घरेलु व्यवसाय था। भारत शताब्दियों से सुंदर और महीन सूती कपड़ों के लिए विश्व प्रसिद्ध था। यह निर्यात की जाने वाली सबसे महत्वपूर्ण वस्तु थी। संपूर्ण भारत में इसके उत्पादन केन्द्र फैले हुए थे। ढ़ाका जो अखण्ड भारत का एक अंग था, मलमल के कपड़े  के लिए विश्व भर में प्रसिद्ध था। विश्व भर में ढ़ाका के मलमल के कपड़े का व्यापार होता था

1616 ई० से 1619 ई० के समय का वर्णन करते हुए टेरी ने लिखा था- “रंग और छपाई का काम भी भारत में सर्वश्रेष्ठ था। रंगाई के लिए पक्के रंगों का प्रयोग किया जाता था। सुंदर चित्र और बेल-बूटे बनाये जाते थे। यद्यपि सूती कपड़े की तुलना में रेशमी कपड़े की बुनाई का काम कम होता था। यहाँ का यह महत्वपूर्ण हस्तकला उद्योग था।” मुगलकाल में कालीन, शौल, काष्ठ, चमड़ा, स्वर्ण, हाथी दांत की वस्तुएँ विश्व प्रसिद्ध थे। 17वीं और 18वीं शताब्दी में, अंग्रेजों के भारत में आने के पहले भारत विश्व का प्रमुख औद्योगिक केन्द्र था। बर्नियर नाम के एक फ्रांसीसी यात्री ने लिखा है- “भारत को छोड़कर कोई भी ऐसा देश नहीं था, जहाँ विभन्न प्रकार की वस्तुएँ पाई जाती हो।” बर्नियर एक बहुत बड़े कमरे का विवरण देते हुए लिखते हैं – “एक बड़े कमरे में निपुण कार्यकर्ता के निरीक्षण में कढ़ाई करने वाला व्यस्त है, दूसरे में सुनार, तीसरे में चित्रकार, चौथे में वार्निश करनेवाला, पाँचवे में बढ़ई, दरजी तथा मोची, छ्ठे मे रेशम और जरी का कार्य करने वाला। शिल्पी प्रतिदिन प्रातः काल अपने काम के लिए आते हैं। दिन भर काम में व्यस्त रहते हैं और शाम के समय अपने घर चले जाते हैं।” इन विदेशी यात्रियों के यात्रा वर्णन से इस तथ्य की पुष्टि होती है कि 18वीं शदी तक तो भारत में कुटीर उद्योग उन्नत अवस्था में थी। जिससे भारत की आर्थिक स्थिति अन्य देशों की तुलना में बहुत अच्छी थी। “कुटीर अद्योग वे उद्योग हैं जिनका एक ही परिवार के सदस्यों के द्वारा पूर्ण रूप से अथवा आंशिक रूप से संचालन किया जाता है।”

प्रो० काले ने कुटीर उद्योग की परिभाषा देते हुए कहा है- “कुटीर उद्योग इस प्रकार के संगठन को कहते हैं। जिसके अंतर्गत स्वतन्त्र उत्पादनकर्ता अपनी पूँजी लगाता है और अपने श्रम के कुल उत्पादन का स्वयं अधिकारी होता है।” कुटीर उद्योग को दो भागों में बाँटा गया है- ग्रामीण कुटीर उद्योग और नगरीय कुटीर उद्योग। भारत गाँवों का देश है। भारत के 70-80 प्रतिशत लोग गाँवों में ही निवास करते हैं। अंग्रेजों के आने से पहले भारत आत्मनिर्भर था। हमारे गाँवों के लोग अपनी जरूरतों के सामान तथा अपने आस-पास के लोगों के भी जरूरतों का सामान घर में ही पैदा कर लेते थे। अदला-बदली व्यवस्था के तहत समाज में सभी अपने खान-पान, कपड़े-लत्ते एवं अन्य जरूरतों के संसाधन प्राप्त कर लेते थे। मध्यकाल में भारतीय समाज जरुरत से अत्यधिक उत्पादन करने लगा था। उस समय तक कागज़ के मुद्रा का चलन नहीं था। उस समय दमड़ी, सोना, चांदी, ताँबे आदि की मुद्राएँ प्रचलन में थी। अभिजात्य समाज में मुद्रा का चलन अधिक था।

अंग्रेजों के आने के पहले से व्यवसायी वर्ग, दस्तकार समुदाय, कृषक आदि आत्मनिर्भर थे। स्थानीय ब्रांडिंग की अपील जिस तरह आज के समय में हमारे प्रधान मंत्री मोदी जी कर रहे हैं, वह सब 19वीं शताब्दी के पहले भारत में मौजूद थी। बनारस की साड़ी, ढाका का मलमल, बिजनौर का इत्र, मदनपुर की साड़ी ये सब स्थानीय उत्पादकों के ब्रांड थे। अंग्रेजों के आने के बाद भारत के विकास की प्रक्रिया और लोगों की आत्मनिर्भरता धीरे-धीरे छिन गया। भारतीय ब्रांडों को यहाँ के लोकगीतों में भी स्थान प्राप्त था। जैसे- बरेली का झुमका, झाँसी की झुलनी, आगरा का चाक़ू, कैंची आदि। आज भी स्थानीय ब्रांडों की स्मृतियाँ यहाँ के लोकस्मृति में समाई हुई है। उन्होंने हमारी कृषि, खान-पान आदि के तरीकों को बदल दिया। जिसके फलस्वरूप हमारे कुटीर उद्योग धीरे-धीरे समाप्त होने लगे और हम दूसरे देशों पर निर्भर होने लगे। सबसे पहले अंग्रेजों ने भारत के लोगों का आत्मविश्वास तोड़कर देश को कच्चे माल का उत्पादक मात्र बना दिया। उनलोगों ने अपनी संस्कृति को उत्कृष्ट और हमारी भारतीय संस्कृति को और हमारे ज्ञान को हीन बताकर हमारा आत्मविश्वास छीन लिया। उन्होंने अपनी पश्चिमी आधुनिकता के अस्त्र से हमारे देश के आधुनिकता का बध कर दिया। इस लड़ाई में उपनिवेशवादी साम्राज्य ने अपने सैनिक और अन्य संसाधन झोक दिए। हमारे समाज और संस्कृति का विऔधोगिकरण कर हमें मात्र कच्चा माल का उत्पादक बना दिया। अंग्रेजों ने पश्चिमी आधुनिकता को पश्चिमी शिक्षा से लैस कर दिया। ये अंग्रेज चूहे बनकर हमारे मांद में घूसे और हमें ही कुतरना शुरू कर दिए। हमारी आत्मनिर्भरता को हराने के लिए इन्होने औपनिवेशिक अकादमिक विमर्श रचा। इसने हमें वायरस की तरह संक्रमित करके कमजोर कर दिया। इस औपनिवेशिक वायरस के कारण हम अपने उत्पादन और ज्ञान को हीन मानने लगे और आयातित सामान एवं विचारों पर जीने के आदि हो गए। इस तरह हम अपनी भाषा, देश के विचार एवं देशी ज्ञान के परम्परा से दूर होते गए। हालांकि जब हमें इस बात का अनुभव हुआ कि वे हमारे साथ छल कर रहे हैं तब इसी अनुभव ने हमें उस पूरे औपनिवेशिक हस्तक्षेप के विरुद्ध लड़ाई की चेतना पैदा किया।

ग्रामीण उद्योगों का वर्गीकरण:      

डॉ० राधाकमल मुखर्जी ने अंग्रेजों के भारत में आने से पहले के भारतीय उद्योगों को इस प्रकार वर्गीकृत किया है:

घरेलू आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए ग्रामीण उद्योग खेती के बाद अवकाश के समय में चलते थे। इसमें स्थानीय सामग्री जैसे- सरकंडे, घास, मिट्टी, ऊँन, सूत आदि का प्रयोग किया जाता था। कृषि उपकरण पर आधारित ग्रामीण उद्योग गाँव के आत्मनिर्भर समाज की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए लुहार, बढ़ई, कुम्हार आदि बराबर काम में लगे रहते थे।

कलात्मक ग्रामीण उद्योग के अंतर्गत गांवों के वे कलात्मक उद्योग थे जो उच्च कोटि के ग्रामीण कला के प्रतीक थे। जिनकी माँग समुंद्र पार के देशों में थी जो आज भी है। नगरीय उद्योग में इनका संगठन उच्च कोटि का था। इनमे से कुछ उद्योग आज भी जीवित हैं। जैसे कश्मीरी शौल उद्योग और उत्तरी भारत का फुलकारी उद्योग आदि।

ग्रामीण उद्योग की विशेषताएँ:

कच्चे माल का आसानी से प्राप्त होना, तैयार माल का खपत होना, मूलभूत वस्तुओं का निर्माण करना, वस्तु-विनिमय प्रणाली की उपलब्धता आदि।

नगरीय उद्योग की विशेषताएँ: ग्रामीण उद्योगों के साथ-साथ नगरीय उद्योग भी विद्यमान थे। ग्रामीण उद्योगों के द्वारा जहाँ गाँव की सीमित आवश्यकताओं की पूर्ति होती थी। वही नगरीय उद्योग कुलीन सामंत एवं धनी व्यापरी वर्ग के लिए उपयोग तथा विलासिता की वस्तुओं का उत्पादन करते थे। नगरीय उद्योगों का बाजार अत्यंत सीमित था।

नगरीय उद्योग तीन भागों में विभाजित थे:

  • समस्त उद्योगों का बहुत बड़ा हिस्सा भारत और विदेशों के कुलीन और संपन्न लोगों के लिए उत्पादन करता था।
  • वे उद्योग जो राज्य और सार्वजनिक संस्थाओं की आवश्यकताओं की पूर्ति करते थे।
  • तीसरा वे उद्योग थे, जिनमे लोहा गलाने और चूड़ी बनाने वाले काम किये जाते थे।

इस तरह के उद्योग में काम करने वाले दो प्रकार के व्यक्ति थे। एक स्वतंत्र रूप से काम करने वाले और दूसरा राज्य या व्यापारिक प्रतिष्ठानों में नौकरी करने वाला। बड़े नगरों में प्रत्येक उद्योग एक संघ में संगठित था। प्रत्येक उद्योग का एक मुखिया होता था। वह श्रम तथा उत्पादन का मूल्य निर्धारित करता था। अनुभवी शिल्पकार नये शिल्पकारों को प्रशिक्षिण देते थे। यह वंशानुगत व्यवसाय था। शिल्पकार एक विशेष जाती का व्यक्ति होता था। इसलिए शिल्प संघ जातीय सत्ता से नियंत्रित होते थे। ईस्ट इण्डिया कंपनी एक व्यापारिक संस्था थी। जिसका मुख्य उद्देश्य भारत के माल और उत्पादनों के व्यापार पर एकाधिकार स्थापित करके लाभ अर्जित करना था।

कम्पनी को भारतीय उद्योगों के साथ काम करने में अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ता था। कंपनी भारत में तैयार माल के बदले में सोना-चांदी के अतिरिक्त कुछ और नहीं दे सकती थी क्योंकि ब्रिटेन में ऐसा कुछ भी नहीं बनता था या पैदा होता था जिसे भारतीय सामग्री के बदले में दिया जा सके। भारतीय कपड़े को इंग्लैंड में ले जाकर बेचने से कंपनी को बहुत लाभ हुआ किन्तु इंग्लैंड के कपड़ा उद्योग के लिए संकट उत्पन्न हो गया। ‘रॉबिन्सन क्रूसो नामक’ उपन्यास के लेखक डैफी ने लिखा है- “भारतीय कपड़ा हमारे घरों आलमारियों और सोने के कमरों में घुस गया है। पर्दे, गद्दे, कुर्सियों और बिस्तर के रूप में और कुछ नहीं सिर्फ भारतीय सामान है।”

जब इंग्लैंड में फ़्रांस से होने वाले आयात पर रोक लगा दिया गया तब कंपनी के द्वारा भारत से किये जाने वाले आयात में भारतीय सूती कपड़े का स्थान सबसे ऊपर हो गया। सूति कपड़े के आयात में वृद्धि होने से इंग्लैंड में कंपनी के विरुद्ध विरोध भड़क गया। इस विरोध के दो कारण थे। भारत से किये जाने वाले व्यापार के कारण इंग्लैंड का सोना-चांदी भारत में आ रहा था और दूसरे इंग्लैड के नये रेशमी वस्त्र उद्योग के लिए बड़ा खतरा उत्पन्न हो गया था। इस कारण 1700 में एक कानून बनाया गया कि फ़्रांस चीन या ईस्टइंडीज में बने रेशम, बंगाल के रेशम या रेशमी कपड़े उक्त देशों में रंगे गए कपड़े ब्रिटिश शासन के क्षेत्र में ना तो पहने जा सकेंगे और न ही किसी और प्रकार के काम में लाए जायेंगे। इस प्रतिबन्ध के बाद भी इंग्लैंड में भारत के सूती कपड़े का आयात बंद नहीं हो सका। 1702 में सादे सूती कपड़े पर इंग्लैंड में भारी आयात शुल्क लगा दिया गया। इसके बाद भी वहाँ भारतीय सूती कपड़े का आयात बढ़ता ही गया। भारतीय कपड़े की श्रेष्ठता के कारण 1750 के बाद भी भारत से अधिक मात्रा में सूती कपड़ा मँगवाया गया। 1760 में एक अंग्रेजी महिला पर 200 पौंड का जुर्माना केवल इसलिए लगाया कि उसके पास एक विदेशी रुमाल था।

ईस्ट इण्डिया कंपनी की दमनकरी नीतियों के कारण अंग्रेजों ने भारत से आयत-निर्यात के व्यापार में अपना पक्ष मजबूत रखने के लिए न्यूनतम मूल्य पर अधिक से अधिक माल खरीदने और इस कार्य के लिए सैनिक बल का प्रयोग करने की नीति बनाई। कंपनी के अधिकारी तथा उसके प्रतिनिधि भारतीय जुलाहों को एक निश्चित समय में निश्चित प्रकार का कपड़ा तैयार करने के लिए विवश करते थे और अपनी इच्छानुसार बहुत ही कम मूल्य देते थे। जुलाहों के आनाकानी करने पर उनके अँगूठे तक काट दिया जाता था। इस कारण कपड़े उद्योग में काम करने वाले हजारों मजदूर परिवार बंगाल छोड़कर भाग गए। यही स्थिति अन्य उद्योगों के कामगारों के साथ भी होता था। 1772 में बंगाल के नवाब ने कम्पनी के अधिकारियों से कम्पनी के एजेंटों की शिकायत किया- “कम्पनी के एजेंट रैयतों, किसानों व्यापारियों आदि से जबरदस्ती एक चौथाई कीमत देकर उनके माल और उत्पादन हड़प लेते थे और किसानों को मार-पीटकर तथा उनका दमन करके अपनी एक रुपये की चीज उनको पाँच रुपये में बेंच रहे थे।” ऐसी परिस्थितियों में भारतीय कारीगरों के लिए काम करना असम्भव हो गया था। भारतीय माल खरीदने और भारत में कम्पनी की पूँजी लगाने का तरीका ऐसा रखा गया कि हर बार गरीब बुनकरों और कारीगरों के साथ धोखा हो रहा था। सर विलियम बोल्ट्स के अनुसार- “आमतौर पर बुनकर की सहमति आवश्यक नहीं समझी जाती क्योंकि कम्पनी की ओर से नियुक्त गुमाश्ते उनसे जो चाहते हैं, हस्ताक्षर करा लेते हैं। जितने रुपये उन्हें दिए जाते हैं उतने लेने से इनकार करने पर वे रुपये उनकी कमरबंध में बाँध दिए जाते थे और कोड़ों से मार-पीटकर उन्हें भगा दिया जाता था।” कम्पनी और उसके कर्मचारियों के इस व्यवहार और तौर-तरीकों का भारतीय कुटीर उद्योगों पर विनाशकारी प्रभाव पड़ना अनिवार्य था। इंग्लैंड के अन्य व्यापारियों का भारत में प्रवेश हुआ। 19वीं शताब्दी के प्रारम्भ में इंग्लैंड का युवा वर्ग भारत में मची लूट में अपनी हिस्सेदारी प्राप्त करने के लिए खड़े हो गए। इसलिए 1813 में चाटर्र एक्ट द्वारा भारत में ईस्ट इण्डिया कम्पनी का व्यापारिक एकाधिकार समाप्त करके निजी व्यापारियों को भारत में व्यापार करने की छूट दे दी गई। इससे इंग्लैंड के बहुत सारे व्यापारी संस्थान अपना-अपना माल लेकर भारत आ गए। उनके आने से भारत में आर्थिक शोषण का नया दौड़ शुरू हो गया।

कार्ल मार्क्स ने 10 जून 1853 को न्यूयार्क डेली ट्रिब्यून में द ब्रिटिश रुल इन इण्डिया शीर्षक से एक लेख लिखा जिसमे उसने लिखा कि “ब्रिटिश भाप और विज्ञान ने समूचे हिन्दुस्तान में कृषि और कारखाना उद्योग की एकता को जड़ से उखाड़ फेंका। ब्रिटिश सरकार ने भारतीय माल के आयात पर अधिक शुल्क लगा दिया जिससे कि उसका आयात ही नहीं हो सके और दूसरी ओर अपने माल पर किसी तरह का शुल्क चुकाए बिना भारत पर अपना माल लाद दिया। साथ ही उत्पीड़न और अन्याय के द्वारा भारतीय मंडियों में अपना प्रभुत्व स्थापित कर दिया।

1814 ई० के बाद ब्रिटिश सरकार ने ऐसे कानूनों का निर्माण किया जिसके सहारे भारत से कच्चे माल का सुगमता पूर्वक निर्यात किया जा सके और तैयार माल को भारत में बेचा जा सके। लगातार पड़ रहे अकालों के कारण लाखों भारतीय भूखें मर रहे थे और भारत का अनाज बाहर भेजा जा रहा था। देश में चुंगी और सीमा शुल्क बढ़ा दिया गया ताकि भारतीय व्यापारी व्यापार नहीं कर सके। ब्रिटिश अधिकारी ट्रेवेलियन ने लिखा है-“व्यक्तिगत और घरेलू उपयोग की 235 से भी अधिक वस्तुओं पर अन्तर्देशीय कर लगाए गए थे।” ब्रिटिश शासकों ने भारतीय कार्यालयों में ब्रिटेन में बने कागज़ का उपयोग करना अनिवार्य कर दिया। इससे भारत के कागज़ उद्योग को भारी क्षति हुई। पश्चिम में कच्छ, सिंध और पंजाब प्रान्तों में ढाल, तलवार तथा अन्य हथियारों का खुबसूरत निर्माण कार्य होता था। ब्रिटिश शासन ने इसे पूरी तरह से समाप्त कर दिया। अंग्रेजी शासन ने हथियार से लैस रहने और उसके उपयोग की आवश्यकताओं को समाप्त कर उसपर प्रतिबन्ध लगा दिया इस कारण ये उद्योग भी नष्ट हो गया। ब्रिटिश सरकार ने भारत में रेलों का निर्माण सिर्फ इस उद्देश्य से किया कि वह ब्रिटेन के उद्योगों के कच्चे माल और सम्बन्धी आवश्यकताओं की पूर्ति करता रहे। 19वीं शताब्दी तक रेलों का जाल बिछा दिया गया। इससे ग्रामीण हस्तशिल्प वैश्विक प्रतिस्पर्धा का शिकार हो गया। यातायात के सुगम साधनों से गाँव के लोग शहर जाने लगे जिससे ग्रामीण समुदाय टूटने लगे। सस्ते यूरोपीय सूती कपड़े और बर्तनों के व्यापार अत्यधिक टूटने लगे। सस्ते यूरोपीय सूती कपड़े और बर्तनों के अत्यधिक आयात से ग्रामीण हस्तकला उद्योग नष्ट हो गये। इसप्रकार 19वीं शताब्दी के उतरार्द्ध तक भारत के कुटीर उद्योग धीरे-धीरे समाप्त हो गए और भारत की आत्मनिर्भरता समाप्त होने लगी। देश गुलाम तो हो ही गया था आर्थिक स्वावलम्बन की जगह गरीबी और

बाह्य संसाधनो पर निर्भर होना पड़ा।

भारत का इस ‘आत्मनिर्भर’ शब्द से बहुत पुराना नाता है। यह शब्द पहली बार सनˎ 1905 में इस्तेमाल किया गया था, जिसमे भारत के नेताओं ने अपनी जनता से अपील किया था कि वे अपने देश में बनी हुई वस्तुओं का इस्तेमाल करेंगे। इस आंदोलन के द्वारा भारतीयों ने विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार और स्वदेशी वस्तुओं का अंगीकार कर राष्ट्रीय शिक्षा एवं सत्याग्रह के महत्व पर बल दिया था। इसके बाद चौथी पंचवर्षीय योजना (1969-1979) में इंदिरागांधी के कार्यकाल के दौरान भी ‘आत्मनिर्भरता’ पर बल दिया गया था। एक कहावत के अनुसार ‘जो गरजता है, वह बरसता नहीं है’ बहुत दुःख के साथ कहना पड़ रहा है। आज भारत को आजाद हुए 70-75 वर्ष हो गए लेकिन हम भारतवासी आज भी ‘आत्मनिर्भर’ नहीं है।  

 कई वर्षो के इंतज़ार के बाद हम भारतियों को आत्मनिर्भर बनने के लिए ईश्वर ने अपना एक सेवादार मोदी जी के रूप में भेजा है। उन्होंने स्वयं कहा कि मैं जनता का सेवक हूँ। भारत के पहले प्रधान सेवक के रूप में अपने देश वासियों के लिए उन्होंने ऐसा कहा यह बहुत बड़ी बात है। अपने कहे हुए शब्दों को पूरा करने के लिए वे प्रयासरत हो गए। 1914 में जब नरेंद्र मोदी जी के नेतृत्व में एनडीए की सरकार बनी तब उन्होंने बुनियादी ग्रामीण कुटीर उद्योग से लेकर रक्षा एवं अन्तरिक्ष तक के क्षेत्र में देश की बुनियाद को मजबूत किया। स्वदेशी तथा स्वावलंबन के लिए अनेक कदम उठाये गए, जिसकी झलक हमें उनके द्वारा लागू किये गए विभिन्न योजनाओं में मिलती है। इन योजनाओं में प्रमुख रूप से- ‘मेक इन इण्डिया’, प्रधान मंत्री जन धन योजना, सांसद ग्राम योजना, प्रधान मंत्री कौशल योजना, स्वच्छ भारत अभियान, फीट इण्डिया मिशन,, मुद्रा बैंक योजना, स्टैंड अप इण्डिया स्कीम, आयुष्मान भारत योजना तथा किसान सम्मान निधि योजना आदि शामिल हैं। इसके अलावा भी उनके अनेक प्रयास हैं। जैसे योग के माध्यम से भारत को शारीरिक, मानसिक तथा आध्यात्मिक रूप से अपनी अलग पहचान दुनिया के सामने रखना।

इसी बीच कोरोना महामारी का जनवरी 2020 में आगमन हुआ। अभी हमारी अर्थ व्यवस्था पटरी पर आ ही रही थी कि इस महामारी के कारण देश में लॉकडाउन लगाना पड़ा। जिससे सभी प्रकार के आर्थिक और सामाजिक क्रिया कलापों पर रोक लग गई। सबसे बड़ी दुःख तो गरीब दिहाड़ी मजदूरों पर पड़ी, लघु उद्योग बंद हो गए। अचानक महानगरों से मजदूरों का गाँवों की तरफ पलायन होने लगा। इसी बीच चीन के साथ युद्ध होने की आशंकाएँ भी उत्पन्न होने लगी। इन सभी कारणों का संयुक्त प्रभाव हुआ। इस आपदा को अवसर में बदलने के लिए तथा अर्थव्यवस्था को गति देने के लिए भारत सरकार ने लॉकडाउन के साथ ही कई आर्थिक उपायों की घोषणा की। मई में ‘आत्मनिर्भर भारत’ पैकेज की घोषणा के साथ ‘लोकल के लिए वोकल’ होने का आह्वान किया गया।

आज का भारत 1947 वाला भारत नहीं है। हमें पूरी दुनिया के साथ कदम  से कदम मिलाकर चलना ही होगा। इसके लिए हमें सबसे पहले अपने पाँव और अपने-आपको मजबूत करना होगा, नहीं तो बाहर से आये हुए इन तूफानों के सामने हम टिक नहीं सकेंगे। इसी प्रयास में आत्मनिर्भर भारत के लिए ‘वोकल फॉर लोकल’ अभियान को दुनियाँ के संदर्भ में सकारात्मक अभियान के रूप में लेना ही होगा। प्रधानमंत्री मोदी के शब्दों में कहा जाए तो “हमें दुनियाँ से न तो आँखें झुकाकर, न आँखें उठाकर, बल्कि आँखों में आँखें डालकर बात करनी है।”

आत्मनिर्भर भारत- भारत के प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी जी का भारत को एक आत्मनिर्भर राष्ट्र बनाने सम्बन्धी एक दृष्टि (विजन) है। इसका पहली बार सार्वजनिक उल्लेख उन्होने 12 मई 2020 को किया था। इसके तहत प्रधानमन्त्री मोदी ने 20 लाख करोड़ रुपए के राहत पैकेज की घोषणा किए हैं, जो देश की सकल घरेलू उत्पाद का लगभग 10 प्रतिशत है। आत्मनिर्भर भारत अभियान के तहत सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्योगों के कल्याण के लिए कुल 16-घोषणाएँ की गईं। गरीबों, श्रमिकों और किसानों के लिए अनेक घोषणाएँ की गईं हैं। जिनमें किसानों की आय दोगुनी करने के लिए की गई 11 घोषणाएं भी शामिल हैं।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी ने देश की अर्थव्यवस्था को सही रास्ते पर लाने के लिए “आत्मनिर्भर भारत अभियान” की शुरुआत की है। जिससे देश के नागरिक आत्मनिर्भर बन कर स्वयं का रोजगार शुरू कर सके और साथ ही दूसरों को भी रोजगार उपलब्ध करा सके।”

‘आत्मनिर्भर भारत’ के निर्माण में वैश्वीकरण का बहिष्कार नहीं किया जाएगा। इस मिशन को दो चरणों में लागू किया जाएगा।

प्रथम चरण में चिकित्सा, वस्त्र, इलेक्ट्रॉनिक्स, प्लास्टिक, खिलौने जैसे क्षेत्रों को प्रोत्साहित किया जाएगा ताकि स्थानीय विनिर्माण और निर्यात को बढ़ावा दिया जा सके।

द्वितीय चरण में रत्न एवं आभूषण, फार्मा, स्टील जैसे क्षेत्रों को प्रोत्साहित किया जाएगा। पैकेज का बहुत बड़ा हिस्सा ऋण के रूप में देने की योजना है। सरकार बैंकों को ऋण वापसी की गारंटी देगी। कुछ क्षेत्रों में ब्याज दर में 2 प्रतिशत का भार सरकार स्वयं वहन करेगी। ऋण की रकम सरकार नहीं बैंक से जाएगी।

आत्मनिर्भर भारत अभियान के पाँच स्तंभ हैं  

(1अर्थव्यवस्था – एक ऐसी अर्थव्यवस्था जो छोटे-छोटे परिवर्तन (इंक्रिमेंटल चेंज) नहीं,   बल्कि ऊँची छलांग (क्वाण्टम जम्प) लगाए।

(2बुनियादी ढाँचा – एक ऐसा बुनियादी ढाँचा, जो आधुनिक भारत की पहचान बने। विदेशी कंपनियों को आकर्षित कर सके।

(3प्रौद्योगिकी – एक ऐसा सिस्टम, जिसमें आधुनिक तकनीक को अपनाने और समाज में डिजिटल तकनीक का उपयोग बढ़ाना शामिल है।

(4जनसंख्यिकी (डेमोग्राफी)– भारत की जीवन्त जनसांख्यिकी हमारी ताकत है, आत्मनिर्भर भारत के लिए ऊर्जा का स्रोत है।

(5माँग– भारत के पास बड़ा घरेलू बाजार और माँग है, उसे पूरी क्षमता से इस्तेमाल किए जाने की जरूरत है।

आत्मनिर्भर भारत का उद्देश्य है- भविष्य में भारत का नई संकल्पशक्ति और प्राणशक्ति के साथ विकास के राह में आगे बढ़ना। रोजगार के सभी सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम वर्गीय गृह उद्योगों को बढ़ावा देकर देश से बेरोजगारी और गरीबी को उन्मूलन करना है।

आत्मनिर्भर भारत अभियान के तहत महत्वपूर्ण योजनाएँ इस प्रकार हैं :

वन नेशन वन राशन कार्ड, पी एम स्वनिधि योजना, किसान क्रेडिट कार्ड योजना, प्रधानमंत्री मतस्य संपदा योजना, नाबार्ड के माध्यम से किसानों के लिए इमरजेंसी वर्किंग कैपिटल फंडिंग, इसीएलजीएस, आपातकालीन क्रेडिट लाइन गारंटी योजना (इमरजेंसी क्रेडिट लाइन गारंटी योजना), लिंक्ड प्रोत्साहन योजना (प्रोडक्सन लिंक्ड इंसेंटिभ योजना), प्रधान मंत्री योजना (शहरी), निर्माण तथा इन्फ्रास्ट्रक्चर सेक्टर को सहायता आदि।

आज के समय में भारत का आत्मनिर्भर होना अति आवाश्यक है। हमारे दैनिक जीवन के उपयोग में आने वाली वस्तुओं का आयात चीन या अन्य देशों से किया जाता है। जिसके लिए हमें अधिक मूल्य चुकाना पड़ता है। आत्मनिर्भर होने के बाद हमें किसी दूसरे देश के आगे हाथ नहीं फैलाना पड़ेगा। इससे उद्योग में वृद्धि होने के साथ-साथ अर्थव्यवस्था भी मजबूत होगी। देश में बेरोजगारी की समस्या का समाधान होगा। लोगों को रोजगार मिलेगा। प्रधानमंत्री नरेन्द्रमोदी जी ने अब गाँवों को तकनीक से जोड़कर उनकी आत्मनिर्भरता को बढ़ाने के प्रयास में पुरजोर संकल्पित है। इसी कड़ी में दीनदयाल उपाध्याय और नानाजी देशमुख का उल्लेख भी समीचीन होगा क्योंकि स्वयं प्रधानमंत्री इनसे प्रेरणा प्राप्त करते रहे हैं। दीनदयाल उपाध्याय ने अर्थव्यवस्था के विकेंद्रीकरण की बात करते हुए जनता का, जनता के लिए उत्पादन पर बाल दिया। अथार्त समाज अपनी आवश्यकताओं के अनुरुप उत्पादन करे तथा राज्य इनमे न्यूनतम हस्तक्षेप करें। यह एक प्रकार से आत्मनिर्भरता की ही बात है। नानाजी देशमुख ने तो स्वावलंबी गाँव को व्यवहार में मूर्त करके दिखा दिया था। उन्होंने चित्रकूट के 500 से अधिक गांवों में आत्मनिर्भरता की संकल्पना को लागू किया और इसका परिणाम शून्य बेरोजगारी, गरीबी से मुक्ति और यहाँ तक कि आपसी विवादों में भी शून्यता आया और एक स्वावलंबी परिवेश निर्मित हुआ।

इस ऐतिहासिकता में डॉ ए पी जे अब्दुल कलाम के मॉडल का चर्चा करना भी अनिवार्य है। डॉ कलाम ने वैकल्पिक विकास मॉडल ‘पुरा’ (प्रोविजन ऑफ अर्बन एमिनिटिज इन रूरल एरिया) सुझाया था इस योजना के मूल में यह था कि वे सभी आकर्षण के बिंदु जो शहरों तक सीमित हैं जैसे- स्वच्छ जल, उर्जा, स्वच्छता, हेल्थकेयर, शिक्षा, रोजगार प्रशिक्षण, परिवहन तथा व्यावसायिक और राजकीय सुशासन ये सभी गांवों तक पहुंचे इस प्रकार ग्रामीण स्तर पर एक ऐसी अवसंरचना विकास की योजना थी। जिससे बेहतर जीवन परिवेश की तालाश में लोग शहरों की ओर नहीं जाएँ। इससे शहरों पर भी कम भार पड़ेगा और बेहतर परिणाम मिलेगा। कूल मिलाकर बात यह है कि ‘पुरा’ भी स्थानीय आत्मनिर्भरता और टिकाऊ विकास पर बल देता है।

अतः यह स्पष्ट है कि वर्तमान सरकार की आत्मनिर्भरता की संकल्पना एक मजबूत ऐतिहासिक संदर्भ है और अब यह दृढ़ संकल्पित होकर इसे साकार करने की दिशा में बढ़ रहे है। सबसे दिलचस्प बात है कि वर्तमान सरकार की योजनाओं को देखे तो यह स्पष्ट हो जाता है कि वे लम्बे समय से आत्मनिर्भरता की दिशा में कार्यरत है। कोविड काल के कुछ उन सरकारी कार्यों पर गौर करते हैं तो जो इस संदर्भ में हुआ वह अपने आप में महत्वपूर्ण है।

निष्कर्ष: आत्मनिर्भर भारत अभियान के सामने अनेक प्रकार की चुनौतियाँ होने के बावजूद, भारत को औधोगिक क्षेत्र में मजबूती के लिए उन उद्यमों में निवेश करने की आवश्यकता है जिनमें भारत को वैश्विक ताकत के रूप में उभरने की संभावना हो। देश के नागरिकों को सशक्तिकरण करने की आवश्यकता है ताकि वे देश से जुड़ी समस्याओं का समाधान कर सके और बढ़ता भारत का निर्माण करने में अपना योगदान दे सके।

आत्मनिर्भर बनने के खातिर खुद ही तैयार होना है

आत्मनिर्भर बनना है, आत्मनिर्भर बनना है

‘मेड इन इंडिया’ को अपनाकर, आत्मनिर्भर बनना है

अपनी हस्तकला दिखलाना है, नई भारत बनाना है

स्थानीय उद्योगों को अपनाकर,

सपनों को पूरा करना है, आत्मनिर्भर बनना है ।

भारत की अर्थ व्यवस्था को,

शिखर तक पहुँचाना है, आत्मनिर्भर बनना है

अपना काम स्वयं करना है, आत्मनिर्भर बनना है

स्वतंत्र, मजबूत और आत्मनिर्भर होकर

दुनिया से आगे बढ़ाना है, आत्मनिर्भर बनना है।।

   सन्दर्भ ग्रन्थ सूचि :

  1. हिन्दी विकिपीडिया
  2. बर्नियर की भारत यात्रा – फ्रैन्विक्स बर्नियर एम. डी. – अनुवादक गंगा प्रसाद गुप्ता
  3. www.bharatkaitihas.com
  4. www.indiaspeaksdaily.com
  5. Deepawali.co.in आत्मनिर्भर भारत – लेख

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