बिहारी सतसई : इकाई–5

(सं० जगन्नाथ दास रत्नाकर दोहा 1 से 50)

बिहारी का जन्म: 1595 ई० में बसवा, गोविंदपुर, ग्वालियर में हुआ था। इस दोहा से भी  प्रमाण मिलता है।

“जन्म ग्वालियर जानिए, खंड बुंदेले बाल।

आई तरुनाई सुखद, मथुरा बसे ससुराल।।”

बिहारी का निधन: 1663 ई० में हुआ था।

पिता का नाम- केशवराय था।

गुरु का नाम- नरहरिदास (ये नरहरिदास तुलसीदास वाले नहीं है। ये (बिहारी) निम्बार्क संप्रदाय में दीक्षित थे)

  • बिहारी आरम्भ में शाहजहाँ के आश्रय में कवि रहे।
  • 1645 ई० में बिहारी का आमेर से (जयपुर) आगमन हुआ।
  • राजा जयसिंह अपनी नई पत्नी के प्रेम में डूबे रहते थे। वे महल के बाहर नहीं निकलते थे। उन्हें महल के राज कार्य करने के लिए बुलाने की किसी की भी हिम्मत नहीं होती थी। बिहारी के इस एक दोहे ने राजा जयसिंह के जीवन में नया परिवर्तन लाया और वे राजकार्य में संलग्न हो गए।   

“नहीं पराग नहीं मधुर मधु नहीं विकाश इही काल।

अली कली हौ सो बंध्यों आगे कौनु हवाल।।”

(विश्व साहित्य में आर्थी व्यंजना का यह सर्वश्रेष्ठ दोहा माना जाता है)। इसमें ‘अन्योक्ति’ अलंकार है।

  • ‘बिहारी सतसई’ की रचना मिर्जा राजा जयसिंह के पुत्र रामसिंह को लोक व्यवहार, राजनीति एवं नीति की शिक्षा देने के लिए की गई।

बिहारी सतसई की रचना: 1662 में पूर्ण हुई थी।

बिहारी सतसई के दोहे की संख्या:

डॉ नागेन्द्र के अनुसार: इसमें 713 दोहा और 6 सोरठा छंद है। पूरा 719 छंद है।

आचार्य रामचंद्र शुक्ल के अनुसार: 700 दोहा बताया गया है।

बाबू जगन्नाथ दास ‘रत्नाकर’ के द्वारा संपादित ‘बिहारी रत्नाकर’ में 700 दोहे है।

बिहारी के विषय में विशेष तथ्य:

  • ‘बिहारी’ रीतिकाल के ‘रीतिसिद्ध’ काव्यधारा के कवि थे।
  • डॉ नगेन्द्र ने इन्हें ‘रीतिबद्ध’ कवि माना था।
  • बिहारी रीतिकाल के ‘प्रतिनिधि’ कवि भी थे।
  • बिहारी द्वारा रचित ‘बिहारी सतसई’ हिन्दी में ‘श्रृंगार सतसई’ परम्परा की पहली रचना मानी जाती है।
  • रामचरितमानस को छोड़कर सबसे अधिक टीकाएँ ‘बिहारी सतसई’ पर लिखी गई है।
  • बिहारी सतसई पर सबसे प्रमाणिक टीका बाबू जगन्नाथ दास ‘रत्नाकर’ की मानी जाती है।
  • इस टीका ग्रंथ का नाम ‘बिहारी रत्नाकर’ है।

बिहारी के विषय में महत्वपूर्ण कथन:

“सतसइया के दोहरे ज्यों नावक को तीर।

देखन में छोटे लगे घाव करे गंभीर।।”

कुछ विद्वानों के अनुसार यह दोहा महावीरप्रसाद दिवेदी जी का है।

“भाँति-भाँति रचना सरस, देव गिरा ज्यों व्यास।

त्यों भाषा सब कविन में विमल बिहारी दास।।

ये दोहा बाबू जगन्नाथ ‘दास रत्नाकर’ की है।

लालाभग्वान दीन का कथन: इनका अन्य नाम ‘मास्टर भगवान दीन’ भी था।

“तुलसी और केशव के पश्चात बिहारी- हिन्दी साहित्य के चौथे रत्न थे।”

  • ‘देव और बिहारी’ (कृष्ण बिहारी मिश्र) ने किताब लिखी।
  • दूसरी किताब ‘बिहारी और देव’ (लाला भगवानदीन ने लिखी)    
  • ‘कविवर बिहारी’ नामक पुस्तक बाबू जगन्नाथ दास रत्नाकर ने लिखा था।
  • ‘बिहारी’ पुस्तक विश्वनाथ प्रसाद मिश्र ने लिखी
  • ‘बिहारी की वागविभूति’ पुस्तक विश्वनाथ प्रसाद मिश्र ने लिखी।
  • इसमें बिहारी की प्रशंसा किया गया है।

रामचंद्र शुक्ल के कथन-

“कविता उनकी श्रृंगारी है, पर प्रेम की उच्च भूमि पर पहुँचती नीचे रह जाती है।”

रामचंद्र शुक्ल के कथन-

“श्रृंगार रस के ग्रंथों में जीतनी ख्याति और मान ‘बिहारी सतसई’ का हुआ उतना और किसी का नहीं।”

प० पदमसिंह शर्मा का कथन-

“बिहारी सतसई शक्कर की रोटी है, जहाँ से भी खाओ मीठी ही लगेगी।”

प० पदमसिंह शर्मा का कथन – “बिहारी का विरह वर्णन उत्कृष्ट है।”

प० पदमसिंह शर्मा का कथन – “बिहारी की खड़ी बोली कर्ण कटु एवं नीरस है।”

प० पदमसिंह शर्मा का कथन – “हिन्दी के कवियों में श्रीयुत बिहारी लाल का स्थान सबसे ऊँचा है।”

प० पदमसिंह शर्मा ने बिहारी के काव्य की सराहना करते हुए लिखा है कि- “बिहारी के दोहे का अर्थ गंगा की विशाल जलधारा के सामान है, जो शिव की जटाओं में तो समा गई थी। परन्तु उसके बाहर निकालते ही इतनी असीम और विस्तृत हो गई कि लम्बी-चौड़ी धरती में भी सीमित नहीं रही रह सकी। बिहारी के दोहे रस के सागर हैं, कल्पना के इंद्रधनुष हैं, भाषा के मेष हैं। उसमे सौंदर्य के मादक चित्र अंकित हैं।”

राधाचरण गोस्वामी का कथन-

“बिहारी ऐसा पीयूसवर्षी घनश्याम है, जिसका उदय होते ही वह सूर, तुलसी पर आच्छादित हो जाते है।”

जॉर्ज अब्राहम ग्रियर्सन का कथन-

“समस्त यूरोप के साहित्य में बिहारी सतसई के समकक्ष कोई रचना नहीं है।”

विश्वनाथ प्रसाद के शब्दों में- “बिहारी मुक्तक साहित्य के बेजोड़ कवि है।”

आचार्य हजारी प्रसाद दिवेदी के शब्दों में-

“बिहारी का बिहारी सतसई रसिको के हृदय का घर है।”

आचार्य हजारीप्रसाद दिवेदी के शब्दों में-

“रीतिकाल के सबसे अधिक लोकप्रिय कवि बिहारी है।”

मिश्रबंधु के शब्दों में-

“इस छोटे से ग्रंथ में कवि रत्न ने मानो समुंद्र कूजे में बंद कर दिया हो।”

डॉ गणपति चंद्रगुप्त के शब्दों में-

“बिहारी के काव्य में तीनों गुणों (प्रतिभा, अध्ययन, अभ्यास) समन्वय मिलता है।”

बिहारी के शब्दों में-

“करी कमाई सतसई भरे स्वाद अनेक”

‘बिहारी रत्नाकर’

संपादक: बाबू जगन्नाथ दास रत्नाकर

संपादन वर्ष: 1925 ई०

  • कुल दोहों की संख्या: 700 सौ है। (यह बिहारी सतसई की सबसे प्रमाणिक टीका मानी जाती है)।

बिहारी रत्नाकर के महत्वपूर्ण दोहे:

मेरी भव-बाधा हरौ, राधा नागरि सोइ।
जा तन की झाँई परे, स्याम हरित-दुति होइ॥1।।

अपने अंग के जानि कै जोबन-नृपति प्रबीन।
स्तन, मन, नैन, नितम्ब की बड़ौ इजाफा कीन।।2।।

अर तैं टरत न बर-परे, दई मरक मनु मैन।
होड़ाहोडी बढि चले चितु, चतुराई, नैन।।3।।

औरें-ओप कनीनिकनु गनी घनी-सिरताज।
मनीं धनी के नेह की बनीं छनीं पट लाज।।4।।

सनि-कज्जल चख-झख-लगन उपज्यौ सुदिन सनेहु।

क्यौं न नृपति ह्वै भोगवै लहि सुदेसु सबु देहु।।5।

सालति है नटसाल सी, क्यौं हूँ निकसति नाँहि।
मनमथ-नेजा-नोक सी खुभी खुभी जिय माँहि।।6।।

जुवति जोन्ह मैं मिलि गई, नैन न होति लखाइ।
सौंधे कैं डोरैं लगी अली चली सँग जाइ।।7।।

हौं रीझी, लखि रीझिहौ छबिहिं छबीले लाल।
सोनजुही सी होवति दुति-मिलत मालती माल।।8।।

बहके, सब जिय की कहत, ठौरु कुठौरु लखैं न।

छिन औरे, छिन और से, ए छबि छाके नैन।।9।।

फिरि फिरि चितु उत हीं रहतु, टुटी लाज की लाव।
अंग-अंग-छबि-झौंर मैं भयौ भौंर की नाव।।10।।

नीकी दई अनाकानी, फीकी परी गुहारि।
तज्यौ मनौ तारन-बिरदु बारक बारनु तारि।।11।।

चितई ललचौहैँ चखनु डटि घूँघट-पट माँह।
छह सौं चली छुवाइ कै छिनकु छबीली छाँह।।12।।

जोग-जुगति सिखए सबै मनौ महामुनि मैन।
चाहत पिय-अद्वैतता काननु सेवन नैन।13।।

खरी पातरी कान की, कौन बहाऊ बानि।
आक-कली न रत्नी करै, अली, जिय जानि।।14।।

पिय-बिछुरन कौ दुसहु दुखु, हरषु जात प्यौसार।
दुरजोधन लौं देखियत तजत प्रान इहि बार।।15।।

झीनैं पट मैं झुलमुली झलकति ओप अपार।
सुरतरु की मनु सिंधु मैं लसति सपल्ल्व डार।।16।।

डारे थोड़ी-गाड़, गहि नैन-बटोहि, मारि।
चिलक-चौंध मैं रूप-ठग, हाँसी-फाँसी डारि।।17।।

कीनै हूँ कोरिक जतन अब कहि काढै कौनु।
भो मन मोहन-रूप मिलि पानी मैं कौ लौनु।।18।।

लाग्यो सुमनु ह्वै है सफलु आतप-रोसु निवारि।
बारी, बारी अपनी सींचि सुहृदयता-बारि।।19।।

अजौ तरयौना हीं रह्यो श्रुति सेवत इक-रंग।
नाक-बास बेसरि लह्यो बसि मुकुतनु कैं संग।।20।।

जम करि-मुँह-तरहरि परयौ, इहिं धरहरि चित लाउ।
विषय-तृषा परिहरि अजौं नरहरि के गुन गाउ।।21।।

पलनु पीक, अंजनु अधर, धरे महावरू भाल।
आजु मिले, सु भली करी; भले बने हौ लाल।।22।।

लाज-गरब-आलस-उमग-भरै नैन मुसकात।
राति-रमी रति देति कहि औरें प्रभा प्रभात।।23।।

पति रति की बतियाँ कहीं, सखी लखी मुसकाइ।
कै कै सबै टलाटलीं, अलीं चलीं सुखु पाइ।।24।।

तो पर वारौं उरबसी, सुनी, राधिके सुजान।
तू मोहन कैं उर बसी ह्वै उरबसी-समान।।25।।

कुच-गिरि चढ़ि, अति थकित ह्वै, डीठि मुंह-चाड़।
फिरि न टरि, परियै रही, गिरी चियुक की गाड़।।26।।

बेधक अनियारे नयन, बेधत करि न निषेधु।
बरवट बेधतु मो हियौ तो नासा कौ बेधु।।27।।

लौनैं मुहँ दीठि न लगै, यौं कहि दीनौ ईठि।
दूनी ह्वै लागन लगी, दियै दिठौना, दीठि।।28।।

चितवनि रूखे दृगनु की, हाँसी-बिनु मुसकानि।
मानु जनायौ मानिनी, जानि लियौ पिय, जानि।।29।।

सब ही त्यौं समुहाति छिनु, चलति सबनु दै पीठि।

वाही त्यौं ठहराति यह, कविलनवी लौं, दीठि।।30।।

कौन भाँति रहिहै बिरदु अब देखिवी, मुरारि।
बीधे मोसौं आइ कै गीधे गीधहिं तारि।।31।।

कहत, नटत, रीझत, खिझत, मिलत, खिलत, लजियात।
भरे भौन मैं करत हैं, नैननु हीं सब बात।।32।।

वाही कोई चित चटपटी, धरत अटपट पाइ।
लपट बुझावत बिरह की कपट-भरेऊ आइ।।33।।

लखि गुरुजन-बिच कमल सौं सीसु छुवायौ स्याम।
हरि-सनमुख करि आरसी हियैं लगाई बाम।।34।।

पाइ महावर दैन कौं नाइनि बैठी आइ।
फिरि फिरि, जानि महावरी, एड़ी मीड़ति जाइ।।35।।

तोहीं, निरमोही, लाग्यौ मो ही इहैं सुभाउ।
अनआऐं आवै नहीं, आऐं आवतु आउ।।36।।

नेहु न, नैननु, कौं कछू उपजी बड़ी बलाइ।
नीर-भरे नितप्रति रहैं, तऊ न प्यास बुझाइ।।37।।

नहि परागु नहि मधुर मधु नहिं बिकासु इहिं काल।
अली, कली ही सौं बंध्यौ, आगैं कौन हवाल।।38।।

लाल, तुम्हारे विरह की अगनि अनूप, अपार।
सरसै बरसै नीर हूँ, झर हूँ मिटै न झार।।39।।

देह दुलहिया की बढ़ैं ज्यौं ज्यौं जोबन-जोति।
त्यौं त्यौं लखि सौत्यैं सबैं बदन मालिन दुति होति।।40।।

जगतु जनायौ जिहिं सकलु, सो हरि जान्यौं नाँहि।
ज्यौं आँखिनु सबु देखियै, आँखि न देखी जाँहि।।41।।

सोरठा

मंगलु बिंदु सुरंगु, मुखु ससि, केसरि आड़ गुरु।
इक नारी लहि संगु, रसमय किय लोचन-जगत।।42।।

दोहा

पिय तिय सौं हँसि कै कह्यौं, लखैं दिठौना दीना।
चंदमुखी, मुखचंद तैं भली चंद-समु की।।43।।

कौंहर सी एडीनु की लाली देखि सुभाइ।
पाइ महावरू देइ को आपु भई बे-पाइ।।44।।

खेलन सिखए, अलि, भलैं चतुर अहेरी मार।
कानन-चारी नैन-मृग नागर नरनु सिकार।।45।।

रससिंगार-मंजनु किए, कंजनु भंजनु दैन।
अंजनु रंजनु हूँ बिना खंजनु गंजनु, नैन।।46।।

साजे मोहन-मोह कौं, मोहीं करत कुचैन।
कहा करौ, उलटे परै टोने लोने नैन।।47।।

याकै उर औरे कछू लगी बिरह की लाइ।
पजरै नीर गुलाब कैं, पिय की बात बझाइ।।48।।

कहा लेहुगे खेल पैं, तजौं अटपटी बात।
नैंक हँसौंही हैं भई भौंहे, सौहैं खात।।49।।

डारी सारी नील की ओट अचूक, चुकैंन।
मो मन-मृग करबर गहैं अहे! अहेरी नैन।।50।।

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